Tag Archives: बाज़ार

दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में-हिन्दी शायरी


जन्म लिया हिन्दी में
पढ़े लिखे अंग्रेजी में
आजाद रहे नाम के
गुलामी सिखाती रही आधुनिक शिक्षा।
अब कटोरा लेकर नहीं
बल्कि शर्ट पर कलम टांग कर
मांग रहे पढ़े लिखे लोग नौकरी की भिक्षा।
——–
आंखों से देख रहे पर्दे पर दृश्य
कानों से सुन रहे शोर वाला संगीत
नशीले रसायनों की सुगंध से कर रही
सभी की नासिका प्रीत,
मुंह खुला रह गया है जमाने का
देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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हंसी हो या स्यापा बाजार में बिकता है- हिन्दी शायरी


खुशी हो या ग़म
हंसी हो या स्यापा
अब बाजार में बिकता है,
कब क्या करना है
प्रचार में इशारा दिखता है।
कभी दिल को गुदगुदाना,
कभी आंखों में आंसु लाना,
सौदागरों का करना है जज़्बातों का सौदा
उनको नहीं मतलब इस बात से कि
किसका बसेगा
या किसका उजड़ेगा घरौंदा,
कलम का गुलाम
उनके पांव तले
उनकी उंगलियों के इशारे पर
हर पल की कहानी लिखता है।

———
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

—————————–
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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योगी और यौवन-हिन्दी व्यंग्य कविता (yogi and sex relation-hindi comic poem


हैरानी है इस बात पर कि
समलैंगिकों के मेल पर लोग
आजादी का जश्न मनाते हैं,
मगर किसी स्त्री पुरुष के मिलन पर
मचाते हैं शोर
उनके नामों की कर पहचान,
पूछतें हैं रिश्ते का नाम,
सभ्यता को बिखरता जताते हैं।
कहें दीपक बापू
आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक
पता नहीं कौन हैं,
सब इस पर मौन हैं,
जो समलैंगिकों में देखते हैं
जमाने का बदलाव,
बिना रिश्ते के स्त्री पुरुष के मिलन
पर आता है उनको ताव,
मालुम नहीं शायद उनको
रिश्ते तो बनाये हैं इंसानों ने,
पर नर मादा का मेल होगा
तय किया है प्रकृति के पैमानों ने,
फिर जवानी के जोश में हुए हादसों पर
चिल्लाते हुए लोग, क्यों बुढ़ाये जाते हैं।
———-
योगी कभी भोग नहीं करेंगे
किसने यह सिखाया है,
जो न जाने योग,
वही पाले बैठे हैं मन के रोग,
खुद चले न जो कभी एक कदम रास्ता
वही जमाने को दिखाया है।
जानते नहीं कि
भटक जाये योगी,
बन जाता है महाभोगी,
पकड़े जाते हैं जब ऐसे योगी
तब मचाते हैं वही लोग शोर
जिन्होंने शिष्य के रूप में अपना नाम लिखाया है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।

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बाज़ार में कोई नहीं लिखवा सकता दिल से-व्यंग्य कविता


बेचने के लिए लिखे या बोले शब्द
होते हैं बहुत चमकदार
पर पढ़कर या सुनकर
जल्दी खो देते हैं असर
क्योंकि उनकी आत्मा जल्दी मर जाती है
भले ही लगते हैं वजनदार
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बाज़ार में खरीदे और बेचे जाते शब्द
पढ़वाने और सुनाने के लिए
वैसे ही जैसे बाजार में रोटी भी
सजती है बिकने के लिए
शब्द भी कई रंगों से भर जाते हैं
नफरत और दिखावटी प्यार में
ढूंढते हुए अपनी जगह
दौलतमंदों के इशारे पर चलते
इसलिए महलों में पलते
फिर बिक जाते हैं बड़े बाज़ार में
बाज़ार में अपने लिए खुशी ढूंढता
आदमी उनसे भी लिपट जाता है
जैसे बाज़ार की रोटी खाता है
मगर बाजार के शब्द
सभी नहीं खरीद पाते
घर में ही दाल रोटी मुश्किल से पाते
लिखी जाती हैं उन पर भी कहानियां
शब्द बटोर लेते हैं
उन पर नाम, नामा और तालियाँ
फिर खो जाते हैं भीड़ में
बाज़ार जुट जाता है फिर नये तलाशने के लिए
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बिकने के लिए लिखे शब्द
चमककर फिर खो जाते
लोग पढ़कर और सुनकर सो जाते
बाज़ार में कोई नहीं लिखवा सकता दिल से
इसलिए वह इंसानों की रूह पर
असर नहीं कर पाते
लिखते हैं जो दिल से
वही जमीन और आसमान में छा जाते
बाज़ार में सौदागर कभी
नहीं ढूंढते दिल से लिखे शब्दों को
लिखने वाला कब आँखें मूंदे तो
मुफ्त में लूट लें शब्दों का खजाना
इसी इन्तजार में जुट जाते

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