Category Archives: Thought

साधू, शैतान और इन्टरनेट-हिंदी हास्य व्यंग्य कविता


शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक
और कहा
‘महाराज क्या ध्यान लगाते हो
भगवान के दिए शरीर को क्यों सुखाते हो
लो लाया हूँ टीवी मजे से देखो
कभी गाने तो कभी नृत्य देखो
इस दुनिया को भगवान् ने बनाया
चलाता तो मैं हूँ
इस सच से भला मुहँ क्यों छुपाते हो’

साधू ने नही सुना
शैतान चला गया
पर कभी फ्रिज तो कभी एसी ले आया
साधू ने कभी उस पर अपना मन नहीं ललचाया
एक दिन शैतान लाया कंप्यूटर
और बोला
‘महाराज यह तो काम की चीज है
इसे ही रख लो
अपने ध्यान और योग का काम
इसमें ही दर्ज कर लो
लोगों के बहुत काम आयेगा
आपको कुछ देने की मेरी
इच्छा भी पूर्ण होगी
आपका परोपकार का भी
लक्ष्य पूरा हो जायेगा
मेरा विचार सत्य है
इसमें नहीं मेरी कोई माया’

साधू ने इनकार करते हुए कहा
‘मैं तुझे जानता हूँ
कल तू इन्टरनेट कनेक्शन ले आयेगा
और छद्म नाम की किसी सुन्दरी से
चैट करने को उकसायेगा
मैं जानता हूँ तेरी माया’

शैतान एकदम उनके पाँव में गिर गया और बोला
‘महाराज, वाकई आप ज्ञानी और
ध्यानी हो
मैं यही करने वाला था
सबसे बड़ा इन्टरनेट तो आपके पास है
मैं इसलिये आपको कभी नहीं जीत पाया’
साधू उसकी बात सुनकर केवल मुस्कराया

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घड़ियों की सुईयां तो वैसे ही चलती रहेंगी-साहित्य कविता


जिंदगी में अब कभी कुछ नहीं होता खास।
जैसा अपना नजरिया है, वैसा ही होता आभास।

घड़ियों की सुईयां तो वैसे ही चलती रहेंगी
जैसे रोज चलती साथ, आपस में करती परिहास।

एक दिन के गुजरते, वर्ष हो जाता है पुराना
एक दिन के आने से, नये का होता है अहसास।

कितने बसंत गुजरे, कितने पतझड, आये
बनाया नहीं किसी ने, अपना स्थाई निवास।

आज लिख रहे कविता, कल कहानी लिखेंगे
बनेगा शब्द का साथी वही, जो होगा अपने पास।

कहीं गम करेंगे हमला, कहीं खुशियां बरसेंगी
डटे रहना है जिंदगी में, मजबूत रखना विश्वास।

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सोने जैसे रंग के
कमर तक लहराते बाल
नीली आंखों से बहती हुई प्रेम की धार
बंद होठ कहने लगते हैं
गूढ़ अर्थ वाले खामोश शब्द
चेहरे पर छायी है स्निग्ध मुस्कराहट
जब देखें तो होता है सुखद अहसास
एक अनजानी खुशबू से
उठती हैं दिल में तरंगे
किसी सुंदर पल के पास आने की होती आहट
पर तुम तस्वीर से कभी बाहर निकल कर
जिंदगी की सच्ची धारा में मत बहना
इसमें ख्वाबों के फूल के साथ
सच के कांटों के साथ भी पड़ता है रहना
जिनसे डरकर सभी भागते हैं।
हो जाते तब होशहवास गायब
पर दीवार पर तुझे देख कर मिलता है सुकून
तब जागते हैं

……………………….

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की सिंधु केसरी-पत्रिका ’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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अंतर्जाल पर विधा नहीं बल्कि कथ्य महत्वपूर्ण है-विशेष संपादकीय


