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पेट्रोल में विदेशी और साइकिल में स्वदेशी का भाव-हिन्दी व्यंग्य लेख


करीब दो वर्ष तीन माह से अब लीटर की नाप की जगह दाम बताकर पेट्रोल भरवाना प्रारंभ कर दिया है। उसमें तेल नहीं डलता। दाम बताकर पेट्रोल भरवाते हैं इसलिये उसका सही दाम नहीं मालुम। दरअसल हमने आलोच्य अवधि में ही स्कूटर छोड़कर नया दुपहिया वाहन लिया। जिसमें मीटर बताता है कि गाड़ी में पेट्रोल कितना है। जैसे ही मीटर के लाल संकेत की ऊपर वाली लाईन के पास कांटा आता है हम पेट्रोल भरवा लेते हैं। हमेशा ही सौ रुपये का भरवाते हैं और देख रहे हैं कि भाव बढ़ते बढ़ते पेट्रोल भरने के बाद कांटा अब पूर्णता के संकेत से नीचे आता जा रहा है। मतलब पेट्रोल के भाव बढ़ रहे हैं।
कल एटीएम से पैसे निकालने से पहले पेट्रोल भरवाया। जेब मे एक सौ क और एक पचास का नोट था। इसलिये पचास का ही भरवाया। कांटा कुछ ही ऊपर गया पर आज शाम घर आये तो लगा कि तेल संकेतक कांटा फिर अपनी जगह पेट्रोल भरवाने से पहले वाली लाईन पर आ गया है। मतलब एक दिन में पचास रुपये का पेट्रोल फूंक दिया। यह दाम जेब की लाल रेखा से ऊपर जा रहा है। अभी कुछ दिन पहले पुरानी साइकिल बेचकर नई ली थी। वह भी लाल है पर जेब की की हरियाली बनाये रखने का काम करती है। बरसों से काम पर साइकिल से गये पर अब स्कूटर की आदत हो गयी है, मगर साइकिल चलाना जारी है। मुश्किल यह है कि वह नियमित आदत नहीं रही। नई साइकिल को हम रोज निहारते हैं क्योंकि मालुम है कि संकट की सच्ची साथी है। फिर टांगों को भी निहारते हैं जिन पर अब पहले से कम यकीन रहा है। इसलिये कभी कभी चार से पांच किलोमीटर साइकिल चला लेते हैं। चार पांच दिन के अंतराल से चलाने पर घुटने कुछ नाराजगी जताते हैं पर दम नहीं तोड़ते। लगातार तीन चार दिन चलाओ तो लगता है कि आदत बन रही है मगर छोड़ दें तो फिर मुश्किल आती है।
यह साइकिल करीब तीन हजार रुपये की छह माह पूर्व खरीदी थी पर उसका पैसा वसूलने के लिये समय चाहिए। हमारा अंदाजा है कि पिछले छह माह में सात सौ किलोमीटर से अधिक नहीं चलायी होगी-यह दूरी कम भी हो सकती है।
हमारा मानना है कि उसे तीन हजार किलोमीटर चलाकर ही कीमत की वसूली हो सकती है। अगर वह साइकिल हम काम पर भी ले जायें तो कम से कम पांच माह नियमित रूप से चलानी होगी तभी कीमत की वसूली मानी जा सकती है।
जिस दिन खरीदी थी उस दिन दुकानदार ने बताया था कि साइकिल किसी भी कंपनी की हो मगर वह बनती पंजाब में ही है। बताते हैं कि पंजाब में बनी साइकिलें विदेशों में निर्यात भी होती हैं। मतलब स्वदेशी हैं इसलिये इसमें संदेह नहीं है कि देश का भविष्य वही संभाले रहेंगी। पेट्रोल विदेशी उत्पाद है और कभी भी साथ छोड़ सकता है। आज सोच रहे हैं कि अब साइकिल पर अपनी आदत बढ़ाई जाये।
प्रसंगवश आज एक मित्र ने अपनी कार दिखाई जो उन्होंने एक वर्ष पूर्व खरीदी थी। अभी उन्होंने चलाना सीखा है और रास्ते में मिलने पर उन्होंने बताया कि उनकी गाड़ी डीजल से चलती है और एक किलोमीटर में बीस लीटर! डीजल 42 रुपयेे लीटर है और उनके अनुसार कहीं किराये से आने जाने पर लगने वाले पैसे से कम इस पर खर्च होता है।
सद्भावना से उन्होंने कहा कि-‘तुम भी कार खरीद क्यों नहीं लेते!’
