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ओसामा बिन लादेन कब मरा-हिन्दी लेख (death of osama bin laden,what truth and lie-hindi lekh)


               इस्लामिक उग्रवाद के आधार स्तंभ ओसामा  बिन लादेन के मारे जाने की खबर इतनी बासी लगी कि उस पर लिखना अपने शब्द बेकार करना लगता है।  अगर अमेरिका और लादेन के बीच चल रहे पिछले दस वर्षों से चल रहे संघर्ष के बारे में प्रचार माध्यमों में प्रकाशित तथा प्रसारित समाचारों पर दृष्टिपात करते हैं तो हमारा अनुमान है कि वह दस साल पहले ही मर चुका है क्योंकि उसके जिंदा रहने के कोई प्रमाण अमेरिका और उसकी खुफिया एजेंसी सीआईऐ नहीं दे सकी थी। उसके मरने के प्रमाण नहीं मिले या छिपाये गये यह अलग से चर्चा का विषय हो सकता है। थोड़ी देर के लिये मान लें कि वह दस साल पहले नहीं मारा गया तो भी बाद के वर्षों में भी उसके ठिकानों पर ऐसे अमेरिकी हमले हुए जिसमें वह मर गया होगा। यह संदेह उसी अमेरिका की वजह से हो रहा है जिसकी सेना के हमले बहुत अचूक माने जाते हैं।
                 अगर हम यह मान लें कि ओसामा बिन लादेन अभी तक नहीं मरा  था  तो यह शक होता है कि अमेरिका का एक बहुत बड़ा वर्ग उसे जिंदा रखना चाहता था ताकि उसके आतंक से भयभीत देश उसके पूंजीपतियों के हथियार खरीदने के लिये मजबूर हो सकें। यह रहस्य तो सैन्य विशेषज्ञ ही उजागर कर सकते हैं कि इन दस वर्षों में अमेरिका के हथियार निर्माताओं को इस दस वर्ष की अवधि में ओसामा बिन लादेन की वजह से कितना लाभ मिला? इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि उसे दस वर्ष तक प्रचार में जिंदा रखा गया। अमेरिका के रणीनीतिकार अपनी शक्तिशाली सेना की नाकामी का बोझ केवल अपने आर्थिक हितो की वजह से ढोते रहे।
                  आज से दस वर्ष पूर्व अमेरिका के अफगानिस्तान पर हम हमले के समय ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर आयी थी। वह प्रमाणित नहीं हुई पर सच बात तो यह है कि उसके बाद फिर न तो ओसामा बिन लादेन का कोई वीडियो आया न ही आडियो। जिस तरह का ओसामा बिन लादेन प्रचार का भूखा आदमी था उससे नहीं लगता कि वह बिना प्रचार के चुप बैठेगा। कभी कभी उसकी बीमारी की खबर आती थी। इन खबरों से तो ऐसा लगा कि ओसामा चलती फिरती लाश है जो स्वयं लाचार हो गया है। उन  समाचारों पर शक भी होता था क्योंकि कभी उसके अफगानिस्तान में छिपे होने की बात कही जाती तो कभी पाकिस्तान में इलाज करने की खबर आती।
                          अब अचानक ओसामा बिन लादेन की खबर आयी तो वह बासी लगी। उसके बाद अमेरिका के राष्टपति बराक हुसैन ओबामा के राष्ट्र के नाम संबोधन सुनने का मौका मिला। उसमें ओसामा बिन लादेन के धर्मबंधुओं को समझाया जा रहा था कि अमेरिका उनके धर्म के खिलाफ नहीं है। अगर हम प्रचार माध्यमों की बात करें तो यह लगता है कि इस समय अमेरिका में बराक ओबामा की छवि खराब हो रही है तो उधर मध्य एशिया में उसके हमलों से ओसामा बिन लादेन  के धर्मबंधु पूरी दुनियां में नाराज चल रहे हैं। लीबिया में पश्चिमी देशों के हमल जमकर चल रहे हैं। सीरिया  और मिस्त्र में भी अमेरिका अपना सीधा हस्तक्षेप करने की तैयारी मे है। देखा जाये तो मध्य एशिया में अमेरिका की जबरदस्त सक्रियता है जो पूरे विश्व में ओसामा बिन लादेन के धर्म बंधुओं के लिये विरोध का विषय है। बराक ओबामा ने जिस तरह अपनी बात रखी उससे तो लगता है कि वह ने केवल न केवल एक धर्म विशेष लोगों से मित्रता का प्रचार कर रहे थे बल्कि मध्य एशिया में अपनी निरंतर सक्रियता  से उनका ध्यान भी हटा रहे थे। उनको यह अवसर मिला या बनाया गया यह भी चर्चा का विषय है।
                  अमेरिका में रविवार छुट्टी का दिन था। लोगों के पास मौज मस्ती का समय होता है और वहां के लोगों को यह एक रोचक और दिलखुश करने वाला विषय मिल गया और प्रचार माध्यमों में उनका जश्न दिखाया भी गया। अमेरिका की हर गतिविधि पर नज़र रखने वाले किसी भी घटना के वार और समय में बहुत दिलचस्पी रखते हैं। सदाम हुसैन को फांसी रविवार को दी गयी थी तब कुछ विशेषज्ञों ने अनेक घटनाओं को हवाला देकर शक जाहिर किया था कि कहीं यह प्रचार के लिये फिक्सिंग तो नहीं है क्योकि ऐसे मौकों पर अमेरिका में छुट्टी का दिन होता है और समय वह जब लोग नींद से उठे होते हैं या शाम को उनकी मौजमस्ती का समय होता है।
