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दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में-हिन्दी शायरी


जन्म लिया हिन्दी में
पढ़े लिखे अंग्रेजी में
आजाद रहे नाम के
गुलामी सिखाती रही आधुनिक शिक्षा।
अब कटोरा लेकर नहीं
बल्कि शर्ट पर कलम टांग कर
मांग रहे पढ़े लिखे लोग नौकरी की भिक्षा।
——–
आंखों से देख रहे पर्दे पर दृश्य
कानों से सुन रहे शोर वाला संगीत
नशीले रसायनों की सुगंध से कर रही
सभी की नासिका प्रीत,
मुंह खुला रह गया है जमाने का
देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
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हिन्दी ब्लाग जगत बनेगा देश में नये विचारों का केंद्र-हिन्दी लेख (hindi blog is new center of thinking-hindi lekh)


अंतर्जाल पर हिन्दी भाषा में लिख रहे लेखकों को अभी इसका अनुमान नहीं है कि संगठित प्रचार माध्यम-टीवी, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाऐं-उनके ब्लाग पर नज़र रख रहे हैं। कुछ ब्लाग लेखक लिखते हैं कि इंटरनेट पर लिखने से समाज में कोई बड़ा वैचारिक बदलाव नहीं आने वाला तो उनकी स्थिति दो प्रकार की ही हो सकती है। एक तो यह कि वह अपने पाठों में कोई वैचारिक बात नहीं रखते और दूसरी यह कि रखते हैं तो उनके मौलिक न होने का अहसास स्वयं को है।
एक बड़े पत्रकार के व्यंग्य पर हिल जाने वाले हिन्दी ब्लाग जगत को अगर किसी बात की जरूरत है तो वह है आत्मविश्वास। प्रसंग वश यह लेख भी एक ऐसे ही टीवी और अखबार पत्रकार के लेख पर ही आधारित है जिसमें वह कुछ निष्पक्ष दिखने का प्रयास कर रहे थे। वह मान रहे थे कि केवल दो विचारधाराओं के मध्य ही प्रसारण माध्यमों में कार्यक्रम और समाचार पत्र पत्रिकाओं में आलेख होते हैं। उनका यह भी था कि जब हम कहीं बहस करते हैं तो एक तरफ राष्ट्रवादी तो दूसरी तरफ समतावादी विद्वानों को ही बुलाते हैं जो अपनी धुरी से इतर कुछ नहीं सोचते न बोलते। कहने का अभिप्राय यह है कि वह उस सत्य को स्वीकार कर रहे थे जिसे स्वतंत्र और मौलिक ब्लाग लेखक लिखते आ रहे हैं।
यहां यह भी उल्लेख करें कि वह पत्रकार स्वयं ही राष्ट्रवादियों पर सांप्रदायिक होने का ठप्पा लगाकर अपने को समतावादी बताते रहें तो राष्ट्रवादियों ने भी उनको अपने धुरविरोधियों की सूची में शामिल कर रखा है। इतने बरसों से प्रचार माध्यमों में सक्रिय विद्वान की अभिव्यक्त्ति अपनी ही थी पर विचारों का स्त्रोत हिन्दी ब्लाग जगत का दिखा जहां यह बातें लिखी गयी हैं। कहने को तो यह भी कह जा सकता है कि इतने बड़े आदमी को भला कहां फुरसत रखी है? मगर यह सोचना गलता होगा। दरअसल आम पाठक इतना ब्लाग जगत पर नहीं आ रहा जितना यह बुद्धिजीवी आ रहे हैं। वजह साफ है कि वह अभी तक एक तय प्रारूप में चलते आ रहे थे इसलिये कुछ नया सोचने की जरूरत उनको नही थी पर इधर हिन्दी ब्लाग एक चुनौती बनता जा रहा है इसलिये यह संभव है कि वह यहां से विचारों को उठकार उस पर अपने मौलिक होने का ठप्पा लगाये क्योंकि उनके पास प्रचार माध्यमों की शक्ति है।
इन दो विचारधाराओं पर चलने वाली बहसों में आम आदमी का एक विचारवान व्यक्ति की बजाय निर्जीव प्रयोक्ता के रूप में ही रखा जाता है। सवाल यह है कि उनको यह विचार कहां से आया कि प्रचलित विचाराधाराओं से अलग भी किसी का विचार हो सकता है?