हमने मित्र से कहा कि-‘आपके घर के मार्ग की सड़के सही और चौड़ी हैं और हम दूर रहते हैं। हमारा पेट्रोल तो सड़क जाम में ही खत्म हो जायेगा।’’
वह बोले-‘हां, यह तो ठीक है।’
हमने हंसते हुए कहा कि-‘हमने तो नई साइकिल खरीदी है। सड़क जाम में पेट्रोल फूंकते फूंकते तो लगता है कि वही चलाया करें!’
वह बोले-‘हां, आपके घर का मार्ग वाकई बहुत खराब है।’
बातचीत खत्म घर आये। समाचार चैनल खोले। कहीं क्रिकेट तो कहीं फिल्म तो कहीं कोई दूसरी बकवास चल रही थी। हर बार हम समाचार सुनने के लिये खोलते हैं। मालुम है कि देखाने सुनने को नहीं मिलेंगे पर आदत तो आदत है। वहीं एक जगह ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी कि मिस्र के जनआंदोलन की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर भारत में जल्दी महसूस किया जायेगा। यह सुनते ही मित्र से हुए वार्तालाप का स्मरण हुआ और हम गैलरी में खड़ी साइकिल के पास गये। उसे परसों ही चलाया था। उस पर हाथ फेरा जैसे निर्देश दे रहे हों कि तैयार हो जाओ स्वदेशी चाल पर चलने के लिये।
अब तो यह लगने लगा है कि जैसे सुविधाओं का गुलाम होना ही विदेशी गुलाम होने जैसा है। गांधी जी के स्वेदशी वस्तुओं के उपभोग करने के विचार की पूरा देश खिल्ली उड़ा रहा है। देश की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है पर कृत्रिम रूप से पेट्रोल प्रधान बना दिया गया है। पेट्रोल के दाम बढ़ते हैं तो हर चीज़ के दाम बढ़ जाते हैं। ऐसी चीजों के दाम भी बढ़ने लगते हैं जिनका पेट्रोल से रिश्ता नहीं है पर मुश्किल यह है कि उसके उत्पादक और विक्रेता मोटर साइकिलों पर घूमते हैं और उनका निजी खर्च बढ़ता है। सो महंगाई बढ़नी है।
ऐसा लगता है कि देश के बाज़ार विशेषज्ञ देश के पांच सौ तथा हजार के नोट लायक बना रहे हैं। यह तभी हो पायेगा जब प्याज एक किलो और पेट्रोल एक लीटर आठ सौ रुपये हो जायेगा।
इसी प्रसंग पर अंतिम बात! लिखते लिखते टीवी पर आ रहे समाचार पर हमारी नज़र गयी। यह समाचार सुबह अखबार में पढ़ा था। ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने एक कृत्रिम पेट्रोल का सृजन किया है जिसका प्रयोग सफल रहा तो वह तीन साल बाद बाज़ार में आ जायेगा। कीमत 15 रुपये लीटर होगी। मगर क्या तीन साल बाद इसकी कीमत इतनी रह पायेगी। भारत के बाज़ार नियंत्रकों के लिये यह खबर नींद उड़ाने वाली होगी क्योंकि तब देश के सभी लोगों को हजार और पांच सौ के उपयोग लायक बनाने के उनके प्रयास संकट में पड़ जायेंगे। यकीनन इस पेट्रोल का भारत में उपयोग रोकने की कोशिश होगी या फिर उसकी कीमत किसी भी तरह तमाक कर तथा अन्य प्रयास पेट्रोल जितनी बना दी जायेगी। इस तेल के खेल को भला कौन समझ पाया? साइकिल पर चले तो फिर समझने की जरूरत भी क्या रह जायेगी?
