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अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है-चार क्षणिकाएं


हादसों की खबर से अब
शहर सिहरता नहीं
अपने दर्द इतने भर लिये इंसानं ने
कि किसी अन्य की लाश  से हमदर्दी
जताने के लिये निकलता नहीं
कुछ लोग गिरा देते हैं लाशें
शायद कोई उनको देखकर चैंक जाये
जानते नहीं कि
कोई दूसरे को देखेगा तो तब
अब अपने से आगे देखने की
रौशनी और चाहत होगी
किसी की आंखों  में
अपने सामने कत्ल होते देखकर भी
आदमी अब सिहरता  नहीं
………………………..

शांति की बात सियारों से नहीं होती
पीठ पीछे वार करने वालों से
कभी वफादारी की उम्मीद नहीं होती
जो यकीन करते हैं उन पर
मुसीबत में किसी की भी
उनसे हमदर्दी नहीं होती
…………………

जख्म बांटना ही उनका काम है
इसलिये ही तो उनका नाम है
खंजर लेकर घूमने वालों से दोस्ती की
ख्वाहिश करते हैं कायर
क्योंकि घुटने टेकना ही रोज उनका काम है
………………………..
आग लगाना उनका काम है
मिलते उनको दाम है
कौन देता है कीमत
कौन खरीदता है लाशें
रौशनी जितनी तेज है इस शहर में
अंधेरे का राज है उतना ही गहरा
सच तो सब जानते हैं
पर अंधेरे मे तीर चलाना ही उनका काम है
………………………….

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क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना-हास्य व्यंग्य


ब्लागर अपने कंप्यूटर पर बैठा था कि उसकी पत्नी ने उसे दूसरे ब्लागर के मिलने की खबर अंदर आकर सुनायी। उसने कहा-‘बोल दो घर पर नहीं है।’

तब तक दूसरा ब्लागर अंदर आ गया और बोला-‘भाई साहब हमसे क्या नाराजगी है?’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘नाराजगी तुमसे नहीं है। तुम्हारी भाभीजी से है तुम्हें अंदर न बुलाकर हमें यह बताने आयीं हैं कि तुम आ गये हो। वैसे हमारी नजरें बहुत तेज हैं और हमने देख लिया था कि तुम अंदर आये हो।’

वह आकर उसके पास रखी कुर्सी पर बैठ गया और बोला-‘‘भाभीजी, आप मुझे शिकंजी पिलाईये। भाई साहब जरूर शिकंजी पीते हैं-ऐसा मेरा विश्वास है।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘पर यह बात हमने अपने किसी ब्लाग पर तो नहीं लिखी।’

दूसरा ब्लागर बोला-‘मैने अंदाजा कर लिया था। शिकंजी पीकर इंटरनेट पर ब्लाग पर अच्छी तरह लिखा जा सकता है।’

भद्र महिला चली गयी तो वह अपने असली रूप में आ गया और बोला-‘पर जरूरी नहीं है कि शिकंजी पीकर हर कोई ब्लाग पर अच्छा लिख सकता हो।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘हां इसमें कोई शक नहीं है, अगर वह कुछ लिखता हो तो?’
दूसरे ने ब्लागर ने कहा-‘हम पर फब्तियां कस रहे हो!
पहले ब्लागर ने कहा-‘‘और तुम क्या कर रहे थे?वैसे इधर कैसे भटक गये।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘‘मैं एक क्रिकेट प्रतियोगिता करा रहा हूं। जिसमें चार ब्लागर और चार कमेंटरों की टीमें हैं। मै चाहता हूं कि तुम उनके लिये कोई एक्शन सीन लिख दो।’

तब तक गृहिणी शिकंजी के ग्लास बनाकर लायी। उसने जब सुना कि कोई क्रिकेट के एक्शन सीन की बात हो रही है तो वह उत्सुकतावश वहीं एक तरफ बैठ गयी।
पहला ब्लागर-‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन? और इतने सारे ब्लागर और कमेंटर तुम्हारे पास आये कहां से? क्या कहीं से नीलामी में ले आये क्या?’

