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किसान और ग्राहक तो घास हैं, उनसे कौन यारी करेगा-हिन्दी लेख


        किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर चल रही बहस में कई बातें दिलचस्प हैं। यकीनन अगर हम उनको सुने तो अपनी बात प्रभावी ढंग से न रख सकते हैं न सोच सकते हैं। जहां तक हमारी इस विषय पर अपनी सोच यह है कि अभी तक इससे देश के लाभ या हानियों पर किये गये अनुमान उस रूप में प्रकट नहीं होंगे जिस तरह व्यक्त किये जा रहे हैं।
            हम लाभ हानियों से अलग हटकर एक बात जरूर मानते हैं कि इस देश की समस्याओं का हल अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों के अनुरूप करने की बात तो यह कभी दिखाई नहीं दी। हम एक अर्थशास्त्री होने के नाते-अर्थशास्त्र हमारे अध्ययन के दौरान एक विषय रहा है इसलिये यह पदवी हमने स्वयंभू रूप से स्वयं धारण की है-मानते हैं कि अगर इस देश में राज्य प्रबंध अगर प्रत्येक गांव में स्वच्छ पानी, पक्की सड़क तथा बिजली की व्यवस्था कर ले तो इस देश में आर्थिक समस्यायें नगण्य रह जायेंगी। यह अलग बात है कि आज़ादी   के बाद इस पर भारी पैसा खर्च हुआ पर भ्रष्टाचार के कारण परिणाम शून्य ही रहा। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अशिक्षा तथा भुखमरी जैसी समस्यायें पूरी तरह से खत्म भले न हों पर वह गंभीर चिंता का विषय नहीं रहेगी। मूल बात कहें तो सरकार कल्याण के नाम पर दूसरे काम न भी करे तो चल जायेगा।
          यह कोई  अनिवार्य  शर्त नहीं हो सकती है कि गांव के विषय पर लिखने के लिये वहां पैदा होना जरूरी है। हम शहर में जन्मे हैं पर अनेक बार गांवों में जाने का अवसर मिला। उससे यह लगता है कि वहां मूलभूत सुविधाओं का पूर्णतः अभाव है। बरसात के दिनों में जब गांवों में सब्जी, गेंहु, चावल तथा दूध अधिक मात्रा में होता है तब वहां से उसे निकालकर शहर पहुंचाने के लिये कितनी मुश्किल होती है यह हमने स्वयं देखा है। उस समय अशुद्ध जल की वजह से बीमारी अपना रौद्र रूप दिखाती है तब यह गांव के मार्ग इस कदर नाले में बदल जाते हैं कि रात को किसी मरीज को गांव से बाहर पास के बड़े गांव या शहर ले जाना लगभग असंभव होता है। इसी कारण छोटी बीमारी में लोग वहां मर जाते हैं। गांव में अगर अस्पताल भी हो तो वहां चिकित्सक पहुंच नहीं सकता। वैसे सामान्य हालत में भी स्वास्थ्य कमी वहां पहुचंने से कतराते हैं। अगर आजादी के बाद हम देश के पूरे गांवों में शुद्ध जल, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधायें नहीं पहुंच पाये तो यह संकट हमारी प्रबंध व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। शहरों के पास जो गांव हैं उनमें शायद ऐसा आधारभूत ढांचा मिल जाये पर जो दूर हैं उनकी समस्याओं पर कितना सोचा गया यह अलग से विचार का विषय है।
     विदेशी कंपनिंयां अगर भारत आ रही हैं तो वह कोई आधारभूत ढांचा नहीं बनायेंगी बल्कि उनका अपनी सुविधानुसार दोहन ही करेंगी। जहां आधारभूत ढांचा नहंी है वहां उनको उन्हीं बिचौलियों पर निर्भर रहना होगा जिनको हटाने की बात हो रही है। इधर हम सुन रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप गंभीर रूप से आर्थिक संकट में हैं और अब वहां विकासशील देशों के निचले स्तर पर जाकर कमाने की बात हो रही है। हमने अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा को यह कहते हुए पढ़ा था कि हमें विदेशों में जाकर छोटे स्तर पर काम करना होगा। अमेरिका की विदेशमंत्राणी हेनरी क्लिंटन ने भी कहा था कि काम के बारे में भारतीयों से सीखना चाहिए।
          बहरहाल इस बहस में एक महत्वपूर्ण समाचार पर चर्चा किसी ने नहीं की कि अमेरिका ने पाकिस्तान के 28 सैनिकों को मार दिया जिससे दोनों देशों के बीच गंभीर तनाव है। पाकिस्तान ने अपना एक हवाई अड्डा अमेरिकी सेना से खाली करने को कहा है। इतना ही नही उसने संयुक्त राष्ट्र में भी यह मामला उठाया है। भारतीय प्रचार माध्यम इस पर खबर देकर चुप हो गये हैं। उनको शायद इसका अंदाजा नहीं है कि अंततः यह तनाव युद्ध में बदल सकता है। अगर पाकिस्तान अमेरिका के हाथ से निकल गया तो उसका राजनीतिक प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप से करीब करीब खत्म होने जैसा ही है। हमारा मानना है कि अमेरिका से अधिक मित्रता से अब कोई लाभ नहीं है। वह सामरिक रूप से शक्तिशाली है पर उसका आर्थिक ढांचा करीब करीब गड़बड़ाने लगा है। ऐसे में पाकिस्तान की राजनीतिक बगावत उसके सम्राज्य में आखिरी कील की तरह लग सकती है। देखा जाये तो पाकिस्तान अपने सहधर्मी देशों का एक तरह से प्रवेश द्वार है। भले ही वह एक सार्वभौमिक राष्ट्र की तरह दिखता है पर संक्रमण काल में उसकी सरकार की बैठक सऊदी अरब में होती है तो क्रमवार होने वाले क्रिकेट मैच दुबई या आबुधाबी में होते हैं। जिन दूसरे देशों की क्रिकेट टीमों का क्रम में पाकिस्तान का दौरा होता है वह दुबई या आबुधाबी में उसके साथ मैच खेलती हैं। ऐसे में पाकिस्तान के साथ अमेेरिका का तनाव मध्यएशियाई देशों तक विस्तृत हो सकता है। यह देश एक तरह से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी हैं।
