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सोचना और सच का सामना -हास्य व्यंग्य और कवितायें (sach ka samana-hindi vyangya aur kavitaen)


ख्याल कभी सच नहीं होते
आदमी की सोच में बसते ढेर सारे
पर ख्याल कभी असल नहीं होते।
कत्ल का ख्याल आता है
कई बार दिल में
पर सोचने वाले सभी कातिल नहीं होते।
धोखे देने के इरादे सभी करते
पर सभी धोखेबाज नहीं होते।
हैरानी है इस बात की
कत्ल और धोखे के ख्याल भी
अब बीच बाजार में बिकने लगे हैं
सच की पहचान वाले लोग भी अब कहां होते।।

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आदमी का दिमाग काफी विस्तृत है और इसी कारण उस अन्य जीवों से श्रेष्ठ माना जाता है। यह दिमाग उसे अगर श्रेष्ठ बनाता है पर इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर उस पर कोई कब्जा कर ले तो वह गुलाम भी बन जाता है। इसलिये इस दुनियां में समझदार आदमी उसे ही माना जाता है जो बिना अस्त्र शस्त्र के दूसरे को हरा दे। अगर हम यूं कहे कि बिना हिंसा के किसी आदमी पर कब्जा करे वही समझदार है। हम इसे अहिंसा के सिद्धांत का परिष्कृत रूप भी कह सकते हैं।
अंग्रेजों ने भारत को डेढ़ सौ साल गुलाम बनाये रखा। वह हमेशा इसे गुलाम बनाये नहीं रख सकते थे इसलिये उन्होंने ऐसी योजना बनायी जिससे इस देश में अपने गोरे शरीर की मौजूदगी के बिना ही इस पर राज्य किया जा सके। इसके लिये उन्होंने मैकाले की शिक्षा पद्धति का सहारा लिया। बरसों से बेकार और निरर्थक शिक्षा पद्धति से इस देश में कितनी बौद्धिक कुंठा आ गयी है जिसे अभी दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रम सच का सामना में देखा जा सकता है।
‘आप अपने पति का कत्ल करना चाहती थीं?’
‘आप अपनी पत्नी को धोखा देना चाहते थे?’
पैसे मिल जायें तो कोई भी कह देगा हां! हैरानी है कि समाचार चैनल कह रहे हैं कि ‘हां, कहने से पूरा हिन्दुस्तान हिल गया।’
सबसे बड़ी बात यह है कि लोग सच और ख्याल के बीच का अंतर ही भूल गये हैं। कत्ल का ख्याल आया मगर किया तो नहीं। अगर करते तो जेल में होते। अगर धोखे का ख्याल आया पर दिया तो नहीं फिर अभी तक साथ क्यों होते?
वह यूं घबड़ा रहे हैं
जानते हैं कि झूठ है सब
फिर भी शरमा रहे हैं।
सच की छाप लगाकर ख्याल बेचने के व्यापार से
वह इसलिये डरे हैं कि
उसमें अपनी जिंदगी के अक्स
उनको नजर आ रहे हैं।
कहें दीपक बापू
ख्यालों को हवा में उड़ते
सच को सिर के बल खड़े देखा है
कत्ल और धोखे का ख्याल होना
और सच में करना
अलग बात है
ख्याल तो खुद के अपने
चाहे जहां घुमा लो
सच बनाने के लिये जरूरत होती है कलेजे की
साथ में भेजे की
अक्ल की कमी है जमाने के
इसलिये सौदागर ख्याल को सच बनाकर
बाजार में बेचे जा रहे हैं।
ख्यालों की बात हो तो
हम एक क्या सौ लोगों के कत्ल करने की बात कह जायें
सामना हो सच से तो चूहे को देखकर भी
मैदान छोड़ जायें
पैसा दो तो अपना ईमान भी दांव पर लगा दें
सर्वशक्तिमान की सेवा तो बाद में भी कर लेंगे
पहले जरा कमा लें
बेचने वालों पर अफसोस नहीं हैं
हैरानी है जमाने के लोगों पर
जो ख्वाबों सच के जज्बात समझे जा रहे हैं
शायद झूठ में जिंदा रहने के आदी हो
हो गये हैं सभी
इसलिये ख्याली सच में बहे जा रहे हैं।