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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टीवी चैनल और खोजी पत्रकारिता-हिन्दी लेख (TV chainal aur khoji patrakarita-hindi lekh)


आजकल एक जनसंपर्क कंपनी की बहुत चर्चा है जिसकी संचालिका की एक उद्योगपति से वार्तालाप का टेप मामला तो अदालत में चल रहा है। इधर हम यह सोच रहे हैं कि जार्ज बर्नाड शॉ का यह कथन कितना सत्य है कि बिना बेईमानी के कोई अन्य रास्ता किसी को अमीर नहीं बना जा सकता। मतलब इस धरती पर जितने भी अमीर है वह भले ही अपनी ताकत पर प्रचार माध्यमों में अपने ईमानदार होने का प्रचार करें पर आम आदमी जानता है कि उनका यह ‘खूबसूरत झूठ’ अपने कंधे पर गरीबों की आह का बोझ लिये हुए है।
अभी तक हमारे देश में यह माना जाता था कि उद्योग, व्यापार, फिल्म या मादक द्रव्यों के विक्रय के अलावा अमीर होने का अन्य कोई मार्ग नहीं  है। अब लगता है कि जनसंपर्क का काम भी इसमें शामिल हो गया है। जब हम जनसंपर्क का बात करते हैं तो टीवी तथा समाचार पत्रों का माध्यम उसका एक भाग है। जब कोई जनसंपर्क की बड़ी कंपनी बना रहा है तो तय बात है कि उसके पास टीवी या पत्रकारों का जमावड़ा होना चाहिए। जिस जनसंपर्क कंपनी की संचालिका की चर्चा टेलीकॉम घोटाले में आई है उसके साथ दो पत्रकार भी शामिल है। यह बातचीत सुनकर ऐसा नहीं लगता कि उसका समाचार से अधिक संबंध है। बल्कि उससे तो ऐसा लगता है कि किसी व्यवसाय से जुड़े दलाल आपस में बात कर रहे हैं।
हमें इन पर आपत्ति नहीं है बल्कि हम इशारा कर रहे हैं कि जिस तरह समाज में सामान्य मार्ग से आर्थिक उपलब्धि, सामाजिक प्रतिष्ठा स्थापित करना तथा अन्य लोगों के हित का काम बड़े पैमाने पर करना कठिन बना दिया गया है। ऐसा कोई काम नहीं है जिससे राज्य के सहयोग के बिना आगे बढ़ा जा सके। इसी कारण जिन लोगों को आगे बढ़ना है वह पहले राज्य के शिखर पुरुषों में अपनी पैठ बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि पुराने पूंजीपति कोई दूध के धुले हैं। अगर वह इतने ईमानदार होते तो राज्य की व्यवस्था ऐसी नहंी बनने देते जिससे कि नये अमीर बनना बंद हो गया। राज्य चला समाजवाद की राह, जिससे देश में अमीरों का वर्चस्व बना रहा। लोग नौकरियों के लिये पैदा होने लगे। यह आकर्षण इतना था कि लोग अब सेठ बनने की सोचते भी नहीं है। छोटे मोटे व्यवसायियों को तो कोई सम्मान ही नहीं है। इन बड़े व्यवसायियों को देखें तो आप अनेक तरह के सवाल पूछ सकते हैं जिनका कोई जवाब नहीं मिलता।
1-क्या इन्होंने आयकर पूरी तरह से चुकाया होगा?
2-आयात पर पूरा कर भुगता होगा?
3-इन लोगों ने अपने उत्पादों पर जो उत्पाद कर वसूला उसे क्या पूरा जमा किया होगा?
4-धर्म तथा समाज सेवा के नाम पर किये कार्यों के लिये पैसा खर्च कर करों से राहत नहीं ली होगी?
यकीनन इसका जवाब होगा ‘‘नहीं!’’
अब आते हैं जनसंपर्क की असली बात पर! आप जब किसी ए.टी.एम. पर जायें तो वहां पर क्रिकेट खिलाड़ियों के अभिनय वाले विज्ञापन सजे हुए मिलते हैं। यकीनन इन खिलाड़ियों ने इसके लिये ढेर सारा पैसा लिया होगा? क्या देश के इतने बड़े बैंक को को इसकी जरूरत थी?