         बहरहाल अब बड़े विषयों पर बड़े विद्वानों की चर्चा सुनकर ऐसा लगता है कि निरपेक्ष या स्वतंत्र प्रेक्षकों की बातें दमदार होती हैं पर महत्व केवल संगठित विद्वानों को ही दिया जा रहा है। अनेक स्वतंत्र विद्वानों ने किराना के खेरिज व्यापार में विदेशी निवेश पर अपनी राय बेबाकी रूप से रखी। वह इससे चिंतित नहीं है पर खुश भी नहीं है। जहां तक किसानों और उपभोक्ताओं के हित का प्रश्न है तो सवाल यह है कि इन दोनों रूपों में हर मनुष्य शोषित होता है और अगर उसे प्रसन्न रखने का प्रयास किया जाये तो पूरी दुनियां का व्यापार ही ठप्प हो जाये। वाल मार्ट आये या नहीं यह समस्या शोषितों के आपसी द्वंद्व का विषय है। यह अलग बात है कि समय के अनुसार बाज़ार और प्रचार के अनुसार समाज का स्वरूप बदलता रहता है और उसे रोकना कठिन है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  Bharatdeep, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) की मानसिक हलचल अब ब्लॉग पर नहीं दिखेगी-हिन्दी लेख (anna hazare ki mansik halchal wala blog band hona-hindi lekh)


                अन्ना हजारे ने अपना ब्लॉग बंद करने का निर्णय लिया है। वैसे तो इस देश में बहुत कम लोग होंगे जिन्होंने उनका ब्लॉग देखा होगा क्योंकि उस पर पाठ प्रकाशित होता ही था कि प्रचार माध्यम उसे अपने मंच पर मुख्य समाचार की तरह उपयोग करते रहे जिसकी वजह से उसको देखने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। ऐसे में ब्लॉग होने का प्रभाव बाजार समर्थित प्रचार माध्यमों पर ही पड़ेगा जिनके लिये सनसनी फैलाने वाला एक स्त्रोत कम हो जायेगा। वैसे यहां भी स्पष्ट कर दें कि इस देश में गहरा चिंत्तन करने वाले पहले अन्ना हजारे की टीम के सदस्यों पर वर्तमान बाज़ार से समर्थित होने का आरोप लगाते थे तो अब उनको अन्ना का संपूर्ण आंदोलन ही प्रायोजित दिख रहा है। श्री अन्ना हजारे का ब्लॉग बंद होने का फैसला उनकी दृढ़ मानसिक शक्ति पर प्रश्न खड़े करेगा इसमें संशय नहीं है।
         आखिर वह कौनसा पाठ है जिसमें ऐसा कुछ आ गया कि उनको लगा कि यह ब्लॉग बंद करना ही श्रेयस्कर है? अन्ना को अपने प्रचार के लिये वैसे ही किसी ब्लॉग की आवश्यकता नहीं थी तब क्या बाज़ार के प्रायोजन की वजह से उन्होंने इसे बनाया। दरअसल वर्तमान बाज़ार जिसे भी नायक बनाता है उसका ब्लॉग अवश्य फैशन के तौर पर जरूर बनवाता है। इससे वह एक तीर से दो शिकार करता है। एक तो नई पीढ़ी को अपने नायक की अंतर्जालीय छवि से घेरता है दूसरा यह कि टेलीफोन कंपनियों के कनेक्शन कम होने की संभावना बच जाते हैं जिनका खतरा उनको हमेशा बना रहता है। सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे के पीछे कहीं न कहीं बाज़ार का प्रायोजन है और इसी कारण उनके यह ब्लॉग बना भी होगा। इसका लेखक भी उनका सहयोगी था जिसको वह अपनी बात लिख कर देते और वह उसे चिट्ठी के साथ टंकित कर प्रकाशित करता था। अनेक पाठ चर्चित हुए। जब अन्ना मौन थे तब ब्लॉग के माध्यम से वह जनता से जुड़े रहे। अब उनके ब्लॉगर सहयोगी ने उनकी एक अहस्ताक्षरित चिट्ठी के साथ एक पाठ प्रकाशित किया जिसमें अन्ना टीम के सदस्यों को अलोकतांत्रिक बताते हुए टीम में सदस्यों में बदलाव की बात कही है। अन्ना ने अपने ब्लॉगर से सहमत होने की बात से अब इंकार करते हुए बताया कि वह अपने विचार कहीं लिख लेते थे। एक समय उन्हें अपनी टीम के बारे में ऐसा विचार आया था तो लिख लिया पर उसे प्रेषित करने के लिये ब्लॉगर को नहीं दिया। उस ब्लॉगर को केवल हस्ताक्षरित पत्र प्रकाशित करने का अधिकार दिया था। अगर उनका यह स्पष्टीकरण सही माना जाये तो लगता है चूंकि वह ब्लॉगर उनका निकटस्थ है इसलिये ऐसा कागज उसके पास रह सकता है भले ही उसे प्रकाशन का अधिकार न मिला हो। अन्ना का यह विचार उसने अनाधिकार छापा है-यही स्पष्टीकरण अन्ना हजारे साहिब ने दिया है।