आज यह दूसरा ब्लाग/पत्रिका है जिसने 30 हजार पाठ/पाठक संख्या को पार किया। इससे पहले हिंदी पत्रिका ने इस संख्या को पार किया था। इस ब्लाग/पत्रिका के बारे मेंें पहले भी लिख चुका हूं पर कहने के लिये यहां बहुत सारी सामग्री सामने आ जाती है। अंतर्जाल पर नित नित नये अनुभव हो रहे हैं और उनसे कुछ नया सीखने और समझने का अवसर मिलता है।
यह संख्या बहुत अधिक नहीं है और यहां रुकना भी नहीं है पर अंतर्जाल पर लिखना मेरे लिये एक अजीबोगरीब अनुभव है और यह बाहर पत्र पत्रिकाओं पर लिखने से कहीं अलग है। पत्र पत्रिकाओं में रचना छपने पर पाठक से सीधे कोई संवाद नहीं होता। हां, कुछ पत्र पत्रिकाओं में में अपनी रचनाओं की प्रशंसा में पत्र भी छपे देखे हैं पर वहां आलोचना कोई छपती नहीं देखी क्योंकि अगर वह आती भी होंगी तो कोई संपादक वहां क्यों छापना चाहेगा? फिर वहां आलोचना भेजने की सोचेगा भी कौन? पहले तो कोई जरूरत नहीं समझेगा और भेजेगा तो अपने वास्तविक नाम से नहीं भेजेगा। वैसे भी कोई पत्र पत्रिका अपने यहां छपी रचनाओं के बारे में आलोचनात्मक सामग्री छापना पसंद नहीं करती।

यहां त्वरित टिप्पणियों की सुविधा के कारण ब्लाग लेखक तथा पाठक अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और यह अनुभव आम जीवन में लेखन के अनुभव से अलग है। कई बार कुछ आम पाठक ऐसे भी हैं जो छहः माह पुराने पाठ पर कमेंट देते हैं। कभी अच्छी और कभी बुरी भी। ऐसे में मन में उहापोह की स्थिति बनी रहती है कि उसे बनी रहने दें कि हटा दें। तब यह सोचकर कि अन्य पाठक भी वहां आयेंगे और उनका मन खराब न हो उसे स्पैम में डाल देते हैं और इंतजार करते हैं कि टिप्पणीकर्ता पुनः वहां आये और अपनी टिप्पणी न देखकर सवाल करे पर ऐसा हुआ नहीं।

कविताओं को लेकर फब्तियां कसते हैं कि क्या यह कविता है या गद्य! वह तो अपनी बात कहकर चले जाते हैं पर फिर दूसरी बार वह किसी कविता पर ही खुश होकर लिखते हैं कि क्या मजेदार है?
ऐसे अनेक उदाहरण देखकर यह लगता है कि अंतर्जाल पर किसी विद्या को लेकर कोई पूर्वाग्रह रखना ठीक नहीं है क्योंकि यहां महत्वपूर्ण होगा कथ्य और तथ्य। बस यह देखा जायेगा कि उसमें शब्दों का चयन और प्रस्तुतीकरण कैसा है? उसमें रचयिता का भाव क्या है और उसकी विषय सामग्री कैसी है?

