Category Archives: aastha

संत कबीर वाणी:पढ़ कर पत्थर और लिख कर ईंट होते लोग


चतुराई क्या कीजिए, जो नहिं शब्द समाय
कोटिक गुन सूवा पढै, अन्त बिलाई खाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि उस चतुरता का क्या लाभ जब किसी प्रकार के ज्ञान की बात हृदय में नहीं समाती. करोडों प्रकार के गुणों की बात सुनकर तोता सीखता-पढता है पर अवसर आने पर बिल्ली उसको खा जाती है.

पढ़ि-पढ़ि के पत्थर भये, लिखी भये जू ईंट
कबीर अंतर प्रेम का, लागी, नेक न छींट

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं संसार के लोग बहुत पढ़-पढ़ का पत्थर के समान और लिख-लिख कर ईंट की तरह कठोर हो जाते हैं. उनके अंतर्मन में तनिक भी छीन नहीं लगी, इसलिए व सरल सरस ह्रदय के सच्चे मनुष्य नहीं बन पाए

Advertisements

संत कबीर वाणी:जो सात्विक नहीं उसे संत नहीं कहा जा सकता



कबीर विषधर बहु मिलै, मणिधर मिला न कोय
विषधर को मणिधर मिलै, विष तजि अमृत होय

संत कबीर दास जी कहते हैं कि विषधर सर्प तो बहुत मिलते हैं पर मणि वाला सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाय तो विष मिटकर अमृत हो जाता है।

भावार्थ-कहते हैं कि जहाँ सांप ने काट लिया हो वहाँ मणि लगाने से विष निकल जाता है। वही मणि दूध में डाल कर पीया जाये उसका कोड भी दूर हो जाता है (हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है)। आशय यह है कि यहाँ बुर लोगों की संगत के कारण बुरी आदतें तो बहुत जल्दी आ जाती हैं पर अच्छे की संगत बहुत जल्दी नहीं मिल पाती है और अगर मिल जाये तो अपने आप ही अच्छे संस्कार विचार मन में आ जाते हैं।

चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस
ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।

संकलन कर्ता का अभिमत-आजकल हमने देखा होगा कि धर्म के क्षेत्र में ऐसे लोग हो गए है जो बातें तो आदर्श की करते हैं पर उनका ऐक ही उद्देश्य होता है कि अपने लिए माया का अधिक से अधिक संग्रह करते हैं कहने को वह साधू संत कहलाते हैं और उनके द्वारा प्रायोजित शिष्य भी उन्हें भगवान का अवतार कहते हैं पर उन्हें कभी भी उन्हें आध्यात्मिक गुरू नही माना जा सकता है। उनकी वाणी में हमारे पुराने धर्म ग्रंथों का महा ज्ञान तोते की तरह रटा हुआ होता है और उनका सामान्य व्यवहार देखकर कभी भी यह नही कहा जा सकता कि वह उसे धारण किया हुआ है। ऐसे लोगों को धर्म का व्यापार करने वाला तो कहा जा सकता है पर साधू-संत नही माना जा सकता है चाहे वह कितना भी जतन कर लें।

भीड़ में अपना अस्तित्व ढूँढता आदमी


अलग खडा नहीं रह सकता
इसलिये भीड़ में शामिल
हो जाता आदमी
फिर वहीं तलाशता है
अपनी पहचान आदमी
भीड़ में सवाल-दर सवाल
सोचता मन में
पर किसी से पूछने का सहस नहीं जुटाता
भीड़ में शामिल पर अलग सोचता आदमी

भीड़ में शामिल लोगों में
अपने धर्म के रंग
अपनी जाति का संग
अपनी भाषा का अंग
देखना और ढूंढना चाहता आदमी
अपनी टोपी जैसी सब पहने
और उसके देवता को सब माने
उसके सच को ही सर्वश्रेष्ठ जाने
अपनी शर्तें भीड़ पर थोपता आदमी
भीड़ में किसी की पहचान नहीं होती
यह जानकर उसे कोसता आदमी