दूसरा ब्लागर अब गृहिण की उपस्थिति के आभास होने पर सम्मान के साथ बोला-‘अरे भाईसाहब, आप भी कैसी बात करते हो। अरे, आजकल वह समय गया। आप देख नहीं रहे कहां का खिलाड़ी कहां खेल रहा है। शहर का वासी हो या न हो तो पर उस शहर की तरफ से खेल तो सकता है। वैसे ही ब्लागर हो या न हो, कमेंटर हो या न हो और उसने कभी इंटरनेट खोला भी न हो पर हमने कह दिया कि ब्लागर तो ब्लागर। हमें अपने काम और कमाई से मतलब है।’
दूसरा ब्लागर उसे हैरानी से देखने लगा। फिर वह बोला-‘‘आप तो कुछ एक्शन सीन लिख दो। आजकल तो क्रिकेट के साथ एक्शन भी जरूरी है। किसी खिलाड़ी को किससे लड़वाना है। लड़ाई के लिये वह कौनसा शब्द बोले यह लिखना है। थप्पड़ या घूसा किस तरह मारे और दूसरे के जोर से लगता दिखे पर लगे नहीं इसलिये मैं ही एक्शन डायरेक्टर तो मैं ही रहूंगा पर यह तो कोई पटकथा लेखक ही तय कर सकता है। फिर उसके लिये कमेटी होगी तो उसमें बहस के डायलाग लिखवाना है। सजा का क्या हिसाब-किताब हो यह भी लिखना है। एक-दो खिलाड़ी ऐसे है जिनको एक दो मैच बाद बाहर बैठने के लिये राजी कर लिया है। उसके लिये तमाम तरह का प्रचार कराना है।

गृहिणी ने पूछा-‘पर यह किसलिये?’

वह बोला-‘अपने शहर की इज्जत बढ़ाने के लिये। देखिये हमारे शहर की कोई टीम नहीं बुला रहा। इसलिये मैं अपने शहर में क्रिकेट के खेल के विकास के लिये यह कर रहा हूं। स्थानीय मीडिया मेंे भी इसके लिये संपर्क साध रहा हूं ताकि अधिक से अधिक लोग वहां पहुंचे। और हां, इटरवैल में नाच गाने का भी इंतजाम किया है।’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मैने आज तक कोई नाटक नहीं लिखा।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘इसमे लिखने लायक है क्या? यह तो सब आसानी से हो जायेगा। बस थोड़ा सोचना भर है। मुझे अन्य व्यवस्थायें देखनीं नहंी होतीं तो मैं ही इस पर लिखता।’’

पहले ब्लागर ने कहा-‘‘मेरे बूते का नहीं है। जब झगड़ा कराना है तो उसके लिये कुछ ऐसा वैसा लिखना जरूरी है, और इस मामले में तुम जितने दक्ष हो मैं तो हो ही नहीं सकता।’

गृहिणी ने दूसरे ब्लागर की तरफ देखकर कहा-‘आपने तो सारे सीन पहले ही सोच लिये है। एकदम जोरदार कहानी लग रही है। बस आपको तो शब्द ही तो भरने हैं। अभी आप यह सीन बताकर जा रहे हैं यह तो उसे भी याद नहीं रख पायेंगे।फिर लिखेंगे कहां से? आप कोशिश करो तो अच्छा लिख लोगे।’
दोनो ने शिकंजी का ग्लास खत्म किया तो वह दोनों ग्लास उठाकर चली गयी । दूसरा ब्लागर बोला-‘‘ठीक है जब क्रिकेट मैच कराना है और उसमें एक्शन के सीन रखने हैं तो यह भी कर लेता हूं। देखो भाभीजी ने हमारा हौंसला बढ़ाया। एक तुम हो जब तब ऐसी वैसी बातें करते हो। भाभीजी बहुत भले ढंग से पेश आतीं हैं और तुम……………………छोड़ो अब तुमसे क्या कहूं

पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, पर याद रखना मैंने तुम्हारी उस तुम्हारी पहले और आखिरी कमेंट के बारे में उसे कुछ नहीं बताया। क्या इसके लिये मुझे धन्यवाद नहीं दोगे?
दूसरे ने कहा-‘‘अच्छा मैं चल रहा हूं। और हां, इस ब्लागर मीट पर भी कुछ अच्छा लिख देना ताकि मेरी प्रतियोगिता को प्रचार मिले। फिर देखो तुम्हें कैसे फ्लाप से हिट बनाता हूं।’

वह चला गया और गृहिण ने पूछा-‘‘क्या कहा उसने?’

पहले ब्लागर ने कहा-‘तुमने भी तो सुना! यही कहा‘क्रिकेट मैच के लिये एक्शन सीन लिख देना’।’’

फिर वह मन में सोचने लगा-‘मैने इस बार भी नहीं पूछा कि इंटरनेट पर बने ब्लाग पर मैं यह रिपोर्ट हास्य कविता के रूप में लिखूं या नहीं। चलो अगली बार पूछ लूंगा।
नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं है। अगर किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो वही इसके लिये जिम्मेदार होगा। इन पंक्तियों का लेखक किसी ऐसे दूसरे ब्लागर से नही मिला।

रहीम के दोहे:हंसिनी चुनती है केवल मोती


मान सहित विष खाप के, संभु भय जगदीश
बिना मान अमृत पिए, राहू कटाए शीश

कविवर रहीम कहते हैं सम्मान के के साथ विषपान कर शिव पूरे जगत में भगवान् स्वरूप हो गए. बिना सम्मान के अमृत-पान कर राहू ने चंद्रमा से अपना मस्तक कटवा लिया.

भाव-हमें वही कार्य करना चाहिए जिससे सम्मान मिले. समाज हित में कार्य करना विष पीने लायक लगता है पर प्रतिष्ठा उसी से ही बढती है. अपने स्वार्थ के लिए कार्य करने से यश नहीं बढ़ता बल्कि कई बार तो अपयश का भागी बनना पड़ता है. इसका एक आशय यह भी है हमें जो चीज सहजता और सम्मान से मिले स्वीकार करना चाहिए और कहीं हमें अपमान और घृणा से उपयोगी वस्तु भी मिले तो उसे त्याग देना चाहिए.

मान सरोवर ही मिले, हंसी मुक्ता भोग
सफरिन घरे सर, बक-बालकनहिं जोग

कवि रहीम कहते हैं की हंसिनी तो मान सरोवर में विचरण करती है और केवल मोतियों को ही चुनकर खाती है. सीपियों से भरे तालाब तो केवल बगुले और बच्चों के क्रीडा स्थल होते हैं.

भाव- विद्वान् और ज्ञानी व्यक्ति सदैव अपने जैसे लोगों से व्यवहार रखते हैं और उनके अमृत वचन सुनते हैं, किन्तु जो मूर्ख और अज्ञानी हैं वह सदैव बुरी संगति और आमोद-प्रमोद में अपना समय नष्ट करते हैं. जिस तरह हंसिनी केवल मानसरोवर में विचरण करती है उसी तरह ज्ञानी लोग सत्संग में अपने मन के साथ विचरण करते हुए अपना समय बिताते और ज्ञान प्राप्त करते हैं.

रहीम के दोहे: बिपति भए धन न रहे


बिपति भए धन न रहे, रहे जो लाख करोड़
नभ तारे छिपि जात है, ज्यों रहीम भए भोर

कवि रहीम कहते हैं, जैसे प्रभात होते ही आकाश से तारागन विलीन जो जाते हैं, उसी प्रकार आपत्ति आने पर चाहे कई लाख-करोड़ धन भी पास हो तो वह भी समाप्त हो जाता है।

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर गुलियाए खाय

कवि रहीम कहते हैं की कुछ लोग भगवान् राम को ह्रदय में धारण नहीं करते और भोग-विलास में डूबे रहते हैं । पशु की टांगों को स्वाद से खाने के बाद दवा भी खाते हैं।