                    जब से क्रिकेट  में फिक्सिंग की बात सामने आयी है तब से हर विषय में फिक्सिंग के तत्व देखने वालों की कमी नहीं है। स्थिति तो यह है कि फुटबाल और टेनिस में भी अब लोग फिक्सिंग के जीव ढूंढने लगे हैं। अमेरिका की ऐसी घटनाओं पर विश्लेषण करने वाले वार और समय का उल्लेख करना नहीं भूलते।
                        पहले की अपेक्षा अब प्रचार माध्यम शक्तिशाली हो गये है इसलिये हर घटना का हर पहलु सामने आ ही जाता है। अमेरिका इस समय अनेक देशों में युद्धरत है और वह अफगानिस्तान से अपनी सेना  वापस बुलाना चाहता है। संभव है कि ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद उसे यह सहुलियत मिल जायेगी कि वहां के रणनीतिकार अपनी जनता को सेना की वापसी का औचित्य बता सकेंगे। अभी तक  वह अफगानिस्तान में अपनी सेना बनाये रखने का औचित्य इसी आधार पर सही बताता रहा था कि ओसाबा अभी जिंदा है। अलबत्ता सेना बुलाने का यह मतलब कतई नहीं समझना चाहिए कि अफगानितस्तान से वह हट रहा है। दरअसल उसने वहां उसी तरह अपना बौद्धिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक वर्चस्व स्थापित कर दिया होगा जिससे बिना सेना ही वह वहां का आर्थिक दोहन करे जैसे कि ब्रिटेन अपने उपनिवेश देशों को आज़ाद करने के बाद करता रहा है। सीधी बात कहें तो अफगानिस्तान के ही लोग अमेरिका का डोली उठाने वाले कहार बन जायेंगे।        
                     ओसामा बिन लादेन एकदम सुविधा भोगी जीव था। यह संभव नहीं था कि जहां शराब और शबाब की उसकी मांग जहां पूरी न होती हो वह वहां जाकर रहता। उसके कुछ धर्मबंधु भले ही प्रचार माध्यमों के आधार पर उसे नायक मानते रहे हों पर सच यह है कि वह अय्याश और डरपोक जीव था। वह युद्ध के बाद शायद ही कभी अफगानिस्तान में रहा हो। उसका पूरा समय पाकिस्तान में ही बीता होगा। अमेरिकी प्रशासन के पाकिस्तानी सेना में बहुत सारे तत्व हैं और यकीनन उन्होंने ओसामा बिन लादेन को पनाह दी होगी। वह बिना किसी पाकिस्तानी सहयोग  के इस्लामाबाद के निकट तक आ गया और वहां आराम की जिंदगी बिताने लगा यह बात समझना कठिन है। सीधा मतलब यही है कि उसे वहां की लोग ही लाये और इसमें सरकार का सहयोग न हो यह सोचना भी कठिन है। वह दक्षिण एशिया की कोई भाषा नहीं जानता इसलिये यह संभव नही है कि स्थानीय सतर पर बिना सहयोग के रह जाये। अब सवाल यह भी है कि पाकिस्तानी सेना बिना अमेरिका की अनुमति के उसे वहां कैसे पनाह दे सकती थी। यकीनन कहीं न कहीं फिक्सिंग की बू आ रही है। अमेरिका उसके जिंदा रहते हुए अनेक प्रकार के लाभ उठाता रहा है। ऐसे में संभव है कि उसने अपने पाकिस्तानी अनुचरों से कहा होगा कि हमें  तो हवा में बमबारी करने दो और तुम लादेन को कहीं रख लो। किसी को पता न चले, जब फुरतस मिलेगी उसे मार डालेंगे। अब जब उसका काम खत्म हो गया तो उसे इस्लामाबाद में मार दिया गया।
                        खबरें यह है कि कुछ मिसाइलें दागी गयीं तो डान विमान से हमले किये गये। अमेरिका के चालीस कमांडो आराम से लादेन के मकान पर उतरे और उसके आत्मसमर्पण न करने पर उसे मार डाला। तमाम तरह की कहानिया बतायी जा रही हैं पर उनमें पैंच यह है कि अगर पाकिस्तान को पता था कि लादेन उनके पास आ गया तो उन्होंने उसे पकड़ क्यों नहीं लिया? यह ठीक है कि पाकिस्तान एक अव्यवस्थित देश है पर उसकी सेना इतनी कमजोर नहीं है कि वह अपने इलाके में घुसे लादेन को जीवित न पकड़ सके। बताया जाता है कि अंतिम समय में पाकिस्तान के एबटबाद में सैन्य अकादमी के बाहर ही एक किलोमीटर दूर एक बड़े बंगले में रह रहा था। पाकिस्तान का खुफिया तंत्र इतना हल्का नहीं लगता है कि उसे इसकी जानकारी न हो। अगर पाकिस्तान की सेना या पुलिस अपनी पर आमादा हो जाती तो उसे कहीं भी मार सकती थी। ऐसे में एक शक्तिशाली सेना दूसरे देश को अपने देश में घुस आये अपराधी की सूचना भर देने वाली एक  अनुचर संस्था  बन जाती है और फिर उसकी सेना  को हमले करने के लिए  आमंत्रित  करती है। इस तरह पाकिस्तान ने सारी गोटिया बिछायीं और अमेरिकी सेना को ही ओसामा बिन लादेन को मारे का श्रेय दिलवाया जिसको न मार पाने के आरोप को वह दस बर्षों से ढो रही थी। लादेन अब ज्यादा ताकतवर नहीं रहा होगा। उसे सेना क्या पाकिस्तानी पुलिस वाले ही धर लेते अगर उनको अनुमति दी जाती । ऐसा लगता है कि अमेरिका ने चूहे को मारने के लिये तोपों का उपयोग  किया है।