नहीं! वह बैंक एक भी पैसा विज्ञापन पर न खर्च करे तो भी ग्राहक उसके पास जायेगा। यही स्थिति जीवन बीमा कंपनी की है। तब सवाल यह उठता है कि इतनी बड़ी अर्धसरकारी कंपनियों को विज्ञापन पर पैसा खर्च करने की क्या आवश्यकता है? इसका मतलब साफ है कि उदारीकरण और निजीकरण के चलते राज्य और निजी कंपनियों का स्वरूप एक जैसा ही कर दिया गया है जबकि है नहीं! फिल्म, समाज सेवा, व्यापार तथा उद्योग जगत के शिखर पुरुष सभी जगह अपना चेहरा दिखा रहे हैं। वह क्रिकेट भी देखने बड़े ताम झाम के साथ आते हैं तो फिल्म सम्मेलन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। पूरा समाज अपनी दोनों आंखों को अखबार और टीवी पर रोज देखता है। अब इन शिखर पुरुषों के कार्यक्षेत्र की विशिष्टता देखने के लिये कोई यह प्रश्न नहीं पूछता कि उनका मूल व्यवसाय क्या है?
स्थिति यह है कि समाचार चैनलों पर क्रिकेट और हास्य नाटकों के साथ ही बिग बॉस के अंश भी दिखाकर समय काटा जाता है। कम से कम पौन घंटा तो ऐसा लगता है कि प्रचार माध्यमों के प्रबंधकों ने मान लिया है कि इस देश का आम आदमी बिना अक्ल का है? उसे तो बस आंखों गड़ाकर समाचार देखना है न कि सुनना और समझना है? अब तो यह लगने लगा है कि टीवी चैनलों के कुछ कार्यक्रमों पर विवाद खड़े करना भी फिक्सिंग का हिस्सा है? उन पर कोई बैन लगे या उसके खिलाफ प्रदर्शन हो सभी पैसे देखकर कराया जाता है ताकि उसे प्रचार मिले। ऐसी स्थिति में जनसंपर्क का कार्य केवल दलाली जैसा हो गया है? जब सभी शिखर पुरुषों एक हो गये हैं तो उनके मातहत या साथी के रूप में जनसंपर्क का काम करने वाले इस बात का ध्यान रखते हैं उनके घेरे में रहने वाला ही आदमी विज्ञापन में शक्ल दिखाये, कभी बयान दे तो कभी उसके मामूली से कृत्य पर बड़ी चर्चा की जाये। विज्ञापन की कंपनियां तो चलती ही जनसंपर्क अधिकारियों की कृपा से हैं। जनसंपर्क वाला ही विज्ञापन बनवायेगा और टीवी तथा समाचार चैनलों को देगा। यही कारण है कि क्रिकेट, फिल्म, व्यापार, उद्योग तथा अन्य सामाजिक मनोरंजक क्षेत्रों के शिखर पुरुष अब गिरोह के सरगना की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उनका जनसंपर्क कार्यालय एक तरह से उनके लिये सुरक्षा कवच दिलाने का काम करता है।
सच बात तो यह है कि सीधी राह से कोई अमीर नहीं बना। कहीं करचोरी तो कहीं निजी सेवा देकर राज्य के राजस्व के साथ बेईमानी कर सभी अमीर बन रहे हैं। संभव है देश के कुछ मेहनती लोग अमीर बना जाते हैं पर जनसंपर्क के लिये खर्च न करने के कारण उनको वैसी प्रसिद्धि नहीं मिलती क्योंकि उसके लिये तो बेईमानी का पैसा होना आवश्यक है। उद्योग के उत्पाद तथा व्यापार की सेवा में शुद्ध रूप से अमीर बनने के सारे मार्ग बंद हैं, ऐसे में जनसंपर्क का काम केवल दलाल ही चला सकते हैं। टेलीकॉम घोटाले में कुछ पत्रकारों के दलाल के रूप में चर्चा होना बहुत दिलचस्प है। मजे की बात यह है कि हमारे एक राष्ट्रवादी ब्लागर उन पर प्रतिकूल टिप्पणियां बहुत पहले ही कर चुके हैं। उनको शर्मनिरपेक्ष तक कहा गया है क्योंकि इन पत्रकारों ने अपनी छवि धर्मनिरपेक्ष दिखाने की कोशिश की थी। इधर टेलीकॉम घोटाले में विदेशी कंपनियों के शामिल होने की बात की जा रही है तब यह बात भी देखनी होगी कि ऐसे कुछ दलाल कहीं विश्व के कट्टरपंथी धार्मिक देशों से तो नहीं जुड़े थे इसलिये ही यहां धर्मनिरपेक्षता का ढोल पीट रहे थे ताकि वहां के शिखर पुरुष खुश हों और उनका काम चलता रहे।
