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उस्ताद और शागिर्द का मुफ्त का खेल-हिंदी हास्य कविता


उस्ताद ने शागिर्द से कहा
” इस साल के सालाना जलसे के
अपने प्रचार पत्र में तुमने
यह घोषणा कैसे डाल दी है।
हम गरीब बच्चों को
मुफ्त कापियां पेन और किताबें
मुफ्त बांटेंगे,
कभी सोचा है कि
हम चंदे का इस्तेमाल अगर
ऐसा करेंगे तो
क्या खुद पूरा साल धूल चाटेंगे,
विरोधियों को हंसने वाली
यह बैठे बिठाये कैसी चाल दी है.”
सुनकर शागिर्द बोला
“आपके साथ काम करने में
यही परेशानी है,
मेरी चालों से कमाते
पर फिर भी शक जताते
यह देखकर होती हैरानी है,
लोगों के भले का हम दंभ भरते,
छोड़ भलाई सारे काम करते,
पढ़ने वाले गरीब बच्चे
भला हमारे पास कब आयेंगे,
सामान खत्म हो गया
अगर आया कोई भूले भटके तो
उसे बताएँगे,
देश में जितने बढ़े है गरीब,
समाज सेवकों के चढ़े हैं नसीब,
लोगों की इतनी नहीं बढ़ी समस्याएँ,
जितनी उनके लिए बनी हैं समाज सेवी संस्थाएं,
ऐसे में यह मुफ्त मुफ्त का खेल
अब जरूरी है,
सस्ते में दवाएं बांटने का कम हो गया पुराना
इसलिए नया दाव लगाना एक मजबूरी है,
विरोधियों के सारे विकेट उड़ा दे
मैंने यह ऐसी बाल की है।”


कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com

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गरीब का कोई हमराह नहीं होता-हिंदी व्यंग्य कविताएँ


मिट्टी से बना इंसान
रात और दिन में चलता बुत की तरह
कोई उनमें शाह नहीं होता,
समंदर जैसी लहरें उठती हैं मन में
पर पिंजरे में बंद है, वह अथाह नहीं होता,
कहें दीपक बापू
भलाई बेच रहे लोग
अपना घर भरने के लिये
महफिलों में गरीबी पर  अफसोस के सुर
गाये जाते मजे के लिये
मगर गरीब का कोई हमराह नहीं होता। 
————————————-
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’ग्वालियर
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

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हिन्दी ब्लाग जगत बनेगा देश में नये विचारों का केंद्र-हिन्दी लेख (hindi blog is new center of thinking-hindi lekh)


अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में लिख रहे लेखकों को अभी इसका अनुमान नहीं है कि संगठित प्रचार माध्यम-टीवी, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाऐं-उनके ब्लाग पर नज़र रख रहे हैं। कुछ ब्लाग लेखक लिखते हैं कि इंटरनेट पर लिखने से समाज में कोई बड़ा वैचारिक बदलाव नहीं आने वाला तो उनकी स्थिति दो प्रकार की ही हो सकती है। एक तो यह कि वह अपने पाठों में कोई वैचारिक बात नहीं रखते और दूसरी यह कि रखते हैं तो उनके मौलिक न होने का अहसास स्वयं को है।