जवाब हम देते हैं। हिन्दी ब्लाग जगत पर बहुत कम लिखा जा रहा है पर याद रखिये न छपने की कुंठा लेकर आये ब्लाग लेखकों के साथ उनकी अभिव्यक्त होने के लिये तरस रही अपनी विचाराधारायें हैं। यह विचाराधारायें न तो विदेश से आयातित हैं और न अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न देशी विद्वानों के सतही सोच पर आधारित है। वह उपजी है उनके स्वयं के विचार से। कहने का अभिप्राय है कि इंटरनेट पर हिन्दी में लिखने वाले ब्लाग लेखक बाहर चल रही गतिविधियों और प्रचार पर नज़र रखें। उनमें वैचारिक बदलाव नज़र आ रहा है। यह सच है कि हिन्दी ब्लाग जगत पर आम पाठकों की संख्या कम है पर खास वर्ग उस पर नज़र रखे हुए है क्योंकि एक ही विचार या नारे पर चलते हुए उसको अपना भविष्य अंधकार मय नज़र आ रहा है। दूसरा यह कि ब्लाग जगत से खतरे का आभास उनको है इसलिये वह अब कहीं कहीं यहां से विचार भी ग्रहण करने लगे हैं-इसे हम चोरी नहीं कह सकते-और उनको प्रस्तुत करते हैं। उनका नाम है इसलिये लगता है कि मौलिक हैं जबकि सच यह है कि हिन्दी ब्लाग लेखकों द्वारा आपसी चर्चाओं से उनका जन्म हुआ है। आप कुछ विचारों की बानगी देखिये।
1-इतने वर्षों से यह प्रचार माध्यम विज्ञापन पर चल रहे हैं पर बाजार और उसके प्रबंधकों को दबाव को कभी जाहिर नहीं किया। अब तो वह बहस करते हैं कि बाजार किस तरह तमाम क्षेत्रों को प्रभावित कर रहा है। समाज के साथ ही वह खेलों और फिल्मों में बाजार के हस्तक्षेप की चर्चा करते हैं। लोग यकीन नहीं करेंगे कि पर सच बात यह है कि बाजार के इस रूप पर सबसे पहली चर्चायें हिन्दी ब्लाग जगत पर ही हुईं थी। यहां यह बात नहीं भूलना चाहिये कि इस लेखक को तीन साल अंतर्जाल पर हो गये हैं और अनेक पाठों पर दूसरे ब्लाग लेखकों की बाजार के इस कथित प्रभाव की चर्चा करती हुईं अनेक टिप्पणियां हैं जो इतनी ही पुरानी हैं।
2-गांधीजी पर लिखे गये इस लेखक के पाठों को यहां के ब्लाग लेखकों ने पढ़ा होगा। गांधीजी को नोबल न दिये जाने के विषय पर लिखे गये इस लेखक के विचारों को एक स्तंभकार ने जस का तस अपने लेख में लिखा। सच है उसे आम पाठकों ने अभी कम पढ़ा होगा पर उस स्तंभकार ने लाखों लोगों तक वह बात पहुंचा दी। अखबारों ने इस लेखक के वैचारिक चिंतन बिना नाम के छापे। यहां हम कोई शिकायत नहीं कर रहे बल्कि इंटरनेट लेखकों को बता रहे हैं कि वह अपने अंदर कुंठा न पालें। अगर वह मौलिकता के साथ आयेंगे तो वह वैचारिक शक्ति केंद्र का बिन्दु बनेंगे। आम पाठकों की कम संख्या को लेकर अपने अंदर कुंठा पालना व्यर्थ है।
3-कलकत्ता में एक धर्म के युवक की मौत पर एक वर्ग बावेला मचाता है पर कश्मीर पर दूसरे धर्म के युवक की मौत पर वही खामोश हो जाता है तो दूसरा मचाता है। हम यहां इस विषय पर बहस नहीं कर रहे कि कौन गलत है या कौन सही्! मुख्य बात यह है कि कथित विचारधाराओं ने लोगों को सोच तो प्रदान की है पर एक दायरे के अंदर तक सिमटी है। ऐसे में मुक्त भाव से लिखने वाले हिन्दी लेखक कई ऐसी बातें लिख जाते हैं जिनको स्थापित विद्वान सोच भी नहीं सकता।
