Tag Archives: कविता

मानसिक हलचल-हिन्दी शायरी (mansik halchal-hindi shayari)


जिंदगी के दरिया में बहते हुए
अपने मन की हलचलों के साथ
चला जाता हूं
कभी कभी किनारे पर आकर
करता हूं आत्म मंथन तो
अपने ही दिल के ख्यालों पर
अपने को हंसता पाता हूं।

किया था कुछ लोगों पर भरोसा
दिया था खुद को धोखा
दूसरों को क्या दोष देता।

निभाया था साथ अपनों का
अपनी इज्जत बढ़ाने के सुख की खातिर
क्यों शिकायत करूं कि
मैंने कुछ नहीं पाया।

कई इंसानी बुतों को रास्ता दिखाकर
मैंने अपने चिराग होने का अहसास पाला
उनका क्या दोष
जिन्होंने मतलब निकालकर
पलटकर नहीं देखा।

जब करता हूं आत्म मंथन
होता है यह अनुभव कि
मेरे मन में उठती हुई हलचल
क्षणिक रूप से उठती है
फिर गिरती है जिंदगी के सत्य रूपी दरिया में
व्यर्थ ही उनके साथ कभी हंसकर तो
कभी रोकर समय बिताया।
अपनी हालातों के लिये
बस अपने को ही जिम्मेदार पाया।
———–

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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अपनी तन्हाई में-हिन्दी शायरी


 किसी की कामयाबी देखकर

कभी बहके नहीं

इसलिये अपनी राह खुद चुनी

उस पर  अकेला तो हो ही जाना था

अब अपनी तन्हाई में  भी

अपने साथ खुद ही होता हूं।

भीड़ तो भ्रम में

चाहे जहां चल देती है

उसके शोरशराबे का मतलब

तभी समझ में आता

जब अकेला होता हूं।

धोखा देने के

एक जैसे मंजर हमेशा

आंखों के सामने आते,

बस कभी नाम तो कभी चेहरे

बदलते दिखते,

मैं तो बस देख रहा होता हूं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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कभी अच्छा,कभी बुरा-हिंदी शायरी (sum good sum bed-hindi poem)


एक दिन घूमते हुए उसने
चाय पिलाई तब वह अच्छा लगा
कुछ दिन बाद वह मिला तो
उसने पैसे उधार मांगे तब वह बुरा लगा
फिर एक दिन उसने
बस में साथ सवारी करते हुए
दोनों के लिये टिकिट खरीदा तब अच्छा लगा
कुछ दिन बाद मिलने पर
फिर उधार मांगा
पहली बार उसको दिया उधार पर
फिर भी बहुत बुरा लगा
एक दिन वह घर आया और
सारा पैसा वापस कर गया तब अच्छा लगा
वह एक दिन घर पर
आकर स्कूटर मांग कर ले गया तब बुरा लगा
वापस करने आया तो अच्छा लगा

क्या यह सोचने वाली बात नहीं कि
आदमी कभी बुरा या अच्छा नहीं होता
इसलिये नहीं तय की जा सकती
किसी आदमी के बारे में एक राय
हालातों से चलता है मन
उससे ही उठता बैठता आदमी
कब अच्छा होगा कि बुरा
कहना कठिन है
चलाता है मन उसे जो बहुत चंचल है
जो रात को नींद में भी नहीं सोता
कभी यहां तो कभी वहां लगा

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दुकानों में सौदे की तरह सजा है ईमान -हिन्दी शायरी


बेच दो
या बदल दो
ईमान हो गयी है एक शय
चाहे जैसे भेष धर लो
दुकानों में सौदे की तरह सजा है ईमान
चाहे जब तख्ती बदल दो
जो करते हैं ऐलान ईमान पर चलाने का
बिक जाते हैं टके के भाव
जिनके दिल में है सच
वह दिखाया नहीं करते
फरेब करना आसान है ईमान की आड़ में
तुम भी चाहो तो कर लो

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dil,

इंसान को पंख नहीं लगा सकता-व्यंग्य कविता


जमीन पर आते हुए इंसान ने
सर्वशक्तिमान से कहा
‘इस बार इंसान बनाया है
इसके लिये शुक्रगुजार हूं
पर मुझे परिंदों की तरह पंख लगा दो
उड़कर पूरी दुनियां घूम सकूं
इतना मुझे ताकतवर बना दो’

सर्वशक्तिमान ने कहा
‘तेरी इस ख्वाहिश पर
परिंदों का आकाश में उड्ना
बंद नहीं करा सकता
इंसान के दिमाग की फितरत है जंग करना
आपस में होता है उनका लड़ना मरना
वैसे भी कभी उड़ते हुए परिंदों को
मारकर जमीन पर गिरा देता है
अगर तुम्हें पंख दे दिये तो
आकाश में उड़ने वालों को
वह भी नसीब नहीं हो पायेगा
जमीन पर तो क्या तुम्हारे साथ
कोई परिंदा रह पायेगा
क्योंकि बिना पंख में इंसान का दिमाग
उड़ता है ख्वाबों और सपनों में इधर उधर
ख्वाहिशें उससे क्या क्या नहीं करवाती
नीयत और चालचलन को गड्ढे में गिराती
ऊंचाई की तरफ उड़ने की चाहत
उसको हमेशा बैचेन बनाती
पंख दे दिये तो तू जमीन पर
चैन नहीं पायेगा
आकाश में और बैचेनी फैलायेगा
जमीन पर तो इंसानों के घर को ही
आग लगाने की इंसानों में आदत होती
मैं तुझे पंख देकर इतना ताकतवर
कभी नहीं बना सकता कि
तुम आकाश में भी आग लगा दो
या ऊंचे उड़ते हुए
आकाश छूने की हवस में
अपने पंख जलाकर
समय से पहले अपनी मौत बुला लो

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