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15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर विशेष हिन्दी लेख-भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बिना अधूरापन


          देश में एक बार फिर 15 अगस्त 2011 सोमवार को स्वतंत्रता दिवस या आजादी के दिन के अवसर पर अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। देश में बढ़ते भ्रष्टाचार, अराजकता, बेरोजगारी, भूखमरी, बेरोजगारी, अस्वास्थ्य की स्थित और गरीबी की वजह से अनेक लोगों के लिये 15 अगस्त की आजादी एक भूली बिसरी घटना हो गयी है। आजादी को अब 65 वर्ष हो गये हैं और इसका मतलब यह है कि कम से हर परिवार की पांच से सात पीढ़ियों ने इस दौरान इस देश में सांस ली होगी। हम देखते हैं कि पीढ़ी दर पीढ़ी एतिहासिक घटनाओं की स्मृतियां फीकी पड़ती जाती हैं। एक समय तो उनको एक तरह विस्मृत कर दिया जाता है। अगर 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस और और 26 जनवरी गणतंत्र दिवस हर वर्ष औपचारिक रूप से पूरे देश में न मनाया जाये तो शायद हम इन तारीखों को भूल चुके होते। वैसे निंरतर औपचारिक रूप से मनाये जाने के बाद भी कुछ वर्षों बाद एक दिन यह स्थिति आयेगी कि इसे याद रखने वालों की संख्या कम होगी या फिर इसे लोग औपचारिक मानकर इसमें अरुचि दिखायेंगे।
            ऐतिहासिक स्मृतियों की आयु कम होने का कारण यह है कि इस संसार में मनुष्य की विषयों में लिप्तता इस कदर रहती है कि उसमें सक्रियता का संचार नित नयी एतिहासिक घटनाओं का सृजन करता है। मनुष्य जाति की इसी सक्रियता के कारण ही जहां इतिहास दर इतिहास बनता है वही उनको विस्मृत भी कर दिया जाता है। हर पीढ़ी उन्हीं घटनाओं से प्रभावित होती है जो उसके सामने होती हैं। वह पुरानी घटनाओं को अपनी पुरानी पीढ़ी से कम ही याद रखती है। इसके विपरीत जिन घटनाओं का अध्यात्मिक महत्व होता है उनको सदियों तक गाया जाता है। हम अपने अध्यात्मिक स्वरूपों में भगवत् स्वरूप की अनुभूति करते हैं इसलिये ही भगवान श्री विष्णु, श्री ब्रह्मा, श्री शिव, श्री राम, श्री कृष्ण तथा अन्य स्वरूपों की गाथायें इतनी दृढ़ता से हमारे जनमानस में बसी हैं कि अनेक एतिहासिक घटनायें उनका विस्मरित नहीं करा पातीं। हिन्दी के स्वर्णिम काल में संत कबीर, मानस हंस तुलसी, कविवर रहीम, और भक्तमणि मीरा ने हमारे जनमानस को आंदोलित किया तो उनकी जगह भी ऐसी बनी है कि वह हमारे इतिहास में भक्त स्वरूप हो गये और उनकी श्रेणी भगवान से कम नहीं बनी। हम इन महामनीषियों के संबंध में श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित इस संदेश का उल्लेख कर सकते हैं जिसमें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘जैसे भक्त मुझकों भजते हैं वैसे ही मैं उनको भजता हूं’। अनेक विद्वान तो यह भी भी कहते हैं कि भक्त अपनी तपस्या और सृजन से भगवान की अपेक्षा बढ़े हो जाते हैं।
स्वतंत्रता संग्राम के समय अनेक महापुरुष हुए। उनके योगदान का अपना इतिहास है जिसे हम पढ़ते आ रहे हैं पर हैरानी की बात है कि इनमें से अनेक भारतीय अध्यात्म से सराबोर होने के बावजूद भारतीय जनमानस में उनकी छवि भक्त या ज्ञानी के रूप में नहीं बन पायी। स्पष्टतः स्वतंत्रता संग्राम में उनकी सक्रिय छवि ने उनके अध्यात्मिक पक्ष को ढंक दिया। स्थित यह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को भी अनेक लोग राजनीतिक संत कहते हैं जबकि उन्होंने मानव जीवन को सहजता से जीने की कला सिखाई।