                   यह केवल अनुमान ही है। हो सकता है कि दस वर्ष या पांच वर्ष पूर्व मर चुके लादेन को अधिकारिक मौत प्रदान करने का तय किया गया हो। अभी यह सवाल है कि यह तय कौन करेगा कि करने वाला कौन है? बिना लादेन ही न1 इसका निर्णय तो आखिर अमेरिका ही करेगा। हालांकि नज़र रखने वाले इस बात की पूरी तहकीकात करेंगे। सब कुछ एक कहानी की तरह लग रहा है क्योंकि लादेन की लाश की फोटो या वीडियो दिखाया नहीं गया। कम उसका पोस्टमार्टम हुआ कब उसका डीएनए टेस्ट किया गया इसका भी पता नहीं चला। आनन फानन में उसका अंतिम संस्कार समंदर में इस्लामिक रीति से किया गया। कहां, यहा भी पता नहीं। भारतीय प्रचार माध्यम इस कहानी की सच्चाई पर यकीन करते दिख रहे हैं। उनको विज्ञापन दिखाने के लिये यह कहानी अच्छी मिल गयी। हमारे पास भीअविश्वास का कोई कारण नहीं पर इतना तय है कि इस विषय पर कुछ ऐसे तथ्य सामने आयेंगे कि इस कहानी पेंच दिखने लगेंगे।
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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विकीलीक्स की जानकारी हैरान नहीं करती-हिन्दी आलेख(wikileeks aur india-hindi article)


हमारे देश में ऐसी बहुत बड़ी आबादी है जिसकी दिलचस्पी अमेरिका में इतनी नहीं है जितनी प्रचार माध्यम या विशिष्ट वर्ग के लोग लेते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जनसामान्य जागरुक नहीं है या समाचार पढ़ने या सुनने के उसके पास समय नहीं है। दरअसल देश के प्रचार माध्यम से जुड़े लोग यह मानकर चलते हैं कि गरीब, ठेले वाले, खोमचे वाले या तंागे वाले उनके प्रयोक्ता नहीं है और इसलिये वह पढ़े लिखे नौकरी या व्यवसाय करने वालों को ही लक्ष्य कर अपनी सामग्री प्रस्तुत करते हैं। यह उनका अज्ञान तथा अव्यवसायिक प्रवृत्ति का परिणाम है। शायद कुछ बुद्धिमान लोग बुरा मान जायें पर सच यह है कि समाचार पढ़ना तथा राजनीतिक ज्ञान रखना गरीबीया अमीरी से नहीं जुड़ा-यह तो ऐसा शौक है जिसको लग जाये तो वह छूटता नहीं है। चिंतन क्षमता केवल शिक्षित या शहरी लोगों के पास होने का उनका विचार खोखला है। कई बार तो ऐसा लगता है कि ग्रामीण और शिक्षित वर्ग का ज्ञान कहीं  अधिक है। सीधी बात कहें तो अमेरिका ने 1971 में भारत पाक युद्ध के समय अपना सातवां बेड़ा भारत के खिलाफ उतारने की घोषणा की थी और यह बात आज भी आम भारतीय के जेहन में है और वह उस पर यकीन नहीं करता। विकिलीक्स से बड़े शहरों के बुद्धिजीवी चौंक गये हैं पर उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि आम भारतीय जनमानस प्रभावित या चिंतित हो।
विकिलीक्स ने अमेरिकी सरकार के गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा किया है। यह एक बहुदेशीय वेबसाईट है। अनेक पत्रकार इसमें अपने पाठ या पोस्ट रखते हैं और उनकी जांच के बाद उनको प्रकाशित किया जाता है। अपनी भद्द पिटते देखकर अमेरिकी सरकार इसके विरुद्ध कार्यवाही करने में लगी है। वह अन्य देशों से इसे अनदेखा करने का आग्रह कर रही है। दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रचार की जिम्मेदारी लेने वाले अमेरिकी रणनीतिकार अब ठीक उलट बर्ताव कर रहे हैं।
अमेरिका की विदेश मंत्री हेनरी क्लिंटन ने सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का मखौल उड़ाने के साथ ही हमारे देश के विशिष्ट वर्ग की जासूसी करने को कहा है। बात तो यह है कि अमेरिका अपनी आर्थिक विवशताओं के चलते ही भारत को पुचकार रहा है वरना उसकी आत्मा तो खाड़ी देश और उनके मानस पुत्र पाकिस्तान में ही बसती है। इसलिए अपनी साम्राज्यवादी भूख मिटाने तथा हथियार बिकवाने के लिये पाकिस्तान को भी साथ रख रहा है। अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान में फैले आतंकवाद से निपटने में भारतीय हितों की उसे परवाह नहीं है। उसका दोगलापन कोई ऐसी चीज नहीं है जिस पर चौंका जाये। सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता भी अब कितनी प्रासंगिक है यह भी हमारे लिये विचार का विषय है। ब्राजील, जापान, जर्मनी के साथ भारत को इसमें स्थाई सदस्यता दी भी गयी तो उसमें वीटो पॉवर का अधिकार मिलेगा इसमें संदेह है-कुछ प्रचार माध्यमों में इस आशय का समाचार बहुत पहले पढ़ने को मिला था कि अब नये स्थाई सदस्यों को इस तरह का अधिकार नहीं मिलेगा। बिना वीटो पॉवर की स्थाई सदस्यता को कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि अमेरिकी मोह में अंधे हो रहे प्रचार कर्मी उसकी हर बात को ब्रह्म वाक्य की तरह उछालते हैं। तब ऐसा भी लगता है कि वह अपने देश के जनमानस की बजाय पश्चिमी अप्रवासी भारतीयों को लिये अपने प्रसारण कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारत के सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता पर भी जिस तरह खुश होकर यह प्रचार माध्यम चीख रहे थे वह हास्यप्रद था क्योंकि यह क्रमवार आधार पर नियम से मिलनी ही थी। समाचारों पर बहुत समय से रुचि लेने वाले आम पाठक यह जानते हैं कि अनेक अवसरों पर भारत को यह सदस्यता मिली पर उसकी बात सुनी नहीं गयी।
इस चर्चा में विकीलीक्स के खुलासे चिंतन से अधिक मनोरंजन के लिये है। जिस तरह विदेशी राष्ट्रों के लिये संबोधन चुने गये हैं उससे भारतीय टीवी चैनलों के हास्य कलाकारों की याद आती है। यह अलग बात है कि यह कलाकार पेशेवर होने के कारण अमेरिकी रणनीतिकारों से अधिक शालीन और प्रभावी शब्द इस्तेमाल करते हैं। विकिलीक्स ने अमेरिकी रणनीतिकारों के दोहरेपन को प्रमाण के साथ प्रस्तुत किया है जो कि एक असामान्य घटना है। अमेरिकी जो कहते हैं और सोचते हैं इस पर अधिक माथा पच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। सच तो यह है कि विकिलीक्स के खुलासे देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अमेरिका एक स्वतंत्र राष्ट्र नहीं बल्कि पूंजीवाद का उपनिवेश है जो व्यापार या बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है। चाहे किसी भी देश के पूंजीपति या विशिष्ट वर्ग के लोग हैं अपने क्षेत्र में उसे कितनी भी गालियां देते हों पर अपनी संतान या संपत्ति वहां स्थापित करने में उनको अपनी तथा भविष्य की पीढ़ी की सुरक्षा नज़र आती है। तय बात है कि वह कभी वहां के रणनीतिकारों के निर्देश पर चलते हैं तो कभी उनको चलाते हैं। अमेरिकी रणनीतिकारों की भी क्या कहने? एक ग्राहक कुछ मांगता है दूसरे से उसकी आपूर्ति करवाते हैं। दूसरा कहे तो तीसरे से करवाते हैं। खुलासों से पता लगता है कि खाड़ी देश दूसरे के परमाणु संयत्र पर अमेरिका को हमले के लिये उकसा रहा है। मतलब यह कि अमेरिका अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है या पूंजीतंत्र के शिखर पुरुष अपने क्षेत्र में उसे घसीट रहे हैं, यह अब चर्चा का विषय हो सकता है। ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों के औपचारिक या अनौपचारिक बयानों, कमरे में या बाहर की गयी टिप्पणियों तथा कहने या करने में अंतर की चर्चा करना भी समय खराब करना लगती है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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हिन्दी वाले अंग्रेज-हिन्दी चिंतन लेख (hindi wale angrej-hindi article)


कभी कभी तो लगता है कि अपना ही दिमाग चल गया है। संभव है कंप्यूटर पर काम करते हुए यह हुआ हो या लगातार लिखने की वजह से अपने अंदर कुछ अधिक आत्मविश्वास आ गया है जो हर किसी की बात गलत नज़र आती है। यही कारण है कि अंग्रेजी भाषा और रोमन लिपि को लेकर अपने दिमाग में देश के विद्वानों के मुकाबले सोच उल्टी ही विचरण कर रही है। विद्वान लोगों को बहुत पहले से ही अं्रग्रेजी में देश का भविष्य नज़र आता रहा है पर हमें नहंी दिखाई दिया। अपनी जिंदगी का पूरा सफर बिना अंग्रेजी के तय कर आये। इधर अंतर्जाल पर आये तो रोमनलिपि में हिन्दी लिखने की बात सामने आती है तब हंसी आती है।
सोचते हैं कि लिखें कि नहीं। इसका एक कारण है। हमारे एक मित्र पागलखाने में अपने एक अन्य मित्र के साथ उसके रिश्तेदार के साथ देखने गये थे। वहां उन्होंने अपना मानसिक संतुलन जांचने के वाले दस प्रश्न देखे जो वहां बोर्ड पर टंगे थे। उसमें लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का जवाब आपके मन में ‘हां’ आता है तो समझ लीजिये कि आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। उनमें एक यह भी था कि आपको लगता है कि आप हमेशा सही होते हैं बाकी सभी गलत दिखते हैं।’
यानि अगर हम यह कहें कि हम सही हैं तो यह मानना पड़ेगा कि हमें मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। अगर हम यह कहें कि देश के सभी लोगों का भविष्य अंग्रेजी से नहीं सुधर सकता या रोमन लिपि में हिन्दी लिखने वाली बात बेकार है तो यह विद्वानों के कथनों के विपरीत नज़र आती है। तब क्या करें?