अगड़म-बगडम लिखते तो हिट हो जाते


पहले ब्लॉगर ने उसी मित्र से दूसरे ब्लॉगर का पता निकाला। उससे पता लगा कि वह उसके पास में स्थित गाँव में ही रहता है। दरअसल पहले ब्लॉगर का घर भी शहर के बाहर कालोनी में था, और वह गाँव उससे बहुत ज्यादा दूर नहीं था। पहला ब्लॉगर कई बार उस गाँव में जा चुका था।

उसने साइकिल उठाई और वहां चल दिया। पक्की सड़क से होते हुए वह उस कच्ची सड़क की ओर मुड़ा जो उस गाँव की तरफ जाती थी । उसने मोड़ पर स्थित पहले मकान के बाहर मैदान पर घास खोद रहे व्यक्ति को देखा और साइकिल से उतरकर आवाज दीं । वह व्यक्ति उसके पास आया। बनियान और तहमद पहने उस व्यक्ति से उसने दूसरे ब्लॉगर का नाम बताते हुए उसके घर पूछा-‘क्या तुम उस जानते हो कहाँ रहता है।’

उस व्यक्ति ने कहा-‘इस नाम का कोई आदमी यहाँ नहीं रहता।आप गलत गाँव में आ गये हैं’

पहला ब्लोगर सोच में पड़ गया। उसे लगा कि उसके मित्र ने उसे धोखा दिया है-पर फिर लगा कि हो सकता है यह आदमी ही उसे नहीं जानता हो क्योंकि वह दूसरा ब्लॉगर उस गाँव का नहीं था शहर से उधारी वालों से परेशान होकर ही वह गाँव के बाहर ही कहीं रह रहा था-ऐसा ही उसके मित्र ने बताया था। फिर उसने उस आदमी को घूर कर देखा और कहा-‘अच्छा तो तुम हमें ही चलाने लगे। क्या बात है आज तुम मुझे ही नहीं पहचान रहे।”

वह दूसरा ब्लॉगर था। उसने भी उसे नहीं पहचाना था फिर उसके समझ में आया और बोला-‘अच्छा तो तुम हो यार, मैं डर गया था की कोई गलत आदमी मेरा पता पूछ रहा है क्योंकि मुझे यहाँ कोई इस नाम से नहीं जानता। यहाँ मेरा दूसरा नाम है।”
पहले ब्लोगर ने कहा-‘दूसरा कि तीसरा?’
दूसरा बोला-‘चौथा। मैं अपने नाम बदलकर काम करता हूँ।इतनी संख्या है कि मुझे खुद याद नहीं रहता और तुम्हारा भी भेजा फ्राई हो जाएगा।’
पहला ब्लॉगर बोला-‘अच्छा किया जो नाम बदल लिया हैं नहीं तो उधार माँगने वाले परेशान करते।’
दूसरा ब्लॉगर-‘तुमसे किसने कहा?’’

पहला ब्लोगार-‘’किसी ने नहीं। मैने अनुमान किया।’

दूसरा ब्लॉगर-‘’कहो कैसे आना हुआ।”
पहले ने कहा-”सोचा तुमसे मिल लूँ ।”
दूसरा-”क्या घर पर कोई काम नहीं था।”
पहला- ‘मैं अपने काम सुबह जल्दी निपटा देता हूँ। जो काम तुम कर रहे हो घास काटने का वह मैं अपने गार्डन में सुबह ही कर चुका हूँ। इस समय तुमसे उस रिपोर्ट के बारे में पूछने आया हूँ जो मैने लिखी थी तुमने देखी कि नहीं?”