              गंभीर चिंतकों की नज़र में अन्ना ने पहली ऐसी रणनीतिक गलती की है जो उनके व्यक्तित्व में गिरावट दर्ज करेगी। जब देश में चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बात आती है तब अन्ना हजारे को एक महानायकत्व का दर्जा देने का प्रयास प्रचार माध्यम करते हैं। जब तक आंदोलन किनारे पर था तब लोगों ने उसका अधिक अध्ययन नहीं किया और उस समय अन्ना सारे निर्णय स्वयं करते हुए एक चतुर व्यक्ति लगे। जब यह लोगों की समंदरनुमा भीड़ में आया तब धीरे धीरे लगा कि अन्ना हजारे एक ऐसा शीर्षक है जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अनेक उपशीर्षकों के साथ एक बड़ा पाठ होगा। मतलब अन्ना हजारे एक नाम भर है। बाज़ार से प्रायोजित होने के प्रत्यक्ष प्रमाण भले न हो पर अन्ना टीम के सभी वरिष्ठ सदस्य ऐसे स्वयंसेवी संगठनों के कर्ताधर्ता हैं जो अपने कथित सामाजिक लक्ष्यों के लिये राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार से दान या चंदे के रूप में धन प्राप्त करते हैं। तय बात है कि बाज़ार का सामाजिक उद्देश्य लोगों को अपने हित में साधे रहना होता है। कम से कम आज के आधुनिक युग में कोई भी व्यवसायिक परिवार, संगठन या समूह धर्म के नाम दान या चंदा नहीं देता जब तब उसका कोई आर्थिक हित न पूरा होता हो। ऐसे में अन्ना की टीम के सहयोगी पेशेवर समाज सेवक हैं और उनसे यह अपेक्षा करना कि वह अपने चंदादाताओं का ध्यान नहीं रखेंगे यह सोचना गलत होगा।
          बहरहाल अन्ना के सहयोगी ब्लॉगर ने अन्ना टीम के उन्हीं सहयोगियों के बारे अन्ना के ही ऐसे विचार प्रकट किये जो प्रचार माध्यमों में समाचारों के दौरान उनकी मानसिक हलचल को बयान करते थे। हस्ताक्षर नहंी है इससे यह तो माना जा सकता है कि उनमें निर्णायक तत्व नहीं है पर इतना तय है कि उनके सहयोगियों की स्थिति अब डांवाडोल हो रही है। यह सच है कि मानसिक हलचल के समय विचारों का उतारचढ़ाव आता है। उनको स्थिर मानकर उन पर प्रतिक्रिया देना तब तक ठीक नहीं है जब उनमें व्यक्ति का निर्णायक तत्व प्रमाणित नहीं है। हम अन्ना साहब की सफाई को स्वीकार करते हैं पर ब्लॉग बंद करने का निर्णय इस बात को दर्शाता है कि वह डर गये हैं। जिन सहयोगियों की आलोचना ब्लॉग में है वह अगर तत्काल स्वयं ही अन्ना टीम से हट जायें तो उनका आंदोलन हाल ही टॉय टॉय फिस्स हो जायेगा। बाजार से पैसा जुटाने वाले उनके वर्तमान सहयोगियों को संगठित प्रचार समूह का समर्थन भी इसलिये मिला है क्योंकि कहीं न कहीं से उनको आपने धनदाताओं से ऐसे निर्देश मिले हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जनमानस में बना रहना चाहिए। इसके अलावा अन्य ने महानायकत्व की ऐसी छवि बना ली है जिसके निकट अन्य व्यक्तित्व पनप नहीं सकता। उन्होंने करीब करीब देश के सारे बड़े संगठनों से दूरी बना ली है। ऐसे में उनकी टीम के चार बलशाली सदस्य अगर उनका साथ छोड़ दें तो फिर अन्ना के लिये रालेगण सिद्धि से दिल्ली आना भी कठिन हो जायेगा। देश में सक्रिय बौद्धिक वर्ग तथा स्थापित सामाजिक संगठन अब अन्ना हजारे के आंदोलन को सक्रिय सहयोग  शायद ही दें।
         ऐसे में अपनी टीम के इन सदस्यों को प्रसन्न करने के लिये अन्ना हजारे ने ब्लॉग बंद करने का फैसला सुनाया पर इससे रूप से यह अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भी हमारे सामने आ गया है कि अन्ना अपने आंदोलन की स्थिति को जानते हैं। अपनी गांधी जैसी छवि बनते देखकर वह खुश हो रहे हैं और उनको लगता है कि उनकी वर्तमान टीम ही इसमें सबसे अधिक मददगार है। जहां तक आंदोलन के नतीजों का सवाल है इस पर हम पहले भी बहुत कुछ लिख चुके हैं। गांधीजी ने हिंसा होने पर अपना एक आंदोलन वापस ले लिया था पर इससे उनकी छवि एक अहिंसक रूप में बढ़ी थी जबकि अन्ना साहेब ने अपना ब्लॉग लेकर यह साबित किया कि एक पाठ ने ही उनके ब्लॉग को उखाड़ दिया जो कि उनकी मानसिक हलचल का परिणाम रहा। ऐसा लगता है कि जब अन्न हज़ारे रालेगण सिद्धि में होते हैं तब उनकी मानसिक हलचल उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करती है पर दिल्ली में आकर वह थम जाती है। उनके ब्लॉगर का तो यही कहना है कि वह दिल्ली में चौकड़ी के दबाव में बयान दे रहे हैं, जबकि अन्ना का अपनी टीम को बदलने का विचार उनके पास लिखित में है।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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अफगानिस्तान के राष्ट्रपति करजई ने गद्दाफी की तरह अमेरिका से वैर बांधा-हिन्दी लेख (afaganistan,america,pakistan and hamid karjai-hindi lekh)


