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खिचड़ी खबरनामा-हिन्दी हास्य व्यंग्य (khichdi khabarnama-hindi hasya vyangya


उस क्रिकेट माडल ने टीवी वाले पत्रकारों के साथ बदतमीजी की। यह खबर भी टीवी चैनल वालों ने दी हैं। क्रिकेट माडल यानि वह खिलाड़ी जो खेलने के साथ ही विज्ञापन में भी करते हैं। अब टीवी चैनल वाले उस पर शोर मचा रहे हैं कि उसने ऐसा क्यों किया?’
अब उनका यह प्रलाप भी उस तरह प्रायोजित है जैसा कि उनके समाचार या वास्तव में ही वह दुःखी हैं, कहना कठिन हैं। एक जिज्ञासु होने के नाते समाचारों में हमारी दिलचस्पी है पर टीवी समाचार चैनल वाले समाचार दिखाते ही कहां हैं?
इस मामले में उन पर उंगली भी कोई नहीं उठाता। कहते हैं कि हमारा चैनल समाचारों के लिये बना है। टी.आर.पी रैटिंग में अपने नंबरों के उनके दावे भी होते हैं। इस पर आपत्ति भी नहीं की जानी चाहिये पर मुद्दा यह है कि उनको यह सम्मान समाचार के लिये नहीं बल्कि मनोंरजन के लिये मिलता है ऐसे में जो चैनल केवल समाचार देते हैं उनका हक मारा जाता है। सच तो यह है कि अनेक समाचार चैनल तो केवल मनोरंजन ही परोस रहे हैं पर अपनी रेटिंग के लिये वह समाचार चैनल की पदवी ओढ़े रहते है। अगर ईमानदारी से ऐसे मनोरंजन समाचार चैनल का सही आंकलन किया जाये तो उनको पूर्णतः समाचार और मनोरंजन चैनलों के मुकाबले कोई स्थान ही नहीं मिल सकता। अलबत्ता यह खिचड़ी चैनल है और उनके लिये कोई अलग से रैटिंग की व्यवस्था होना चाहिए।
जिस क्रिकेट माडल ने उनको फटकारा वह खिचड़ी चैनलों के चहेतोें में एक है। अपने इन मनोरंजक समाचार चैनलों के पास फिल्मी अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और क्रिकेट खिलाड़ियों के जन्म दिनों का पूरा चिट्ठा है। जिसका वह रोज उपयोग करते हैं। उस दिन जन्म दिन वाला फिल्मी और क्रिकेट माडल तो संभवतः इतना बिजी रहता होगा कि वह शायद ही उनके प्रसारण देख पाता हो। इससे भी मन नहीं भरता तो प्रायोजित इश्क भी करवा देते हैं-समाचार देखकर तो यही लगता है कि कभी किसी अभिनेत्री को क्रिकेट खिलाड़ी से तो कभी अभिनेता से इश्क करवाकर उसका समाचार चटखारे लेकर सुनाते हैं।
यह मनोरंजक समाचार चैनल जो खिचड़ी प्रस्तुत करते हैं वह प्रायोजित लगती है। अब भले ही उस क्रिकेट माडल ने टीवी पत्रकार को फटकारा हो पर उसका प्रतिकार करने की क्षमता किसी में नहीं है। वजह टीवी चैनल और क्रिकेट माडल के एक और दो नंबर के प्रायोजक एक ही हैं। अगर चैनल वाले गुस्से में उसे दिखाना बंद कर दें या उसकी खिचड़ी लीलाओं-क्रिकेट से अलग की क्रियाओं- का बहिष्कार करें तो प्रायोजक नाराज होगा कि तुम हमारे माडल को नहीं दिखा रहे काहे का विज्ञापन? उसका प्रचार करो ताकि उसके द्वारा अभिनीत विज्ञापन फिल्मों के हमारे उत्पाद बाजार में बिक सकें।