श्रीमद्भागवत गीता में भी एक बात कही है कि‘बहुत कम ज्ञानी भक्त होते है।’ हजारों में कोई एक फिर उनमें भी कोई एक! मतलब अकेले होने का मतलब मनोरोगी या पूर्ण ज्ञानी होना है। अपने पूर्ण ज्ञानी होने को लेकर कोई मुगालता नहीं है इसलिये किसी आम राय के विरुद्ध अपनी बात लिखने से बचते हैं। मगर कीड़ा कुलबुलाता है तो क्या करें? तब सोचते हैं कि लेखक हैं और ज्ञानी न होने के विश्वास और मनोरोगी होने के संदेह से परे होकर लिखना ही पड़ेगा।
इस देश का विकास अंग्रेजी पढ़ने से होगा या जो अंग्रेजी पढ़ेंगे वही आगे कामयाब होंगे-यह नारा बचपन से सुनते रहे। पहले अखबार पढ़कर और अब टीवी चैनलों की बात सुनकर अक्सर सोचते हैं कि क्या वाकई हमारे देश के कथित बुद्धिजीवियों को देश की आम जनता की मानसिकता का ज्ञान है। तब अनुभव होता है कि अभी तक जिन्हें श्रेष्ठ बुद्धिजीवी समझते हैं वह बाजार द्वारा प्रयोजित थे-जो या तो कल्पित पात्रों के कष्टों का वर्णन कर रुलाते हैं या बड़े लोगों के महल दिखाकर ख्वाब बेचते रहे हैं।
बचपन में विवेकानंद की जीवनी पढ़ी थी। जिसमे यह लिखा था कि शिकागो में जैसे ही उन्होंने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा ‘ब्रदर्स एंड सिस्टर’
वैसे ही सारा हाल तालियों से गूंज उठा। उसके बाद तो उनकी जीवनी में जो लिखा था वह सभी जानते हैं। उन महान आत्मा पर हम जैसा तुच्छ प्राणी क्या लिख सकता है? मगर इधर अंतर्जाल पर उनके प्रतिकूल टिप्पणी पढ़ने का अवसर मिला तो दुःख हुआ। भाई लोग कोई भी टिप्पणी किसी भी सज्जन के बारे में लिख जाते हैं-अब यह पता नहीं उनकी बात कितनी सच कितली झूठ।
बहरहाल इस स्वामी विवेकानंद की जीवन के प्रारंभ में ही इस तरह का वर्णन अब समझ में आता है।
ऐसा लगता है कि उन महान आत्मा का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए बाजार द्वारा लोगों को यह प्रायोजित संदेश दिया गया कि ‘भई, अंग्रेजी पढ़ लिखकर ही आप अमेरिका या ब्रिटेन को फतह कर सकते हो।’
बात यहीं नहीं रुकी। कोई अमेरिका में नासा में काम कर रहा है तो उससे भारत का क्या लाभ? ब्रिटेन के हाउस और कामंस में कोई भारतीय जाता है तो उससे आम भारतीय का क्या वास्ता? इस बारे में रोज कोई न कोई समाचार छपता है? मतलब यह कि यहां आपके होने या होने का केाई मतलब नहीं है।
दरअसल अंग्रेजी के विद्वान-अब तो हिन्दी वाले भी उनके साथ हो गये हैं-कहीं न कहीं अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये अमेरिका और ब्रिटेन के सपने यहां बेचते हैं। कुछ लोगों ने तो यह टिप्पणी भी की है कि अंग्रेजी में विज्ञान है और उससे जानने के लिये उसका ज्ञान होना जरूरी है। अब तो हमारे दिमाग में यह भी सवाल उठने लगा है कि आखिर अंग्रेजी में कौनसा विज्ञान है? चिकित्सा विज्ञान! आधुनिक चिकित्सकों के पास जाने में हमें खौफ लगता है इसलिये ही रोज योग साधना करते हैं। एक नहीं दसियों मरीजों के उदाहरण अपनी आंखों से देखे हैं जिन्होंने डाक्टरों ने अधिक बीमार कर दिया। यह रिपोर्ट, वह रिपोर्ट! पहले एड्स बेचा फिर स्वाइन फ्लू बेचा। मलेरिया या पीलिया की बात कौन करता है जो यहां आम बीमारी है। परमाणु तकनीक पर लिखेंगे तो बात बढ़ जायेगी। भवन निर्माण तकनीकी की बात करें तो यह इस देश में अनेक ऐसे पुल हैं जो अंग्रेजों से पहले बने थे। लालकिला या ताजमहल बनने के समय कौन इंजीनियरिंग पढ़ा था?
अब सवाल करें कि इस देश के कितने लोग बाहर अंग्रेजी के सहारे रोजगार अर्जित कर रहे हैं-हमारे पास ऐसी कई कहानियां हैं जिसमें ठेठ गांव का आदमी अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रंास पहंुच गया और अंग्रेजी न आने के बावजूद वह वहां जम गया। विभाजन के बाद सिंध और पंजाब से आये अनेक लोगों ने यहां आकर हिन्दी सीखी और व्यापार किया। वह हिन्दी या उर्दू सीखने तक वहां नहीं रुके रहे। अब भी देश के तीन या चार करोड़ लोग बाहर होंगे। 115 करोड़ वाले इस देश के कितने लोगों का भविष्य अंग्रेजी से बन सकता है? कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया में कितने भारतीय जा पायेंगे? इसका मतलब यह है कि आज की तारीख में 115 पंद्रह करोड़ लोग तो भारतीय ऐसे हैं जिन्होंने अपनी पहली सांस यहां ली तो अंतिम भी यही लेंगे। अरे, कार बनाने की इंजीनियरिंग सीख ली, रोड बनाने की भी तो सीखी है! मगर क्या हुआ। एक से एक नयी कार बाजार में आ गयी है पर सड़कों के क्या हाल है?