वैसे अब तो यह हालत हो गयी है कि टीवी चैनल रोज घोटालों की चर्चा इस तरह करते हैं जैसे कि उनकी खोज हो पर सच तो यह है कि राज्य की ऐजेंसियों का ही काम है जो वह कर रही हैं। एक अच्छी छवि वाले एक उद्योगपति ने इसी मीडिया से कहा कि‘‘ आप जिन घोटालों की चर्चा कर रहे हैं वह आपने नहीं खोजे, सच तो यह है कि देश में खोजी पत्रकारिता नाममात्र की भी नहीं है इसलिये ही यह सब हो रहा है। घोटाले का पता होने पर सब हाथ ताप रहे हैं पर उनकी खोज किसने की है यह भी देखना चाहिए।’’
यह चैनल खोजी पत्रकारिता क्या करेंगे? समाचारों के नाम पर निजी प्रचार का घोटाला वहां रोज देखा जा सकता है। खबर केवल बड़े आदमी की चाहिए? बदनामी बड़े के चाहिए। गरीब मर जाये या लाचार होकर सड़क पर मिले तभी उनको उस पर व्यवसायिक दया आती है। जहां तक खोजी पत्रकारिता कर घोटाले खोजने का काम है यकीनन कौन चैनल का कौन आदमी अपनी नौकरी खोना चाहेगा?
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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साधू, शैतान और इन्टरनेट-हिंदी हास्य व्यंग्य कविता


शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक
और कहा
‘महाराज क्या ध्यान लगाते हो
भगवान के दिए शरीर को क्यों सुखाते हो
लो लाया हूँ टीवी मजे से देखो
कभी गाने तो कभी नृत्य देखो
इस दुनिया को भगवान् ने बनाया
चलाता तो मैं हूँ
इस सच से भला मुहँ क्यों छुपाते हो’

साधू ने नही सुना
शैतान चला गया
पर कभी फ्रिज तो कभी एसी ले आया
साधू ने कभी उस पर अपना मन नहीं ललचाया
एक दिन शैतान लाया कंप्यूटर
और बोला
‘महाराज यह तो काम की चीज है
इसे ही रख लो
अपने ध्यान और योग का काम
इसमें ही दर्ज कर लो
लोगों के बहुत काम आयेगा
आपको कुछ देने की मेरी
इच्छा भी पूर्ण होगी
आपका परोपकार का भी
लक्ष्य पूरा हो जायेगा
मेरा विचार सत्य है
इसमें नहीं मेरी कोई माया’

साधू ने इनकार करते हुए कहा
‘मैं तुझे जानता हूँ
कल तू इन्टरनेट कनेक्शन ले आयेगा
और छद्म नाम की किसी सुन्दरी से
चैट करने को उकसायेगा
मैं जानता हूँ तेरी माया’

शैतान एकदम उनके पाँव में गिर गया और बोला
‘महाराज, वाकई आप ज्ञानी और
ध्यानी हो
मैं यही करने वाला था
सबसे बड़ा इन्टरनेट तो आपके पास है
मैं इसलिये आपको कभी नहीं जीत पाया’
साधू उसकी बात सुनकर केवल मुस्कराया

विरह का दर्द और हास्य का जाल-हिन्दी हास्य कविता (virah ka dard aur hasya ka jaal-hindi hasya kavita)


पुरानी प्रेमिका मिली अपने
पुराने प्रेमी कवि से बहुत दिनों बाद
और बोली,
‘कहो क्या हाल हैं,
तुम्हारी कविताओं की कैसी चाल है,
सुना है तुम मेरी याद में
विरह गीत लिखते थे,
तुम पर सड़े टमाटर और फिंकते थे,