खिलाड़ी स्वयं भी नाराज हो सकता है कि जब मेरी खिचड़ी गतिविधियों-इश्क और जन्मदिन कार्यक्रम- का प्रसारण नहीं कर रहे तो काहे का साक्षात्कार? कहीं उसके संगी साथी ही अपने साथी के बहिष्कार का प्रतिकार उसी रूप में करने लगे तो बस हो गया खिचड़ी चैनलों का काम? साठ मिनट में से पचास मिनट तक का समय इन अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और क्रिकेट खिलाड़ियों की खिचड़ी गतिविधियों के कारण ही इन चैनलों का समय पास होता है। अगर आप इन चैनल वालों से कहें कि इस तरह के समाचार क्यों दे रहे हैं तो यही कहेंगे कि ‘दर्शक ऐसा हीं चाहते हैं’। अब इनसे कौन कहे कि ‘तो ठीक है तो अपने आपको समाचार की बजाय मनोरंजन चैनल के रूप में पंजीकृत क्यों नहीं कराते।’
हो सकता है कि यह कहें कि इससे उनको दर्शक कम मिलेंगे क्योंकि अधिकतर समाचार जिज्ञासु फिर धोखे में नहीं फंसेंगे न! मगर इनके कहने का कोई मतलब नहीं है क्योकि सभी जानते हैं कि यह चैनल दर्शकों की कम अपने प्रायोजकों को की अधिक सोचते हैं। यह उनका मुकाबला यूं भी नहीं कर सकते क्योंकि जो इनके सामने जाकर अपमानित होते हैं वह पत्रकार सामान्य होते हैं। उनमें इतना माद्दा नहीं होता कि वह इनका प्रतिकार करें। उनके प्रबंधक तो उनके अपमान की चिंता करने से रहे क्योंकि उनको अपने प्रायोजक स्वामियों का पता है जो कि इन फिल्म और खेलों के माडलों के भी स्वामी है।
वैसे आजकल तो फिल्म वाले क्रिकेट पर भी हावी होते जा रहे हैं। पहले फिल्म अभिनेत्रियां अपने प्रचार के लिये कोई क्रिकेट खिलाड़ी से इश्क का नाटक रचती थीं पर वह तो अब टीम ही खरीदने लगी हैं जिसमें एक नहीं चैदह खिलाड़ी होते हैं और उनकी मालकिन होने से प्रचार वैसे ही मिल जाता है। क्रिकेट, फिल्म और समाचार की यह खिचड़ी रूपरेखा केवल आम आदमी से पैसा वसूलने के लिये बनी हैं।
क्रिकेट खिलाड़ी और फिल्म अभिनेता अभिनेत्रियां करोड़ों रुपये कमा रहे हैं और उसका अहंकार उनमें आना स्वाभाविक है। उनके सामने दो लाख या तीन लाख माहवार कमाने वाले पत्रकार की भी कोई हैसियत नहीं है ओर फिर उनको यह भी पता है कि अगर इन छोटे पत्रकारों को फटकार दिया तो क्या बिगड़ने वाला है? उनके प्रबंधक भी तो उसी प्रायोजित धनसागर में पानी भरते हैं जहां से हम पीते हैं।
इधर हम सुनते आ रहे हैं कि विदेशों में एक चैनल के संवाददाता ने अपनी सनसनी खेज खबरों के लिये अनेक हत्यायें करा दी। हमारे देश में ऐसा हादसा होना संभव नहीं है पर समाचारों की खिचड़ी पकाने के लिये चालबाजियां संभव हैं क्योंकि उनमें कोई अपराधिक कृत्य नहीं होता। इसलिये लगता है जब कोई खेल या फिल्म की खबर नहीं जम रही हो तो यह संभव है कि किसी प्रायोजक या उसके प्रबंधक से कहलाकर फिल्मी और क्रिकेट माडल से ऐसा व्यवहार कराया जाये जिससे सनसनी फैले। हमारे देश के संचार माध्यमों के कार्यकर्ता पश्चिम की राह पर ही चलते हैं और यह खिचड़ी पकाई गयी कि फिक्स की गयी पता नहीं।