        ऐसा नहीं है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन राष्ट्र या मातृभूमि को महत्व नहीं देता। भगवान श्रीकृष्ण ने तो अपने मित्र श्री अर्जुन को राष्ट्रहित के लिये उसे क्षात्र धर्म अनुसार निर्वाह करने का उपदेश दिया। दरअसल क्षत्रिय कर्म का निर्वाह मनुष्य के हितों की रक्षा के लिये ही किया जाता है। यह जरूर है कि चाहे कोई भी धर्म हो या कर्म अध्यात्मिक ज्ञान होने पर ही पूर्णरूपेण उसका निर्वाह किया जा सकता है। देखा जाये तो भारत और यूनान पुराने राष्ट्र माने जाते हैं। भारतीय इतिहास के अनुसार एक समय यहां के राजाओं के राज्य का विस्तार ईरान और तिब्बत तक इतना व्यापक था कि आज का भारत उनके सामने बहुत छोटा दिखाई देता है। ऐसे राजा चक्रवर्ती राजा कहलाये। यह इतिहास ही राष्ट्र के प्रति गौरव रखने का भाव अनेक लोगों में अन्य देशों के नागरिकों की राष्ट्र भक्ति दिखाने की प्रवृत्ति की अपेक्षा कम कर देता है। इसी कारण अनेक बुद्धिमान इस देश के लोगों में राष्ट्रप्रेम होने की बात कहते हैं। यह सही है कि बाद में विदेशी शासकों ने यहा आक्रमण किया और फिर उनका राज्य भी आया। मगर भारत और उसकी संस्कृति अक्षुण्ण रही। इसका अर्थ यह है कि 15 अगस्त को भारत ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त की और कालांतर वैसे ही महत्व भी माना गया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय अध्यात्मिक को तिरस्कृत कर पश्चिम से आये विचारों को न केवल अपनाया गया बल्कि उनको शैक्षणिक पाठ्यक्रमों से जोड़ा भी गया। हिन्दी में अनुवाद कर विदेशी विद्वानों को महान कालजयी विचारक बताया गया। इससे धीमे धीमे सांस्कृतिक विभ्रम की स्थिति बनी और अब तो यह स्थिति यह है कि अनेक नये नये विद्वान भारतीय अध्यात्मक के प्रति निरपेक्ष भाव रखना आधुनिकता समझते हैं। इसके बावजूद 64 साल के इस में इतिहास की छवि भारत के अध्यात्मिक पक्ष को विलोपित नहीं कर सकी तो इसका श्रेय उन महानुभावों को दिया जाना चाहिए जिन्होंने निष्काम से जनमानस में अपने देश के पुराने ज्ञान की धारा को प्रवाहित रखने का प्रयास किया। यही कारण है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को मनाने तथा भीड़ को अपने साथ बनाये रखने के लिये उनके तरह के प्रयास करने पड़ते हैं जबकि राम नवमी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि पर स्वप्रेरणा से लोग उपस्थित हो जाते हैं। एक तरह से इतिहास और अध्यात्मिक धारायें प्रथक प्रथक हो गयी हैं जो कि होना नहीं चाहिए था।
        एक जो सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्वतंत्रता ने भारत का औपचारिक रूप से बंटवारा किया जिसने इस देश के जनमानस को निराश किया। अनेक लोगों को अपने घरबार छोड़कर शरणार्थी की तरह जीवन पाया। शुरुआती दौर में विस्थापितों को लगा कि यह विभाजन क्षणिक है पर कालांतर में जब उसके स्थाई होने की बात सामने आयी तो स्वतंत्रता का बुखार भी उतर गया। जो विस्थापित नहीं हुए उनको देश के इस बंटवारे का दुःख होता है। विभाजन के समय हुई हिंसा का इतिहास आज भी याद किया जाता है। यह सब भी विस्मृत हो जाता अगर देश ने वैसा स्वरूप पाया होता जिसकी कल्पना आजादी के समय दिखाई गयी। ऐसा न होने से निराशा होती है पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इसे उबार लेता है। फिर जब हमारे अंदर यह भाव आता है कि भारत तो प्राचीन काल से है राजा बदलते रहे हैं तब 15 अगस्त की स्वतंत्रता की घटना के साथ जुड़ी हिंसक घटनाओं का तनाव कम हो जाता है।सीधी बात कहें तो हमारे देश के जनमानस वही तिथि या घटना अपनी अक्षुण्ण बनाये रख पाती है जिसमें अध्यात्मिकता का पुट हो। एतिहासिकता के साथ अध्यात्मिकता का भाव हो वरना भारतीय जनमानस औपचारिकताओं में शनै शनै अपनी रुचि कम कर देता है। इसी भाव के कारण दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से राष्ट्रीय पर्वों पर आम जनमानस का उत्साह धार्मिक पर्वों के अवसर पर कम दिखाई देता है। हालांकि अध्यात्मिकता के बिना एतिहासिक घटनाओं के प्रति आम जनमानस अधूरापन दिखाना जागरुक लोगों को बुरा लगता है।
अथर्ववेद से स्वतंत्रता दिवस पर विशेष लेख-राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा गुणी नागरिकों के बल पर ही संभव (atharvved se swatantrata diwas  or inddepandent day  15 august par vishesh hindi lekh-good citizen can security self nation or matrabhumi) 
