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वनडे मातरम् तो क्रिकेटर पितृम-हिन्दी व्यंग्य (oneday matrama and cricket is fatharam-hindi vyangya)


बड़ा अजीब लगता है जब एक टीवी चैनल में वनडे मातरम् शब्द देखकर हैरानी होती है। देश के स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने अपने अभियान में जमकर गया होगा ‘वंदे मातरम्’! भारत का राष्ट्रगान भी वंदेमातरम् शब्द से शोभायमान है। सच तो यह है कि वंदेमातरम् शब्द का उच्चारण ही मन ही मन में राष्ट्र के प्रति जान न्यौछावर करने वाले शहीदों की याद दिलाता है। देश के शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि देते हुंए मन भर जाता है और मन गुनगुनाता है ‘वंदे मातरम्’!
आम मनुष्य और उसकी भावनाओं के दोहन करने के लिये उत्पाद करना बाज़ार और उनको खरीदने के लिये प्रेरित करना उसके प्रचार का काम है। अभी तक हम सुनते थे कि अमुक समाज के इष्ट का नाम बाज़ार ने अपने उत्पाद के लिये प्रयोग मेें किया तो विरोध हो गया या किसी पत्रिका ने किसी के धार्मिक संकेतक का व्यवसायिक उपयोग किया तो उस प्रतिबंध लग गया। अनेक प्रकार के जूते, जींस, तथा पत्रिकायें इस तरह के विरोध का सामना कर चुके हैं। धर्म, जाति, तथा भाषा के नाम पर समूह बनते हैं इसके लिये उसके प्रतीकों या इष्ट के नाम या नारे का उपयेाग बाज़ार के लिये अपने उत्पाद तथा प्रचार के लिये उपभोक्ता को क्रय करने के लिये प्रयुक्त करना कठिन होता है। मगर हमारे राष्ट्र का कोई अलग से समूह नहीं है बल्कि उपशीर्षकों में बंटे समाज उसकी पहचान हैं जिसे कुछ लोग गर्व से विभिन्न फूलों का गुलदस्ता कहते हुए गर्व से सीना फुला देते हैं।
यही कारण है कि वंदे मातरम अब बाज़ार के प्रचारकों के लिये वनडे मातरम् हो गया है। अगला विश्व क्रिकेट भारत में होना है। उसके लिये प्रचारकों ने-टीवी, रेडियो, तथा अखबार-ने अपना काम शुरु कर दिया है। कोई टीवी चैनल बल्ले बल्ले कर रहा है तो कोई वनडे मातरम् गा रहा है। इस श्रृंखला में वह लोग बीसीसीआई की टीम के विश्व कप के लिये चुनी गयी टीम के सदस्यों को महानायक बनाने पर तुले हैं। मैच में अधिक से अधिक लोग मैदान पर आयें यही काफी नहीं है बल्कि टीवी के सामने बैठकर आंखें फोड़ते हुए बाज़ार के उत्पादों का विज्ञापन प्रचार देखें इसके लिये जरूरी है कि लगातार उनका ध्यान विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता की तरफ बनाये रखा जायें, इस उद्देश्य से बाज़ार तथा प्रचार प्रबंधक सक्रिय हैं।
प्रचारकों को पैसा चाहिये तो बाज़ार उत्पादकों को अपने उत्पाद के लिये उपभोक्ता। दोनों मिलकर भारतीय समाज में एक नया समाज बनाना चाहते हैं जिसमें क्रिकेट और फिल्म का शोर हो। लोग एक नंबर में देखें और दो नंबर में सट्टा खेलें। मज़़े की बात यह है कि प्रचार माध्यमों में युवाओं को प्रोत्साहन देने की बात की जाती है ताकि वह भ्रमित रहे होकर उनके बताये मार्ग का अनुकरण करते हुए केवल मनोरंजन में उलझे रहें या महानायक बनने का सपना देखते हुए अपना जीवन नष्ट कर लें।
वनडे मातरम् यानि एक दिवसीय क्रिकेट मैच उनके लिये माता समान तो क्रिकेट खिलाड़ी पिता समान हो गये हैं क्योंकि वह उनके लिये धनार्जन का एक मात्र साधन हैं। इनसे फुरसत हो तो फिल्म अभिनेता तो गॉडफादर यानि धर्मपिता की भूमिका निभाते हैं। इसका उदाहरण एक टीवी चैनल पर देखने को मिला।