अब यह तो विश्वास की बात हो गयी। वैसे अधिकतर टीवी पत्रकार आम मध्यमवर्गीय होते हैं उनके लिये यह संभव नहीं है कि स्वयं ऐसी योजनायें बनाकर उस पर अमल करें अलबता उनके पीछे जो घाघ लोग हैं उनके लिये ऐसी योजनायें बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। यही कारण है कि खिचड़ी समाचार ही पूर्ण समाचार का दर्जा पाता है।
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‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

ब्लॉग पर लिखा गया भी साहित्य है-हिन्दी आलेख (Literature written on the blog – the Hindi article)


हिंदी की विकास यात्रा नहीं रुकेगी। लिखने वालों का लिखा बना रहेगा भले ही वह मिट जायें। पिछले दिनों कुछ दिलचस्प चर्चायें सामने आयीं। हिंदी के एक लेखक महोदय प्रकाशकों से बहुत नाखुश थे पर फिर भी उन्हें ब्लाग में हिंदी का भविष्य नहीं दिखाई दिया। अंतर्जाल लेखकों को अभी भी शायद इस देश के सामान्य लेखकों और प्रकाशकों की मानसिकता का अहसास नहीं है यही कारण है कि वह अपनी स्वयं का लेखकीय स्वाभिमान भूलकर उन लेखकों के वक्तव्यों का विरोध करते हुए भी उनके जाल में फंस जाते हैं।
एक प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या ब्लाग पर लिखा गया साहित्य है? जवाब तो कोई नहीं देता बल्कि उलझ कर सभी ऐसे मानसिक अंतद्वंद्व में फंस जाते हैं जहां केवल कुंठा पैदा होती है। हमारे सामने इस प्रश्न का उत्तर एक प्रति प्रश्न ही है कि ‘ब्लाग पर लिखा गया आखिर साहित्य क्यों नहीं है?’

जिनको लगता है कि ब्लाग पर लिखा गया साहित्य नहीं है उनको इस प्रश्न का उत्तर ही ढूंढना चाहिए। पहले गैरअंतर्जाल लेखकों की चर्चा कर लें। वह आज भी प्रकाशकों का मूंह जोहते हैं। उसी को लेकर शिकायत करते हैं। उनकी शिकायतें अनंतकाल तक चलने वाली है और अगर आज के समय में आप अपने लेखकीय कर्म की स्वतंत्र और मौलिक अभिव्यक्ति चाहते हैं तो अंतर्जाल पर लिखने के अलावा कोई चारा नहीं है। वरना लिफाफे लिख लिखकर भेजते रहिये। एकाध कभी छप गयी तो फिर उसे दिखा दिखाकर अपना प्रचार करिये वरना तो झेलते रहिये दर्द अपने लेखक होने का।
उस लेखक ने कहा-‘ब्लाग से कोई आशा नहीं है। वहां पढ़ते ही कितने लोग हैं?
वह स्वयं एक व्यवसायिक संस्थान में काम करते हैं। उन्होंने इतनी कवितायें लिखी हैं कि उनको साक्षात्कार के समय सुनाने के लिये एक भी याद नहीं आयी-इस पाठ का लेखक भी इसी तरह का ही है। अगर वह लेखक सामने होते तो उनसे पूछते कि ‘आप पढ़े तो गये पर याद आपको कितने लोग करते हैं?’