  हमारे यहां स्वतंत्रता संग्राम में दौरान आज़ादी तथा देश भक्ति का नारा इस तरह लगा कि हमारे यहां पेशेवर अभियान संचालक लोगों की भीड़ को एकत्रित करने के लिये आज भी लगाते हैं। लोगों   के राष्ट्रप्रेम की धारा इस तरह बह रही है कि आज भी स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा गांधी जयंती पर भाव विभोर करने वाले गीत लोगों को लुभाते हैं। जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन होता है तो उस समय मातृभूमि का नारा देकर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करने के प्रयास होते हैं जिनसे प्रभावित होकर लोगों की भीड़ जुटती भी है।

         देश को स्वतंत्रता हुए 64 वर्ष हो गये हैं और इस समय देश की स्थिति इतनी विचित्र है कि धनपतियों की संख्या बढ़ने के साथ गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या उनसे कई गुना बढ़ी है। आर्थिक उदारीकरण होने के बाद तो यह स्थिति हो गयी है कि उच्च मध्यम वर्ग अमीरों में आ गया तो गरीब लोग अब गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गये हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में करोड़पतियों की संख्या में बढ़ोतरी हो गयी है तो समाज के हालत बता रहे हैं कि रोडपति उससे कई गुना बढ़े हैं। इसी कारण विकास दर के साथ अपराध दर भी तेजी बढ़ी है। आधुनिक तकनीकी जहां विकास में योगदान दे रही है तो उसके सहारे अपराध के नये नये तरीके भी इजाद हो गये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा देश आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभासों के बीच सांसे ले रहा है। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो 64 वर्ष पूर्व मिली आजादी पर ही सवाल उठा रहे हैं। अनेक लोग तो अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ करने की आवश्यकता बता रहे हैं। मातृभूमि की रक्षा के नारे की गूंज इतनी तेज हो उठती है कि सारा देश खड़ा होता है। तब ऐसा लगता है कि देश में बदलाव की बयार बहने वाली है पर बाद में ऐसा होता कुछ नहीं है। वजह साफ है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा नारों से नहीं होती न ही तलवारें लहराने या हवा में गोलियां चलाने से शत्रु परास्त होते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सत्यं बृहदृत्तामृग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्पुरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु्।।
                ‘‘सत्य पथ पर चलने की प्रवृत्ति, हृदय का विशाल भाव, सहज व्यवहार, साहस, कार्यदक्षता तथा प्रत्येक मौसम को सहने की शक्ति, ज्ञान के साथ विज्ञान में समृद्धि तथा विद्वानों का सम्मान करने के गुणों से ही राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा की जा सकती है।’’
           राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा के लिये सतत और गंभीर प्रयास करने होते हैं। अपने नागरिकों को ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण करना होता है। उनका नेतृत्त करने वालों को न केवल शारीरिक रूप से सक्षम होना चाहिए बल्कि उनमें साहस भी होना चाहिए। समाज के नागरिक वर्ग के लोग आर्थिक रूप से उत्पादक, भेदभाव से रहित तथा सत्यमार्गी होना चाहिए। हम देख रहे हैं कि अभी तक विकसित कहलाने वाले पश्चिमी राष्ट्र अब लड़खड़ाने लगे हैं क्योंकि उनके यहां अनुत्पादक नागरिकों का वर्ग बढ़ रहा है। इसके विपरीत हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है पर जिस तरह हमने पश्चिमी के विचारों को स्थान दिया है उसके चलते हमारे यहां भी अनुत्पादक नागरिक वर्ग बढ़ने की संभावना हो सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा का नारा लगाना अलग बात है पर उसके लिये सतत और गंभीर प्रयास करते रहना अलग बात है और इस बात को समझना चाहिए।
वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro
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कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख (kanya bhrun hatya aur madhya yugin samaj-hindi lekh


              हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
        इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
           जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
                  कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं।
            इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
           फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।

हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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साभार समाचार प्रस्तुति-हिन्दी व्यंग्य (sabhar samachar prustuti-hindi vyangya)


धरती पर विचरने वाला सौर मंडल! कल जब इस विषय पर लेख लिखा था तब यह स्वयं को ही समझ में नहीं आ रहा था कि यह चिंत्तन है कि व्यंग्य! हमें लगने लगा कि यह किसी की समझ में नहीं आयेगा, क्योंकि उस समय दिमाग सोचने पर अधिक काम कर रहा था लिखने में कम! मगर ऐसे में उस पर आई एक टिप्पणी से यह साफ हो गया कि जिन लोगों के लिये लिखा गया उनको समझ में आ गया।
मुश्किल यह है कि चिंत्तन लिखने बैठते हैं तब किसी विषय पर तीव्र कटाक्ष करने की इच्छा होती है, तब कुछ न कुछ व्यंग्यात्मक हो ही जाता है। जब व्यंग्य लिखने बैठते हैं तो अपने विषय से संबंधित कुछ गंभीर चर्चा हो ही जाती है और वह चिंत्तन दिखने लगता है।
ब्लाग पर लिखते हुए पहले हम यह सोचते थे कि दोनों भाव एक साथ न लायें पर जब समाचार चैनलों को समाचार से अधिक खेल, हास्य तथा मनोरंजन से संबंधित अन्य चैनलों की सामग्री प्रसारित करते देखते हैं तो सोचते हैं क्यों न दोनों ही विद्यायें एक साथ चलने दी जायें। हम उनकी तरह धन तो नहीं कमा सकते पर उनकी शैली अपनाने में क्या बुराई है? इधर अमेरिका के राष्ट्रपति का भारत आगमन क्या हुआ? सारे चैनलों के लिये यही एक खबर बन गयी है। कब किधर जा रहे हैं, आ रहे हैं और खा रहे हैं, यह हर पल बताया जा रहा है। ऐसा लगता है कि बाकी पूरा देश ठहर गया है, कहीं सनसनी नहीं फैल रही। कहीं हास्य नहंी हो रहा है। कहीं खेल नहीं चल रहा है।
हैरानी होती है जिस क्रिकेट से यही प्रचार माध्यम अपनी सामग्री जुटा रहे थे उसके टेस्ट मैच-यह भारत और न्यूजीलैंड के बीच अहमदाबाद में चल रहा है-की खबर से मुंह फेरे बैठे हैं। कल इनका कथित महानायक या भगवान चालीस रन बनाकर आउट हो गया जबकि यह उससे पचासवें शतक की आशा कर रहे थे। हो सकता है कि उस महानायक या भगवान ने सोचा हो कि क्यों इनके अस्थाई भगवान यानि अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने खड़ा होकर धर्मसंकट खड़ा किया जाये। इस धरती पर विचरने वाले सौर मंडल-पूंजीपति, धार्मिक ठेकेदार, अराजक तत्व तथा उनके दलाल-के लिये स्वर्ग है अमेरिका। वैश्वीकरण ने पूरी दुनियां को एक राष्ट्र बना दिया है अमेरिका! इसलिये अमेरिका के राष्ट्रपति को अब विश्व का दबंग कहकर प्रचारित किया जा रहा है। बाकी राष्ट्रों के प्रमुख क्या हैं, यह वही जाने और उनके प्रचार माध्यम! ऐसे में क्रिकेट के भगवान या महानायक ने चालीस रन पर अपनी पारी निपटाकर प्रचार माध्यमों को संकट से बचा लिया। अगर वह शतक बनाता तो संभव है टीवी चैनल और अखबार में संकट पैदा हो जाता कि किसको उस दिन का महानायक बनाया जाये। अपनी खबर को अगले मैचों तक के लिये रोक कर उसने प्रचार माध्यमों को धर्मसंकट से बचा लिया। ख् वह पचासवां शतक नहीं बना सके-इस खबर से ऐसा लगता है कि जैसे नब्बे तक पहुंच गये थे, पर वह तो चालीस रन बनाकर आउट हो गया। इस तरह इन भोंपूओं ने सारी दुनियां में धरती पर विचरने वाले सौर मंडल को बताया कि देखो कैसे क्रिकेट के भगवान या महानायक ने अपनी वफादारी निभाई।