दूसरा ब्लॉगर-”मैने देखी थी , बहुत अच्छी थी । अब तुम यहाँ से चले जाओ। बडे दिनों बाद घर में एन्ट्री मिली है अगर तुम यहाँ रहे और मेरे घर के लोगों ने देख लिया तो हालत खराब हो जायेगी।”

इतने में गृह स्वामिनी बाहर आई और उसने पहले ब्लॉगर को नमस्ते की और अपने पति से बोली-‘भाई साहब को बिठाओ मैं इनके लिये चाय बनाकर आती हू।”

वह अन्दर चली गयी , पहला ब्लॉगर खुश हो गया और बोला-‘’ अगर चाय पिलाना है तो ठीक हैं, अन्दर चलते हैं। यहाँ कुछ गर्मी है।”

दूसरा ब्लॉगर-‘नहीं, बाहर ही बैठो। मैं अन्दर से कुर्सी ले आता हूँ। वैसे तुम्हें साइकिल पर देखकर वह समझी कि तुम कोई लेनदार हो। इसलिये चाय की पूछ लिया और मैं भी यूं सोच कर चुप रह गया कि तुम्हारा नमक खाया है।”

वह अन्दर गया और दो कुर्सिया ले आया।

पहले ब्लॉगर ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा-‘तुमने उस रिपोर्ट पर कमेंट नहीं दी ।’
दूसरा-‘मैने उसे पढा ही नहीं।”

पहला-‘पर तुमने अभी कहा था कि रिपोर्ट देखी थी।”
दूसरा-‘हाँ पर मैने यह कब कहा की मैने उस पढा है।?”

पहला-“तुमने कब देखी थी?

दूसरा –‘’तुमसे मिलने के अगली रात दस बजे को।

पहला-“पर मैने तो उसे रात को एक बजे प्रकाशित किया था।’
दूसरा-”अरे यार, तुम भी ऐसे ही हो। तभी मैं कहूं मुझे दिखाई क्यों नहीं दी। वैसे तुमने रात को एक बजे रिपोर्ट क्यों डाली, यह कोई टाइम है?”

पहला-”इसलिये कि घर में सब सो रहे थे।’

दूसरा-‘तुम यार इतना डरते हो?’
पहला-‘यह तुम कह रहे हो। मैं नहीं चाहता की मुझे तुम्हारी तरह कहीं ओर ठिकाने ढूंढने पडे।’

दूसरा-अच्छा छोड़ो, यह बताओ कि तुम्हारी रिपोर्ट हिट हुई या फ्लाप?
पहला-‘एकदम फ्लाप?”
दूसरा-‘तुमने रिपोर्ट् के बारे में अकडम्-बकडम लिखा कि नहीं? मैं अपनी भाषा में कहूं तो…………तुम्हारी भाषा में ही कहता हूं कि अभद्र शब्द…………लिखे कि नही”

पहला-‘यह क्या होता है? यह कौनसी विधा है।”
दूसरा-‘जब यह नहीं जानते तो लिखा क्या होगा? खाक! इसलिये तो रिपोर्ट फ्लॉप हो गयी ।अकडम-बकडम लिखते तो हिट हो जाते. ‘

पहला–‘यह करना जरूरी है।’

दूसरा-‘यह फ़ैशन है।”
पहला-‘यह में नहीं कर सकता।’

दूसरा-इसलिये तो तुम्हारा लिखा मेरी समझ में नहीं आता और कमेंट नहीं देता और तुम फ्लॉप हो। मेरी भाषा में लिखो तो मैं खूब कमेंट दूं।”

पहला ब्लोगर-‘तुम्हारी भाषा सीखने की मुझे जरूरत नहीं है, मैं तो तुम्हें यह बताने आया था कि भईया रिपोर्ट पढ लेना।’
दूसरा-‘अब क्या खाक पढ लेना। हो गयी पुरानी। वैसे किसी ने कमेंट दी।’
पहला-‘हां! जो मेरे दोस्त हैं उन्होने दी।’

दूसरा-‘ब्लोगरों से दोस्ती। वहां भला कोयी है दोस्ती लायक!’
पहला-‘हां, तुम ठीक कह्ते हो। सब भले लोग हैं, तुमसे दोस्ती करने लायक तो नहीं हैं।’
दूसरा-‘क्या मैं बुरा हूं। देखो मेरे मोहल्ले में आकर यह बद्तमीजी नहीं चलेगी। यह ठेका तो हमने ले रखा है। ऐसी कमेंट लिख जाऊंगा कि छोडो यार…..’