          गद्दाफी की मौत ने अमेरिका के मित्र राजनयिको को हक्का बक्का कर दिया है। भले ही गद्दाफी वर्तमान समय में अमेरिका का मित्र न रहा हो पर जिस तरह अपने अभियान के माध्यम से राजशाही को समाप्त कर लीबिया के राष्ट्रपति पद पर उसका आगमन हुआ उससे यह साफ लगता है कि विश्व में अपनी लोकतंत्र प्रतिबद्धताओं को दिखाने के लिये उसे पश्चिमी राष्ट्रों ने समर्थन दिया था। ऐसा लगता है कि फ्रांस के ज्यादा वह करीब था यही कारण संक्रमणकाल के दौरान उसके फ्रांस जाने की संभावनाऐं सामने आती थी। संभवत अपनी अकड़ और अति आत्मविश्वास के चलते उसने ऐसा नहीं किया । ऐसा लगता है कि उसका बहुत सारा धन इन पश्चिमी देशों रहा होगा जो अब उनको पच गया है। विश्व की मंदी का सामना कर रहे पश्चिमी देश अब इसी तरह धन का जुगाड़ करेंगे और जिन लोगों ने अपना धन उनके यहां रखा है उनके सामने अब संशय उपस्थित हो गया होगा। प्रत्यक्ष विश्व में कोई अधिक प्रतिक्रिया नहीं दिखाई दे रही पर इतना तय है कि अमेरिका को लेकर उसके मित्र राजनेताओं के हृदय में अनेक संशय चल रहे होंगे। मूल में वह धन है जो उन्होंने वहां की बैंकों और पूंजीपतियों को दिया है। हम पर्दे पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दृश्य देखते हैं पर उसके पीछे के खेल पहले तो दिखाई नहीं देते और जब उनका पता लगता है तो उनकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाता है। इन सबके बीच एक बात तय हो गयी है कि अमेरिका से वैर करने वाला कोई राजनयिक अपने देश में आराम से नहंी बैठ सकता। ऐसे में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई ने अमेरिका और भारत से युद्ध होने पर पाकिस्तान का साथ देने की बात कहकर गद्दाफी के मार्ग पर कदम बढ़ा दिया है। उसका यह कदम इस बात का प्रमाण है कि उसे राजनीतिक ज्ञान नहीं है। वह घबड़ाया हुआ है और ऐसा अफलातूनी बातें कह रहा है जिसके दुष्परिणाम कभी भी उसके सामने आ सकते हैं।
        यह हैरानी की बात है कि जिन देशों के सहयोग से वह इस पद पर बैठा है उन्हें ही अपने शत्रुओ में गिन रहा है। इसका कारण शायद यह है कि अमेरिकी सेना अगले एक दो साल में वहां से हटने वाली है और करजई का वहां कोई जनाधार नहीं है। जब तक अमेरिकी सेना वहां है तब तक ही उसका राष्ट्रपति पद बरकरार है, उसके बाद वह भी नजीबुल्लाह की तरह फांसी  पर लटकाया जा सकता है। उसने किस सनक में आकर पाकिस्तान को मित्र बना लिया है यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि वहां  की खुफिया संस्था आईएसआई अपने पुराने बदले निकाले बिना उसे छोड़ेगी नहीं। अगर वह इस तरह का बयान नहीं देता तो यकीनन अमेरिका नहीं तो कम से कम भारत उसकी चिंता अवश्य करता। भारत के रणनीतिकार पश्चिमी राष्ट्रों से अपने संपर्क के सहारे उसे राष्ट्रपति पद से हटने के बाद किसी दूसरे देश में पहुंचवा सकते थे पर लगता है कि पद के मोह ने उसे अंधा कर दिया है। अंततः यह उसके लिये घातक होना है।
         अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से हटेगी पर वैकल्पिक व्यवस्था किये बिना उसकी वापसी होगी ऐसी संभावना नहीं है। इस समय अमेरिका तालिबानियों से बात कर रहा है। इस बातचीत से तालिबानी क्या पायेंगे यह पता नहीं पर अमेरिका धीरे धीरे उसमें से लोग तोड़कर नये तालिबानी बनाकर अपनी चरण पादुकाओं के रूप में अपने लोग स्थापित करने करने के साथ ही किसी न किसी रूप में सैन्य उपस्थिति बनाये रखेगा। अमेरिका दुश्मनों को छोड़ता नहीं है और जब तक स्वार्थ हैं मित्रों को भी नहीं तोड़ता। लगता है कि अमेरिका हामिद करजई का खेल समझ चुका है और उसके दोगलेपन से नाराज हो गया है। जिस पाकिस्तान से वह जुड़ रहा है उसका अपने ही तीन प्रदेशों में शासन नाम मात्र का है और वहां के बाशिंदे अपने ही देश से नफरत करते हैं। फिर जो क्षेत्र अफगानिस्तान से लगे हैं वहां के नागरिक तो अपने को राजनीतिक रूप से पंजाब का गुलाम समझते हैं। अगर पाकिस्तान को निपटाना अमेरिका के हित में रहा और उसने हमला किया तो वहीं के बाशिंदे अमेरिका के साथ हो लेंगे भले ही उनका जातीय समीकरण हामिद करजई से जमता हो। अमेरिका उसकी गीदड़ भभकी से डरेगा यह तो नहीं लगता पर भारत की खामोशी भी उसके लिये खतरनाक है। भारत ने संक्रमण काल में उसकी सहायता की थी। इस धमकी के बाद भारतीय जनमानस की नाखुशी को देखते हुए यहां के रणनीतिकारों के लिये उसे जारी रखना कठिन होगा। ऐसे में अफगानिस्तान में आर्थिक रूप से पैदा होने वाला संकट तथा उसके बाद वहां पैदा होने वाला विद्रोह करजाई को ले डूबेगा। वैसे यह भी लगता है कि पहले ही भारत समर्थक पूर्व राष्ट्राध्यक्षों की जिस तरह अफगानिस्तान में हत्या हुई है उसके चलते भी करजई ने यह बयान दिया हो। खासतौर से नजीबुल्लाह