जिस पूंजीवाद को हम रोते हैं वह अब चरम पर है। अब तो ऐसा लगता है कि विश्व के अनेक विकासशील देशों के राष्ट्रप्रमुख अपने लिये अमेरिका को ही संरक्षक मानने लगे हैं। यही कारण है कि पूंजी के बल पर चलने वाले प्रचार माध्यम भले ही चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका जनाभिमुख होने का होने का दावा करें पर यह सच नहीं है। वह अपने समाचार और विषय जनता पर थोप रहे हैं। कम से कम भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर जनमानस इतना उत्साहित नहीं है जितना समाचार चैनल उसे दिखा रहे हैं। इस समय देश में दीपावली का पर्व की धूम है। इधर अमेरिका का भव्य विमान भारत में उतर रहा था भारत में लोग तब फटाखे फोड़ने और मिठाई खाने में लोग व्यस्त थे। फिर भाईदूज का दिन भी है जब लोग अपने घरों से इधर उधर जाते और आते हैं। ऐसा लगता है कि यह यात्रा कार्यक्रम ही इस तरह बनाया गया कि भारत के लोग घरों में होंगे तो उन पर अपने महानायक का प्रचार थोपा जायेगा। हालांकि अनेक मनोरंजन और धार्मिक चैनलों के चलते यह संभव नहीं रहा कि कोई एक प्रकार के चैनल अपना कार्यक्रम थोप ले पर समाचारों में दिलचस्पी रखने वालों की संख्या कम नहीं है और अंततः उनको एक कम महत्व का समाचार बार बार देखना पड़ा।
समाचार पत्र पत्रिकाऐं, टीवी चैनल और रेडियो इनको एक प्रकार से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। पहले केवल प्रकाशन पत्रकारिता को ही चौथा स्तंभ माना जाता था पर अब आधुनिक तकनीकी के उपयोग के चलते बाकी अन्य दोनों माध्यमों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। समाचार चैनलों के कार्यकर्ता यह कहते है कि लोग इसी तरह के कार्यक्रम पसंद कर रहे हैं पर उन्हें यह पता होना चाहिए कि वह अपने मनोरंजन कार्यक्रमों को समाचारों की आड़ में थोप रहे हैं। इतना ही नहीं समाचारों के नाम पर भी अब अपने नायक बनाने लगे हैं। कभी फिल्म तो कभी क्रिकेट तो कभी टीवी धारावाहिकों से जुड़े लोगों को अनावश्यक प्रचार देने लगते हैं।
यह देश के समाचार चैनलों के लिये ही चिंताजनक है कि आम जनमानस में उनको एक समाचार चैनल की तरह नहीं बल्कि मनोरंजन कार्यक्रमों के नाम पर ही जाना जा रहा है। इन चैनलों की छबि भारत में नहीं बल्कि बाहर भी खराब हो गयी है। अगर ऐसा न होता तो ओबामा बराक हुसैन के भारत दौरे में मुंबई के कार्यक्रमों में उनको दूर नहीं रखा जाता। याद रखिये वहां के कार्यक्रमों में केवल दिल्ली दूरदर्शन को ही आने का अवसर मिला। क्या कभी अमेरिका के राष्ट्रपति की यात्रा के दौरन किसी पश्चिमी देश में भी ऐसा होता है कि वहां के समाचार चैनलों में किसी एक को ही ऐसा अवसर मिलता हो। यहां हम देखें तो अपने देश के समाचार चैनल संभव है कि विदेशी समाचार चैनलों से अधिक कमा रहे हों पर उनकी वैसी छबि नहीं है। इसका कारण यह है कि एक समाचार चैनल के नाते उनको जनमानस से सहानुभूति नहीं मिलती और जो उन्होंने खुद ही खोई है। वरना क्या वजह है कि दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दावा करने वाले अनेक समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों की ऐसी उपेक्षा की गयी और वह भी दुनियां के सबसे महान लोकतांत्रिक देश होने का दावा करने वाले अमेरिका के रणनीतिकारों के कम कमलों से। बहरहाल यह तय है कि धरती पर विचरने वाले सौर मंडल के सूर्य कहे जाने पूंजीपतियों का उनको वरदहस्त बराबर मिलेगा क्योंकि उनके महानायक को वैसा ही प्रचार दिया जिसकी चाहत थी। यह पहला अवसर था कि जब कोई समाचार चैनल यह दावा नहीं कर रहा था कि यह सीधा प्रसारण आप हमारे ही चैनल पर देख रहे हैं। सभी ने दूरदर्शन से साभार कार्यक्रम लिया।
एक बुद्धिमान आज सब्जी खरीद रहे थे। पास में उनके एक मित्र आ गये। उन्होंने बुद्धिमान महाशय से कहा-‘आज ओबामा जी का क्या कार्यक्र्रम है? कहंी पढ़ा या सुना था। हमारे यहां तो सुबह से लाईट नहीं थी।’
बुद्धिमान महाशय ने कहा-‘क्या खाक देखते? हमारी भी लाईट सुबह से नहीं है। पता नहीं ओबामा का आज क्या कार्यक्रम है?
