Category Archives: kavita

इंसान भी अब पालतू होते हैं-व्यंग्य कविता


कई चेहरे रोज दिखते हैं
पर फिर भी अनजाने रह जाते हैं
मिलते हैं रोज कई लोग यहां
पर सभी अपनी महफिलों में आने के
दावतनामे नहीं भिजवाते हैं

आते हैं कई खत हमारे दरवाजे पर
लिखने वाले सभी अपने नहीं हो जाते हैं
सस्ती है दोस्ती
एक जाम पर दोस्त बदल जाते हैं
बेदर्द जमाने में लोग
क्या समझेंगे दिल के इशारे
उनके दिल में तो चमकते पत्थरों के
घर बस जाते हैं

सहारे की उम्मीद किससे करें
मददगार कीमत बताए जाते हैं
जिनकी आंखों पर है दौलत का पर्दा
वह किसी के बहते पसीने को
भला क्या देख पायेंगे
जिनके कान सुनते है शोर
भला किसी बेसहारे की
सिसकती आवाज कहां सुन पायेंगे
जुबान जिनकी गिरवी है अपने आका के पास
भला सच क्या कह पायेंगे
आपने हाथों रखी है अपनी कलम गुलाम
मालिक के इशारे के बिना
किसका नाम लिख पायेंगे
इंसान भी अब पालतू होते हैं
जो अपना सम्मान बेच आते हैं
हर जगह अपने आका के नाम
लिखते और गाते नजर आते हैं

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अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है-चार क्षणिकाएं


हादसों की खबर से अब
शहर सिहरता नहीं
अपने दर्द इतने भर लिये इंसानं ने
कि किसी अन्य की लाश  से हमदर्दी
जताने के लिये निकलता नहीं
कुछ लोग गिरा देते हैं लाशें
शायद कोई उनको देखकर चैंक जाये
जानते नहीं कि
कोई दूसरे को देखेगा तो तब
अब अपने से आगे देखने की
रौशनी और चाहत होगी
किसी की आंखों  में
अपने सामने कत्ल होते देखकर भी
आदमी अब सिहरता  नहीं
………………………..

शांति की बात सियारों से नहीं होती
पीठ पीछे वार करने वालों से
कभी वफादारी की उम्मीद नहीं होती
जो यकीन करते हैं उन पर
मुसीबत में किसी की भी
उनसे हमदर्दी नहीं होती
…………………

जख्म बांटना ही उनका काम है
इसलिये ही तो उनका नाम है
खंजर लेकर घूमने वालों से दोस्ती की
ख्वाहिश करते हैं कायर
क्योंकि घुटने टेकना ही रोज उनका काम है
………………………..
आग लगाना उनका काम है
मिलते उनको दाम है
कौन देता है कीमत
कौन खरीदता है लाशें
रौशनी जितनी तेज है इस शहर में
अंधेरे का राज है उतना ही गहरा
सच तो सब जानते हैं
पर अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है
………………………….

क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना-हास्य व्यंग्य


ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसकी पत्नी ने उसे दूसरे ब्लागर के मिलने की खबर अंदर आकर सुनायी। उसने कहा-‘बोल दो घर पर नहीं है।’

तब तक दूसरा ब्लागर अंदर आ गया और बोला-‘भाई साहब हमसे क्या नाराजगी है?’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘नाराजगी तुमसे नहीं है। तुम्हारी भाभीजी से है तुम्हें अंदर न बुलाकर हमें यह बताने आयीं हैं कि तुम आ गये हो। वैसे हमारी नजरें बहुत तेज हैं और हमने देख लिया था कि तुम अंदर आये हो।’

वह आकर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला-‘‘भाभीजी, आप मुझे शिकंजी पिलाईये। भाई साहब जरूर शिकंजी पीते हैं-ऐसा मेरा विश्वास है।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘पर यह बात हमने अपने किसी ब्लाग पर तो नहीं लिखी।’

दूसरा ब्लागर बोला-‘मैने अंदाजा कर लिया था। शिकंजी पीकर इंटरनेट पर ब्लाग पर अच्छी तरह लिखा जा सकता है।’

भद्र महिला चली गयी तो वह अपने असली रूप में आ गया और बोला-‘पर जरूरी नहीं है कि शिकंजी पीकर हर कोई ब्लाग पर अच्छा लिख सकता हो।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘हां इसमें कोई शक नहीं है, अगर वह कुछ लिखता हो तो?’
दूसरे ने ब्लागर ने कहा-‘हम पर फब्तियां कस रहे हो!
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘और तुम क्या कर रहे थे?वैसे इधर कैसे भटक गये।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘‘मैं एक क्रिकेट प्रतियोगिता करा रहा हूं। जिसमें चार ब्लागर और चार कमेंटरों की टीमें हैं। मै चाहता हूं कि तुम उनके लिये कोई एक्शन सीन लिख दो।’

तब तक गृहिणी शिकंजी के ग्लास बनाकर लायी। उसने जब सुना कि कोई क्रिकेट के एक्शन सीन की बात हो रही है तो वह उत्सुकतावश वहीं एक तरफ बैठ गयी।
पहला ब्लागर-‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन? और इतने सारे ब्लागर और कमेंटर तुम्हारे पास आये कहां से? क्या कहीं से नीलामी में ले आये क्या?’