अगर ब्लाग की बात करें तो पहले इस बात को समझ लें कि हम कंप्यूटर पर काम कर रहे हैं उसका नामकरण केल्कूलेटर, रजिस्टर, टेबल, पेन अल्मारी और मशीन के शब्दों को जोड़कर किया गया है। मतलब यह है कि इसमें वह सब चीजें शामिल हैं जिनका हम लिखते समय उपयोग करते हैं। अंतर इतना हो सकता है कि अधिकतर लेखक हाथ से स्वयं लिखते हैं पर टंकित अन्य व्यक्ति करता है और वह उनके लिये एक टंकक भर होता है। कुछ लेखक ऐसे भी हैं जो स्वयं टाईप करते हैं और उनके लिये यह अंतर्जाल एक बहुत बड़ा अवसर लाया है। स्थापित लेखकों में संभवतः अनेक टाईप करना जानते हैं पर उनके लिये स्वयं यह काम करना छोटेपन का प्रतीक है। यही कारण है अंतर्जाल लेखक उनके लिये एक तुच्छ जीव हैं।
इस पाठ का लेखक कोई प्रसिद्ध लेखक नहीं है पर इसका उसे अफसोस नहीं है। दरअसल इसके अनेक कारण है। अधिकतर बड़े पत्र पत्रिकाओं के कार्यालय बड़े शहरों में है और उनके लिये छोटे शहरों में पाठक होते हैं लेखक नहीं। फिर डाक से भेजी गयी सामग्री का पता ही नहीं लगता कि पहुंची कि नहीं। दूसरी बात यह है अंतर्जाल पर काम करना अभी स्थापित लोगों के लिये तुच्छ काम है और बड़े अखबारों को सामगं्री ईमेल से भी भेजी जाये तो उनको संपादकगण स्वयं देखते हों इसकी संभावना कम ही लगती है। ऐसे में उनको वह सामग्री मिलती भी है कि नहीं या फिर वह समझते हैं कि अंतर्जाल पर भेजकर लेखक अपना बड़प्पन दिखा रहा इसलिये उसको भाव मत दो। एक मजेदार चीज है कि अधिकतर बड़े अखबारों के ईमेल के पते भी नहीं छापते जहां उनको सामग्री भेजी जा सके। यह शिकायत नहीं है। हरेक की अपनी सीमाऐं होती हैं पर छोटे लेखकों के लिये प्रकाशन की सीमायें तो अधिक संकुचित हैं और ऐसे में उसके लिये अंतर्जाल पर ही एक संभावना बनती है।
इससे भी हटकर एक बात दूसरी है कि अंतर्जाल पर वैसी रचनायें नहीं चल सकती जैसे कि प्रकाशन में होती हैं। यहां संक्षिप्तीकरण होना चाहिये। मुख्य बात यह है कि हम अपनी लिखें। जहां तक हिट या फ्लाप होने का सवाल है तो यहां एक छोटी कहानी और कविता भी आपको अमरत्व दिला सकती है। हर कविता या कहानी तो किसी भी लेखक की भी हिट नहीं होती। बड़े बड़े लेखक भी हमेशा ऐसा नहीं कर पाते।
एक लेखिका ने एक लेखक से कहा-‘आपको कोई संपादक जानता हो तो कृपया उससे मेरी रचनायें प्रकाशित करने का आग्रह करें।’
उस लेखक ने कहा-‘पहले एक संपादक को जानता था पर पता नहीं वह कहां चला गया है। आप तो रचनायें भेज दीजिये।’
उस लेखिका ने कहा कि -‘ऐसे तो बहुत सारी रचनायें भेजती हूं। एक छपी पर उसके बाद कोई स्थान हीं नहीं मिला।‘
उस लेखक ने कहा-‘तो अंतर्जाल पर लिखिये।’
लेखिका ने कहा-‘वहां कौन पढ़ता है? वहां मजा नहीं आयेगा।
लेखक ने पूछा-‘आपको टाईप करना आता है।’
लेखिका ने नकारात्मक जवाब दिया तो लेखक ने कहा-‘जब आपको टाईप ही नहीं करना आता तो फिर अंतर्जाल पर लिखने की बात आप सोच भी कैसे सकती हैं?’