अब संगठित प्रचार माध्यम में सक्रिय बुद्धिजीवियों को यह लगने लगा है कि उनकी विचारों की पूंजी बहुत कम है भले ही उनके द्वारा लिखे गये शब्दों की संख्या हिन्दी ब्लाग लेखकों से अधिक है। उनका नाम ज्यादा है पर उनका सोच आजाद नहीं है।
हां, यह सच है कि हम ब्लाग लेखक कुंठित होकर यहां आते हैं पर ब्लाग शुरु करने के बाद उसका नशा सब भुला देता है। जहां तक मठाधीशी का सवाल है तो हर ब्लाग लेखक जैसे ही ब्लाग खोलता है यह पदवी उसके पास स्वयं ही आ जाती है। इंटरनेट पर लिखने वाले लेखकों यह बात समझ लेना चाहिये कि उनका अकेला होना ही उनको स्वतंत्र बनाता है। वह जिन संघर्षों से गुजर रहे हैं वह उनके लिये सोच को विकसित करने वाला है। उनको संगठित प्रचार माध्यमों में गढ़े गये विचारों से आगे जाना है। जैसे जैसे ब्लाग लेखकों की संख्या बढ़ेगी वैसे उनकी सोच का दायरा भी बड़ा होगा। संगठित प्रचार माध्यमों में नाम पाना किसे बुरा लगता है पर दूसरा सच यह है कि वहां नवीन और मौलिक विचार या विद्या को साथ लेकर स्थान पाना कठिन है। ऐसे में ब्लाग जगत पर आकर दायरा बढ़ जाता है। जब तब आम पाठक है स्थापित विद्वान ब्लाग लेखकों के विचारों को ग्रहण कर अपना जाहिर कर सकते हैं पर कालंातर में यह तो जाहिर होना ही है कि उनका जनक कौन है?
जब कोई स्थापित विद्वान यह मान रहा है कि सीमित विचाराधाराओं के इर्दगिर्द प्रचार माध्यम घूमते रहे हैं वह अप्रत्यक्ष रूप से स्वयं को भी जिम्मेदार मान रहा है क्योंकि अभी तक तो वह भी यही करते रहे थे।
हिन्दी ब्लाग जगत पर कुछ गजब के लिखने वाले हैं। यह सही है कि उनमें कुछ लकीर के फकीर है तो कुछ नये ढंग से सोचने वाले भी है। इसमें दिलचस्प बात यह है कि नये ढंग से सोचने वाले अधिक भाषा सौंदर्य से नहीं लिख पाते पर उनकी बातें बहुत प्रभावी होती हैं और वह शायद स्वयं ही नहीं जानते कि ऐसी बात कह रहे हैं जिनको संगठित प्रचार माध्यम जगह नहीं देंगे अलबत्ता कुछ स्थापित विद्वान उनके विचारों को उठा भी सकते हैं। आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है? इसका जवाब यह है कि हमारे आसपास घटता बहुत कुछ है पर शाब्दिक अभिव्यक्ति कैसे की जाये यह महत्वपूर्ण बात है। बड़े विद्वान अभिव्यक्ति तो कर सकते हैं पर नवीन विचार के जनक तो हिन्दी ब्लाग लेखक ही बनेंगे। यह बात हमने अपने अनुभव से कही है। ऐसे विचारों को लिखते हुए हम यह कहना नहीं भूलते कि यह जरूरी नहीं कि हम सही हों। हो सकता है हमारा यह अनुमान हो, पर विचारणीय तो है। इतना तय है कि इस ब्लाग जगत पर अनेक लोग तो ऐसे हैं जो पाठ लिखने के साथ ही जोरदार वैचारिक टिप्पणियां भी लिख जाते हैं और भविष्य में उनकी चर्चा भी प्रचार माध्यमों में होगी।
आखिरी बात हम यह भी कह सकते हैं कि अगर विद्वानों ने हिन्दी ब्लाग जगत से विचार नहीं भी लिये होंगे पर यह हो सकता है कि यहां की जानकारी उनको तो हो ही गयी है और इसलिये प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभर रहे हिन्दी ब्लाग लेखकों को ध्यान में रखते हुए नये ढंग से सोचना शुरू किया हो-मतलब प्रभाव तो है न!