बड़े बड़े आलेख बिना टिप्पणियों के पड़े हुए हैं और कविताओं पर निरंतर प्रतिक्रियायें आती हैं। आलेखों के विषयों पर सवाल उठाते हैं पर कविताओं पर नहीं। अव्यवसायिक और अप्रचारित लेखक हूं इसलिये लिखने में समय और ऊर्जा व्यय करने के लिये जूझना पड़ता है। कभी किसी विषय पर आलेख लिखने का मन हो पर समय और शक्ति नहीं हो तो सोचते हैं कि कविता से काम चला लो ब्लाग जगत में इसे ठेलना भी कहते हैं। क्योंकि पाठक संख्या बढ़ रही है पर उसकी गति संतोषजनक नहीं है इसलिये अपनी प्रेरणा बनाये रखने का काम भी स्वयं ही करना पड़ता है। कई बार गंभीर विषय पर भी कविता लिख लेते हैं कि कौन इसे हजारों लोग एक साथ पढ़ने वाले हैं बाद में इस विषय पर आलेख या व्यंग्य लिख लेंगे। कुल मिलाकर अपनी बात आम पाठक तक पहुंचाने के लिये एक संघर्ष करना ही पड़ रहा है क्योंकि मैं तो इसी भरोसे हूं कि आम पाठक ही मेरा प्रचारक हो सकता है। लिखने की प्रवृत्ति बचपन से ही है इसलिये लिखने के पूरे मजे लेता हूं। पैसा तो जेब से ही जा रहा है पर जीवन में जिज्ञासा का ऐसा भाव है कि लिखता ही चला जा रहा हूं। कई बार तो ऐसे पाठ भी लिखता हूं जिनका उद्देश्य लोगों को पढ़ाने की बजाय बल्कि स्वयं उनको पढ़ना होता है। हैरान हो जाता हूं जब शब्द भी आंखों से पढ़कर बता देते हैं कि उन्होने आज क्या पढ़ा? कविताओं की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर कथ्य और तथ्य प्रभावपूर्ण हों तो वह यहां स्वीकार्य होंगी।
जहां तक अपने लिखे पाठों से मिले अस्पष्ट संदेशों को पढ़ा है लोगों का अध्यात्मिक सामाजिक चिंतन और हास्य व्यंग्य में समान रुचि है। हिंदी ब्लाग जगत में पता नहीं मेरा क्या मुकाम है या होगा इस पर मैं विचार नहीं करता मगर मुझे लोगों से प्यार पाकर बहुत अच्छा लगता है। मेरी मान्यता है कि अगर आप लेखक हैं तो भले ही आप उससे पैसा नहीं कमाते पर लोग आपको सम्मान और प्यार देते हैं जो कि या तो धन कमाने पर मिलता है या पद पाने पर। जब लिखना प्रारंभ किया तो पता ही नहीं था यह यात्रा कहां जायेगी। इसी लेखनी से मिले नाम की खातिर 1980 में एक अखबार में फोटो कंपोजिंग आपरेटर के रूप में अपना जीवन शुरू किया। उस समय विंडो नहीं था पर आज विंडो पर काम करने में आसानी होती है। फिर कुछ समय तक संपादक भी रहा और वहां के गुरु ने लिखने के गुर के साथ जीवन के दांव भी बताये। वह अध्यात्मिक नहीं थे पर उनकी शख्सियत मैं कभी नहीं भूलता। वह लिखने में किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से दूर रहने के साथ ही निंरतर अभ्यास करने की प्रेरणा देते थे। यही कारण है कि जब कंप्यूटर पर लिखने के लिये बैठता हूं तो विचारों का क्रम आता चला जाता है।

जिनको मेरी कविताओं से नाराजगी है उन्हें इस बात के लिये अपना भाग्य सराहना चाहिये कि मुझे टिककर एक जगह बैठने की आदत नहीं है वरना मेरे लिये एक घंटे लिखने का मतलब होता है दस हास्य कवितायें। मैंने लोगों के हृदय में कविताओं के प्रति चिढ़ का भाव देखा है इसलिये अभी कम ही लिखता हूं। चूंकि ब्लाग पर कुछ न कुछ लिखने का पक्का विचार कर रखा है इसलिये कवितायें ही लिख लेता हूं। हां, अगर इससे कभी थोड़ी आय वगैरह की संभावना बनी तो फिर बड़े बड़े हास्य व्यंग्य भी लिखने का विचार कर सकता हूं। नहीं भी बनी तो अनेक ब्लाग की जगह एक ही ब्लाग पर सप्ताह में एक बार अवश्य लिखूंगा।
अंतर्जाल की यह यात्रा कैसे चलती रहेगी पता नहीं पर अपने अनुभव से सीखता हुआ अपने पाठकों के लिये ऐसे अवसरों पर उनको लिखता हूं। आजकल उमस बहुत है इसलिये अधिक लिखने का मन भी नहीं होता पर ऐसे अवसर लिखने का मोह संवरण भी नहीं कर सका। प्रशंसकों का आभारी हूं और आलोचकों से क्षमाप्रार्थी।
अनजाने में बहुत सारे ब्लाग/पत्रिका बना लिये पर सभी पर पाठकों की नजरें रहती हैं और शायद कुछ अदृश्य मित्र हैं जो इशारा कर जाते हैं कि देखो अपने इस ब्लाग/पत्रिका को जो आज बीस/पच्चीस/तीस हजार की पाठक संख्या के पार है। शायद वह चाहते हैं कि मैं कुछ लिखूं उन्हीं को समर्पित यह मेरा विशेष संपादकीय

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यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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पहले बनाओ पंगेबाज फिर बताओ चंगेबाज-हास्य व्यंग्य कविता