को फांसी देने के बाद भारत की रणनीतिक क्षमताओं पर अफगानिस्तान में संदेह पैदा हुआ है। इसका कारण शायद यह भी है कि भारत को वहां के राजनीतिक शिखर पुरुष केवल आर्थिक दान दाता के रूप में एक सीमित सहयोग देने वाला देश मानते हैं। सामरिक महत्व से भारत उनके लिये महत्वहीन है। इसके लिये यह जरूरी है कि एक बार भारतीय सेना वहां जाये। भारत को अगर सामरिक रूप से शक्तिशाली होना है तो उसे अपने सैन्य अड्डे अमेरिका की तरह दूसरे देशों में स्थापित करना चाहिए। खासतौर से मित्र पड़ौसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को सामरिक उपस्थिति के रूप में विश्वास दिलाना चाहिए कि उनकी रक्षा के लिये हम तत्पर हैं। यह मान लेना कि सेना की उपस्थिति रहना सम्राज्यवाद का विस्तार है गलत होगा। हमारे यहां कुछ विद्वान लोग इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सुना को उपनिवेशवाद मानते हैं पर वह यह नहीं जानते कि अनेक छोटे राष्ट्र अर्थाभाव और कुप्रबंधन के कारण बाहर के ही नहीं वरन् आंतरिक खतरों से भी निपटने का सामर्थ्य नहीं रखते। वहां के राष्ट्राध्यक्षों को विदेशों पर निर्भर होना पड़ता है। ऐसे में वह विदेशी सहायक के मित्र बन जाते हैं। भारत का विश्व में कहीं कोई निकटस्थ मित्र केवल इसलिये नहीं है क्योंकि यहां की नीति ऐसी है जिसमें सैन्य उपस्थिति सम्राज्य का विस्तार माना जाता है। सच बात तो यह है आर्थिक रूप से शक्तिशाली होने का कोई मतलब नहीं है बल्कि सामरिक रूप से भी यह दिखाना आवश्यक है कि हम दूसरे की मदद कर सकते हैं तभी शायद हमारे लिये खतरे कम होंगे वरना तो हामिद करजई जैसे लोग चाहे जब साथ छोड़कर नंगे भूखे पाकिस्तानी शासकों के कदमों में जाकर बैठेंगे। यह बात अलग बात है कि ऐसे लोग अपना बुरा हश्र स्वयं तय करते हैं।

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लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

भ्रष्टाचार का जिंदा मुद्दा छोड़ जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह या आत्मनिर्णय का मुर्दा मसला क्यों पकड़ा-हिन्दी लेख (bhrashtachar ka jinda mudda chhod jammu kashmir mein janmat sangrah ka murda masla kyon pakda-hindi lekh


           भारत में महात्मा गांधी के चरणचिन्ह पर चल रहे लोगों को यह गलतफहमी कतई नहीं रखना चाहिए कि अहिंसा के हथियार का उपयोग देशी लोगों को तोड़ने के लिये किया जाये। उनको एक बात याद रखना चाहिए कि गांधी जी ने अंिहंसा का प्रयोग देश के लोगों को एकजुट करने के साथ ही विदेशों में भी अपने विषय को चर्चा योग्य बनाने के लिये किया था। उन्होंने अपनी अहिंसा से देश को जोड़ा न कि अलग होने के लिये उकसाया। जम्मू कश्मीर के मसले पर जनमत संग्रह की मांग का समर्थन कर अन्ना हजारे के सहयोगी ने ऐसा ही काम किया है जैसे कि अपनों का जूता देश अपनों की ही सिर। उनके बयान के कारण उनसे मारपीट हुई जिसकी निंदा पूरे देश में कुछ ही घंटे टीवी चैनलों पर चली जबकि उनके बयान के विरोध की बातें करते हुए दो दिन होने जा रहे हैं। अहिंसा की बात निहत्थे लोगों के लिये ठीक है पर जो हथियार लेकर हमला कर रहे उन उग्रवादियों से यह आशा करना बेकार है कि वह गांधीवाद को समझेंगे। फिर जम्मू कश्मीर का मसला अत्यंत संवेदनशील है ऐसे में अन्ना के सहयोगी का बयान अपने प्रायोजकों में अपनी छवि बनाये रखने के लिये जारी किया गया लगता है। अन्ना हजारे को भारत का दूसरा गांधी कहा जाता है पर वह गांधी नहंी है। इसलिये तय बात है कि अन्ना हजारे के किसी सहयोगी को भी अभी गांधीवाद की समझ नहंी है। महात्मा गांधी देश का विभाजन नहीं चाहते यह सर्वज्ञात है। ऐसे में गांधीवादी अन्ना हजारे के किसी सहयोगी का जम्मू कश्मीर के जनमत संग्रह कराने तथा वहां से सेना हटाने का बयान संदेह पैदा करता है। क्या गांधीजी ने कहा था कि अपने देश में कहीं किसी प्रदेश में सेना न रखो।
        बहरहाल कुछ लोगों को अन्ना के सहयोगी का बयान के साथ ही उसका विरोध भी प्रायोजित लग सकता है। अन्ना के सहयोगी के साथ मारपीट हुई यह दुःख का विषय है। प्रचार माध्यमों से पता चला कि आरोपियों की तो जमानत भी हो चुकी है। इसका सीधा मतलब है कि बयान के विरोधियों ने अन्ना के सहयोगी को उनके इसी बयान की वजह से खलनायक बनाने के लिये इस तरह का तरीका अपनाया जिससे उनके शरीर को अधिक क्षति भी न पहुंचे और उनकी छवि भी खराब हो। यह मारपीट भले ही अब हल्का विषय लगता हो पर यकीनन यह अंततः अन्ना के उस सहयोगी के लिये संकट का विषय बनने वाला है।
       भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के वजह से अन्ना हजारे की राष्ट्रीय छवि बनी तो तय था कि उसका लाभ उनके निकटस्थ लोगों को होना ही था। अन्ना के जिस सहयोगी के साथ मारपीट हुई वह उनके साथ उस पांच सदस्यीय दल का सदस्य था जो सरकारी प्रतिनिधियों के साथ जनलोकपाल विधेयक बनाने पर चर्चा करती रहीं। एक तरह से उसकी भी राष्ट्रीय छवि बनती जा रही थी जिससे अपने अन्य प्रतिबद्ध एजेंडों को छिपाने में सफल हो रहे थे। अब वह सामने आ गया है। इंटरनेट के एक दो हिन्दी ब्लॉग लेखकों ने जम्मू कश्मीर के मसले पर प्रथकतावादियों के साथ आयोजित एक कार्यक्रम में उनकी सहभागिता का जिक्र किया था तब हैरानी भी हुई थी। ऐसे में हमें संदेह भी हो रहा था कि अन्ना हजारे साहब की आड़ के कुछ ऐसे तत्व तो नहीं आगे बढ़ रहे जो राष्ट्रीय छवि के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय छवि तो नहीं बनाने का प्रयास कर रहे हैं । ऐसे में अन्ना जी के सहयोगी ने ऐसा बयान इस तरह दे दिया कि जैसे वह आम बयान हो पर उनके विरोधियों के लिये इतना ही काफी था।
        एक बात निश्चित है कि कुछ अदृश्य शक्तियां अन्ना साहब के आंदोलन को बाधित करना चाहती होंगी पर जिस तरह अन्ना के सहयोगी अपने मूल उद्देश्य से अलग हटकर बयान दे रहे हैं उसे देखकर नहीं लगता कि उन्हें  प्रयास करने होंगे क्योंकि यह काम अन्ना के सहयोगी ही कर देंगे। अब एक सवाल हमारे मन में आता है कि अन्ना के सहयोगी ने यह बयान कहीं जानबूझकर तो नहीं दिया कि अन्ना जी का आंदोलन बदनाम हो। वह पेशेवर समाज सेवक हैं ऐसी बातें प्रचार माध्यम ही कहते हैं। अन्नाजी के अनेक सहयोगियों को विदेशों से भी अनुदान मिलता है ऐसा सुनने को मिलता रहता है। तब लगता है कि अन्ना के सहयोगी कहीं अपने प्रायोजकों के ऐजेंडे को बढ़ाने का प्रयास न करें। दूसरी यह भी बात है कि अन्ना साहेब का आंदोलन अभी लंबा चलना है। ऐसे में उनके निकटस्थ सहयोगियों के चेहरे भी बदलते नजर आयेंगे। यह देखकर स्वयं की पदच्युत होने की संभावनाओं के चलते कोई सहयोगी अफलातूनी बयान भी दे सकता है। कहा भी जाता है कि बिल्ली दूध पीयेगी भी तो फैला जरूर देगी।
        बहरहाल अगर अन्ना के सहयोगी का जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का बयान प्रायोजित है तो फिर यह मारपीट भी कम प्रायोजित नहीं लगती। प्रचार माध्यमों के अनुसार 24 या 25 सितम्बर को यह बयान दिया गया जबकि उनके साथ मारपीट 13 अक्टोबर को हुई। अक्सर देखा गया है कि संवेदनशील बयानों पर प्रतिक्रिया एक दो दिन मेें ही होती है पर यहां 18 दिन का अंतर देखा गया। संभव है आरोपियों ने यह घटना भावावेश में आकर की हो पर उनके प्रेरकों ने कहीं न कहीं यह हमला फिक्स किया होगा। उनके पीछे कौनसा समूह है यह कहना कठिन है। पहली बात तो यह अगर यह मारपीट नहीं होती तो बयान को 18 दिन बाद कोई पूछता भी नहीं। अब यह संभव है कि जम्मू कश्मीर के मसले पर भारत में प्रचार बनाये रखने वाले समूह का भी यह काम हो सकता हैं। दूसरा अन्ना के सहयोगी के ऐसे विरोधियों का भी यह काम हो सकता जो उनकी छवि बिगाड़ना चाहते रहे होंगे-यह अलग बात है कि उन्होंने स्वयं ही यह बयान देकर यह अवसर दिया।
आगे क्या होगा कहना कठिन है? इतना तय है कि अन्ना के यह सहयोगी अब जम्मू कश्मीर के मसले पर समर्थन कर भले ही अपने प्रायोजकों को प्रसन्न कर चुके हों पर भारतीय जनमानस उनके प्रति अब वैसे सद्भावना नहीं दिखायेगा। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलनरत श्री अन्ना हजारे की टीम में फिलहाल उनकी जगह बनी हुई है पर विशुद्ध रूप से जनमानस के हार्दिक समर्थन से चल रहे अभियान को आगे चलाते समय उनके रणनीतिकारों के पास अपने विवादास्पद सहयोगी से पीछा छुड़ाने के अलावा कोई चारा नहीं रहने वाला। उनके साथ मारपीट करने वालों का उद्देश्य की उनका खून बहाना नहीं बल्कि छवि खराब करना अधिक लगता है। यह मारपीट अनुचित थी पर जिस लक्ष्य को रखकर की गयी वह भी अन्ना टीम के विरोधियों के हाथ लग सकता है। जनमानस की अनदेखी करना कठिन है। यह सही है कि महंगाई और भ्रष्टाचार देश में भयंकर रूप ले चुके हैं और जनमानस से विवादास्पद बयान भूल जाने की अपेक्षा की जा सकती थी पर यह काम तो अन्ना के वह कथित सहयोगी भी कर सकते थे। वरना संयुक्त राष्ट्रसंघ में धूल खा रहे प्रस्ताव की बात अब करने क्या औचित्य था? भ्रष्टाचार जैसे ज्वलंत मुद्दे में ऐसे मुर्दा सुझाव का कोई मतलब नहीं था।
इस विषय पर कल दूसरे ब्लाग पर लिखा गया यह लेख भी अवश्य पढें।

             अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के लक्ष्यों को लेकर तो उनके विरोधी भी गलत नहीं मानते। इस देश में शायद ही कोई आदमी हो यह नहीं चाहता हो कि देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो। अन्ना हजारे ने जब पहली बार अनशन प्रारंभ किया तो उनको व्यापक समर्थन मिला। किसी आंदोलन या अभियान के लिये किसी संगठन का होना अनिवार्य है मगर अन्ना दिल्ली अकेले ही मैदान में उतर आये तो उनके साथ कुछ स्वयंसेवी संगठन साथ हो गये जिसमें सिविल सोसायटी प्रमुख रूप से थी। इस संगठन के सदस्य केवल समाज सेवा करते हैं ऐसा ही उनका दावा है। इसलिये कथित रूप से जहां समाज सुधार की जरूरत है वहां उनका दखल रहता है। समाज सुधार एक ऐसा विषय हैं जिसमें अनेक उपविषय स्वतः शामिल हो जाते हैं। इसलिये सिविल सोसायटी के सदस्य एक तरह से आलराउंडर बन गये हैं-ऐसा लगता है। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन से पहले उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहंी थी। अब अन्ना की छत्रछाया में उनको वह सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसकी कल्पना अनेक आम लोग करते हैं। इसलिये इसके सदस्य अब उस विषय पर बोलने लगे हैं जिससे वह जुड़े हैं। यह अलग बात है कि उनका चिंत्तन छोटे पर्दे पर चमकने तथा समाचार पत्रों में छपने वाले पेशेवर विद्वानों से अलग नहीं है जो हम सुनते हैं।

           बहरहाल बात शुरु करें अन्ना हजारे से जुड़ी सिविल सोसायटी के सदस्य पर हमले से जो कि वास्तव में एक निंदनीय घटना है। कहा जा रहा है कि यह हमला अन्ना के सहयोगी के जम्मू कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने पर दिया गया था जो कि विशुद्ध रूप से पाकिस्तान का ऐजंेडा है। दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र में पारित उस प्रस्ताव का हिस्सा भी है जो अब धूल खा रहा है और भारत की सामरिक और आर्थिक शक्ति के चलते यह संभव नहीं है कि विश्व का कोई दूसरा देश इस पर अमल की बात करे। ऐसे में कुछ विदेशी प्रयास इस तरह के होना स्वाभाविक है कि भारतीय रणनीतिकारों को यह विषय गाहे बगाहे उठाकर परेशान किया जाये। अन्ना के जिस सहयोगी पर हमला किया गया उन्हें विदेशों से अनुदान मिलता है यह बात प्रचार माध्यमों से पता चलती रहती है। हम यह भी जानते हैं कि विदेशों से अनुदान लेने वाले स्वैच्छिक संगठन कहीं न कहीं अपने दानदाताओं का ऐजेंडा आगे बढ़ाते हैं।
           हमारे देश में लोकतंत्र है और हम इसका प्रतिकार हिंसा की बजाय तर्क से देने का समर्थन करते हैं। कुछ लोगों को यह लगता है कि मारपीट कर प्रतिकार करें तो वह कानून को चुनौती देते हैं। इस प्रसंग में कानून अपना काम करेगा इसमें भी कोई शक नहीं है।
           इधर अन्ना के सहयोगी पर हमले की निंदा का क्रम कुछ देर चला पर अब बात उनके बयान की हो रही है कि उसमें भी बहुत सारे दोष हैं। कहीं न कहीं हमला होने की बात पीछे छूटती जा रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम अपनी बात कहें तो शायद कुछ लोगों को अजीब लगे। हमने अन्ना के सहयोगी के इस बयान को उन पर हमले के बाद ही सुना। इसका मतलब यह कि यह बयान आने के 15 दिन बाद ही घूल में पड़ा था। कुछ उत्तेजित युवकों ने मारपीट कर उस बयान को पुनः लोकप्रियता दिला दी। इतनी कि अब सारे टीवी चैनल उसे दिखाकर अपना विज्ञापनों का समय पास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि कहीं यह उत्तेजित युवक यह बयान टीवी चैनलों पर दिखाने की कोई ऐसी योजना का अनजाने में हिस्सा तो नहीं बन गये। संभव है उस समय टीवी चैनल किसी अन्य समाचार में इतना व्यस्त हों जिससे यह बयान उनकी नजर से चूक गया हो। यह भी संभव है कि दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई बैंगलौर या अहमदाबाद जैसे महानगरों पर ही भारतीय प्रचार माध्यम ध्यान देते हैं इसलिये अन्य छोटे शहरों में दिये गये बयान उनकी नजर से चूक जाते हैं। इस बयान का बाद में जब उनका महत्व पता चलता है तो कोई विवाद खड़ा कर उसे सामने लाने की कोई योजना बनती हो। हमारे देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो अनजाने में जोश के कारण उनकी योजना का हिस्सा बन जाते हैं। यह शायद इसी तरह का प्रकरण हो। हमला करने वाले युवकों ने हथियार के रूप में हाथों का ही उपयोग किया इसलिये लगता है कि उनका उद्देश्य अन्ना के सहयोगी को डराना ही रहा होगा। ऐसे में मारपीट कर उन्होंनें जो किया उसके लिये उनको अब अदालतों का सामना तो उनको करना ही होगा। हैरानी की बात यह है कि हमला करने वाले तीन आरोपियों में से दो मौके से फरार हो गये पर एक पकड़ा गया। जो पकड़ा गया वह अपने कृत्य पर शार्मिंदा नहीं था और जो फरार