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में- हिन्दी शायरी


जन्म लिया हिन्दी में
पढ़े लिखे अंग्रेजी में
आजाद रहे नाम के
गुलामी सिखाती रही आधुनिक शिक्षा।
अब कटोरा लेकर नहीं
बल्कि शर्ट पर कलम टांग कर
मांग रहे पढ़े लिखे लोग नौकरी की भिक्षा।
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आंखों से देख रहे पर्दे पर दृश्य
कानों से सुन रहे शोर वाला संगीत
नशीले रसायनों की सुगंध से कर रही
सभी की नासिका प्रीत,
मुंह खुला रह गया है जमाने का
देखकर रौशनी पत्थरों के शहर में।
अक्ल काम नहीं करती,
हर नयी शय पर बेभाव मरती,
बाजार के सौदागरों के जाल को
जमीन पर उगे धोखे के माल को
सर्वशक्तिमान का बनाया समझ रहे हैं
हांके जा रहे हैं भीड़ में भेड़ की तरह
दिन में सूरज की रौशनी में छिपे रहते
दिल का उजाला ढूंढते रात के पहर में।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
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योगी और भोगी-हिन्दी हास्य कविताएँ


हैरानी है इस बात पर कि
समलैंगिकों के मेल पर लोग
आजादी का जश्न मनाते हैं,
मगर किसी स्त्री पुरुष के मिलन पर
मचाते हैं शोर
उनके नामों की कर पहचान,
पूछतें हैं रिश्ते का नाम,
सभ्यता को बिखरता जताते हैं।
कहें दीपक बापू
आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक
पता नहीं कौन हैं,
सब इस पर मौन हैं,
जो समलैंगिकों में देखते हैं
जमाने का बदलाव,
बिना रिश्ते के स्त्री पुरुष के मिलन
पर आता है उनको ताव,
मालुम नहीं शायद उनको
रिश्ते तो बनाये हैं इंसानों ने,
पर नर मादा का मेल होगा
तय किया है प्रकृति के पैमानों ने,
फिर जवानी के जोश में हुए हादसों पर
चिल्लाते हुए लोग, क्यों बुढ़ाये जाते हैं।
———-
योगी कभी भोग नहीं करेंगे
किसने यह सिखाया है,
जो न जाने योग,
वही पाले बैठे हैं मन के रोग,
खुद चले न जो कभी एक कदम रास्ता
वही जमाने को दिखाया है।
जानते नहीं कि
भटक जाये योगी,
बन जाता है महाभोगी,
पकड़े जाते हैं जब ऐसे योगी
तब मचाते हैं वही लोग शोर
जिन्होंने शिष्य के रूप में अपना नाम लिखाया है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

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‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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गरीब कैसे दिखें-हिंदी हास्य व्यंग्य (grib saise dikhe-hindi hasya vyangya)


आस्ट्रेलिया के एक पुलिस अधिकारी ने भारतीयों को हमले से बचने के लिये गरीब दिखने की सलाह क्या दी, उस पर भारत के बुद्धिजीवी समुदाय में  बावेला मच गया है।  कोई इस सलाह को लेकर  उसकी नाकामी पर बरस रहा है तो कोई उसे बेवकूफ बता रहा है।  अपनी समझ में उसने एक बहुत गज़ब का विचार व्यक्त किया है। दरअसल यह कोई उसका विचार नहीं बल्कि यह तो पुराना ही दर्शन है। अगर अपनी रक्षा करनी है तो उसके लिये सबसे पहला उपाय स्वयं को ही करना है पर विकासवादियों की संगत में सभी प्रकार के बुद्धिजीवियों की सोच केवल अब इसी बात पर रहती है कि ‘आदमी चाहे कैसे भी चले,, उसे रास्ता या अदायें बदलने की सलाह देना उसकी आजादी का उल्लंघन है क्योंकि हर आदमी को सुरक्षा देना राज्य का काम है।’