घर से निकले ही थे पैदल
देखा फंदेबाज को भागते हुए आते
इससे पहले कुछ कह पाते
वह हांफते हुए गिर पड़ा आगे
और बोला
’‘दीपक बापू अभी मुझे बचा लो
चाहे फिर भले ही अपनी हास्य कविता सुनाकर
हलाल कर मुझे पचा लो
रास्ते में उस पंगेबाज को जैसे ही मैंने
कहा बापू से मिलने जा रहा हूं
पत्थर लेकर मारने के लिये मेरे पीछे पड़ा है
सिर फोड़ने के लिये अड़ा है
कह रहा है ‘टीवी पर तमाम समाचार आ रहे है
बापू के नाम से बुरे विचार मन में छा रहे हैं
तू उनका नाम हमारे सामने लेता है
उनको तू इतना सम्मान देता है
अभी तेरा काम तमाम करता हूं
वीरों में अपना नाम करता हूं’
देखो वह आ रहा है
अच्छा होगा आप मुझे बचाते’’

पंगेबाज भी सीना तानकर खड़ा हो गया
हांफते हांफते बोला फंदेबाज
‘अच्छा होता आप इसे भी
अपनी हास्य कविता सुनाते’

कविता का नाम सुनकर भागा पंगेबाज
उसके पीछे दौडने को हुए
फंदेबाज का हाथ छोड़ने को हुए
पर अपनी धोती का एक हिस्सा
उसके हाथ में पाया
उनकी टोपी पा रही थी
अपने ही पांव की छाया
अपनी धोती को बांधते
टोपी सिर पर रखते बोले महाकवि दीपक बापू
‘कम्बख्त जब भी हमारे पास आना
कोई संकट साथ लाना
क्या जरूरत बताने थी उसे बताने की कि
हम हास्य कविता रचाते
कविता सुनने से अच्छे खासे तीसमारखां
अपने आपको बचाते
हम उसे पकड़कर अपनी कविता सुनाते
तुम अपने मोबाइल से कुछ दृश्य फिल्माते
वह नहीं भागता तो हम मीडिया में छा जाते
कैसे बचाया एक फंदेबाज को पंगेबाज से
इसका प्रसारण और प्रकाशन सब जगह करवाते
आजकल सभी जगह हिट हो रहे पंगे
रो रहे है फ्लाप काम करके भले चंगे
ऐसे ही दृश्य बनते हैं खबर
खींचो चाहे दृश्य और शब्द
जैसे कोई हो रबड़
पहले बनाते हैं ऐसी योजना जिससे
मशहूर हो जायें पंगे
फिर जिनको पहले बताओ बुरा
बाद में बताओ उनको चंगे
पहले बनाओ पंगेबाज फिर बताओ चंगेबाज
कितना अच्छा होता हम सीधे प्रसारण करते हुए
अपनी हास्य कविता से पंगेबाज को भगाते
हो सकता है उससे हम भी नायक बन जाते
हमारे ब्लाग पर भी छपती वह कविता
शायद इसी बहाने हिट हो जाते
इतने पाठ लिखकर भी कभी हिट नहीं पाते
पंगेबाज कुछ देर खड़ा रहा जाता तो
शायद हम भी कुछ हास्य कविता पका लेते
अपने पाठको का पढ़ाकर सकपका देते
पर तुमने सब मामला ठंडा कर दिया
अब हम तो चले घर वापस
इस गम में
कोई छोटी मोटी शायरी लिख कर काम चलाते
………………………………………………………

यह हास्य कविता काल्पनिक है तथा किसी घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वही इसक लिये जिम्मेदार होगा
दीपक भारतदीप

यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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ब्लाग लेखक (http://) का मतलब एक सामान्य उपभोक्ता-आलेख


हिंदी ब्लाग जगत का व्यवसायिक रूप करीब-करीब मैंने समझ लिया है और अब मुझे किसी तरह का कोई भ्रम नहीं है। एक बात बिल्कुल स्पष्ट है कि केवल लिखने के दम पर यहां कमाना अभी तक तो अंसभव है। निरंतर लिखते हुए मैंने यह अनुभव किया कि उससे मुझे कोई आर्थिक या सामाजिक लाभ होने वाला नहीं है। हिंदी के सभी ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले एग्रीगेटरों पर अक्सर मैं देखता हूं तो पता हूं कि मुझे वहां लोकप्रियता पाने का विचार तो छोड़ ही देना चाहिए क्योंकि कई ऐसी स्थितियां हैं जो कभी मेरे अनुकूल नहीं होंगी। उसके लिए जिस प्रकार के रणनीतिक कौशल की आवश्यकता है वह मुझमें नहीं है।