अपने अन्दर होते विचारों में छेद
भीड़ में देखता सबके भेद
अपनी सोच पर कभी नहीं होता खेद
सबको अलग बताकर एकता की कोशिश
दूसरे की नस्ल पर उंगुली उठाकर
अपने को श्रेष्ठ साबित कराने का इरादा
असफल होने पर सबको समान
बताने का दावा
आदमी देता है भीड़ को धोखा
पर भीड़ का कोई रंग नहीं होता
कोई देवता उसकी पहचान नहीं बनता
कोई उसकी भाषा नहीं होती
कहा-सुना सब बेकार
तब हताश हो जाता है आदमी
भीड़ में शामिल होना चाहता
पर अपनी शर्तें
कभी नहीं भूलना चाहता आदमी
अपने अंतर्द्वंदों से मुक्त नहीं हो पाता आदमी
—————————

संत कबीर वाणी:गाली से कलह, दु:ख और मृत्यु पैदा होती है


गारी ही सो उपजे, कष्ट और भीच
हारी चले सो साधू हैं, लागि चले सो नीच

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की गाली से कलह और दु:ख तथा मृत्यु पैदा होती हैं जो गाली सुनकर हार मानकर चला जाये वही साधू मतलब सज्जन पुरुष और जो गले देने के बदले में गाली देने लग जाता है वह नीच है।

लेखकीय अभिमत- संत शिरोमणि कबीरदास जी ने अपने जीवन को कितना सात्विक ढंग से जिया यह उनकी वाणी से स्पष्ट होता है। हमने देखा होगा की कुछ लोगों की आदत होती है की वह अकारण गालिया बकने लगते हैं। अगर उनके प्रत्युतर में उनको गाली दी जाये तो वह और गालियाँ देने लगते हैं क्योंकि वह सामने से आ रही गालियों को ध्यान में ही नहीं लाते। ऐसे दुष्ट लोगों की तरफ जो अनदेखा कर निकल जाते हैं वह साधू हैं और जो उनको गाली देने लगें वह स्वयं भी नीच होते हैं।

अन्धे मिलि हाथी छुआ, अपने अपने ज्ञान
अपनी अपनी सब कहैं, किसको दीजै कान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं अंधों ने मिलकर किसी हाथी को अपने-अपने ज्ञानानुसार छुआ और सबने अपनी-अपनी बात कही, अब बताईये किसकी बात पर यकीन किया जाये।

लेखकीय अभिमत-हमने देखा कुछ लोग किसी चीज को आँखों से देखकर ही केवल अपना मत व्यक्त करने लगते हैं और उसकी अच्छाई और बुराई जाने बिना उसकी प्रशंसा करते हैं। ऐसे लोगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है की अगर कोई हमारे सामने किसी व्यक्ति या वस्तु की प्रशंसा कर रहा है तो हमें उसके कहने पर नहीं बल्कि अपने विवेक से गुण दोष पर विचार कर अपनी राय कायम चाहिए नहीं तो हम भी अक्ल के अंधों की जमात में शामिल हो जायेंगे।

कल है पुरुष दिवस


कल अंतर्राष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जायेगा। यह अपने आप में अजीब बात लगती है क्योंकि अभी तक तो पुरुष को एक शोषक माना जाता है। अगर हम सभी धर्मों की मान्यताओं को देखें तो सभी सर्वशक्तिमान को पुरुष ही मानते हैं। हालांकि हमारे देश में भगवान के अवतारों और देवताओं के साथ उनकी धर्मपत्नियों की भी मान्यता है पर उसकी सीमा साकार और सगुण भक्ति तक है जहाँ निर्गुण और निराकार भक्ति की बात आती है तो परब्रह्म की साधना में पुरुषत्व की अनुभूति होती है। जहाँ तक मान्यताओं का प्रश्न है तो जितने भी मनीषी हुए हैं उन्होने मनुष्य को एक समाज मानते हुए अपने विचार व्यक्त किये हैं हालांकि वह सब पुरुष हैं। जब भी हम अपने आध्यात्म और ग्रंथों से उद्धरण लेते हैं तो उसमें पुरुषो का ही नाम आता है। अगर कुछ लोग कहते हैं कि सारी दुनिया की सामाजिक मान्यताएं पुरुष की बनाईं हुईं हैं तो गलत नहीं है।