सब्जी वाले ने बीच में हस्तक्षेप किया‘यह आप लोग लाईट न होने से किसकी बात कर रहे हो।’
बुद्धिमान ने कहा-‘तू चुपचाप सब्जी बेच, ऐसे समाचार सुनना और देखना हमारे जैसे फालतू लोगों का काम है या कहो मज़बूरी है।’
मित्र ने अपना सिर हिलाया और बोला-‘हां, यह बात सही है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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कोई है जो देखता और सुनता है-चिंतन (संदर्भ-हैती का भूकंप)


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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जब उस भयानक भूकम्प का हैती आक्रमण हुआ होगा तो मृत्यु ने अट्टाहास किया होगा। इतना सारा भोजन एक साथ मिलने का सौभाग्य मृत्य को हमेशा नहीं मिलता। जीवन देवता की सासें कुछ देर रुक गयी होंगी मगर वह भी संभला होगा और जिनकी सांसें बची होंगी उनके बचाने का प्रयास किया होगा। हैती के उस भूकंप की बहुत सारी यादें वहां के उन लोगों में रहेंगी जो जिंदा बच गये होंगे। जहां मौत चहूं और हमला करती है तब जीवन की धारा भले ही पतली होने के बावजूद प्रभावी ढंग से प्रवाहित हो ही जाती है और अपना अस्तित्व प्रमाणित करने के लिये कुछ ऐसे लोगों की सांसें भी बचाती है जो लगभग मुत्यु के पेट में चले गये होंगे। अनेक प्राकृतिक आपदाओं के समय जहां मृत्यु अपना भयानक रूप दिखाती है वहीं जीवन अपनी सहृदयता के कुछ अंश अवश्य प्रस्तुत करता है।
वह लड़का उस दुकान में काम करता था जहां कोकाकोला और स्नैक्स बिकते थे। भूकंप के कंधे पर सवार मृत्यु ने उस दुकान को भी तहस नहस कर दिया। चारों तरफ से दुकान ढह गयी। जब मलबा गिर रहा होगा तब मृत्यु का अट्टाहास शायद ही किसी ने देखा होगा। जो लोग मर गये वह क्या बतायेंगे और जो बच लड़का बच गया वह भी बेहोश हो गया, पता नहीं उसने मौत का चेहरा देखा था कि नहींे।
जब मौत दीवारों और छत को मलबा बनाकर गिरा रही होगी तब उस बेहोश लड़के की बची सांसोें को जीवन देवता ने पढ़ा होगा-उसके खाते में शेष रही सांसों के हिसाब पर उसकी नजर पड़ी होगाी। वह उसके पास गिरने वाले पत्थर और लकड़ी के टुकड़ों को दूर करता होगा या फिर उनको उससे दूर गिेराता होगा। जीवन मृत्यु के इस द्वंद्व को भला वह बंद आंखें कहां देख पायी होंगी जिनको बाद में अपने जीवन की लड़ाई खुद ही लड़नी थी। जीवन ने बचायी होंगी कोकाकोला की बोतलेे और स्नैकस के वह भाग जो बाद में उस लड़के काम आने होंगे क्योंकि उन पर लिखा होगा उनको उदरस्थ करने वालो का नाम जिसे मिटा पाना मृत्यु के बस में नहीं था और इसलिये जीवन उनको संजोने आया था।