एक तेजगेंदबाज को घायल होने के बावजूद टीम में शामिल किया गया पर जब उसके अनफिट होने का चिकित्सीय प्रमाण पत्र मिला तो एक अन्य तेज गेंदबाज-जिसे केरल एक्सप्रेस कहा जाता है-को शामिल किया गया। केरल एक्सप्रेस को जब पहले टीम में शामिल से बाहर रखा गया तो उसके लिये सहानुभूति गीत गाये थे। अब जब उसे शामिल किया गया तो उसकी खबर और फोटो के साथ एक फिल्म अभिनेता के फोटो के साथ ही उसकी एक फिल्म का वाक्य‘जब अब हम किसी को बहुत चाहते हो तो कायनात उसके साथ हमें मिला ही देती है’, चलाया गया। दोनों में कोई तारतम्य नहीं है। ऐसे बहुत सारी फिल्मों में डायलाग मिल जायेंगे। ढेर सारे अभिनेताओं ने बोले होंगे मगर वह अभिनेता तो प्रचार माध्यमों का धर्म पिता है और जैसा कि स्पष्ट है कि विश्व कप तक क्रिकेट खिलाड़ी पिता हो गये हैं। दोनों को मिला कर बन गया बढ़िया कार्यक्रम।
इसलिये जब वनडे मातरम् नारा सुनते हैं तो कहना ही पड़ता है क्रिकेटर पितृम। मजा आता है जब नारों के जवाब में ऐसे नारे अपने दिमाग़ में आते हैं यह अलग बात है कि उनको नारे लगाने के पैसे मिलते हैं पर हमें फोकटिया लिखना होता है और मेहनत भी पड़ती है। न लिखें तो लगता है कि अपना मनोरंजन नहीं किया।
लेखक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
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आईपीएल समाप्त, ब्लाग पर पाठक संख्या बढ़ना शुरु-हिन्दी आलेख (IPL end,increas hindi blog vews)


आईपीएल क्रिकेट प्रतियोगिता खत्म होने के अगले दिन ही अगर ब्लाग पर पाठक संख्या बढ़ने लगे तो विचारणीय विषय तो बनता ही है। यह लेखक पहले क्रिकेट का बहुत शौकीन था पर जब इसमें फिक्सिंग की बात आयी तो फिर मन विरक्त हो गया। 2006 में भारत विश्व कप प्रतियोगिता से बाहर हो गया तो उसके बाद लगभग क्रिकेट से मन हट ही गया। अंतर्जाल पर आने से पता लगा कि ऐसा अनेक लोगों के साथ हुआ है। हालत यह हो गयी थी कि 10 महीने तक अपने देश के लोगों के लिये क्रिकेट यहां एक ‘‘गंदा खेल’’ बन गया मगर फिर 2007 में भारत की क्रिकेट टीम को बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में जीत मिली तो फिर यह खेल लोकप्रिय हुआ। अब जिस तरह क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग के आरोप लग रहे हैं उससे तो लगता है कि इसमें भारत को जबरन जितवाया गया था ताकि यहां के लोगों द्वारा इस पर खर्च लगातार किया गया जाये-याद रहे इस क्रिकेट केवल भारत के धन पर ही चल रहा है।
एक बार ऐसा लगा कि यह खेल इतना लोकप्रिय नहंी बन पायेगा पर अब आसपास माहौल देखकर ऐसा लगता है कि पुरानी पीढ़ी के जो लोग निराश हो गये थे वह भी फिर इस खेल को देखने लगे। वैसे तो यह कहा जा रहा था कि इसे केवल सट्टे या दाव खेलने वाले ही अब इसमें रुचि ले रहे हैं पर अब ऐसा लगने लगा है कि इसमें फिर लोग ‘‘ईमानदार मनोंरजन’’-यह बात आजकल एक खूबसूरत सपना ही है- तलाश रहे थे। थे इसलिये लिखा क्योंकि अब फिर इस पर उंगलियां उठने लगी है।
हिन्दी ब्लाग लिखने के साथ ही पाठक भी अच्छी संख्या में मिलने लगे थे। पिछली बार आईपीएल अफ्रीका में हुआ तब भी इतना अधिक पाठक संख्या में अंतर नहंी आया था। मार्च के आखिरी सप्ताह से जब भारत के परीक्षाकाल चलता है तब पाठक संख्या गिरती है। यह हुआ भी! मगर इधर आईपीएल प्रारंभ होते ही तो स्थिति बदल गयी। इसी दौरान एक ऐसी घटना भी हुई जिसने हिन्दी ब्लाग जगत में पाठक संख्या का भारी संकट दिखाई दिया। वह यह थी कि पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी-उस भी फिक्सिंग का आरोप हैं और अभी तक अपने देश की टीम से बाहर है-भारत की एक महिला टेनिस खिलाड़ी से प्रेम प्रसंग सामने आया। उसमें भी पैंच था। वह यह कि उसने भारत की उसी शहर एक लड़की से