लेखिका ने कहा-‘वह तो किसी से टाईप करवा लूंगी पर वहां मजा नहीं आयेगा। वहां कितने लोग मुझे जान पायेंगे।’
लेखन के सहारे अपनी पहचान शीघ्र नहीं ढूंढी जा सकती। आप अगर शहर के अखबार में निरंतर छप भी रहे हैं तो इस बात का दावा नहीं कर सकते कि सभी लोग आपको जानते हैं। ऐसे में अंतर्जाल पर जैसा स्वतंत्र और मौलिक लेखन बेहतर ढंग से किया जा सकता है और उसका सही मतलब वही लेखक जानते हैं जो सामान्य प्रकाशन में भी लिखते रहे हैं।
सच बात तो यह है कि ब्लाग लिखने के लिये तकनीकी ज्ञान का होना आवश्यक है और स्थापित लेखक इससे बचने के लिये ऐसे ही बयान देते हैं। वैसे जिस तरह अंतर्जाल पर लेखक आ रहे हैं उससे पुराने लेखकों की नींद हराम भी है। वजह यह है कि अभी तक प्रकाशन की बाध्यताओं के आगे घुटने टेक चुके लेखकों के लिये अब यह संभव नहीं है कि वह लीक से हटकर लिखें।
इधर अंतर्जाल पर कुछ लेखकों ने इस बात का आभास तो दे ही दिया है कि वह आगे गजब का लिखने वाले हैं। सम सामयिक विषयों पर अनेक लेखकों ने ऐसे विचार व्यक्त किये जो सामान्य प्रकाशनों में स्थान पा ही नहीं सकते। भले ही अनेक प्रतिष्ठत ब्लाग लेखक यहां हो रही बहसें निरर्थक समझते हों पर यह लेखक नहीं मानता। मुख्य बात यह है कि ब्लाग लेखक आपस में बहस कर सकते हैं और आम लेखक इससे बिदकता है। जिसे लोग झगड़ा कह रहे हैं वह संवाद की आक्रामक अभिव्यक्ति है जिससे हिंदी लेखक अभी तक नहीं समझ पाये। हां, जब व्यक्तिगत रूप से आक्षेप करते हुए नाम लेकर पाठ लिखे जाते हैं तब निराशा हो जाती है। यही एक कमी है जिससे अंतर्जाल लेखकों को बचना चाहिये। वह इस बात पर यकीन करें कि उनका लिखा साहित्य ही है। क्लिष्ट शब्दों का उपयोग, सामान्य बात को लच्छेदार वाक्य बनाकर कहना या बड़े लोगों पर ही व्यंग्य लिखना साहित्य नहीं होता। सहजता पूर्वक बिना लाग लपेटे के अपनी बात कहना भी उतना ही साहित्य होता है। शेष फिर कभी।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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सम्मान की न सोचो तो ही रचना कर्म संभव-आलेख (samman se pare hokar he rachna sanbhav-hindi lekh)


अगर किसी व्यक्ति ने अपना जीवन का श्रमिक के रूप में प्रारंभ किया हो और फिर लेखक भी बना हो तो उसके लिये इस देश में चल रही बहसों पर लिखने के लिये अनेक विषय स्वतः उपलब्ध हो जाते हैं। बस! उसे अपने लेखन से किसी प्रकार की आर्थिक उपलब्धि या कागजी सम्मान की बात बिल्कुल नहीं सोचना चाहिये। वैसे यह जरूरी नहीं है कि सभी लेखक कोई आरामगाह में पैदा होते हैं बस अंतर इतना यह है कि कुछ लोग ही अपने संघर्षों से कुछ सीख पाते हैं और उनमें भी बहुत कम उसे अपनी स्मृति में संजोकर उसे समय पड़ने पर अभिव्यक्त करते हैं।
इस समय देश में टीवी धारावाहिको और इंटरनेट की यौन सामग्री से सुसज्जित वेबसाईटों पर जमकर बहस चल रही है। इस देश में बुद्धिजीवियों की दो विचाराधारायें हैं। इनमें एक तो वह है जो मजदूरों और गरीबों को भला करने के के लिये पूंजीपतियों पर नियंत्रण चाहती है दूसरी वह है जो उदारीकरण का पक्ष लेती है। यह उदारीकरण वाली विचाराधारा के लोग संस्कृति संस्कार प्रिय भी हैं। वैसे तो दोनों विचारधाराओं के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है पर दोनों एक मामले में सहमत हैं वह है राज्य से नियंत्रण की चाहत।