एक बड़े पत्रकार के व्यंग्य पर हिल जाने वाले हिन्दी ब्लाग जगत को अगर किसी बात की जरूरत है तो वह है आत्मविश्वास। प्रसंग वश यह लेख भी एक ऐसे ही टीवी और अखबार पत्रकार के लेख पर ही आधारित है जिसमें वह कुछ निष्पक्ष दिखने का प्रयास कर रहे थे। वह मान रहे थे कि केवल दो विचारधाराओं के मध्य ही प्रसारण माध्यमों में कार्यक्रम और समाचार पत्र पत्रिकाओं में आलेख होते हैं। उनका यह भी था कि जब हम कहीं बहस करते हैं तो एक तरफ राष्ट्रवादी तो दूसरी तरफ समतावादी विद्वानों को ही बुलाते हैं जो अपनी धुरी से इतर कुछ नहीं सोचते न बोलते। कहने का अभिप्राय यह है कि वह उस सत्य को स्वीकार कर रहे थे जिसे स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखक लिखते आ रहे हैं।
यहां यह भी उल्लेख करें कि वह पत्रकार स्वयं ही राष्ट्रवादियों पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगाकर अपने को समतावादी बताते रहें तो राष्ट्रवादियों ने भी उनको अपने धुरविरोधियों की सूची में शामिल कर रखा है। इतने बरसों से प्रचार माध्यमों में सक्रिय विद्वान की अभिव्यक्त्ति अपनी ही थी पर विचारों का स्त्रोत हिन्दी ब्लाग जगत का दिखा जहां यह बातें लिखी गयी हैं। कहने को तो यह भी कह जा सकता है कि इतने बड़े आदमी को भला कहां फुरसत रखी है? मगर यह सोचना गलता होगा। दरअसल आम पाठक इतना ब्लाग जगत पर नहीं आ रहा जितना यह बुद्धिजीवी आ रहे हैं। वजह साफ है कि वह अभी तक एक तय प्रारूप में चलते आ रहे थे इसलिये कुछ नया सोचने की जरूरत उनको नही थी पर इधर हिन्दी ब्लाग एक चुनौती बनता जा रहा है इसलिये यह संभव है कि वह यहां से विचारों को उठकार उस पर अपने मौलिक होने का ठप्पा लगाये क्योंकि उनके पास प्रचार माध्यमों की शक्ति है।
इन दो विचारधाराओं पर चलने वाली बहसों में आम आदमी का एक विचारवान व्यक्ति की बजाय निर्जीव प्रयोक्ता के रूप में ही रखा जाता है। सवाल यह है कि उनको यह विचार कहां से आया कि प्रचलित विचाराधाराओं से अलग भी किसी का विचार हो सकता है?
जवाब हम देते हैं। हिन्दी ब्लाग जगत पर बहुत कम लिखा जा रहा है पर याद रखिये न छपने की कुंठा लेकर आये ब्लाग लेखकों के साथ उनकी अभिव्यक्त होने के लिये तरस रही अपनी विचाराधारायें हैं। यह विचाराधारायें न तो विदेश से आयातित हैं और न अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न देशी विद्वानों के सतही सोच पर आधारित है। वह उपजी है उनके स्वयं के विचार से। कहने का अभिप्राय है कि इंटरनेट पर हिन्दी में लिखने वाले ब्लाग लेखक बाहर चल रही गतिविधियों और प्रचार पर नज़र रखें। उनमें वैचारिक बदलाव नज़र आ रहा है। यह सच है कि हिन्दी ब्लाग जगत पर आम पाठकों की संख्या कम है पर खास वर्ग उस पर नज़र रखे हुए है क्योंकि एक ही विचार या नारे पर चलते हुए उसको अपना भविष्य अंधकार मय नज़र आ रहा है। दूसरा यह कि ब्लाग जगत से खतरे का आभास उनको है इसलिये वह अब कहीं कहीं यहां से विचार भी ग्रहण करने लगे हैं-इसे हम चोरी नहीं कह सकते-और उनको प्रस्तुत करते हैं। उनका नाम है इसलिये लगता है कि मौलिक हैं जबकि सच यह है कि हिन्दी ब्लाग लेखकों द्वारा आपसी चर्चाओं से उनका जन्म हुआ है। आप कुछ विचारों की बानगी देखिये।