उसने निकाह किया था जहां महिला टेनिस खिलाड़ी रहती थी। जब वह भारत में अपनी भावी वधु के शहर पहुंचा तो पूर्व वधु ने उस पर मुकदमा दायर कर दिया। इस खबर की प्रचार माध्यमों में जमकर चर्चा हुई। उस समय हिन्दी ब्लाग संख्या एकदम गिर गयी। तब तो ऐसा लगने लगा कि क्रिकेट, टेनिस और फिल्म वाले मिलकर कोई ऐसा संयुक्त उद्यम चला रहे हैं जिससे संगठित प्रचार माध्यमों को निरंतर सनसनी और मनोरंजन के लिये सामग्री मिलती रहे। अब यह तो पता नहीं कि अंतर्जाल पर सक्रिय अन्य वेबसाईटों या ब्लाग की क्या स्थिति रही पर इस ब्लाग लेखक का अनुमान है कि कम से कम भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की आवाजाही कम ही रही होगी।
जैसे ही किकेट और महिला टेनिस खिलाड़ी का मामला थमा, इस ब्लाग लेखक के ब्लाग पर पाठक संख्या बढ़ी। अब आईपीएल के मैच थमे तो अब गुणात्मक वृद्धि देखने में आयी है। अब है तीसरी क्षति की भरपाई। वह है परीक्षाकाल की! अब परीक्षायें तो समाप्त हो गयी हैं पर शिक्षक तथा छात्रों के साथ उनके पालकों को भी इस समय घर से बाहर अवकाश् को कारण प्रस्थान होता है और इस दौरान उनकी अतंर्जाल पर सक्रियता नहीं रह पाती। इस ब्लाग लेखक ने परीक्षाकाल तथा क्रिकेट मैच के दौरान पाठकों की कमी का अनुमान करते हुए एक पाठ लिखा था पर प्रेम प्रसंग एकदम अप्रत्याशित रूप से सामने आया।
कुछ दिनों पहले आस्ट्रेलिया का एक किस्सा सुनने में आया था जिसमें एक टीवी चैनल में रिपोर्टर ने अपने सनसनीखेज समाचारों के लिये पांच कत्ल करवाये थे। जहां कत्ल होता वह पुलिस से पहले पहुंच जाता और वहां से सीधे अपने चैनल को खबर देता था। इसलिये शक के दायरे में आ गया। जब हम भारत के संगठित -रेडियो, टीवी चैनलों, तथा समाचार पत्रों-की बात करते हैं तो यह बात तय है कि उनके आदर्श तो ऐसे ही गोरे देश हैं। मगर आस्ट्रेलिया की जनसंख्या कम है जबकि भारत में यह समस्या नहंी है। इसलिये यहां के प्रचार माध्यमों को बिना कत्ल कराये ऐसे ही समाचार मिल जाते हैं जो नाटकीय होते हैं। अधिकतर भारतीय टीवी चैनल फिल्म और क्रिकेट के सहारे हैं तो यही स्थिति क्रिकेट और फिल्म अभिनेताओं की भी है कि वह बिना प्रचार के चल नहीं सकते। इसलिये कभी कभी तो लगता है कि फिल्म और क्रिकेट के सक्रिय लोग योजनाबद्ध ढंग से ऐसे समाचार बनाते हैं जिससे दोनों का लाभ हो। आईपीएल को घोषित तौर से फिल्म जैसा मनोरंजन माना गया है।
वैसे जो स्थित सामने आयी है उससे तो लगता है कि आईपीएल विवाद के कारण क्रिकेट अपनी आभा फिर खो सकता है। जब यह विवाद चल रहा था तब उसे देखने वाले शायद समाचार सुन और पढ़ नहंी रहे थे इसलिये निरंतर चिपके रहे पर अब जब वह देखेंगे कि वह तो ठगे गये तब फिर उन्हें अपने मनोरंजन के लिये नये साधन तलाशने होंगे। हालांकि मई में बीस ओवरीप विश्व कप प्रतियोगिता हो रही है और उसमें बीसीसीआर्इ्र की टीम के-इसे भारत की प्रतिनिधि टीम होने का भ्रम पालना पड़ता है क्योंकि यह वहां अकेली जो होती है-प्रदर्शन को लेकर अनेक लोगों को संदेह है। वैसे तो पहले भी बुरी तरह हारी थी पर इस बार अगर इतना बुरा खेलती है तो गये काम से! इस दौरान पाठकों की संख्या पर अंतर पड़ने की संभावना नहीं है क्योंकि यह भारतीय समयानुसार देर रात को खेले जायेंगे। बहरहाल यह बात भी दिल्चस्प है कि इस लेखक ने क्रिकेट देखना छोड़ा दिया है पर यह विषय है कि किसी न किसी रूप में चला ही आता है।

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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बाज़ार का प्रेम प्रायोजन-व्यंग्य