इंटरनेट पर सविता भाभी बैन हुई। दोनों विचाराधाराओं के लोग एकमत हो गये। इसका कारण यह था कि एक तो सविता भाभी देशी नाम था और उससे ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी भारतीय नारी के नाम का दोहन हो रहा है। पहली विचारधारा वालों को उससे कोई लेनादेना नहीं था क्योंकि उनका तो केवल पाश्चात्य विचारों और पात्रों पर नजर रखकर अपनी बात कहना ही लक्ष्य होता है। उदारीकरण और संस्कृति प्रिय बुद्धिजीवियों के लिये देशी और हिंदी नाम होने से सविता भाभी वेबसाईट पर प्रतिबंध लगना अच्छी बात रही।
आजकल सच का सामना चर्चा का विषय है। किसी काम को सोचना तब तक सच नहीं होता जब तक उसे किया न जाये। यही सोच सच के रूप में बिक रही है।
पता चला कि यह किसी ब्रिटिश और अमेरिकी धारावाहिकों की नकल है। वहां भाग लेने वाले पात्रों ने अपने राजफाश कर तहलका मचा दिया। इसी संबंध में लिखे एक पाठ पर इस लेखक को टिप्पणीकर्ता ने बताया कि ब्रिटेन में इस वजह से अनेक परिवार बर्बाद हो गये। उस सहृदय सज्जन ने बहुत अच्छी जानकारी दी। हमारा इस बारे में सोचना दूसरा है।
भारत और ब्रिटेन के समाज में बहुत बड़ा अंतर है। यह तो पता नहीं कि ब्रिटेन में कितना सोच बोला जाता है पर इतना तय है कि भारत में पैसे कमाने के लिये कोई कितना भी झूठ बोला जा सकता है-अगर वह सोचने तक ही सीमित है तो चाहे जितने झूठ बुलवा लो। इससे भी अलग एक मामला यह है कि अपने देश में ‘फिक्सिंग का खेल’ भी होता है। अभी एक अभिनेत्री के स्वयंबर मामले में एक चैनल ने स्टिंग आपरेशन किया था जिसमें एक भाग लेने वाले ने असलियत बयान की कि उसे पहले से ही तय कर बताया कि क्या कहना है?
अपने देश में एक मजेदार बात भी सामने आती है। वह यह है कि जिनका चरित्र अच्छा है तो बहुत है और जिनका नहीं है तो वह कहीं भी गिर सकते हैं। सच का सामना में भाग लेने वाले कोई मुफ्त में वहां नहीं जा रहे-याद रखिये इस देश में आदमी नाम तो चाहता है पर बदनामी से बहुत डरता है। हां, पैसे मिलने पर बदनाम होना भी नाम होने जैसा है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह एक व्यवसाय है। बस अंतर इतना है कि ठगी के मामले में कोई शिकायत करता है पर इसमें पैसा होने के कारण कोई शिकायत नहीं करता।
इन मामलों में बुद्धिजीवियों का अंर्तद्वंद्व देखने लायक है। दोनों विचाराधाराओं के बुद्धिजीवियों ने बस एक ही राह पकड़ी है कि प्रतिबंध लगाओ।
मजदूरों और गरीबों के लिये मसीहाई छबि रखने वालों का तो खैर ठीक है पर उदारवादियों का रवैया थोड़ा हैरान करने वाला है। यही उदारवादी देश मे अमेरिका और ब्रिटेन जैसे आर्थिक प्रारूप की मांग करते रहे हैं। उन्होंने सरकारी नियंत्रण का जमकर विरोध किया। धीरे धीरे सरकारी नियंत्रण कम होता चला गया और निजी क्षेत्र ने हर उस जगह अपना काम शुरु किया जहां आम आदमी की नजर जाती है। नतीजा सामने हैं! अगर समाचारों के लिये कोई सबसे बेहतर चैनल लोगों को लगता है तो वह दिल्ली दूरदर्शन!