1-इतने वर्षों से यह प्रचार माध्यम विज्ञापन पर चल रहे हैं पर बाजार और उसके प्रबंधकों को दबाव को कभी जाहिर नहीं किया। अब तो वह बहस करते हैं कि बाजार किस तरह तमाम क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है। समाज के साथ ही वह खेलों और फिल्मों में बाजार के हस्तक्षेप की चर्चा करते हैं। लोग यकीन नहीं करेंगे कि पर सच बात यह है कि बाजार के इस रूप पर सबसे पहली चर्चायें हिन्दी ब्लाग जगत पर ही हुईं थी। यहां यह बात नहीं भूलना चाहिये कि इस लेखक को तीन साल अंतर्जाल पर हो गये हैं और अनेक पाठों पर दूसरे ब्लाग लेखकों की बाजार के इस कथित प्रभाव की चर्चा करती हुईं अनेक टिप्पणियां हैं जो इतनी ही पुरानी हैं।
2-गांधीजी पर लिखे गये इस लेखक के पाठों को यहां के ब्लाग लेखकों ने पढ़ा होगा। गांधीजी को नोबल न दिये जाने के विषय पर लिखे गये इस लेखक के विचारों को एक स्तंभकार ने जस का तस अपने लेख में लिखा। सच है उसे आम पाठकों ने अभी कम पढ़ा होगा पर उस स्तंभकार ने लाखों लोगों तक वह बात पहुंचा दी। अखबारों ने इस लेखक के वैचारिक चिंतन बिना नाम के छापे। यहां हम कोई शिकायत नहीं कर रहे बल्कि इंटरनेट लेखकों को बता रहे हैं कि वह अपने अंदर कुंठा न पालें। अगर वह मौलिकता के साथ आयेंगे तो वह वैचारिक शक्ति केंद्र का बिन्दु बनेंगे। आम पाठकों की कम संख्या को लेकर अपने अंदर कुंठा पालना व्यर्थ है।
3-कलकत्ता में एक धर्म के युवक की मौत पर एक वर्ग बावेला मचाता है पर कश्मीर पर दूसरे धर्म के युवक की मौत पर वही खामोश हो जाता है तो दूसरा मचाता है। हम यहां इस विषय पर बहस नहीं कर रहे कि कौन गलत है या कौन सही्! मुख्य बात यह है कि कथित विचारधाराओं ने लोगों को सोच तो प्रदान की है पर एक दायरे के अंदर तक सिमटी है। ऐसे में मुक्त भाव से लिखने वाले हिन्दी लेखक कई ऐसी बातें लिख जाते हैं जिनको स्थापित विद्वान सोच भी नहीं सकता।
अब संगठित प्रचार माध्यम में सक्रिय बुद्धिजीवियों को यह लगने लगा है कि उनकी विचारों की पूंजी बहुत कम है भले ही उनके द्वारा लिखे गये शब्दों की संख्या हिन्दी ब्लाग लेखकों से अधिक है। उनका नाम ज्यादा है पर उनका सोच आजाद नहीं है।
हां, यह सच है कि हम ब्लाग लेखक कुंठित होकर यहां आते हैं पर ब्लाग शुरु करने के बाद उसका नशा सब भुला देता है। जहां तक मठाधीशी का सवाल है तो हर ब्लाग लेखक जैसे ही ब्लाग खोलता है यह पदवी उसके पास स्वयं ही आ जाती है। इंटरनेट पर लिखने वाले लेखकों यह बात समझ लेना चाहिये कि उनका अकेला होना ही उनको स्वतंत्र बनाता है। वह जिन संघर्षों से गुजर रहे हैं वह उनके लिये सोच को विकसित करने वाला है। उनको संगठित प्रचार माध्यमों में गढ़े गये विचारों से आगे जाना है। जैसे जैसे ब्लाग लेखकों की संख्या बढ़ेगी वैसे उनकी सोच का दायरा भी बड़ा होगा। संगठित प्रचार माध्यमों में नाम पाना किसे बुरा लगता है पर दूसरा सच यह है कि वहां नवीन और मौलिक विचार या विद्या को साथ लेकर स्थान पाना कठिन है। ऐसे में ब्लाग जगत पर आकर दायरा बढ़ जाता है। जब तब आम पाठक है स्थापित विद्वान ब्लाग लेखकों के विचारों को ग्रहण कर अपना जाहिर कर सकते हैं पर कालंातर में यह तो जाहिर होना ही है कि उनका जनक कौन है?