बचपन में एक गाना सुनते थे कि ‘ऐ, मेरे वतन के लोगों, जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए उनकी याद करो कुर्बानीं।’ यह गाना सुनकर वास्तव में पूरी शरीर रोमांचित हो उठता था। आज भी जब यह गाना याद आता है तो उस रोमांच की याद आती है-आशय यह है कि अब पहले रोमांच नहीं होता।
आखिर ऐसा क्या हो गया कि अब लगता है कि उस समय यह जज़्बात पैदा करने वाले गीत, संगीत या फिल्में समाज में कोई जाग्रति या देशभक्ति के लिये नहीं   बनी बल्कि उनका दोहन कर कमाई करना ही उद्देश्य था।
फिर क्रिकेट में देशभक्ति का जज़्बात जागा। जब देश जीतता तो दिल खुश होता और हारता तो मन बैठ जाता था। अब वह भी नहीं रहा। अब स्थिति यह है कि जिसे पूरा देश भारतीय क्रिकेट टीम यानि अपना प्रतिनिधि मानता है उसे अनेक अब एक भारतीय क्रिकेट नियंत्रण बोर्ड नामक एक क्लब की टीम ही मानते हैं जो व्यवसायिक आधार पर अपनी टीम बनाती है और आर्थित तंत्र के शिखर पुरुष उसके प्रायोजक मसीहा हैं। इसका कारण यह है कि अब देशों की सीमायें तोड़कर विदेशों से खिलाड़ी यहां बुलाकर देश के कुछ शहरों और प्रदेशों के नाम से क्लब स्तरीय टीमें बनायी जाती हैं। देश क्रिकेट पर पैसा खर्च कर रहा है, तो इस पर सट्टे खेलने और खिलाने वालों के पकड़े जाने की खबरे आती हैं जिसमें अरबों रुपये का दाव लगने की बात कही जाती है। आखिर यह पैसा भी तो इसी देश का ही है।
यह देखकर लगता है कि हम तो ठगे गये। अपना कीमती वक्त फोकट में इस बाजार और उसकी मुनादी करने वालों-संगठित प्रचार माध्यम-के इशारों पर क्रिकेट पर गंवाते रहे।
अब हो क्या रहा है। विश्व उदारीकरण के चलते बाजार देशभक्ति के भाव को खत्म कर वैश्विक जज़्बात बनाना चाहता है। भारतीय बाजार पर स्पष्टतः बाहरी नियंत्रण है। अगर पश्चिम में उसे पैसा सुरक्षित चाहिये तो मध्य एशिया में उसे भारत में ही अपने को मजबूत बनाने वाल संपर्क भी रखने हैं। अब बात करें पाकिस्तान की। पाकिस्तान एक देश नहीं बल्कि एक उपनिवेश है जिस पर पश्चिमी और मध्य एशियों के समृद्धशाली देशों का संयुक्त नियंत्रण है। स्थिति यह है कि जब देश के हालत बिगड़ते हैं तो उसकी सरकार अपनी सेना के साथ बैठक ही मध्य एशिया के देश में करती है। अगर किसी गोरे देश की टीम पाकिस्तान नहीं जाना चाहती तो वह उसका कोटा मध्य एशिया के देश में खेलकर पूरा करती है। यह क्रिकेट एक और दो नंबर के व्यवसायियों के लिये अरबों रुपये का खेल हो गया है और अरब देश तेल के अलावा इस पर भी अपनी पकड़ रखते हैं। मध्य एशिया इस समय अवैध, अपराधिक तथा दो नंबर के धंधों का केंद्र बिन्दू हैं अलबत्ता कथित रूप से अपने यहां धर्म के नाम पर कठोर कानून लागू करने का दावा करते हैं पर यह केवल दिखावा है। अलबत्ता समय समय पर आम आदमी को इसका निशाना बनाते हैं। अभी दुबई में अवैध कारोबार में लगे 17 भारतीयों को इसलिये फांसी की सजा सुनाई गयी है क्योंकि उन पर एक पाकिस्तानी की हत्या का आरोप है। इसको लेकर भारत में जो प्रतिक्रिया हुई है वह ढोंग के अलावा कुछ नहीं दिखती। दुबई को भारतीय बाजार से ही ताकत मिलती है। उसके भोंपू-संगठित प्रचार माध्यम-उनको बचाने के लिये पहल कर रहे हैं। अगर वाकई भारतीय अमीर और उनके प्रचारक इतने संवदेनशील हैं तो वह दुबई की सरकार पर सीधे दबाव क्यों नहीं डालते? पीड़ितों को कानूनी मदद के नाम वहां की अदालतों में पेश होने से कोई लाभ नहीं होगा। हद से हद आजीवन कारावास हो जायेगा। अगर भारतीय प्रचार तंत्र में ताकत है तो वह क्यों नहीं पूछता कि ‘आखिर तुम्हारे यहां यह अवैध धंधा चल कैसे रहा था, तुम तो बड़े धर्मज्ञ बनते हो।’