देश के समाचार चैनल केवल विज्ञापन चैनल बन कर रह गये हैं जिनमें खबरें कम ही होती हैं। हिंदी फिल्म उद्योग बहुत बड़ा है और उसके लिये 365 दिन भी कम हैं। हर दिन किसी न किसी अभिनेता या अभिनेत्री का जन्म दिन होता है। फिर इतने अभिनेता और अभिनेत्रियां हैं कि उनके निजी संपर्क भी इन्हीं समाचारों में स्थान पाते हैं।
मुद्दे की बात तो यह है कि नियंत्रणवादी हो या उदारवादी व्यवस्था दोनों में अपने दोष और गुण हैं। नियंत्रणवादी व्यवस्था में कुछ बौद्धिक मध्यस्थों के द्वारा पूंजीपति समाज पर नियंत्रण स्थापित करते हैं तो उदारवादी में बौद्धिक मध्यस्थ उनका निजी कर्मचारी बन जाता है। दरअसल राज्य को सहज विचारधारा पर चलना चाहिये। यह सहज विचाराधारा अधिक लंबी नहीं है। राज्य को अपने यहां स्थित सभी समाजों पर नियंत्रण करना चाहिये पर उनकी आंतरिक गतिविधियों से परे रहना ही अच्छा है। पूंजीपतियों को व्यापार की हर तरह की छूट मिलना चाहिये पर आम आदमी को ठगने से भी बचाना राज्य का दायित्व है। व्यापार पर बाह्य निंयत्रण रखना जरूरी है पर उसमें आंतरिक दखल करना ठीक नहीं है।
दोनों ही विचारधारायें पश्चिम से आयातित हैं इसलिये आम भारतीय का सोच उनसे मेल नहीं खाता। सच बात तो यह है कि नारे और वाद की चाल से चलता यह देश दुनियां में कितना पिछड़ गया है यह हम सभी जानते और मानते हैं। इस देश की समस्या अब संस्कार, संस्कृति या धर्म बचाना नहीं बल्कि इस देश में इंसान एक आजाद इंसान की तरह जी सके इस बात की है। पूरे देश के समलैंगिक होने की बात करने वालों पर केवल हंसा ही जा सकता है। इस पर इतनी लंबी च ौड़ी बहस होती है कि लगता नहीं कि कोई अन्य समस्या है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस देश मेें लोग सच से भागते हैं और उसकी पर्दे पर ईमानदारी से अभिव्यक्ति करेंगे इसमें संदेह है।
दूसरी बात यह है कि आधी अधूरी विचाराधाराओं से व्यवस्थायें कहीं भी नहीं बनती। अगर नियंत्रणवादी हो तो पूरी तरह से सब राज्य के नियंत्रण में होना चाहिये। उदारवादी हैं तो फिर यह सब देखना पड़ेगा। सहज विचारधारा अभी किसी की समझ में नहीं आयेगी। हम इस पर लिखें भी तो बेकार लगता है। बुद्धिजीवियों के पूर्वाग्रहों को भी भला कोई मिटा सकता है। अमेरिका और ब्रिटेन की संस्कृति और संस्कारों का हम पर बहुत प्रभाव है और धीरे धीरे वह सभी बुराईयां यहां आ रही हैं जो वहां दिखती हैं। हां, हमें उनसे अधिक बुरे परिणाम भोगने पड़ेंगे। वजह यह कि पश्चिम वाले भौतिकता के अविष्कारक हैं और उसकी अच्छाईयों और बुराईयों को जानते हुए समायोजित करते हुए चलते हैं और हमारे यहां इस प्रकार के नियंत्रण की कमी है। शराब पश्चिम में भी पी जाती है पर वहां शराबी के नाम से कोई बदनाम नहीं होता क्योंकि उनके पीने का भी एक सलीका है। अपने यहां कोई नई चीज आयी नहीं कि उससे चिपट जाते हैं। उससे अलग तभी होते हैं जब कोई नई चीज न आ जाये। इसके अलावा पश्चिम में व्यायाम पर भी अधिक ध्यान दिया जाता है जिस पर हमारे लोग कम ही ध्यान देते हैं। ढेर सारी बुराईयों के बावजूद वहां हमारे देश से बड़ी आयु तक लोग जीते हैं वह भी अच्छे स्वास्थय के साथ। अपने यहां एक उम्र के बाद आदमी चिकित्सकों के द्वार पर चक्कर लगाने लगता है।
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अनंत शब्दयोग को ऐलेक्सा ने दिया आठवां नंबर-संपादकीय (anant shabdyog trafic rank 8)