कई बार ऐसे विज्ञापन मेरे सामने आते हैं जिसमें ऐसा संदेश होता है कि जैसे वह आपको फ्री वेबसाइट बनाने का आमंत्रण दे रहे हों पर जैसे ही उसमें घुसते हैं पता चलता है कि यह सब एक छलावा है। फ्री ब्लाग बनाओ उस पर लिखते जाओ। गूगल का विज्ञापन उस पर लगाओ और इस आशा में लिखते जाओ कि शायद कुछ मिल जायेगा तो वह एक स्वप्न है। अभी तक वही कमा रहे हैं जिन्होंने डोमेन खरीदा है यानि वेब साइट बनाई है।

मेरा एक मित्र है जिसकी बिल्कुल भी अंतर्जाल में रुचि नहीं है। उसका बेटा साफ्टवेयर का कुछ काम जानता है। अभी तक बेरोजगार है। मैने अपने मित्र को अपने ब्लाग के बारे में बताया था तो उसने मुझसे पूछा था कि‘ क्या मुझे उससे आय हो रही है।‘ मेरे इंकार करने पर उसने बताया कि उसका बेटा किसी व्यक्ति के साथ वेबसाइट बना रहा है और उससे उनको आय होने की संभावना है। उससे मिली जानकारी के आधार पर पता चला कि उसका लड़का तो फिर अलग हट गया और उस वेबसाइट पर कुल पंद्रह हजार बनाने का खर्चा आया। मेरे मित्र ने ही बताया कि उनको आय के रूप में एक चेक मिल चुका है। आज मैंने उस वेबसाइट का निरीक्षण किया। मैंने अपने मित्र से कहा था कि वह उस वेबसाइट बनाने वाले को मेरे ब्लाग का पता पूछकर उससे राय मांगे। मेरे मित्र ने कुछ और समझा और आकर मुझे बताया कि तुम्हारे ब्लाग की सामग्री उसके काम की नहीं है।

मैंने आज उस वेबसाइट को देखा। विशुद्ध रूप से साफ्टवेयर के व्यवसाय से जुड़ी उस वेबसाइट का निर्माण मेरे ब्लाग बनाने के बहुत बाद हुआ और उसे चेक भी मिल गया। उसके विज्ञापन देखे तो मुझे लगा कि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होना चाहिए। अंतर्जाल पर आय के जरिये बने यह अच्छी बात है। मैंने हमेशा ही कहा है कि जिनके लिए यह व्यवसास बन सकता है वह अपने परिश्रम में कोई कमी नहीं रखें। जैसे जैसे मैंने गौर किया तो पाया कि उस बेवसाइट पर हिंदी में भी मनोरंजन और साहित्य जैसा कुछ दिखाने का प्रयास हो रहा है। पर उसका जो मुख्य पृष्ठ है उसमें अंग्रेजी में ही साफ्टवेयर के बारे में लिखा हुआ है। उसके वेबसाइट के मालिक ने मेरी विषय सामग्री के बारे में कहा कि वह उसके काम की नहीं है पर उसने यह भी बताया था कि केवल एक-दो कविता या आलेख उसने देखा था। मेरे मित्र का कहना था कि उसने यह भी कहा कि जब तक वह डोमेन नहीं लेंगे उनकी आय की संभावन नगण्य ही है।

वह मेरा मित्र अंतरंग है और जब भी मिलता है ब्लाग के बारे में चर्चा करते हुए कहता है कि-‘कुछ पैसा खर्च करो तो तुम्हें भी आय हो जायेगी। इस तरह केवल लिखने से काम नहीं चलेगा।‘

मैं उसकी बात सुनकर हंसता हूं। मुझे ताज्जुब होता है कि अंतर्जाल के बारे में कोई जानकारी न होने के बावजूद वह यह बात बड़े आत्मविश्वास से अपनी बात कहता है। उसको यह ज्ञान मेरे और अपने बेटे द्वारा बतायी गयी बातों पर ही आधारित है। बहुत दिन तक उसकी बातों का विश्लेषण करता रहा। अब मेरे सामने वैसे ही निष्कर्ष आ रहे हैं जैसा वह कहता आया है।