जब कोई स्थापित विद्वान यह मान रहा है कि सीमित विचाराधाराओं के इर्दगिर्द प्रचार माध्यम घूमते रहे हैं वह अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को भी जिम्मेदार मान रहा है क्योंकि अभी तक तो वह भी यही करते रहे थे।
हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ गजब के लिखने वाले हैं। यह सही है कि उनमें कुछ लकीर के फकीर है तो कुछ नये ढंग से सोचने वाले भी है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि नये ढंग से सोचने वाले अधिक भाषा सौंदर्य से नहीं लिख पाते पर उनकी बातें बहुत प्रभावी होती हैं और वह शायद स्वयं ही नहीं जानते कि ऐसी बात कह रहे हैं जिनको संगठित प्रचार माध्यम जगह नहीं देंगे अलबत्ता कुछ स्थापित विद्वान उनके विचारों को उठा भी सकते हैं। आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? इसका जवाब यह है कि हमारे आसपास घटता बहुत कुछ है पर शाब्दिक अभिव्यक्ति कैसे की जाये यह महत्वपूर्ण बात है। बड़े विद्वान अभिव्यक्ति तो कर सकते हैं पर नवीन विचार के जनक तो हिन्दी ब्लाग लेखक ही बनेंगे। यह बात हमने अपने अनुभव से कही है। ऐसे विचारों को लिखते हुए हम यह कहना नहीं भूलते कि यह जरूरी नहीं कि हम सही हों। हो सकता है हमारा यह अनुमान हो, पर विचारणीय तो है। इतना तय है कि इस ब्लाग जगत पर अनेक लोग तो ऐसे हैं जो पाठ लिखने के साथ ही जोरदार वैचारिक टिप्पणियां भी लिख जाते हैं और भविष्य में उनकी चर्चा भी प्रचार माध्यमों में होगी।
आखिरी बात हम यह भी कह सकते हैं कि अगर विद्वानों ने हिन्दी ब्लाग जगत से विचार नहीं भी लिये होंगे पर यह हो सकता है कि यहां की जानकारी उनको तो हो ही गयी है और इसलिये प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहे हिन्दी ब्लाग लेखकों को ध्यान में रखते हुए नये ढंग से सोचना शुरू किया हो-मतलब प्रभाव तो है न!

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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अच्छी फिल्म को सामान्य दर्शक ही हिट बनाते हैं-हिन्दी लेख


एक फिल्म बनी थी संतोषी मां! वह इतनी जोरदार हिट हुई थी कि उसके निर्माताओं की चांदी हो गयी। उसकी इतनी जोरदार सफलता की आशा तो उसके निर्माता निर्देशक तक ने  भी नहीं की।  वह फिल्म महिलाओं को बहुत पसंद आयी और वह दोपहर के शो में अपने घर का निपटाकर मोहल्ले से झुंड बनाकर  देखने जाती थीं।  हमारे शहर में वह फिल्म एक ऐसे थिऐटर में लगी जिसमें पुरानी फिल्में ही लगती थीं। उसका फर्नीचर भी निहायत घटिया था।  कम से कम वह थियेटर इस लायक नहीं था कि अमीर और  गरीब दोनों वर्ग की महिलायें वहां जाना पसंद करें। इसलिये उसमें नई फिल्में नहीं  लगती थीं। संतोषी मां एक छोटे बजट  की धार्मिक फिल्म थी इसलिये कम दर के कारण उसे वह थियेटर मिल गया।
भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में कहीं भी संतोषी मां नाम का पात्र नहीं मिलता, मगर धर्म का ऐसा महत्व है कि वह फिल्म पूरे देश में एतिहासिक कीर्तिमान बनाती रही।  कोई प्रचार नहीं! जो फिल्म देखकर आया उसने दूसरे को बताया और दूसरे ने तीसरे को। साथ ही यह भी बात फैलती रही  एक शहर से दूसरे और दूसरे से तीसरे! आज का  टीवी, रेडियो या अखबार का प्रचार उसके सामने फीका लगता है।  उस फिल्म के बाद ही हमारे देश में शुक्रवार को माता का व्रत रखने का सिलसिला शुरु हुआ जो आज तक जारी है।  एक फिल्म क्या कर सकती है ‘संतोषी मां’ इसका प्रमाण है। साथ ही यह भी कि अगर फिल्म में दम हो तो  वह बिना प्रचार के ही चल सकती है।
आजकल मुंबईया फिल्मों को पहले दिन के दर्शक जुटाने के लिये भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है। इसका कारण  है कि देश में मनोरंजन के ढेर सारे साधन हैं और इतने सारे विकल्प हैं कि थोक भाव में लोगों का पहले दिन मिलना मुश्किल काम है।  यही कारण है कि आजकल फिल्मों के प्रसारण से पहले उससे विवाद जोड़ने का प्रचलन शुरु हुआ है। वैसे वह ऐसा न भी करें तो भी फिल्मों को पहले दिन दर्शक मिल जायेंगे।  समस्या तो अगले दिनों की है।
अधिकतर फिल्मी विशेषज्ञ सप्ताह भर के आंकड़ों पर ही फिल्म की सफलता और असफलता का विश्लेषण करते हैं। एक आम आदमी के रूप हमारे लिये किसी  फिल्म की सफलता का आधार यह होता है कि आम  लोग  कितने महीनों तक उसे याद रखते हैं। शोले, सन्यासी, त्रिशुल, दीवार, राम और श्याम, जंजीर और अन्य कई फिल्में ऐसी हैं जिनको लोग आज तक याद करते हैं। अमिताभ बच्चन को इसलिये ही सर्वाधिक सफल माना जाता है क्योंकि उनकी सबसे अधिक यादगार फिल्में हैं।  देखा जाये तो उनके बाद अनिल कपूर ही ऐसे हैं जो सुपर स्टार की पदवी पर रहे।  उनके बाद के अभिनेताओं की फिल्में यादगार नहीं रही।  यही कारण है कि आज के अभिनेता अपनी यादगार इतिहास में बनाये रखने  के लिये आस्कर आदि जैसे विदेशी पुरस्कारों का मुंह जोहते हैं।
अभी हाल ही में दो फिल्में रिलीज हुई। उनको लेकर ढेर सारा विवाद खड़ा हुआ। विशेषज्ञ मानते हैं कि वह भीड़ खींचने के लिये किया गया।  अभी दूसरी  फिल्म का परिणाम तो आना है पर पहले वाली फिल्म का नाम तक लोग भूल गये हैं ।
दरअसल किसी भी फिल्म को पहले और दूसरे दिन फिल्म देखने वाले दर्शक ही उसके भविष्य का निर्माता भी होते हैं क्योंकि वह बाहर आकर जब लोगों का अपना विचार बताते हैं तब अन्य दर्शक वर्ग देखने जाता है। विवादों की वजह से शुरुआती एक या दो दिन अच्छे दर्शक मिल जाते हैं पर  बाद फिल्म की विषय सामग्री ही उसे चला सकती है।