इस प्रवृत्ति ने लोगों को अपंग बना दिया है और न तो कोई अपनी रक्षा के लिये शारीरिक कला में रुचि लेता है और न ही इस बात का प्रयास करता है कि उसकी संपत्ति भले ही कितनी भी क्यों न हो, पर उसका प्रदर्शन न करें ताकि अभावों से ग्रसित आसपास के लोगों के समुदाय में कुंठा का भाव न आये-यही भाव अंततः धनपति समाज के प्रति कभी निराशा के रूप में अभिव्यक्त होता है तो कभी क्रोध से उपजी हिंसा के रूप  मे।
मगर नहीं! भारत में बहुत कम लोग हैं जिनको ऐसी सलाह का मतलब समझ में आयेगा। वैसे उस आस्ट्रेलियाई पुलिस अधिकारी के अज्ञान पर तरस भी आ रहा है। वह किसी अफ्रीकी देश के लोगों को कहता तो समझ में आ सकता था मगर भारतीयों को ऐसी सलाह उसने यह विचार किये बिना ही दी है कि यहां के लोग पैसा कमाते ही इसलिये है कि उसका प्रदर्शन कर दूसरों के मुकाबले अपने आपको श्रेष्ठ साबित करें।  एक आदमी को जिंदा रहने के लिये क्या चाहिये! पेट भर रोटी, पूरा तन ढंकने के लिये कपड़े-यहां फैशन से कम कपड़ा पहनने वालों की बात नहीं हो रही’-और सिर ढंकने के लिये छत।  देश में हजारों मजदूर परिवार हैं जो  ईंटों के कच्चे घर बनाकर रहते हैं।  उनकी बीवियां सुबह उठकर खाना बनाती हैं, बच्चे पालती हैं और फिर पति के साथ ईंटें और रेत ढोने का भी का करती हैं  फिर भी  वह उनके चेहरा पर संतुष्टि के भाव रहते  हैं।  यही कारण है कि भारत का ऐसा मजदूर वर्ग  बाजार और प्रचार के लक्ष्य के दायरे से बाहर का समाज है।  अपने यहां एक अभिनेता सभी संतुष्टों को असंतुष्ट होने का संदेश एक विज्ञापन में देता है।  ‘डोंट बी संतुष्ट’ का नारा लगाने वाले  अभिनेता के उस विज्ञापन का लक्ष्य तो केवल वह लोग हैं जिनका पैसे के मामलें में हाजमा खराब है।  यही कारण है कि उसके संदेश का आशय यही है कि आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिये, बल्कि असंतुष्ट होकर खरीददारी करना चाहिए।
हमारे देश के टीवी चैनल, फिल्में और रेडियो ऐसे असंतोष फैलाने वाले संदेशवाहक की छबि बनाने में जुटे हैं। सभी जानते हैं कि इस तरह के  का प्रभाव हमारे देश के लोगों के दिमाग पर होता है-टीवी, फिल्म और रेडियो के प्रभाव सभी जानते हैं।
लोग बाहर जा इसलिये ही रहे हैं कि उनमें असंतोष है।  हालत यह है कि बाहर जाने के लिये लोग पैसा खर्च कर रहे हैं। यह राशि इतनी अधिक होती है कि अनेक माध्यम और गरीब लोग यह सोचते हैं कि इतना पैसा होने पर वह स्वयं विदेश जाने की तो सोचते ही नहीं।
ऐसे धनाढ्य लोग इतना पैसा देश में रखकर क्या करेंगे? फिर इधर कर वसूलने वालों की नज़रे भी लगी रहती हैं। इसलिये कोई पैसा बाहर भेज रहा है तो कोई खुद ही जा रहा है। कहीं पैसे को अपने पीछे कोई छिपा रहा है तो कोई पैसे के पीछे छिप रहा है। 