मतलब यह है कि आप एक या दो करोड़ लोगों के भविष्य को पूरे देश का भविष्य नहीं कह सकते। अंग्रेजी सीखने से दिमाग भी अंग्रेजी हो जाता है। ऐसा लगता है कि दिमाग का एक हिस्सा काम ही नहंी करता। भ्रष्टाचार और अपराध पर बोलते सभी हैं पर अपने कर्म किसी को नहीं दिखाई देते। अंग्रेजी दो ही लोगों की भाषा है-एक साहब की दूसरी गुलाम की! तीसरी स्थिति नहीं है। अंग्रेजी यहां क्यों सिखा रहे हो कि अमेरिका में नास में जाकर नौकरी करो या हाउस कामंस में बैठो। यहां तो सभी जगह वंशों का आरक्षण किया जाना है। पहले व्यापार में ही वंश परंपरा थी पर अब तो खेल, फिल्म, समाजसेवा, कला तथा पत्रकारिता में भी वंश परंपरा ला रहे हैं। जिसके पास पूंजी है वही अक्लमंद! बाकी सभी ढेर! अंग्रेजी पढ़ोगे तो ही बनोगे शेर। मतलब अधिक योग्य हो तो अंग्रेजी पढ़ो और बाहर जाकर गुलामी करो! यहां तो वंशों का आरक्षण हो गया है।
अमेरिका और ब्रिटेन आत्मनिर्भर देश नहीं है। दोनों के पास विकासशील देशों का पैसा पहुंचता है। विकासशील देशों की जनता गरीब हैं पर इसलिये उनके यहां के शिखर पुरुष अपना पैसा छिपाने के लिये इन पश्चिमी देशों की बैंकों को भरते हैं। फिर तेल क्षेत्रों पर इनका कब्जा है। ईरान पर ब्रिटेन का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है पर अन्य तेल उत्पादक देशों पर अमेरिका का सीधा नियंत्रण है। अमेरिका का अपना व्यापार कुछ नहंी है सिवाय हथियारों के! अमेरिका इसी तेल क्षेत्र पर वर्चस्व बनाये रखने के लिये तमाम तरह की जीतोड़ कोशिश कर रहा है। इस कोशिश में उसे फ्रंास की मदद की जरूरत अनेक बार पड़ती है। कभी अकेला लड़ने नहीं निकलता अमेरिका। वैसे अमेरिका इस समय संघर्षरत है और अगर उसका एक शक्ति के रूप में पतन हुआ तो वहां जाकर ठौर ढूंढने से भी लाभ नहीं रहेगा। सबसे बड़ी बात है कुदरत का कायदा। कल को कुदरत ने नज़र फेरी और ब्रिटेन और अमेरिका का आर्थिक, राजनीतिक तथा सामरिक रूप से पतन हुआ तो अंग्रेजी की क्या औकात रह जायेगी? फिर इधर चीन बड़ा बाजार बन रहा है। जिस तरह उसकी ताकत बढ़ रही है उससे तो लगता है कि चीनी एक न एक दिन अंग्रेजी को बेदखल कर देगी। तब अपने देश का क्या होगा? कुछ नहीं होगा। इस देश में गरीबी बहुत है और यही गरीब धर्म, भाषा तथा नैतिक आचरण का संवाहक होता है उच्च वर्ग तो सौदागर और मध्यम वर्ग उसके दलाल की तरह होता है। गरीब आदमी अपनी तंगहाली में भी हिन्दी और देवानगारी लिपि को जिंदा रख लेगा। मगर उन लोगों की क्या हालत होगी जो स्वयं न तो अंग्रेज रहे हैं और हिन्दी वाले। उनकी पीढ़ियां क्या करेंगी? कहीं अपने ही देश में अजनबी होने का ही उनके सामने खतरा न पैदा हो जाये। सो अपना कहना है कि क्यों अंग्रेजी को लेकर इतना भ्रम फैलाते हो। कहते हैं कि इस देश को दूसरे देशों के समकक्ष खड़ा होना है तो अंग्रेजी भाषा सीखों और हिन्दी के लिये रोमन लिपि अपनाओ। पहली बात तो वह जगह बताओ जहां 113 करोड़ लोगों को खड़ा किया जा सके-अरे, यह अमेरिका में नासा में काम करने या इंग्लैंड के हाउस आफ कामंस में बैठने से भला क्या इस देश की सड़कें बन जायेगी? फिर क्या सभी वहां पहुंच सकते हैं क्या? कल इस पर लेख लिखा था, पर दिल नहीं भरा तो बैठे ठाले यह लिख लिया!

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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पाकिस्तान की पैंतरेबाजी और उसके मित्र देश-आलेख


किसी भी राष्ट्र का सम्मान न तब तक नहीं बढ़ सकता जब तक वह दूसरों से मदद लेता है और जब वह दान लेने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह पतन के गर्त में गिर चुका है। पाकिस्तान की स्थिति भी कुछ वैसे ही है पर लगता है कि वह मदद और दान एक तरह हफ्ता वसूली की तरह ले रहा है।

आजकल पाकिस्तान पर दानदाता देशों का विशेष अनुग्रह हो गया है। वैसे तो पाकिस्तान को अनेक देश घोषित अघोषित रूप से सहायता देते रहे हैं पर उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। मुंबई पर हमले के पश्चात् पूरे विश्व में उसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुूई और उसके लिये पूरी दुनियां ने पाकिस्तान को जिम्मेदार माना। इससे उसको सहायता देने वाले देशों के लिये उसको बड़ी राशियां देना कठिन हो गया। फिर यह भी सभी जानते हैं कि पाकिस्तान को मिली ऐसी सहायता आतंकवादियों तक ही पहुंच जाती है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति करीब छःह महीने से खराब है और उसे बीच में चीन ने राहत देकर दिवालिया होने से बचाया था। अब अमेरिका आगे आया है और उसके मित्र देश अब उसकी मदद कर रहे हैं पर अब इसे दान का नाम दिया जा रहा है। हुआ यह है कि पाकिस्तान की मदद को लालायित यह देश पिछले कुछ दिनों से अपना खजाना उसके लिये खोल नहंीं पा रहे थे क्योंकि इससे उनके कर्णधारों की अपने देश में जनता की नजरों में छबि खराब हो जाती। फिर भारतीय जनता की नजरें भी सभी पर लगी हुई हैं। मगर विश्व में अमीर देशों को तो बस पाकिस्तान की मदद का नशा है सो अब इस मदद को नाम दिया गया है ‘दान’। यानि अपने देश और विश्व के लोगों को भ्रमित करना। मदद से थोड़ी संवेदना कम हो जाती है और अब तो पाकिस्तान का नाम जिस तरह से विश्व में जाने लगा है उससे हर जगह आम आदमी उससे घृणा करता है। ऐसे में दान शब्द से आदमी की भावनायें थोड़ा अलग हो जाती हैं कि क्योंकि ‘दान’ करना एक अच्छा काम माना जाता है। फिर ‘दान’ देने वाले देशों के लोग शायद विश्व में अपनी ‘दानदाता’ वाली छबि से शायद खुश होंगे। फिर भारत के लोग भी ‘दान’ को लेकर शायद ही गुस्से का इजहार करें-ऐसा अनुमान किया जा रहा होगा।