यहां हो यह रहा है कि फिल्म आने से पहले उसका विवाद खड़ा किया जाता है। लोग देखने पहुंचते हैं तो पता लगता है कि ‘सामान्य फिल्म’ है और उनकी यह निराशा अन्य दर्शकों को वहां नहीं पहुंचने देती।  किसी फिल्म की सफलता इस आधार पर विश्लेषक देखते हैं कि उसने कितना राजस्व फिल्म उद्योग को दिलवाया।  अगर विश्लेषकों की बात माने तो अनेक बहुचर्चित फिल्में इस प्रयास में नाकाम रही हैं।  किसी हीरो की लोकप्रियता का भी यही आधार है और इसमें अनेक अभिनेता सफल नहीं हैं।  एक मजे की बात है कि एक दो वर्ष पहले अक्षय कुमार के बारे में कहीं हमने पढ़ा था कि वह सबसे अधिक कमाई फिल्म उद्योग को कराने वाला कलाकार है-जबकि प्रचार में अन्य कलाकारों को बताया जा रहा था।   हालांकि उनकी आखिरी फिल्म भी फ्लाप हो गयी जो कि उनके साथ बहुत कम होता है-फिल्म उद्योग में अधिक राजस्व दिलाने में उनका क्या योगदान है यह भी अब पता नहीं है।  
कहने का अभिप्राय यह है  किसी फिल्म पर एक या दो दिन में अपनी कोई राय कायम नहीं की जा सकती।  अभी हाल ही में विवादों से प्रचार पा चुकी दो फिल्मों के बारे में देखने वालों की यह टिप्पणी है कि वह अत्यंत साधारण हैं। यकीनन यह बात उनके आगामी दर्शकों का मार्ग रोकेगी।
हमारा दूसरा ही अपना आधार है। वह यह कि कौनसी वह फिल्म है जो हमें पूरी देर बैठने को विवश करती है। अभी टीवी पर  नसीरुद्दीन और अनुपम खेर द्वारा अभिनीत  आतंकवाद के विषय पर बनी एक फिल्म ने पूरी तरह हमको बांधे रखा।  उस फिल्म का नाम याद नहीं है पर इतन तय है कि उसे अधिक सफलता नहीं मिली होगी क्योंकि वह संगीत और गीत रहित थी जबकि हिन्दी फिल्मों में सफलता के लिये उनका होना जरूरी है।  किसी भी फिल्म को चहुंमुखी सफलता तभी मिल पाती है जब उसकी कथा, पटकथा, गीत और संगीत समाज के हर प्रकारे की  आयु तथा आर्थिक वर्ग के लोगों को एक साथ प्रभावित करे। इस तरह की फिल्में अब बन ही नहीं रही-यह  निराशा की बात है। यही कारण है कि अब सुपर स्टार बनते नहीं भले ही प्रचारित किये जाते हों।



कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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चुटकले और हास्य कवितायें भी हिन्दी साहित्य का हिस्सा-हिन्दी आलेख (think on hindi writing)


पता नहीं कुछ लोग चुटकुलों को साहित्य क्यों नहीं मानते, जबकि सच यह है कि उनके सृजन में वैसे ही महारथ की आवश्यकता होती है जैसी कि कहानी या व्यंग लिखने में। चुटकुलों में ही एक अधिक पात्र सृजित कर उनसे ऐसी बातें कहलायी जाती हैं जिनसे स्वाभाविक रूप से हंसी आती है और पाठक इस बात की परवाह नहीं करता कि वह साहित्य है या नहीं।
चुटकुलों की तरह हास्य कविताओं को भी अनेक लोग साहित्य नहीं मानते जबकि उनकी लोकप्रियता बहुत है। ऐसे में सवाल यह है कि साहित्य कहा किसे जाता है?