दूसरा ब्लागर अब गृहिण की उपस्थिति के आभास होने पर सम्मान के साथ बोला-‘अरे भाईसाहब, आप भी कैसी बात करते हो। अरे, आजकल वह समय गया। आप देख नहीं रहे कहां का खिलाड़ी कहां खेल रहा है। शहर का वासी हो या न हो तो पर उस शहर की तरफ से खेल तो सकता है। वैसे ही ब्लागर हो या न हो, कमेंटर हो या न हो और उसने कभी इंटरनेट खोला भी न हो पर हमने कह दिया कि ब्लागर तो ब्लागर। हमें अपने काम और कमाई से मतलब है।’
दूसरा ब्लागर उसे हैरानी से देखने लगा। फिर वह बोला-‘‘आप तो कुछ एक्शन सीन लिख दो। आजकल तो क्रिकेट के साथ एक्शन भी जरूरी है। किसी खिलाड़ी को किससे लड़वाना है। लड़ाई के लिये वह कौनसा शब्द बोले यह लिखना है। थप्पड़ या घूसा किस तरह मारे और दूसरे के जोर से लगता दिखे पर लगे नहीं इसलिये मैं ही एक्शन डायरेक्टर तो मैं ही रहूंगा पर यह तो कोई पटकथा लेखक ही तय कर सकता है। फिर उसके लिये कमेटी होगी तो उसमें बहस के डायलाग लिखवाना है। सजा का क्या हिसाब-किताब हो यह भी लिखना है। एक-दो खिलाड़ी ऐसे है जिनको एक दो मैच बाद बाहर बैठने के लिये राजी कर लिया है। उसके लिये तमाम तरह का प्रचार कराना है।

गृहिणी ने पूछा-‘पर यह किसलिये?’

वह बोला-‘अपने शहर की इज्जत बढ़ाने के लिये। देखिये हमारे शहर की कोई टीम नहीं बुला रहा। इसलिये मैं अपने शहर में क्रिकेट के खेल के विकास के लिये यह कर रहा हूं। स्थानीय मीडिया मेंे भी इसके लिये संपर्क साध रहा हूं ताकि अधिक से अधिक लोग वहां पहुंचे। और हां, इटरवैल में नाच गाने का भी इंतजाम किया है।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मैने आज तक कोई नाटक नहीं लिखा।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इसमे लिखने लायक है क्या? यह तो सब आसानी से हो जायेगा। बस थोड़ा सोचना भर है। मुझे अन्य व्यवस्थायें देखनीं नहंी होतीं तो मैं ही इस पर लिखता।’’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मेरे बूते का नहीं है। जब झगड़ा कराना है तो उसके लिये कुछ ऐसा वैसा लिखना जरूरी है, और इस मामले में तुम जितने दक्ष हो मैं तो हो ही नहीं सकता।’

गृहिणी ने दूसरे ब्लागर की तरफ देखकर कहा-‘आपने तो सारे सीन पहले ही सोच लिये है। एकदम जोरदार कहानी लग रही है। बस आपको तो शब्द ही तो भरने हैं। अभी आप यह सीन बताकर जा रहे हैं यह तो उसे भी याद नहीं रख पायेंगे।फिर लिखेंगे कहां से? आप कोशिश करो तो अच्छा लिख लोगे।’
दोनो ने शिकंजी का ग्लास खत्म किया तो वह दोनों ग्लास उठाकर चली गयी । दूसरा ब्लागर बोला-‘‘ठीक है जब क्रिकेट मैच कराना है और उसमें एक्शन के सीन रखने हैं तो यह भी कर लेता हूं। देखो भाभीजी ने हमारा हौंसला बढ़ाया। एक तुम हो जब तब ऐसी वैसी बातें करते हो। भाभीजी बहुत भले ढंग से पेश आतीं हैं और तुम……………………छोड़ो अब तुमसे क्या कहूं

पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, पर याद रखना मैंने तुम्हारी उस तुम्हारी पहले और आखिरी कमेंट के बारे में उसे कुछ नहीं बताया। क्या इसके लिये मुझे धन्यवाद नहीं दोगे?
दूसरे ने कहा-‘‘अच्छा मैं चल रहा हूं। और हां, इस ब्लागर मीट पर भी कुछ अच्छा लिख देना ताकि मेरी प्रतियोगिता को प्रचार मिले। फिर देखो तुम्हें कैसे फ्लाप से हिट बनाता हूं।’

वह चला गया और गृहिण ने पूछा-‘‘क्या कहा उसने?’