आखिर यह क्या हो रहा है? एक तरफ पाकिस्तान के नाकाम राष्ट्र होने का भय सभी को सता रहा है। पाकिस्तान के पास जो परमाणु बम हैं उसका वह अब भावनात्मक रूप से उपयोग कर रहा है। हालत यह है कि सर्वाधिक परमाणू बम रखने वाल अमेरिका तक उसके बमों से घबड़ाया हुआ है। अब जापान ने भी पाकिस्तान को दान देने का फैसला किया। यह आश्चर्य की बात है कि विश्व का हर बड़ा देश पाकिस्तान को दान देने के लिये तैयार बैठा है। वैसे एक बात मजे की है कि पाकिस्तान के कर्णधारों ने विश्व से कोई ऐसी अपील नहंी की है कि उसे दान दिया जाये। हो सकता है कि ऐसे में भारतीय जनता भी कुछ विचार कर सकती।

सच बात तो यह है कि पाकिस्तान के रणनीतिकारों ने पूरे विश्व के देशों को चक्करघिन्नी बना दिया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि पाकिस्तान को दान पर दान दिया जा रहा है। एक अखबार में यह विश्लेषण छपा था कि अमेरिका अब केवल अपना ध्यान अलकायदा से संघर्ष पर केंद्रित करना चाहता है। तालिबान को उसने अपने लक्ष्य से परे कर दिया है। इसलिये संभव है यह दान कथित रूप से तालिबान को अलकायदा से अलग करने के काम आ सकता है। तालिबान से केवल अफगानिस्तान और भारत को परेशानी है और अभी तक आतंकवाद पर साझे संघर्ष करने के दावे करने वाले विश्व के अमीर और बड़े राष्ट्रों ने अब अपनी नीति बदल ली हैं। वह तालिबान और अलकायदा को अलग करना चाहते हैं। अब यह कहना कठिन है पर अभी तक समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर जो विश्लेषण हमने देखें हैं उससे नहीं लगता कि इसमें कोई बहुत जल्दी सफलता मिल पायेगी। तालिबान के पास जो मानवीय शक्ति है उसका उपयोग अलकायदा अपने धन और तकनीकी कौशल के कारण अपने सहायक के रूप में करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि तालिबान से जुड़े अधिकतर लोग धन के कारण उसमेंे हैं पर दूसरा सच यह भी कि लड़ना उनकी प्रवृत्ति है। पाकिस्तान के जिन इलाकों में तालिबान सक्रिय है उसकी उपस्थिति का कारण यह है कि वहां लोगों की अशिक्षा और गरीबी के कारण उनका उपयोग करने के सुविधा होती है। इसके अलावा वह इलाके बहुत सुंदर और उपजाऊ हैं जहां सूखे मेवे पैदा होता है। अलकायदा के लोग मध्य एशिया से आकर वहां ऐश की जिंदगी जीते हैं और तालिबान को आर्थिक सहायता देकर उसे अपनी सुरक्षा के लिये उपयोग करते है। दरअसल अलकायदा और तालिबान तो बस नाम भर है वहां के स्थानीय निवासियों की जुझारु प्रवृति विश्व विख्यात है जो अपने विरोधी पर कभी हिंसा के रूप में प्रकट होती है। आपने डूरंड लाईन का नाम सुना होगा। उसे कभी अंग्रेज पार नहीं कर पाये और इसलिये अफगानिस्तान कभी उनके हाथ नहीं आया। जब तालिबान और अलकायदा नहीं थे तब भी वहां पाकिस्तान का संविधान नहीं चलता था और आगे भी चलेगा इसकी संभावना नहीं है। इन जुझारु जातियों का खौफ पाकिस्तान के हर शहर में रहता है। आजादी से पहले भी अनेक नृशंस हत्यााओं का जिक्र अनेक बुजुर्ग करते रहे हैं। आदमी को काट देना वहां कोई कठिन काम नहीं माना जाता। अलकायदा और तालिबान ने तो वहां के लोगो की अशिक्षा,गरीबी और जुझारु प्रवृति को भुनाया है न कि बनाया है-कम से विद्वानों की अभी तक जो विश्लेषण हैं वह तो यही बताते हैं।
बहरहाल अब पाकिस्तान अपने हालत बनाने के लिये दान ले रहा है और वह यही दान अब उन लोगों तक पहुंचेगा जो हिंसा में लिप्त हैं। यह पैसा लेने वालों को दान और मदद की अंतर से कोई मतलब नहंीं हैं। वह भी जानते हैं पड़ौसी देश भारत के दबाव की वजह से यह हो रहा है। आतंकवाद के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष की बात करने वाले देशों के चरित्र की यही असलियत है कि वह उसी आतंकवादी समूह को अपने विरुद्ध मानते हैं जिसकी गतिविधियां उनको त्रस्त करती हैं और दूसरे के विरुद्ध सक्रिय आतंकवादी गिरोह उनको मित्र लगते हैं या वह उसकी उपेक्षा कर देते हैं। जबकि यह सभी को पता है इन आतंकवादियों के गिरोह आपस में मिले हुए हैं। मदद हो या दान, मजे में रहेगा पाकिस्तान। उसे अपने मनोमुताबिक धन मिल रहा है तो वह क्यों आतंकवाद को समाप्त करना चाहेगा।
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चंद्रयान-1 के प्रक्षेपण पर ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक-संपादकीय


अमेरिका में राष्ट्रपति के उम्मीदवार श्री ओबामा ने भारत के चंद्रयान भेजने पर चिंता जाहिर की और इसे अपने नासा संस्थान के लिये चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वह विजय प्राप्त कर नासा की प्रगति के लिये काम करेंगे। यह खबर दो दिन पुरानी है पर आज नयी खबर यह पढ़ने को मिली कि अमेरिका का चैदहवां बैंक दिवालिया हो गया। अमेरिका अभी तक आतंकवाद से परेशान था पर आर्थिक मंदी भी उसके लिये संकट बन गयी है ऐसे में भारत का चंद्रयान भेजने का दर्द वह उस तरह व्यक्त नहीं की जैसे  कर सकता था।