क्या उन बड़ी बड़ी किताबों को ही साहित्य माना जाये जिनको एक सीमित वर्ग का पाठक वर्ग पढ़ता है और बहुतसंख्यक वर्ग उनका नाम तक नहीं जानता। अनेक पुस्तकें तो ऐसी होती हैं कि किसी मध्यम रुचि वाले पाठक को सौंप दी जाये तो वह उसे हाथ में लेकर एक तरफ रख देता है। क्या साहित्य उन पुस्तकों को माना जाये जिनमें अनेक पात्रों वाली उलझी हुई निष्कर्ष से पर कहानी हो या जिनको पाठक पढ़ते हुए यही याद नहीं रख पाता कि कौन से पात्र की भूमिका क्या थी? क्या साहित्य उन निबंधों को माना जाये जिसका आम आदमी की बजाय केवल समाज के एक खास वर्ग के आचार विचार से संबंधित सामग्री होती है?
पता नहीं साहित्य की क्या परिभाषा हो सकती है, पर हमारी नज़र में जो रचना अधिक से अधिक पाठक वर्ग को प्रभावित करे वह साहित्य है। दरअसल हमारे देश के सम्मानों को लेकर विरोधाभासी परंपरा रही है। भारत का व्यवसायिक सिनेमा ही देश की जनता की पंसद है पर जब पुरस्कार की बात आती है तो कथित कलात्मक फिल्मों को ही पुरस्कृत किया जाता है जो कि देश की गरीबी बेरोजगारी या अन्य समस्याओं को सीधे सीधे प्रस्तुत कर दर्शक के सामने प्रश्न चिन्ह प्रस्तुत करती हैं। उनसे न तो समस्यायें हल होती हैं न आदमी का मनोरंजन होता है। सवाल यह है कि एक आम आदमी के सामने प्रश्न आयें तो भी वह क्या करे? देश की सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं की उसकी कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती। अब भले ही पुरस्कार देने वाले आत्ममुग्धता की स्थिति में हों पर सच यही है कि व्यवसायिक सिनेमा ही इस देश के लोगों की दिल की धड़कन है।
यही स्थिति साहित्य से संबंधित पुरस्कारों की है। जब किसी लेखक की किताब छपी हो उसे ही पुरस्कार दिया जाता है जबकि सच तो यह है कि इस देश के हजारों ऐसे लेखक हैं जो अपनी रचनाओं से साहित्यक प्रवाह की निरंतरता बनाये हुए हैं-उनकी रचनायें अखबारों में छपती हैं या फिर वह मंच पर सुनाते हैं। इनमें अनेक चुटकुले और हास्य कविता लिखने वाले लेखक भी हैं। दरअसल हुआ यह है कि सम्मान आदि प्रदान करने वाली संस्थाओं पर कुछ रूढ़िवादी लेखक काबिज हो जाते हैं-यकीनन यह पद उनको चाटुकारिता लेखन के कारण ही मिलता है-जो चुटकुले या हास्य कवितायें नहीं लिख सकते वही उनकी गौण भूमिका मानते हैं जबकि इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग चुटकुले और हास्य कविताओं ही सुनता और पढ़ता है। इस देश में ऐसे अनेक कवि हैं जो अपनी हास्य रचनाओं के कारण ही लोगों के हृदय में छाये हुए हैं। यकीनन वह भी साहित्यकार ही हैं। प्रश्न चिन्ह खड़े करने वाली या समस्याओं को रूबरू कर पाठक के मन को चिंताओं के वन में छोड़ने वाली रचनायें ही साहित्य नहीं होती बल्कि जो लोगों के मन को मनोरंजन के साथ शिक्षा भी दें भले ही हास्य कविता या चुटकुले ही क्यों न हों साहित्य ही कही जा सकती हैं। वैसे हमारे यहां अब कुछ लोगों द्वारा क्षणिकाओं को भी साहित्य माना जाता है तब चुटकुलों और हास्य कविताओं की उपेक्षा करना ठीक नहीं लगता। अब लंबी रचनायें लिखने का समय नहीं रहा। थोड़े में अपनी बात कहने की आवश्यकता सभी जगह महसूस की जा रही है तब चुटकुलों और हास्य कविताओं का महत्व कम नहीं माना जा सकता।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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