प्रसंगवश याद आया कि एक स्वर्गीय प्रगतिशील नाटककार की पत्नी भी वहां नाटक पेश करने गयी थी। उसमें वहां के धर्म की आलोचना शामिल थी। इसके फलस्वरूप उसे पकड़ लिया गया। पता नहीं उसके बाद क्या हुआ? उस समय यहां के लोगों ने कोई दबाव नहंी डाला। उस प्रगतिशील नाटककारा से सैद्धांतिक रूप से सहमति न भी हो पर उसके साथ हुए इस व्यवहार की निंदा की जाना चाहिये थी पर ऐसा नहीं हुआ।
एक बात तय है कि भारतीय धनाढ्य एक हो जायें तो यह मध्य एशिया के देश घुटनों के बल चलकर आयेंगे। कभी सुना है कि किसी अमेरिकी या ब्रिटेनी को को मध्य एशिया में पकड़ा गया है। इसके विपरीत यहां की आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार शक्तियां तो मध्य एशिया देशों से खौफ खाती दिखती हैं। स्थित यह है कि उनको प्रसन्न करने के लिये उनके पाकिस्तान नामक उपनिवेश से भी दोस्ताना दिखाने लगी हैं।
अभी हाल ही में भारत की एक महिला टेनिस खिलाड़ी और पाकिस्तान के बदनामशुदा क्रिकेट खिलाड़ी की शादी को लेकर जिस तरह भारतीय प्रचार माध्यमों ने निष्पक्षता दिखाने की कोशिश की वह इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण बनने जा रहा है कि भारतीय बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों के लिये देशभक्ति तथा आतंकवाद एक बेचने वाला मुद्दा है और उनके प्रसारणों को देखकर कभी जज़्बात में नहीं बहना चाहिये। पाकिस्तानी दूल्हे के बारे में किसी भी एक चैनल ने यह नहीं कहा कि वह दुश्मन देश का वासी है।
उस पर प्रेम का बखान! अगर भारतीय दर्शन की बात करें तो उसमें प्रेम तो केवल अनश्वर परमात्मा से ही हो सकता है। उसके बाद भी अगर उर्दू शायरों के शारीरिक इश्क को भी माने तो वह भी पहला ही आखिरी होता है। किसी ने शादी तोड़ी तो किसी ने मंगनी-उसमें प्रेम दिखाते यह प्रचार माध्यम अपनी अज्ञानता ही दिखा रहे हैं। वैसे इस शादी होने की भूमिका में बाजार और प्रचार से जुड़े अप्रत्यक्ष प्रबंधकों की क्या भूमिका है यह तो बाद में पता चलेगा। उनकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता क्योंकि क्रिकेट और विज्ञापनों का मामला जुड़ा है। फिर मध्य एशिया में उनके रहने की बात है। इधर एक चित्रकार भी भारत ये पलायन कर मध्य एशिया में चला गया है। कभी कभी तो लगता है कि मध्य एशिया के देश अपने यहां प्रतिभायें पैदा नहीं कर पाने की खिसियाहट भारत से लेकर अपने यहां बसाने के लिये तो लालायित नहीं है-हालांकि यह एक मजाक वाली बात है ।
एक बात दिलचस्प यह है कि क्रिकेट खिलाड़ियों को आस्ट्रेलिया में ही प्रेमिका क्यों मिलती है? क्या वहां कोई ऐसा तत्व या स्थान मौजूद है जो क्रिकेट खिलाड़ियों को प्रेमिकायें और पत्नी दिलवाता है-संभव है अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों को इच्छित जीवन साथी भी वहां मिलता हो। इसका पता लगाना चाहिये। एक भारतीय खिलाड़ी को भी वहीं प्रेमिका मिली थी जिससे उसकी शादी संभावित है। अपने देश के महान स्पिनर ने भी वहीं एक युवती से विवाह किया था। इसकी जानकारी इसलिये भी जरूरी है कि भारत में अनेक लड़के इच्छित रूप वाली लड़की पाने के लिये तरस रहे हैं इसलिये कुंवारे घूम रहे हैं। इधर कुछ लोग कह रहे हैं कि छोटे मोटे विषयों पर पढ़ने के लिये आस्ट्रेलिया जाने की क्या जरूरत है? ऐसे युवकों वहां इस बजाने जाने का अवसर मिल सकता है कि वहां सुयोग्य वधु पाने की कामना पूरी हो सकती है।