पूरे 11 दिन तक वह लड़का वहां पड़ा रहा। लोग आसपास से गुजर रहे थे। वह उनको पुकारता पर कोई नहीं सुन पाता। मृत्यु अपना काम कर चुकी थी पर जीवन भी अभी थका नहीं था। मृत्यु को सारे साधन सहज उपलब्ध हो जाते है। कुछ भी न हो तो वह आकाश को जमीन पर गिरा सकती है पर जीवन के लिये अपना काम धीरज से करना होता है। मौत कुछ भी बिना सोचे समझे अस्त्र शस्त्र जुटाकर आदमी पर पटक सकती है पर जीवन को सोच समझकर अपने साधन जुटाते हुए इंसान की मदद करनी होती है। मौत को समय न अधिक मिलता है न लगता है पर जीवन के पास धीरज के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं होता। मौत हवा का सहारा भी ले सकती है पर जीवन देवता का कार्य इस धरती के पदार्थों के बिना नहीं हो सकता-इसलिये उसे कोकाकोला की बोतलें और स्नैक्स के भाग की रक्षा भी करनी होती है।
उस लड़के ने कहा ‘मै चिल्लाया नहीं, केवल प्रार्थना करता रहा।’ वह प्रार्थना कोई अदृश्य शक्ति सुन रही होगी। मृत्यु प्रार्थना का अवसर नहीं देती क्योंकि वह बहुत जल्दी करती है। उसे मालुम है कि मैं रुकी तो कोई प्रार्थना करेगा तब मोहपाश में बंध जाउंगी। एक जगह पढ़ने को मिला था कि पैसा लेकर दूसरे आदमी का कत्ल करने वालो लोगों को सबसे पहले यही सिखाया जाता है कि ‘जिसको मारना हो उसकी आंखों में झांकना नहीं चाहिये, क्योंकि तब उसके प्रति मोह जाग जाता है।’ मौत के इस खेल को कत्ल के सौदागर बहुत अच्छी तरह जानते हैं। मौत आसानी से दी जा सकती है इसलिये लोग इस काम में लिप्त हो जाते हैं जो लिप्त नहीं होते वह भी कोई जीवन की सहज धारा बहाने में दिलचस्पी नहीं रखते। जीवन आसानी से नहीं दिया जा सकता। दूसरे से कुछ छीनना आसान है पर किसी को देने के लिये मन तैयार नहीं होता। दूसरे से मुफ्त पाने की चाह हरेक के मन में होती है पर त्याग का भाव विरलों में होता है। प्रार्थनायें सभी करते हैं पर सर्वशक्तिमान सभी की नहीं सुनता। जब प्रार्थना हृदय से की जाये तब उसके आगे वह भी लाचार होता है। उसको कोई रूप नहंी है, रंग नहीं है और न पहचान है। वह अनंत है और उसका आभास किया जा सकता है वह भी जीवन की बहती धारा में। जब उस लड़के को राहत दल ने बचाया होगा तब उसने जाना होगा कि जीवन का मोल क्या है? सामान्य स्थिति में कौन इस अमूल्य मानव जीवन का महत्व जान पाता है? पता नहीं वह उस जीवन की धारा को समझ पाया कि नहीं जो उसके पास उसकी सांसें बचाने के लिये निरंतर बहती रहीं।
लोहे, पत्थर और लकड़ी की टूटी शिलायें जो मौत ने अपनी धार से काट गिरायी थीं जीवन उसमें दबने के बावजूद अपनी ताकत दिखा रहा था। एक जीवात्मा थी उस देह में जो परमात्मा का स्मरण कर रही थी। वह पल कैसे रहे होंगे जब जीवन उन शिलाओं से बाहर आया होगा? उसकी अनुभूति तो वही कर सकता है जिसने उसे धारण किया हो? जीवन और मृत्यु का यह संघर्ष हमेशा दिखता है पर जब लड़ा जाता है तब होने वाला संताप जितना सताता है उतना ही विजय प्राप्त करने पर आनंद मिलता है। मृत्यु सत्य है पर जीवन भी असत्य नहीं है क्योंकि उसकी धारा भी निरंतर बहती है। एक मिटता है दूसरा पैदा होता है। माया का स्वरूप व्यापक है इसलिये दिखती है, तो मरती भी है जबकि सत्य अत्यंत सूक्ष्म हैं-या कहें कि उसका भौतिक अस्तित्व तो है ही नहीं-इसलिये अदृश्यव्य है मगर जीवन का आधार तो वही है भले ही उसकी धारा अत्यंत पतली होने के बावजूद शक्तिशाली है।

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