अच्छा हुआ तुमसे शादी नहीं की
वरना पछताती,
कितना बुरा होता जब बेस्वादी चटनी से
बुरे आमलेट ही जीवन बिताती,
तुम भी दुःखी दिखते हो
क्या बात है,
पिचक गये तुम्हारे दोनों गाल हैं,
मेरी याद में विरह गीत लिखते तुम्हारा
इतना बुरा क्यों हाल है।’
सुनकर कवि बोला
‘तुमसे विरह होना अच्छा ही रहा था,
उस पर मेरा हर शेर हर मंच पर बहा था,
मगर अब समय बदल गया है,
कन्या भ्रुण हत्याओं ने कर दिया संकट खड़ा,
लड़कियों की हो गयी कमी
हर नवयुवक इश्क की तलाश में परेशन है बड़ा,
जिनकी जेब भरी हुई है
वह कई जगह साथ एक जगह जुगाड़ लगाते हैं,
जिनके पास नहीं है खर्च करने को
वह केवल आहें भर कर रह जाते हैं,
विरह गीतों का भी हाल बुरा है,
हर कोई सफल कवि हास्य से जुड़ा है,
इश्क हो गयी है बाज़ार में बिकने की चीज,
पैसा है तो करने में लगता है लज़ीज,
एक से विरह हो जाने से कौन रोता है,
दौलत पर इश्क यूं ही फिदा होता है,
दिल से नहीं होते इश्क कि टूटने पर कोई हैरान हो,
कल दूसरे से टांका भिड़ जाता है
फिर क्यों कोई विरह गीत सुनने के लिये परेशान हो,
जिन्होंने बस आहें भरी हैं
उनको भी इश्क पर हास्य कविता
सुनने में मजा आता है,
आशिक माशुकाओं का खिल्ली उड़ाने में
उनका दिल खिल जाता है,
कन्या भ्रुण हत्याओं ने कर दिया कचड़ा समाज का,
इश्क पर फिल्में बने या गीत लिखे जा रहे ज्यादा
मगर तरस रहा इसके लिये आम लड़का आज का,
तुम्हारे विरह का दर्द तो अभी अंदर है
मगर उस पर छाया अब हास्य रस का जाल है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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साभार समाचार प्रस्तुति-हिन्दी व्यंग्य (sabhar samachar prustuti-hindi vyangya)


धरती पर विचरने वाला सौर मंडल! कल जब इस विषय पर लेख लिखा था तब यह स्वयं को ही समझ में नहीं आ रहा था कि यह चिंत्तन है कि व्यंग्य! हमें लगने लगा कि यह किसी की समझ में नहीं आयेगा, क्योंकि उस समय दिमाग सोचने पर अधिक काम कर रहा था लिखने में कम! मगर ऐसे में उस पर आई एक टिप्पणी से यह साफ हो गया कि जिन लोगों के लिये लिखा गया उनको समझ में आ गया।
मुश्किल यह है कि चिंत्तन लिखने बैठते हैं तब किसी विषय पर तीव्र कटाक्ष करने की इच्छा होती है, तब कुछ न कुछ व्यंग्यात्मक हो ही जाता है। जब व्यंग्य लिखने बैठते हैं तो अपने विषय से संबंधित कुछ गंभीर चर्चा हो ही जाती है और वह चिंत्तन दिखने लगता है।
ब्लाग पर लिखते हुए पहले हम यह सोचते थे कि दोनों भाव एक साथ न लायें पर जब समाचार चैनलों को समाचार से अधिक खेल, हास्य तथा मनोरंजन से संबंधित अन्य चैनलों की सामग्री प्रसारित करते देखते हैं तो सोचते हैं क्यों न दोनों ही विद्यायें एक साथ चलने दी जायें। हम उनकी तरह धन तो नहीं कमा सकते पर उनकी शैली अपनाने में क्या बुराई है? इधर अमेरिका के राष्ट्रपति का भारत आगमन क्या हुआ? सारे चैनलों के लिये यही एक खबर बन गयी है। कब किधर जा रहे हैं, आ रहे हैं और खा रहे हैं, यह हर पल बताया जा रहा है। ऐसा लगता है कि बाकी पूरा देश ठहर गया है, कहीं सनसनी नहीं फैल रही। कहीं हास्य नहंी हो रहा है। कहीं खेल नहीं चल रहा है।