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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
कवि एंव संपादक-दीपक भारतदीप
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

उग्र हो जाता है चूहा हो या इंसान, जब माया हो मेहरबान-व्यंग्य आलेख


सुनने में आया है कि मंदी की वजह से आतंकवादी भी पस्त हो रहे हैं। एक टीवी चैनल के अनुसार पाकिस्तान अपनी कमजोर आर्थिक स्थिति वैसे जब मंदी का दौर प्रारंभिक स्थिति में था तब कुछ विश्लेषकों ने यह संभावना व्यक्त की थी कि अनेक आतंकवादी गिरोह भी इसकी लपेट में आयेंगे। यह संदेह गलत नहीं था और न है। कहने को धर्म,जाति,भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज में वैमनस्य फैलाने वाले बहुत सारे संगठन पूरे विश्व में सक्रिय हैं पर उसके सदस्य केवल पैसा कमाने के लिये ही उनसे जुड़ते हैं-कथित सिद्धांतों और आदर्शों से उनका संबंध तो दिखावे का होता है।

प्राचीन भारतीय कथा है कि एक संत एक गृहस्थ के घर गये। वहां उन्होंने भोजन किया और फिर कुछ देर उसके साथ बैठकर बातचीत में लगे रहे। उन्होंने देखा कि गृहस्थ अपने हाथ में एक डंडा पकड़े बैठा है और एक चूहा उसके पास आता है तो उससे उसको भगाता है। संत ने पूछा-क्या बात है कि इस डंडे को पकड़े क्यों बैठे हो? कोई चूहा तुम पर हमला थोड़े ही कर सकता है।’

गृहस्थ ने कहा-महाराज, यह चूहा बहुत दमदार है। मेरे ऊपर जो आला है यह वहां तक एक बार उछल कर ही पहुंच जाता है। ऊपर मिट्टी के बर्तन को नीचे गिरा देता है। कई बर्तन तोड़ चुका है। अब यहीं बैठकर उसे रोकने का काम कर रहा हूं।
संत ने कहा-‘उस बर्तन में क्या है?’
गृहस्थ ने कहा-‘उसमें चांदी के सिक्के हैं जो मैं अपने खर्च से बचा कर रखता हूं ताकि कहीं आपदा में काम आयें।’
संत ने कहा-‘उस बर्तन को नीचे उतारो।’

गृहस्थ ने वैसा ही किया। संत ने उन चांदी के सिक्को को लिया और घर के कोने में स्वयं ही एक गड्ढा खोदा और चांदी के सिक्के कपड़े में बांधकर उसके अंदर रखकर उस पर एक पत्थर रख दिया। गृहस्थ से कहा- इस गड्ढे का उपयोग तुम अपनी बचत रखने के लिये किया करो। यह बात किसी को बताना नहीं। मेरे जाने के बाद अंदर से गड्ढे को पक्का कर देना। यह चूहा यहां कभी नहीं पहुंच पायेगा। अब यह बर्तन फिर तुम उस आले में रख दो और मेरे साथ थोड़ा दूर बैठकर इसका तमाशा देखो।

वह दोनों थोड़ी दूर बैठ गये। खाली मैदान देखकर चूहा आया और उस आले तक उछल कर पहुंचने का प्रयास करने लगा। वहां ऊंचाई तक पहुंचने की बात तो दूर वह जमीने से थोड़ा ऊपर भी नहीं उठ पाता था। थकहारकर मैदान छोड़ गया। गृहस्थ को आश्चर्य हुआ। उसने उस संत से कहा-‘महाराज यह तो चमत्कार हो गया। यह चूहा एक ही झटके में वहां पहुंच जाता था पर आपके प्रभाव से अब जमीन से भी नहीं उठ पा रहा।’

संत ने कहा-‘यह कोई चमत्कार नहीं है। यह मेरे प्रभाव के कारण नहीं हारा। सच बात तो यह है कि यह माया का प्रभाव ही था जो चूहे को इतनी ताकत मिल रही थी जो इतनी ऊंचे एक ही झटके में पहुंच जाता था। अब खाली मिट्टी के बर्तन में इतनी ताकत नहीं है कि वह उसे अपनी तरफ खींच सके।’
यह कथा शायद प्रस्तुतीकरण में एकदम वैसी न हो जैसी सुनायी जाती है। कहीं अलग अलग तरह से प्रसंग होते हैं। संभव है यह कथा कल्पित भी हो पर इस सत्य के इंकार नहीं किया जा सकता है कि खेलती माया ही है यह अलग बात है कि इंसान अपनी ताकत का ढोंग करता है।