देश में आदमी दिखाता है कि ‘देखो फारेन जा रहा हूं।’  उधर आस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अमेरिका में भी वह अपनी दौलत दिखाता है यह प्रदर्शित करने के लिये कि उसे वहां के लोग ऐरा गैरा भारतीय न समझें।  हमारे देश के एक माननीय व्यक्ति ने बस इतना कहा कि ‘भारत के छात्र ऐसे विषयों के लिये बाहर जाते ही क्यों है, जो यहां भी उपलब्ध हैं। जैसे बच्चों की हजामत बनाना या बीमारों की सेवा करना।’
उस पर भी बावेला मच गया।  मतलब समझाओ नहीं!  हमारे पास इतना पैसा है उसका प्रदर्शन न करें तो फिर फायदा क्या, पता नहीं वह कैसे (?) तो कमाया है? यहां खर्च नहीं कर सकते क्योंकि टैक्स बचाने से अधिक यह बताने की चिंता है कि वह आया कहां से?’ बाहर जाने पर   ऐसी समस्या नहीं आती है पर वहां भी उसका दिखावा न करें तो इतना पैसा हमने या हमारे पिताजी ने  कमाया किसलिए?
इस मामले में हमारे बुजुर्गों ने जो सिखाया सादगी और चालाकी का पाठ  याद आता है।   यह लेखक  अपने ताउजी के साथ दूसरे शहर जा रहे था।  उनके पास बड़ी रकम थी-आज वह अधिक नहीं दिखती पर उस समय कोई कम नहीं  थी। उन्होंने लेखक को बताया कि उनका पैसा एक पुराने थैले में है जिसमें खाने का सामान रखा है जिसका उपयोग वह बस में ही करेंगे।
अटैची उन्होंने अपने हाथ में पकड़कर  रखी पर थैला टांग दिया।  कभी कभी वह थैले से  सामान निकालते और फिर उसे वहीं टांग देते।  ऐसे दिखा रहे थे की जैसे उनको थैले की परवाह ही नहीं है
अनेक बार हम बस से दोनों साथ उतरे और वह इतनी  बेपरवाही से चल रहे थे कि किसी को अंदाज ही नहीं हो सकता था कि उनके उस पुराने मैले थैले में खाने के सामान के नीचे एक बहुत बड़ी रकम है।   उनसे सीख मिली तो अब हम भी जब बाहर जाते हैं तो अपना कीमती सामान कभी अटैची में न रखकर खाने के सामान के साथ पुराने थैले में रख देते हैं, पर्स तो करीब करीब खाली ही रखते हैं।  कहीं पर्स खोलते हैं तो पांच दस रुपये कागजों से ऐसे निकालते हैं कि जैसे बड़े बुरे दिन से गुजर रहे हैं।
अपना अपना विचार है। हर आदमी इस पर चले या नहीं। आस्ट्रेलिया के उस पुलिस अधिकारी ने सलाह अपने किसी अन्य दृष्टिकोण से दी होगी पर उस पर हमारा भी अपना  एक दृष्टिकोण है? साथ ही यह भी जानते हैं कि अपने देश में बहुत कम लोगों को  इस दृष्टिकोण से संतुष्ट कर पायेंगे? हर शहर में नारियों के गले से मंगलसूत्र या सोने का हार खींच लेने की घटनायें होती हैं पर इससे क्या फर्क पड़ता है! एक गया तो दूसरा आ जाता है।  अनेक बार प्रशासन अपने इशारे अखबार में छपवाता है कि त्यौहार का अवसर है इसलिये थोड़ा ध्यान रखें!’ मगर सुनता कौन है? अपना अपना दृष्टिकोण है

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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