हैरानी होती है जिस क्रिकेट से यही प्रचार माध्यम अपनी सामग्री जुटा रहे थे उसके टेस्ट मैच-यह भारत और न्यूजीलैंड के बीच अहमदाबाद में चल रहा है-की खबर से मुंह फेरे बैठे हैं। कल इनका कथित महानायक या भगवान चालीस रन बनाकर आउट हो गया जबकि यह उससे पचासवें शतक की आशा कर रहे थे। हो सकता है कि उस महानायक या भगवान ने सोचा हो कि क्यों इनके अस्थाई भगवान यानि अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने खड़ा होकर धर्मसंकट खड़ा किया जाये। इस धरती पर विचरने वाले सौर मंडल-पूंजीपति, धार्मिक ठेकेदार, अराजक तत्व तथा उनके दलाल-के लिये स्वर्ग है अमेरिका। वैश्वीकरण ने पूरी दुनियां को एक राष्ट्र बना दिया है अमेरिका! इसलिये अमेरिका के राष्ट्रपति को अब विश्व का दबंग कहकर प्रचारित किया जा रहा है। बाकी राष्ट्रों के प्रमुख क्या हैं, यह वही जाने और उनके प्रचार माध्यम! ऐसे में क्रिकेट के भगवान या महानायक ने चालीस रन पर अपनी पारी निपटाकर प्रचार माध्यमों को संकट से बचा लिया। अगर वह शतक बनाता तो संभव है टीवी चैनल और अखबार में संकट पैदा हो जाता कि किसको उस दिन का महानायक बनाया जाये। अपनी खबर को अगले मैचों तक के लिये रोक कर उसने प्रचार माध्यमों को धर्मसंकट से बचा लिया। ख् वह पचासवां शतक नहीं बना सके-इस खबर से ऐसा लगता है कि जैसे नब्बे तक पहुंच गये थे, पर वह तो चालीस रन बनाकर आउट हो गया। इस तरह इन भोंपूओं ने सारी दुनियां में धरती पर विचरने वाले सौर मंडल को बताया कि देखो कैसे क्रिकेट के भगवान या महानायक ने अपनी वफादारी निभाई।
जिस पूंजीवाद को हम रोते हैं वह अब चरम पर है। अब तो ऐसा लगता है कि विश्व के अनेक विकासशील देशों के राष्ट्रप्रमुख अपने लिये अमेरिका को ही संरक्षक मानने लगे हैं। यही कारण है कि पूंजी के बल पर चलने वाले प्रचार माध्यम भले ही चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका जनाभिमुख होने का होने का दावा करें पर यह सच नहीं है। वह अपने समाचार और विषय जनता पर थोप रहे हैं। कम से कम भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को लेकर जनमानस इतना उत्साहित नहीं है जितना समाचार चैनल उसे दिखा रहे हैं। इस समय देश में दीपावली का पर्व की धूम है। इधर अमेरिका का भव्य विमान भारत में उतर रहा था भारत में लोग तब फटाखे फोड़ने और मिठाई खाने में लोग व्यस्त थे। फिर भाईदूज का दिन भी है जब लोग अपने घरों से इधर उधर जाते और आते हैं। ऐसा लगता है कि यह यात्रा कार्यक्रम ही इस तरह बनाया गया कि भारत के लोग घरों में होंगे तो उन पर अपने महानायक का प्रचार थोपा जायेगा। हालांकि अनेक मनोरंजन और धार्मिक चैनलों के चलते यह संभव नहीं रहा कि कोई एक प्रकार के चैनल अपना कार्यक्रम थोप ले पर समाचारों में दिलचस्पी रखने वालों की संख्या कम नहीं है और अंततः उनको एक कम महत्व का समाचार बार बार देखना पड़ा।