अब जब यह दिवस मनाया जा रहा है तो पुरुषों के लिए वह समय आ गया है जब वह खुलकर अपना दर्द कहे। आखिर पुरुष भी कम पीड़ित नहीं है। उसकी पीडा यही है कि पुराने पुरुषों ने अपनी सता बनाए रखने के लिए जो मान्यताएं बनाईं वही उसके लिए समस्या बन गयी हैं। जो जाल उसने स्त्री को बन्धन में रखने के लिए बनाए उसमें वह आज का पुरुष ही फंसा है। स्त्री घर की चौखट के बाहर भी उसके नाम के बन्धन में रहे इसके लिए उसने नियम बनाए और उसे निरंतर बनाये रखने के लिए संघर्ष करता रहा, पर घर के अन्दर उसकी सता इतनी नहीं रही जितना समझा जाता है। अगर वह गृहस्वामी बना तो स्त्री उसकी गृहस्वामिनी। घर पुरुष के नाम पर चला स्त्री के हाथ और दिमाग के सहारे। वह निर्णायक दिखता है पर उसके निर्णय के पीछे एक स्त्री भी होती है क्या यह सच हम नहीं जानते। पत्नी के बिना या उसकी असहमति से कोई निर्णय लेने का कितना सोच पाते हैं और लेते हैं तो उस पर कितना अमल कर पाते हैं-यह विचारणीय प्रश्न है। घर के सदस्य उसके अधीन माने जाते हैं पर उसके कहने पर कितना चलते हैं बताने की जरूरत नहीं पुर कुछ हो जाये तो कहा जाता है कि उसका अपने परिवार पर नियंत्रण नहीं है।

वैसे समाज को अलग बांटकर उस पर विचार हमारा आध्यात्म नहीं करता। यह पश्चिमी विचारधारा है पर हम जब उस पर चल ही रहे हैं तो ‘पुरुष दिवस’ पर यह तो सोचना ही चाहिए कि अपना साम्राज्य कायम करने के लिए जो प्रयास विद्वान पुरुषों ने किये उसका परिणाम कोई उसकी नस्ल के लिए भी कोई अच्छा नहीं रहा यह बताने का वक्त आ गया है। माना जाता है कि पुरुष सक्षम है पर कितना?स्त्री से कहा जाता है कि अपने पति को भगवान जैसा समझना पर क्या वह उतना सक्षम कभी रहता है?”

आंकडे बताते हैं कि अधिकतर मामलों में पति पहले इस धरती से विदा होता है और पत्नी बाद में। वजह कहा जाता है कि उस पर तनाव अधिक रहता है-घर का और बाहर का। क्या यह स्त्री पर अपना साम्राज्य बनाए रखने से उपजता है? क्या पुरुष अपने घर के तनाव छिपाता नहीं है क्योंकि उससे उसकी समाज में हेठी होती है? क्या पुरुष होने से कई ऐसे तनाव नहीं सामने आते जिनका सामना स्त्री को नहीं करना पड़ता। हर संघर्ष पर उसका नाम होता है और जीत मिले तू उसकी जय-जय और हार जाये तो उसको ही हाय-हाय झेलने पड़ती है। इन सब पर विचार करने का कल वक्त है। निकला अपने अन्दर फैला तनाव। ऐसा दिन है जब महिलायें भी कोई आपति नहीं करेंगी।