पहला-‘ऐसा सोचना भी नहीं। तुम्हें गलतफ़हमी है कि पहले की तुम्हारी तो गल्तिया माफ़ कर चुका हू, अभी तक तुमसे हिसाब बकाया है।’

दूसरा ब्लोगर गुस्से में उसे घूर रहा था फ़िर बोला-‘वह तो तुम्हारे छ्द्म नाम का ब्लोग था।

“पहला-“वह सब ठीक है, पर तुम अपने कहे पर लिखी रिपोर्ट पर कमेंट तो देते।”
दूसरा-“जब पढे ही नहीं तो क्या खाक देता?”
पहला-“तो अब पढ कर देना।’
दूसरा-पढ़ने के बाद तो मैं किसी को कमेंट नहीं देता।
‘पहला-‘तो बिना पढे ही दे देना।”
दूसरा-‘ यार तुम मेरे मुहल्ले में आकार मुझे तंग मत करो ,वरना ऐसे कमेंट दूंगा कि ……..छोडो यार।’
पहला- ”तुम्हारा मोहल्ला। गुरु तुम किस गलतफहमी में हो। हम दोनों का एक ही मोहल्ला है। इस गाँव में मैं कई बार आता हूँ और ज्यादा दूर नहीं है।’
इतने में एक बच्चा अंदर से चाय के दो कप ले आया और रख कर चला गया।पहले ब्लोगर ने तत्काल एक् कप उठा लिया तो दूसरा बोला कि-‘क्या यार घर से चाय पीकर नही चले थे क्या कि मेरे कहने से पहले ही कप उठा लिया।
‘पहला-“तुम उठाने के लिये कहते?’
दूसरा-“नही!”

पहला-“मुझे मालुम था। वैसे चाय अच्छी बनी है।”

दूसरा-हमारी पत्नी ने तुम्हें शहर से आया लेनदार समझ लिया इसलिये ऐसी स्पेशल चाय पिलाई है-और मैं भी तुम्हारे घर पर नाश्ता कर आया हूं इसलिये झेल रहा हूं।”

चाय पीने के बाद पहला ब्लोगर जाने के लिये तैयार हुआ तब दूसरा ब्लोगर बोला-‘यहां किसी को मत बताना कि मैं ब्लोग लिखता हूं। हम दोनों दोस्त हैं और एक ही मुह्ल्ले के हैं, यह भूलना नहीं।”
पहला ब्लोगर हंसते हुए बोला-‘पर तुम तो कह रहे थे कि ब्लोगर भला दोस्ती लायक होते हैं? साथ में मुह्ल्ला भी याद आने लगा। चलो कोयी बात नही, मैं उम्मीद करता हूं कि तुम जल्दी समझ जाओगे कि दोस्ती किसे कहते हैं?’

दूसरा-‘इस मीटिंग पर कब रिपोर्ट कब लिख रहे हो?’
पहला-कौंनसी मीटिंग………अच्छा यह। कल सुबह छः बजे।
दूसरा-‘इतनी सुबह क्यों?”
पहला-‘उस समय सब घर पर सोते हैं।”
पहला ब्लोगर वहां से साइकिल पर उठाकर चल दिया। आधे रास्ते पर उसे याद आया कि यह तो उसने बताया ही नहीं कि हास्य कविता लिखनी है या नहीं। फ़िर उसने अपने सिर को झटका दिया कि चलो इस बार भी हास्य कविता नहीं लिखते। अगली मीटिंग में पूछ्कर लिख लेंगे।
नोट-यह हास्य व्यंग्य है और इसके पात्र कल्पित हैं अगर किसी की खुराफात से मेल हो जाये तो लेखक जिम्मेदार नहीं है। इन पंक्तियों का लेखक कभी किसी दुसरे ब्लोगर से नहीं मिला है।