पहले ब्लागर ने कहा-‘तुमने भी तो सुना! यही कहा‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना’।’’

फिर वह मन में सोचने लगा-‘मैने इस बार भी नहीं पूछा कि इंटरनेट पर बने ब्लाग पर मैं यह रिपोर्ट हास्य कविता के रूप में लिखूं या नहीं। चलो अगली बार पूछ लूंगा।
नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नही मिला।

अपने आप हिट बना देगा-हास्य कविता


सर्वशक्तिमान के घर से निकलकर
दोनों निकले बाहर तो
एक भिखारी ने कहा
‘दे जा, ऊपर वाले के नाम पर
पांच रुपया तो वह
जिंदगी में हिट बना देगा’

दोनों ने अनसुनी कर दी
और आगे बढ़ गये तो
फंदेबाज बोला
‘दीपक बापू,
हम तो हिट फ्लाप के चक्कर से हैं दूर
अंतर्जाल पर न बनाया है कोई ब्लाग
न फिल्म कोई बनाते जो
तरसे हिट के लिये हमारे नूर
तुम चल रहे हो फ्लाप
देते उसको पांच रुपया तो
क्या हो जायेगा
हो सकता है 12 में से एकाध ब्लाग
उसकी दुआ से हिट हो जाये
तो तुम्हारा बेड़ा पार लगा देगा’

खड़े होकर पहले फंदेबाज को घूरा
फिर बोले
‘काहे हमारे ब्लोग देखते तो बहुत हो
पढ़ते कभी नजर नहीं
ऐसे ही उनके हिट होने की फिक्र में मरे जाते
वैसे भी हम सर्वशक्तिमान के घर
हम कुछ मांगने नहीं आते
फिर भी हम आते इतनी दूर से
तब भी वह बिना मांगे झोली
हमारी तो भर देता दुआओं से
फिर यह उसके पास बैठकर मांगता है तो
उसकी कैसे खाली हो सकती हैं खोली
यह भी एक व्यापार है
इसका भी नहीं कोई पार है
वैसे भी ब्लाग पर हिट होकर
हमें कौन रुपया मिलने वाला है
अपने हिसाब से देता सब ऊपर वाला है
पांच रुपये देने से जिंदगी हिट हो जाती
तो फिर क्यों इस देश में गरीबी छाती
अपने लिये हिट मांगकर
क्या मांगने वालों की कतार में
हम भी शामिल हो जाते
कोई मांगे अंदर मत्था टेककर
तो कोई बाहर हाथ फैलाकर
हम तो आते केवल आस्था से मत्था टेकने
यह उसकी समस्या है
कि हमें क्या दे या नहीं
अपने तय समय पर वह
जिंदगी और ब्लाग दोनों को हिट बना देगा
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 सूचना-इस ब्लाग के कल तक 20 हजार व्यूज का अंक पार करने की संभावना है। अत जो 20 हजारवां पाठक हो अगर वह इस पर नाम लिखे तो अच्छा रहेगा। इसमें कमेंट के कालम में अंग्रेजी या रोमन हिंदी में अपना नाम लिखे तो अच्छा रहेगा। इस ब्लाग के कोने में पाठक संख्या  जिसे 19999 नजर आये तो वह समझे कि वह 20 हजारवां पाठक है और भाग्यशाली है। उसी तरह 20 हजार एक का पाठक भी अपना नात लिख तो अच्छा रहेगा। वह समझे कि वह इसे अब तीस हजार के सफर के लिये छोड़कर जा रहा है। दोनों अपने अपने आपको देख सकते हैं पर मैं उनको नहीं देख पाउंगा पर उनके लिखे से मुझे उसकी सुखद अनुभूति का अहसास होगा।


हमने ओढ़ ली खामोशी-कविता


कोई दे गया गाली तो
खामोशी ओढ़ ली हमने
बदले में देते हम भी
पर लगता मामला बढ़ने
वह तीन देता हम तीस देते
बढ़ती गालियों की संख्या
झगडे बढ़ने से तो भला क्या डरते
पर समय और शब्द
व्यर्थ बर्बाद करने से क्या फायदा
पहले ही घेर रखा तरह-तरह के गम ने

जीता होगा वह भी ग़मों में
तभी तो दे गया गाली
दिमाग में तनाव कर गया खाली
मन में बजा रहा होगा अपने लिए ताली
देता होगा दिल में खुशी की बात बनने
वैसे हम नहीं भूलते हिसाब किसी का
प्रेम का हो या नफरत का
प्रेम वालों से निभाने में अगर आगे हैं
तो नफ़रत करने वालों से भी लेते हैं सबक
जिन्दगी लगती हैं अपने आप संवरने
गाली से किसी को नहीं हराएंगे
शब्द बहुत है हमारे मन में
कभी गंभीर होते तो
कभी कसते हैं व्यंग्य
निकल पड़ते हैं स्वत:
जो रास्ता दिया हमने

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