अनेक अंतर्जाल लेखक समय समय पर अपने विचार प्रकट करते रहे हैं यह अलग बात है कि कुछ अपनी व्यवसायिक मजबूरियों के कारण लिखते नहीं है और लिखते हैं तो संभवतः छदम नामों से। वजह यह है कि कोई भी संतुष्ट नहीं है। एक ब्लाग लेखक ने इस पर जमकर लिख था और उसे मैंने अपने दिमाग में पूरी तरह स्थापित कर लिया। उसने तो यह भी लिख दिया कि डोमेन बेचने वालों ने बहुत आशा से अपना काम प्रारंभ किया परंतु उन्हें बहुत निराशा हाथ लगी। उसने डोमेन बेचने वाली कंपनियों के बाकायदा नाम देते हुए उनके गुणों के साथ दोषों का भी वर्णन किया। केवल ब्लाग लिखने से कमाई नहीं होगी ऐसा उसने नहीं लिखा पर उससे मुझे यह बात भी लगी।
अनेक ब्लाग लेखक अप्रत्यक्ष रूप से कई ऐसी बातें कह जाते हैं कि उसके प्रभाव क्या होंगे इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते। डोमेन बेचने वाली कंपनियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का साहस उस ब्लागर ने वर्डप्रेस के ब्लाग पर ही किया-मैंने इस बात पर गौर किया। वर्डप्रेस के ब्लाग पर लिखना मतलब फ्री में लिखना है पर उसने लिखा।

अब कई ब्लाग धीरे-धीरे वेबसाइट के रूप में परिवर्तित होते जा रहे हैं। इनमें से कुछ को मैंने लिंक भी किया है। इसके बावजूद मुझे ऐसा लग रहा है कि वेबसाइट धारक और ब्लाग धारक अपने आप में एक विभाजन है-यह विभाजन भी मैंने नहीं बल्कि एक ब्लाग लेखक ने ही किया है जो अब स्वयं वेबसाइट चला रहा है। हां, यह अंतर अब लिखने और पढ़ने पर भी दिखने लगा है। मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी और परिवार की व्यापारिक पृष्ठभूमि के कारण कई ऐसी चालाकियों को आसानी से देख लेता हूं जो कोई अन्य नहीं देख लेता। किसी ने ब्लाग को वेबसाइट बनाया इस पर भी कोई आपत्ति नहीं है और जिसने बनवाई उसमें भी मैं दोष नहीं देखता। जब शुरूआती दौर में मैं ब्लाग लेखकों को अपना उत्साह बढ़ाते हुए देखता था तो सोचता कि क्या यह सभी केवल शौकिया ही ऐसा कर रहे हैं या उनका कोई व्यवसायिक उद्देश्य है। अंतर्जाल पर हिंदी लिखने का अभियान कई लोगों ने चला कर रखा है पर धीरे-धीरे सबकी असलियत सामने आती जा रही है। मुझे अपना ब्लाग वेबसाइट में बदलना आता ही नहीं इसलिये यह संभव नहीं है। दूसरा यह कि जिन ब्लाग लेखकों ने बनाकर आय अर्जित की है उनकी आय का सही अनुमान लगाते हुए यह भी लगता है कि अभी इतनी आय उनको नहीं होती जितनी कि घर के लिए आवश्यक है। एक बात तय रही कि हिंदी को अंतर्जाल पर लिखने के अभियान में सभी लोग शौकिया नहीं है उनमें कुछ लोगों उदद्ेश्य यह भी है कि किसी तरह डोमेन बिकवाये जायें। हो सकता है कि यह सच किसी को कड़वा लगे पर मुझे वह यहां दिखाई देते हैं। मजे की बात यह है कि वेबसाईट धारक लोगों ने ही ऐसी बातें लिखी हैं जिससे मैं यह सब विचार बनाता गया हूं।