बहरहाल बाज़ार और उसके प्रचार माध्यमों का रवैया यह सिद्ध कर रहा है कि उनके देशभक्ति, समाज सेवा, धर्म और भाषा के संबंध में कोई स्पष्ट रवैया नहीं है और ऐसे में आम आदमी उनके अनुसार जरूर बहता रहे पर ज्ञानी लोग अपने हिसाब से मतलब ढूंढते रहेंगे। एक पाकिस्तानी दूल्हे को जिस तरह इस देश में मदद मिल रही है उससे आम लोगों में भी अनेक तरह के शक शुबहे उठेंगे। 26/11 को मुंबई में हुए हमलों में जिस तरह रेल्वे स्टेशन पर कत्लेआम किया गया उससे इस देश के लोगों का मन बहुत आहत हुआ। बाज़ार और उसके प्रचार माध्यम एक पाकिस्तानी दूल्हे पर जिस तरह फिदा हैं उससे नहीं लगता कि वह आम लोगों के जज़्बात समझ रहे हैं। कोई भारतीय लड़की किसी पाकिस्तानी से शादी करे, इसमें आपत्ति जैसा कुछ नहीं है पर जब ऐसी घटनायें हैं तब दोनों देशो में तनाव बढ़ेगा और इससे दोनों देशों के आम लोगों पर प्रभाव पड़ता है। अलबत्ता क्रिकेट और अन्य खेलों के विज्ञापन माडलों पर इसका कोई असर नहीं पड़ सकता क्योंकि उनको बाज़ार और प्रचार अपनी शक्ति से सहारा देता है। सीधे पाकिस्तान से नहीं तो मध्य एशिया के इधर से उधर यही बाज़ार करता है। पिछली बार जब पाकिस्तान से संबंध बिगड़े थे तब यही हुआ था। आम आदमी की ताकत नहीं थी पर अमीर लोग मध्य एशिया के रास्ते इधर से उधर आ जा रहे थे।
कहने का अभिप्राय यह है कि देशभक्ति जैसे भाव का इस बाज़ार और प्रचार तंत्र के लिये कोई तत्व नहीं है जब तक उससे उनका हित नहीं सधता हो।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)


भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके उपयोग में संयम, सतर्कता और चतुरता बरती जाये, अन्यथा ऐसे लोगों को इस पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जायेगा जो समाज को गुलाम की तरह चलाने के आदी हैं।

यह इंटरनेट न केवल दृश्य, पठन सामग्री तथा समाचार प्राप्त करने के लिये है बल्कि हमें अपने फोटो, लेखन सामग्री तथा समाचार संप्रेक्षण की सुविधा भी प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम केवल प्रयोक्ता नहीं निर्माता और रचयिता भी बन सकते हैं। अनेक वेबसाईट-जिनमें ब्लागस्पाट तथा वर्डप्रेस मुख्य रूप से शामिल हैं- ब्लाग की सुविधा प्रदान करती हैं। अधिकतर सामान्य प्रयोक्ता सोचते होंगे कि हम न तो लेखक हैं न ही फोटोग्राफर फिर इन ब्लाग की सुविधा का लाभ कैसे उठायें? यह सही है कि अधिकतर साहित्य बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा लिखा जाता है पर यह पुराने जमाने की बात है। फिर याद करिये जब हमारे बुजुर्ग इतना पढ़े लिखे नहीं थे तब भी आपस में चिट्ठी के द्वारा पत्राचार करते थे। आप भी अपनी बात इन ब्लाग पर बिना किसी संबंोधन के एक चिट्ठी के रूप में लिखने का प्रयास करिये। अपने संदेश और विचारों को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास हर हिंदी नौजवान करता है। इधर उधर शायरी या कवितायें लिखवाकर अपनी मित्र मंडली में प्रभाव जमाने के लिये अनेक युवक युवतियां प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं कई बार अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये तमाम तरह के किस्से भी गढ़ते हैं। यह प्रयास अगर वह ब्लाग पर करें तो यह केवल उनकी अभिव्यक्ति को सार्वजनिक रूप ही नहीं प्रदान करेगा बल्कि समाज को ऐसी ताकत प्रदान करेगा जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकते।