समाचार पत्र पत्रिकाऐं, टीवी चैनल और रेडियो इनको एक प्रकार से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। पहले केवल प्रकाशन पत्रकारिता को ही चौथा स्तंभ माना जाता था पर अब आधुनिक तकनीकी के उपयोग के चलते बाकी अन्य दोनों माध्यमों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। समाचार चैनलों के कार्यकर्ता यह कहते है कि लोग इसी तरह के कार्यक्रम पसंद कर रहे हैं पर उन्हें यह पता होना चाहिए कि वह अपने मनोरंजन कार्यक्रमों को समाचारों की आड़ में थोप रहे हैं। इतना ही नहीं समाचारों के नाम पर भी अब अपने नायक बनाने लगे हैं। कभी फिल्म तो कभी क्रिकेट तो कभी टीवी धारावाहिकों से जुड़े लोगों को अनावश्यक प्रचार देने लगते हैं।
यह देश के समाचार चैनलों के लिये ही चिंताजनक है कि आम जनमानस में उनको एक समाचार चैनल की तरह नहीं बल्कि मनोरंजन कार्यक्रमों के नाम पर ही जाना जा रहा है। इन चैनलों की छबि भारत में नहीं बल्कि बाहर भी खराब हो गयी है। अगर ऐसा न होता तो ओबामा बराक हुसैन के भारत दौरे में मुंबई के कार्यक्रमों में उनको दूर नहीं रखा जाता। याद रखिये वहां के कार्यक्रमों में केवल दिल्ली दूरदर्शन को ही आने का अवसर मिला। क्या कभी अमेरिका के राष्ट्रपति की यात्रा के दौरन किसी पश्चिमी देश में भी ऐसा होता है कि वहां के समाचार चैनलों में किसी एक को ही ऐसा अवसर मिलता हो। यहां हम देखें तो अपने देश के समाचार चैनल संभव है कि विदेशी समाचार चैनलों से अधिक कमा रहे हों पर उनकी वैसी छबि नहीं है। इसका कारण यह है कि एक समाचार चैनल के नाते उनको जनमानस से सहानुभूति नहीं मिलती और जो उन्होंने खुद ही खोई है। वरना क्या वजह है कि दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर दावा करने वाले अनेक समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों की ऐसी उपेक्षा की गयी और वह भी दुनियां के सबसे महान लोकतांत्रिक देश होने का दावा करने वाले अमेरिका के रणनीतिकारों के कम कमलों से। बहरहाल यह तय है कि धरती पर विचरने वाले सौर मंडल के सूर्य कहे जाने पूंजीपतियों का उनको वरदहस्त बराबर मिलेगा क्योंकि उनके महानायक को वैसा ही प्रचार दिया जिसकी चाहत थी। यह पहला अवसर था कि जब कोई समाचार चैनल यह दावा नहीं कर रहा था कि यह सीधा प्रसारण आप हमारे ही चैनल पर देख रहे हैं। सभी ने दूरदर्शन से साभार कार्यक्रम लिया।
एक बुद्धिमान आज सब्जी खरीद रहे थे। पास में उनके एक मित्र आ गये। उन्होंने बुद्धिमान महाशय से कहा-‘आज ओबामा जी का क्या कार्यक्र्रम है? कहंी पढ़ा या सुना था। हमारे यहां तो सुबह से लाईट नहीं थी।’
बुद्धिमान महाशय ने कहा-‘क्या खाक देखते? हमारी भी लाईट सुबह से नहीं है। पता नहीं ओबामा का आज क्या कार्यक्रम है?
सब्जी वाले ने बीच में हस्तक्षेप किया‘यह आप लोग लाईट न होने से किसकी बात कर रहे हो।’
बुद्धिमान ने कहा-‘तू चुपचाप सब्जी बेच, ऐसे समाचार सुनना और देखना हमारे जैसे फालतू लोगों का काम है या कहो मज़बूरी है।’
मित्र ने अपना सिर हिलाया और बोला-‘हां, यह बात सही है।
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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

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