यहां यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैं कई बातें यहां नहीं लिख रहा क्योंकि सभी लोगों के प्रति मेरे मन में मैत्री भाव है। मैं यह भी बता सकता हूं कि किस तरह उन वेबसाईट धारकों को इतने पाठक मिल जाते हैं जिनसे उनके विज्ञापन खाते दूसरों के बनिस्बत अधिक चलायमान होते हैं-शायद वह स्वयं भी नहीं समझते होंगे। कुछ अंतर्जाल लेखकों की गतिविधियों से ही मुझे यह आभास हो जाता है कि वह किस तरह लाभ उठा रहे हैं। एक ब्लाग लेखक ने दूसरे का संदर्भ देते हुए लिखा कि ‘मैं 1000 ऐसे पाठक लेकर क्या करूंगा जो मुझे एक पैसा भी नही दिलवा सकते। मैं तो ऐसे 10 पाठक ही चाहूंगा जो मुझे कुछ दिलवा सकें।’ अब इसमें मुझे दिमाग चलाने की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ी।’

यहां दो तरह के लोग लाभ उठाने वाले लगते हैं। एक तो जो डोमेन बिकवाना चाहते हैं दूसरा वह लोग हैं जो यहां थोड़ा बहुत लिखकर बाहर अपनी छवि बनाना चाहते हैं। ऐसे लोग लिखने वालों को प्रेरित करते हुए दिखने का काम भी करते हैं। कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन भी कर यह दिखाते हैं कि वह अंतर्जाल पर हिंदी लिखवाने के लिए कितना काम कर रहे है। पहले तो मैं समझा कि एक दो लोग हैं पर अब लगने लगा है कि एक समूह है जो इस तरह के काम में लगा है।
ऐसे में मेरे जैसे आम लेखक की कोई अधिक भूमिका होती भी नहीं। मन में कभी आता है कि यार थोड़ी आय हो जाती तो और मजे का लिख लेते। तकनीकी कौशल और प्रबंधक की प्रवृत्ति के अभाव ने कहीं भी नहीं पनपने दिया शायद यहां अवसर मिल जाये। धीरे-धीरे इस आशा को ही छोड़ ही दिया। लाभ उठाने वाले लोगों के लिए मैं कोई प्रिय व्यक्ति नहीं हो सकता। फिर भी जो ब्लाग लेखक कमाना चाहते हैं उनके लिए यह आवश्यक है कि इन दोनों प्रकार के लोगों से संपर्क बढ़ायें। जिनको स्वांत सुखाय लिखना है वही केवल ब्लाग पर डटे रहें क्योंकि हिंदी के पाठक जैसे जैसे बढ़ने लगेंगे तब उनकी चर्चा होगी और हो सकता है तब वह लाभ ले सकें। बाकी यहां तो जब शीर्षस्थ ब्लाग लेखकों की कोई सूची किसी ब्लाग, समाचार पत्र, या टीवी चैनल पर आती है वह तो रणनीति में दक्ष ब्लाग लेखकों की आती है। केवल लिखने में ही नहीं बल्कि फोरमों पर पढ़ने में भी रणनीति अपनायी जा रही है। आप ब्लागवाणी पर हिट देखकर अंदाजा लगा सकते हैं।
फिर भी मैं मानकर चलता हूं कि कुछ तो मेरे मित्र हैं जो मुझे चाहते होंगे। आखिर मैं तो किसी से कोई आशा नहीं करता। मैं पहले भी कह चुका हूं कि मैंने अभी तक केवल एक ब्लाग लेखक के साथ प्रत्यक्ष मुलाकात की है-वह हैं श्री सुरेश चिपलूनकर। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व देखकर कह सकता हूं कि वह भी मेरी तरह ही हैं। कुछ लोगों का मेरे प्रति स्नेह भाव है वह मुझे द्रवित कर देता है। ऐसे लोगोंे की संख्या यहां अधिक है पर वह शांति से अपना लिखते हैं पर कई ऐसे लोग जो चमक रहे हैं वह अपने लिखे से कम अपनी चालाकियों से अधिक प्रभाव बनाये हुए हैं। ऐसे में आम ब्लाग लेखकों को अपने समूह बनाते हुए आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि तकनीकी रूप से ब्लाग और वेबसाइट में कोई फर्क नहीं है सिवाय इसके कि उस पर पैसा खर्च कर
जल्दी पैसा कमाने की आशा कर सकते हैं। सच मैं नहीं जानता पर वेबसाइट बनाकर भी केवल लिखकर यह संभव नहीं हैं-जिन लोगों ने पैसा कमाया है उसकी वजह उनका पुराना होना तो है ही साथ ही ब्लाग लिखने के लिए दूसरों को प्रेरित करते हुए उनको पाठक भी अधिक मिल जाते हैं-कैसे? इस पर फिर कभी।