आप फिल्म, क्रिकेट,साहित्य,समाज,उद्योग व्यापार, पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनल तथा उन अन्य क्षेत्रों को देखियें जिससे बड़े वर्ग द्वारा छोटे वर्ग पर प्रभाव डाला जा सकता है वहां पर कुछ निश्चित परिवारों या गुटों का नियंत्रण है। यहां प्रभावी लोग जानते हैं कि यह सभी प्रचार साधन उनके पास ऐसी शक्ति है जिससे वह आम लोगों को अपने हितों के अनुसार संदेश देख और सुनाकर उनको अपने अनुकूल बनाये रख सकते हैं। क्रिकेट में आप देखें तो अनेक वर्षों तक एक खिलाड़ी इसलिये खेलता  है क्योंकि उसे पीछे खड़े आर्थिक शिखर पुरुष उसका व्यवसायिक उपयोग करना चाहते हैं। फिल्म में आप देखें तो अब घोर परिवारवाद आ गया है। सामान्य युवकों के लिये केवल एक्स्ट्रा में काम करने की जगह है नायक के रूप में नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार के शिखरों पर जड़ता है। आप पत्र पत्रिकाओं में अगर लेख पढ़ें तो पायेंगे कि उसमें या तो अंग्रेजी के पुराने लेखक लिख रहे हैं या जिनको किसी अन्य कारण से प्रतिष्ठा मिली है इसलिये उनके लेखन को प्रकाशित किया जा रहा है। पिछले पचास वर्षों में कोई बड़ा आम लेखक नहीं आ पाया। यह केवल इसलिये कि समाज में भी जड़ता है। याद रखिये जब राजशाही थी तब यह कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’, पर लोकतंत्र में ठीक इसका उल्टा है। इसलिये इस जड़ता के लिये सभी आम लोग जिम्मेदार हैं पर वह शिखर पर बैठे लोगों को दोष देकर अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं कि ‘क्या किया जा सकता है।’

इस इंटरनेट पर जरा गौर करें। अक्सर आप लोग देखते होंगे कि समाचार पत्र पत्रिकाओं में में उसकी चर्चा होती है। आप सुनकर आश्चर्य करेंगे कि इनमें से कई ऐसे आलेख होते हैं जिनको इंटरनेट पर ब्लाग से लिया जाता है-जब किसी का नाम न दिखें तो समझ लें कि वह कहीं न कहीं इंटरनेट से लिया गया है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ता केवल फोटो देखने या अपने पढ़ने के लिये बेकार की सामग्री पढ़ने में व्यस्त हैं। उनकी तरफ से हिंदी भाषी लेखकों के लिये प्रोत्साहन जैसा कोई भाव नहीं है। ऐसा कर आप न अपना समय जाया कर रहे हैं बल्कि अपने समाज को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने का अवसर भी गंवा रहे हैं। वह वर्ग जो समाज को गुलाम बनाये रखना चाहता है कि फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों के फोटो देखकर आप अपना समय नष्ट करें क्योंकि वह तो उनके द्वारा ही तय किये मुखौटे हैं। आपके सामने टीवी और समाचार पत्रों में भी वही आ रहा है जो उस वर्ग की चाहत है। ऐसे में आपकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था तो झेल लिये। अब इंटरनेट पर ब्लाग और ट्विटर के जरिये आप अपना संदेश कहीं भी दे सकते हैं। इस पर अपनी सक्रियता बढ़ाईये। जहां तक इस लेखक का अनुभव है कि एक एस. एम. एस लिखने से कम मेहनत यहां पचास अक्षरों का एक पाठ लिखने में होती है। जहां तक हो सके हिंदी में लिखे गये ब्लाग और वेबसाईट को ढूंढिये। स्वयं भी ब्लाग बनाईये। भले ही उसमें पचास शब्द हों। लिखें भले ही एक माह में एक बार। अगर आप समाज के सामान्य आदमी है तो बर्हिमुखी होकर अपनी अभिव्यक्ति दीजिये। वरना तो समाज का खास वर्ग आपके सामने मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर आपको अंतर्मुखी बना रहा है ताकि आप अपनी जेब ढीली करते रहें। आप किसी से एस. एम. एस. पर बात करने की बजाय अपने ब्लाग पर बात करें वह भी हिंदी में। ऐसे टूल उपलब्ध हैं कि आप रोमन में लिखें तो हिंदी हो जाये और हिंदी में लिखें तो यूनिकोड में परिवर्तित होकर प्रस्तुत किये जा सकें।