किसी एक संगठन की बात हम यहां नहीं कर रहे। दूनियां भर में अनेक ऐसे संगठन हैं जो धर्म,जाति,भाषा,वर्ण,रंग, और क्षेत्र के आधार पर हिंसक अभियान चलाते हैं। दावा यह करते हैं कि वह अपने समूहों का कल्याण कर रहे हैं। वह पढ़े लिखे हों या नहीं पर उनका समर्थन करने वाले ढेर सारे बुद्धिजीवी भी मिल जाते हैं। कोई उनको भटके हुए लोग कहता है तो कोई योद्धा बताता है। पुराने समय में सभ्यताओं और समूहों का टकराव हुआ है पर उसका कारण जड़,जमीन और नारी के कारण ही होती थी। आज भी कुछ नया नहीं है पर सभ्रांत बुद्धिजीवी वर्तमान मेें सक्रिय आतंकवादियों के समूहों में जाति,भाषा,और धर्म के तत्व ढूंढते हुए नजर आते हैं। अगर एक बात कहें कि आजकल सभ्य समाज है तो यह भी मानना पड़ेगा कि यह भ्रमित समाज है। पुराने विचारों को उठाकर फैंकने की बात करते हैंं पर कौनसी बात सत्य है झूठ इस पर विचार करने की शक्ति लोगों में नहीं है। आजकल भौतिकतावाद का बोलबाला है। सभी लोग धन के पीछे भाग रहे हैं। यहां तक कि अपनी बौद्धिकता की शक्ति पर कमाने वाले बुद्धिजीवी भी भागते हुए विचार करते हैं ऐसे में चिंतन करे कौन? इस लेखक ने ऐसे आलेख लिखे हैं जिसमें हमेशा ही इस बात की चर्चा की है कि आतंकवाद एक तरह से व्यवसाय बन गया है। कुछ लोग ऐसे जरूरी होंगे जिनका आर्थिक फायदा होता है और इसलिये वह इसके प्रायोजन में सहायता करते हैं-वह हफ्ता वसूली भी हो सकती है और सुरक्षाकर भी। अखबारों में ऐसी खबरें कोने में छपी मिलती हैं जिसमें आतंकवादी क्षेत्रों में तस्करी और अन्य अपराधिक गतिविधियों की बढ़ोतरी की चर्चा होती है। यह भी कहा जाता है कि प्रशासन और सरकार का ध्यान बंटाने के लिये ही इस तरह का आतंकवाद चलाया जाता है।

अगर हम मोटे तौर से देखें तो जैसे जैसे विश्व में आर्थिक और तकनीकी विकास हुआ वैसे ही आतंकवाद भी बढ़ा है। बाजार तेज होता गया तो आतंकवाद भी बढ़ता गया। अब मंदी का दौर चला रहा है। ऐसी बातें भी अखबारों में चर्चा में आती रही हैं कि आतंकवादियों ने मुद्राबाजार में अपना विनिवेश किया। बैंको में अपना पैसा जमा किया। अब जब मंदी आयी है तो उनकी हालत भी पतली हो रही है। वैसे अभी यह मानना गलत होगा कि आतंकवाद पूरी तरह से समाप्त हो जायेगा पर जिस तरह आतंकवादियों और अपराधियों के समूहों के मुखिया कटु और उग्र भाषा का प्रयोग करते हैं उससे तो यही लगता है कि केवल उनकी आर्थिकी शक्ति-दूसरे शब्दों में कहें मायावी शक्ति- बुलवा रही है। यह सही है कि आदमी कोई चूहा नहीं है पर एक बात याद रखना इस सृष्टि में सभी की देह पंचतत्वों से बनी है और अहंकार,मन और बुद्धि अपने स्वभाव के अनुसार सभी में हैं चाहे वह आदमी हो या चूहा। अंतर केवल इतना है कि माया के प्रभाव में चूहा उछल कूद करता है और आदमी अपनी वाणी से भी यही काम करता है।
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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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