कुछ लोगों को ओबामा साहब की यह चिंता कोई अधिक महत्वपूर्ण नहीं लगती होगी पर जिन लोगों ने खबरे पढ़ते हुए अपनी जिंदगी गुजार दी  वह इस बात को बहुत महत्व दे रहे हैं यह अलग बात है कि उनके दिल की बात लिखने वाला कोई बुद्धिजीवी नहीं है।  सच तो यह है कि आर्थिक विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वर्तमान मंदी से उबरने के लिये अमेरिका को कम से कम पांच वर्ष लग जायेंगे।  अमेरिकी सरकार अपने यहां की मंदी से जूझ रही है और उसे इसके लिये बहुत कुछ करना है।
भारतीय बुद्धिजीवी इस समय आंतकवाद को लेकर इस बहस में उलझे है कि कौनसा भाषाई,धार्मिक या वैचारिक समूह अच्छा है और कौन खराब। उन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा कि जिस अमेरिका की उदारीकरण की वह प्रशंसा करते थे वहां की सरकार आखिर अब अपना धन क्यों लगा रही है? इधर भारत के सार्वजनिक बैंक सुरक्षित हैं तो यहां को लेकर आर्थिक विशेषज्ञ चिंतित नहीं हैंं।

कहा जाता था कि भारत की सरकार की नियंत्रित प्रणाली के कारण विकास नहीं हो पा  रहा है पर चंद्रयान-1 क प्रक्षेपण से यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक भ्रांत धारणा थी। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिये और उसकी बढ़ती वैज्ञानिक शक्ति से इस बात की संभावना बन रही है कि विश्व के अनेक गरीब और विकासशील राष्ट्र भारत की तरफ झुक सकते हैं ताकि उन्हें अपने लिये सस्ते में तकनीकी मदद मिल सके।  देने को तो अमेरिका भी ऐसी सहायता देता है पर न केवल पूरा पैसा वसूल करता है बल्कि अपनी अनेक ऐसी शर्तें भी मनवाता है जो किसी सार्वभौमिक राष्ट्र के लिये तकलीफदेह होती हैं। अमेरिका के अलावा अन्य विकसित राष्ट्र भी अब भारत को बराबरी का दर्जा दे सकते हैं-इसके लिये संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थाई सीट होने की जरूरत अब कम ही लोग मानते हैंंं।

भारत ने नियंत्रित प्रणाली होते आर्थिक विकास किया और साथ विज्ञान में भी वह स्थान प्राप्त कर लिया जो अभी चीन के लिये भी थोड़ा दूर है-हालांकि वह भी जल्द ही अपना चंद्रयान अंतरिक्ष में भेजने वाला है। ऐसे में अमेरिका के लिये उस क्षेत्र में चुनौती मिल रही है जिस पर उसका एकाधिकार था।  निजी क्षेत्र की हमेशा वकालत करने वाले भारत के बुद्धिजीवी यह सोचकर हैरान होंगे कि कुछ लोगों ने वहां दबे स्वर में भारत की तरह मिश्रित अर्थ व्यवस्था अपनाने की आवाज उठाई है। मिश्रित अर्थव्यवस्था का अगर संक्षिप्त मतलब यह है कि जनहित के कुछ व्यवसाय और सेवायें सीधे सरकार के नियंत्रण में रहें ताकि उससे देश की आम जनता के  जनजीवन को कभी पटरी से न उतारा जा सके।  भारत में वैसे अधिकतर लोग इसी तरह की अर्थव्यवस्था के ही समर्थक हैं,  पर सरकार की नियंत्रण की सीमाओं पर क्षेत्रों की संख्या  पर मतभेद रहे हैं।  हालांकि कुछ बुद्धिजीवी इसके कड़े विरोधी है और यह तय बात है कि वह पूंजीपतियों के लिये लिखने और पढ़ने वाले हैं।

बहरहाल भारत के बुद्धिजीवियों को अब यह समझ लेना चाहिये कि तमाम तरह के विवादों के बावजूद भारत अब विश्व महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहा है और इस समय इस पर पर विराजमान अमेरिका और अन्य पश्चिमी राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्थाओं को लेकर जूझ रहे हैं। वैसे भारत के विश्व में सर्वशक्तिमान होने की बात का पहले भी अनेक लोग मखौल उड़ाते रहे हैं पर जिस तरह अमेरिका की मंदी ने वहां के हालात बिगाड़े हैं उससे ऐसा लगता है कि तमाम तरह के परिवर्तन इस विश्व में आ सकते हैं। अधिकतर लोगों को लगता है कि अमेरिका केवल हथियारों की वजह से ताकतवर है पर यह केवल अद्र्धसत्य है। अमेरिका के शक्तिशाली होने का कारण यह भी है कि अंतरिक्ष तकनीकी पर एकाधिकार होने के कारण अनेक देश उस निर्भर हैं और यही कारण है कि अपनी पूंजी भी वहीं लगाते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी बैंक निजी होते हुए भी बहुत सारी पूंजी अर्जित कर लेते थे।

अब जिस तरह वहां बैंक दिवालिया हो रहे हैं उससे अमेरिका की साख पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि अमेरिका सरकार कब तक इन बैंकों को बचायेगी। इसके विपरीत भारतीय बैंकों पर सरकार का नियंत्रण है।  हालांकि भारत में भी निजी बैंक अस्तित्व में आ गये हैं पर इस मंदी के कारण उनकी अभी कोई बृहद भूमिका नहीं है। यही कारण है कि भारत के आर्थिक विशेषज्ञ यहां की अर्थव्यवस्था को चिंतित नहीं है। अमेरिका में आर्थिक मंदी का प्रकोप है और ऐसे में अगर भारत से तकनीकी, विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में चुनौती मिलने वाली खबर मिलती है तो उस पर श्री ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक है।
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