याद रखें इस पर अपनी अभिव्यक्ति वैसी उग्र या गालीगलौच वाली न बनायें जैसी आपसी बातचीत में करते हैं। ऐसा करने का मतलब होगा कि उस खास वर्ग को इस आड़ में अपने पर नियंत्रण करने का अवसर देना जो स्वयं चाहे कितनी भी बदतमीजी कर ले पर समाज को तमीज सिखाने के लिये हमेशा नियंत्रण की बात करते हुए धमकाता है।
प्रसंगवश यहां यह भी बता दें कि यह ब्लाग भी पत्रकारिता के साथ ही चौथा स्तंभ है पांचवां नहीं जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं। सीधी सी बात है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता चार स्तंभ हैं। इनमें सभी में फूल लगे हैं। विधायिका में अगर हम देखें तो संसद, विधानसभा, नगर परिषदें और ग्राम पंचायतें आती हैं। कार्यपालिका में मंत्री, संतरी,अधिकारी और लिपिक आते हैं। न्याय पालिका के विस्तारित रूप को देखें तो उसमें भी माननीय न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादी और प्रतिवादी होते हैं। उसी तरह पत्रकारिता में भी समाचार पत्र, पत्रिकायें, टीवी चैनल और ब्लाग- जिसको हम जन अंतर्जाल पत्रिका भी कह सकते हैं- आते हैं। इसे लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ केवल अभिव्यक्ति के इस जन संसाधन का महत्व कम करने के लिये प्रचारित किया जा रहा है ताकि इस पर लिखने वाले अपने महत्व का दावा न करे।

कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी के ब्लाग जगत में आपकी सक्रियता ही इंटरनेट या अंतर्जाल पर आपको प्रयोक्ता के साथ रचयिता बनायेगी। जब ब्लाग आम जन के जीवन का हिस्सा हो जायेगा तक अब सभी क्षेत्रों में बैठे शिखर पुरुषों का हलचल देखिये। अभी तक वह इसी भरोसे हैं कि आम आदमी की अभिव्यक्ति का निर्धारण करने वाला प्रचारतंत्र उनके नियंत्रण में इसलिये चाहे जैसे अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। हालांकि अभी हिंदी ब्लाग जगत अधिक अच्छी हालत में नहीं है- इसका कारण भी समाज की उपेक्षा ही है-तब भी अनेक लोग इस पर आंखें लगाये बैठे हैं कि कहीं यह माध्यम शक्तिशाली तो नहीं हो रहा। इसलिये पांचवां स्तंभ या रचनाकर्म के लिये अनावश्यक बताकर इसकी उपेक्षा न केवल स्वयं कर रहे हैं बल्कि समाज में भी इसकी चर्चा इस तरह कर रहे हैं कि जैसे इसको बड़े लोग-जैसे अभिनेता और प्रतिष्ठत लेखक-ही बना सकते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अनेक ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने रोजगार से जुड़े काम से आने के बाद यहां इस आशा के साथ यहां लिखते हैं कि आज नहीं तो कल यह समाज में जनजन का हिस्सा बनेगा तब वह भी आम लोगों के साथ इस समाज को एक नयी दिशा में ले जाने का प्रयास करेंगे। इसलिये जिन इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नजर में यह आलेख पड़े वह इस बात का प्रचार अपने लोगों से अवश्य करें। याद रखें यह लेख उस सामान्य लेखक है जो लेखन क्षेत्र में कभी उचित स्थान न मिल पाने के कारण यह लिखने आया है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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नये जमाने में-हिन्दी शायरी


एक दोस्त ने फोन पर
दूसरे दोस्त से
‘क्या स्कोर चल रहा है
दूसरा बिना समझे तत्काल बोला
‘यार, ऐसा लगता है
मेरी जेब से आज फिर
दस हजार रुपया निकल रहा है।’
……………………………..

इंसान के जज्ब़ात शर्त से
और समाज के सट्टे के भाव से
समझे जाते हैं।
नये जमाने में
जज़्बात एक शय है
जो खेल में होता बाल
व्यापार में तौल का माल
नासमझी बन गयी है
जज़्बात का सबूत
जो नहीं फंसते जाल में
वह समझदार शैतान समझे जाते हैं
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