हो गये वह टीवी चैनलों पर अपने कृत्य का समर्थन कर रहे थे। हैरानी की बात यह कि उन्होंने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति समर्थन देकर अपनी छवि बनाने का प्रयास किया। इसका सीधा मतलब यह था कि वह अन्ना की आड़ में उनके सहयोगी के अन्य ऐजेंडों से प्रतिबद्धता को उजागर करना चाहते थे। वह इसमें सफल रहे या नहीं यह कहना कठिन है पर एक बात तय है कि उन्होंने अन्ना के सहयोगी को ऐसे संकट में डाल दिया है जहां उनके अपने अन्य सहयोगियों के सामने अपनी छवि बचाने का बहुत प्रयास करना होगा। संभव है कि धीरे धीरे उनको आंदोलन की रणनीतिक भूमिका से प्रथक किया जाये। कोई खूनखराबा नहीं  हुआ यह बात अच्छी है पर अन्ना के सभी सहयोगियों के सामने अब यह समस्या आने वाली है कि उनकी आलराउंडर छवि उनके लिये संकट का विषय बन सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन निर्विवाद है पर जम्मू कश्मीर, देश की शिक्षा नीति, हिन्दुत्ववाद, धर्मनिरपेक्षता तथा आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों पर अपनी बात सोच समझकर रखना चाहिए। यह अलग बात है कि लोग चिंत्तन करने की बजाय तात्कालिक लोकप्रियता के लिये बयान देते हैं। यही अन्ना के सहयोगी ने किया। स्थिति यह है कि जिन संगठनों ने उन पर एक दिन पहले उन पर हमले की निंदा की दूसरे दिन अन्ना के सहयोगी के बयान से भी प्रथक होने की बात कह रहे हैं। अन्ना ने कुशल राजनीतिक होने का प्रमाण हमले की निंदा करने के साथ ही यह कहकर भी दिया कि मैं हमले की असली वजह के लिये अपने एक अन्य सहयेागी से पता कर ही आगे कुछ कहूंगा।

            आखिरी बात जम्मू कश्मीर के बारे में की जाये। भारत में रहकर पाकिस्तान के ऐजेंडे का समर्थन करने से संभव है विदेशों में लोकप्रिय मिल जाये। कुछ लोग गला फाड़कर चिल्लाते हुए रहें तो उसकी परवाह कौन करता है? मगर यह नाजुक विषय है। भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान बना है। इधर पेशेवर बुद्धिजीवी विदेशी प्रायोजन के चलते मानवाधिकारों की आड़ में गाहे बगाहे जनमत संग्रह की बात करते हैं। कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी इस बात को जानते हैं कि यह सब केवल पैसे का खेल है इसलिये बोलते नहीं है। फिर बयान के बाद मामला दब जाता है। इसलिये क्या विवाद करना? अलबत्ता इन बुद्धिजीवियों को कथित स्वैच्छिक समाज सेवकों को यह बता दें कि विभाजन के समय सिंध और पंजाब से आये लोग हिन्दी नहीं जानते थे इसलिये अपनी बात न कह पाये न लिख पाये। उन्होंने अपनी पीड़ा अपनी पीढ़ी को सुनाई जो अब हिन्दी लिखती भी है और पढ़ती भी है। यह पेशेवर बुद्धिजीवी अपने उन बुजुर्गों की बतायी राह पर चल रहे हैं जिसका सामना बंटवारा झेलने वाली पीढ़ी से नहीं हुआ मगर इनका होगा। बंटवारे का सच क्या था? वहां रहते हुए और फिर यहां आकर शरणार्थी के रूप में कैसी पीढ़ा झेली इस सच का बयान अभी तक हुआ नहीं है। विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों में क्या जनमत कराया गया था? पाकिस्तान जम्मू कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और जनमत संग्रह की मांग करने वाले खुले रूप से उससे हमदर्दी रखते हैं। ऐसे में जनमत संग्रह कराने का मतलब पूरा कश्मीर पाकिस्तान को देना ही है। कुछ राष्ट्रवादियों का यह प्रश्न इन कथित मानवाधिकारियों के सामने संकट खड़ा कर सकता है कि ‘सिंध किसके बाप का था जो पाकिस्तान को दे दिया या किसके बाप का है जो कहता है कि वह पाकिस्तान का हिस्सा है’। जम्मू कश्मीर को अपने साथ मिलाने का सपना पूरा तो तब हो जब वह पहले बलूचिस्तान, सीमा प्रांत और सिंध को आजाद करे जहां की आग उसे जलाये दे रही है। यह तीनों प्रांत केवल पंजाब की गुलामी झेल रहे हैं। इन संकीर्ण बुद्धिजीवियों की नज़र केवल उस नक्शे तक जाती है जो अंग्रेज थमा गये जबकि राष्ट्रवादी इस बात को नहीं भूलते कि यह धोखा था। संभव है कि यह सब पैसे से प्रायोजित होने की वजह से हो रहा हो। इसी कारण इतिहास, भूगोल तथा अपने पारंपरिक समाज से अनभिज्ञ होकर केवल विदेशियों से पैसा देकर कोई भी कैसा भी बयान दे सकता है। यह लोग जम्मू कश्मीर पर बोलते हैं पर उस सिंध पर कुछ नहीं बोलते जो हमारे राष्ट्रगीत में तो है पर नक्शे में नहीं है।

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

writer aur editor-Deepak ‘Bharatdeep’ Gwalior

महंगाई का साम्राज्यवाद-हिन्दी लेख (mehangai ka samrajya-hindi lekh


         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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