यह दिलचस्प भी और अविश्वसनीय भी। अक्सर ब्लाग लेखक अपने ब्लाग के लिये ऐलेक्सा का प्रमाण देते हैं। इस लेखक ने भी वहां कई बार देखा है तो उसके ब्लाग हमेशा पिछड़े रहते हैं। मगर यह सबसे पुराना ब्लाग है ‘अनंत शब्दयोग’ जिसके बारे में एलेक्सा हमेशा कहता है कि इसके लिये डाटा उपलब्ध नहीं है। लेखक ने भी मान लिया कि उस पर बहुत लिखा जाता है इसलिये उसकी स्थिति यही हो सकती है। मगर ‘दीपक भारतदीप’ के नाम से सर्च करते हुए इस ब्लाग पर नजर पड़ी। वह वल्र्ड डोमेज से जुड़ा हुआ था। वहां खोलने पर पता लगा कि एलेक्सा में इसकी ट्रेफिक रैकिंग आठ है। लिंक 9 नंबर भी दिया था। जब एलेक्सा पर देखा गया तो फिर वही पुराना जवाब दिया गया।
बहरहाल हम यहां लिंक दे रहे हैं।

UrlTrends Quick Summary
URL: http://anantraj.blogspot.com

Google PageRank: 3/10
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ऐसा लगता है कि एलेक्सा बहुत ऊंची रैकिंग देता नहीं है या हम से ही कोई गलती हो गयी है। अलबत्ता हिंदी के ब्लाग लेखक लिखते हैं कि एक लाख की संख्या से अगर कोई नीचे हिंदी ब्लाग हो तो उसे भी अच्छा माना जाना चाहिये मगर यह तो दो अंकों से भी कम है। हम यहां दो लिंक दे रहे हैं। सुधि पाठक और ब्लाग लेखक इसे चेक करें। लेखक का यह दावा कतई नहीं है कि यह हिंदी का सबसे लोकप्रिय ब्लाग है क्योंकि इस अंतर्जाल की माया ही कुछ ऐसी है कि समझ में तो हमारे भी नहीं आती। बहरहाल यह आंकड़ा दिलचस्प है और इसे हम अपने मित्रों से ही बांट रहे हैं पर इस पर अभिभूत कतई नहीं है। अगर गलती हो जाये तो मजाक न बनायें यही अपेक्षा है। अगर यह सही है तो फिर लिखने लायक बहुत कुछ हमारे पास है वह भी लिख देंगे। नहीं तो यह पाठ यहां नहीं रहने देंगे। अपनी बेवकूफी कौन जगजाहिर करता है। यहां यह भी बता दें कि अभी हाल ही में एक पौर्न बेवसाईट को प्रतिबंधित किया गया था उसकी भी हमने एलेक्सा वाली रैकिंग एक जगह लिखी देखी थी 1124। ऐसे में इस ब्लाग की रैकिंग हमें चौंका सकती है।
http://www.urltrends.com/viewtrend.php?url=http%3A%2F%2Fanantraj.blogspot.com
वैसे हम उस ब्लाग शब्दलेख सारथी की भी जानकारी दे रहे हैं जिससे हम सबसे अधिक हिट समझते हैं पर ऐलेक्सा में उसकी रैकिंग 81,50,877 है और दोनों ही वेबसाईट उसे प्रमाणित कर रही है। एक सवाल यह भी है कि क्या ऐलेक्सा उच्च रैकिंग वाले ब्लाग की जानकारी स्वयं कोई नहीं देता और दूसरों को कैसे जाती हैं। बहरहाल विस्तृत जानकारी मिल जाये तो आगे कुछ लिखे।
UrlTrends Quick Summary
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Outgoing Links: 7
DMOZ Listed: No
Accurate as of: July 12th, 2009
Source: http://www.urltrends.com
http://www.urltrends.com/viewtrend.php?url=http%3A%2F%2Fdeepkraj.blogspot.com
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यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग ‘अनंत शब्दयोग’पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
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4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका

भटकाव-व्यंग्य कविता


कभी इधर लटका
कभी उधर अटका
परेशान मन देह को
लेकर जब भटका
तब आत्मा ने कहा
‘रे, मन क्यों तू देह
को हैरान किये जा रहा है
बुद्धि तो है खोटी
अहंकार में अपनी ही गा रहा है
सम्मान की चाह में
ठोकरें खा रहा है
लेकर सर्वशक्तिमान का नाम
क्यों नहीं बैठ जाता
मेरे से बात कर
मैं हूं इस देह को धारण करने वाली आत्मा’
सुन कर मन गुर्राया और बोला
‘मैं तो इस देह का मालिक हूं
जब तक यह जिंदा है
इसके साथ रहूंगा
यह वही करेगी जो
इससे मैं कहूंगा
तू अपनी ही मत हांक
पहले अपनी हालत पर झांक
मैं तो देह के साथ ही
हुआ था पैदा
शरण तू लेने आयी थी
इस देह में
मूझे भटकता देख मत रो
ओ! भटकती आत्मा।’

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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