Category Archives: हिंदी साहित्य

कवि से महाकवि-हिंदी व्यंग्य कविता (kavi se mahakavai-hindi satire poem


सामने से आती
बेईमान हवाओं की
उनको पहचान नहीं
है।
बहने को आतुर
सामना करते हुए
टिकते नहीं
उनकी रीढ़ की
हड्डी में
इतनी जान नहीं
है।
रंग बिरंगा आकाश
खरीदने की चाहत
है
अपने लिये ही
खुद के दिल में
शान नहीं है।
कहें दीपक बापू
आदर्श की बात
परीक्षा के लिये
रट लीं
पद और पैसे की
दौड़ में जुटे
अक्ल के अंधों
को
बाकी कुछ ध्यान
नहीं है।
———————–
 
राजमार्ग पर जो निकल गये
वह कवि से
महाकवि हो गये।उपाधियों का बोझ
जिनके सिर पर आया
उनके शब्द आमजन की सपंत्ति थे
विशिष्ट सभा में खो गये।

कहें दीपक बापू बिकती है कलम
बाज़ार में सस्ते भाव,
अपनी पंसद के शब्द
अपनी प्रशंसा के गीत पर
लगाते दौलतमंद दाव,
बिके जो रचनाकार प्रसिद्धि पाई
रहे स्वंतत्र उन्होंने सिद्धि पाई
यह अलग बात है
अपनी जिंदगी का बोझ
खाली हाथ ढो गये।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप 
ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh


वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

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गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

—————-

जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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साधू, शैतान और इन्टरनेट-हिंदी हास्य व्यंग्य कविता


शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक
और कहा
‘महाराज क्या ध्यान लगाते हो
भगवान के दिए शरीर को क्यों सुखाते हो
लो लाया हूँ टीवी मजे से देखो
कभी गाने तो कभी नृत्य देखो
इस दुनिया को भगवान् ने बनाया
चलाता तो मैं हूँ
इस सच से भला मुहँ क्यों छुपाते हो’

साधू ने नही सुना
शैतान चला गया
पर कभी फ्रिज तो कभी एसी ले आया
साधू ने कभी उस पर अपना मन नहीं ललचाया
एक दिन शैतान लाया कंप्यूटर
और बोला
‘महाराज यह तो काम की चीज है
इसे ही रख लो
अपने ध्यान और योग का काम
इसमें ही दर्ज कर लो
लोगों के बहुत काम आयेगा
आपको कुछ देने की मेरी
इच्छा भी पूर्ण होगी
आपका परोपकार का भी
लक्ष्य पूरा हो जायेगा
मेरा विचार सत्य है
इसमें नहीं मेरी कोई माया’

साधू ने इनकार करते हुए कहा
‘मैं तुझे जानता हूँ
कल तू इन्टरनेट कनेक्शन ले आयेगा
और छद्म नाम की किसी सुन्दरी से
चैट करने को उकसायेगा
मैं जानता हूँ तेरी माया’

शैतान एकदम उनके पाँव में गिर गया और बोला
‘महाराज, वाकई आप ज्ञानी और
ध्यानी हो
मैं यही करने वाला था
सबसे बड़ा इन्टरनेट तो आपके पास है
मैं इसलिये आपको कभी नहीं जीत पाया’
साधू उसकी बात सुनकर केवल मुस्कराया

आर.एस.एस. से भारत का प्रबुद्ध वर्ग दूर क्यों हुआ-हिन्दी लेख


राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने 10 नवंबर को अपने ही कुछ मुद्दों को लेकर देश भर में प्रदर्शन किया जो शायद इस किस्म का पहला आयोजन था । हम यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के इस प्रदर्शन के मुद्दों पर चर्चा नहीं कर रहे क्योंकि वह तात्कालिक विषयों के साथ ही राजनीतिक रूप से महत्व के हैं। न ही हम यहां राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का समर्थन या विरोध कर रहे हैं। चूंकि उसके सदस्य अपने  संगठन को सामाजिक संगठन मानते हैं इसलिये हम इस संगठन का भारतीय जनमानस में जो छबि उस पर विचार कर रहे हैं।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की छबि एक ऐसे सामाजिक संगठन की रही है जो राजनीति को समाज का ही एक हिस्सा मानकर उसमें भी दखल रखता है पर दिखना नहीं चाहता। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि यह संगठन कभी प्रत्यक्ष किसी सामाजिक या राजनीतिक गतिविधि में सक्रिय रहने के लिये प्रसिद्ध नहीं है। सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में वह अपने सक्रिय स्वयं सेवकं तथा अनुवर्ती  संगठन बनाकर काम करता है जो कि नीति निर्धारण तथा कार्यशैली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उच्च नेत्त्व के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हैं-सच क्या है पता नहीं पर प्रचार माध्यमों में ऐसा ही दिखता है। इसे हम यूं भी कहें कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मूल में बौद्धकता का प्रभाव है जिसमें सार्वजनिक सक्रियता या एक्शन न के बराबर दृष्टिगोचर होती है बस! उसकी उपस्थिति का आभास किया जाता है। अगर कोई सक्रियता दिखाई देती है तो वह बौद्धिक शिविर या महत्वपूर्ण पर्वों पर पथ संचालन तक ही सीमित है। लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक अदृश्य बौद्धिक संस्था के रूप में सक्रिय है पर समय की मांग है कि सक्रिय भूमिका या एक्शन के माध्यम से भी जनमानस को प्रभावित कर अपना संगठन आगे बढ़ाया जाये-ऐसा विचार उसके कुछ बुद्धिमान लोगों ने किया है। 10 नवंबर को उसके स्वयं सेवक जिस प्रदर्शन में भाग लिया  वह एक तरह का नया व्यवहार है पर इसके प्रभाव दूरगामी होंगे यह तय है और क्योंकि माना जाता है संघ के कर्ताधर्ता कोई भी कार्य या योजना भविष्य के दीर्घकालीन  परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए ही प्रारंभ करता है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने अनुवर्ती  संगठनों के माध्यम से कार्य करने में इतना कुशल है कि अगर उसके आलोचक विरोध न करें तो शायद भारतीय जनमानस और युवा वर्ग में उसका वह स्थान न रहे जो कि नैपथ्य की बौद्धिकता से अधिक सार्वजनिक सक्रियता या एक्शन से प्रभावित होता है। राष्ट्रीय स्वयं संघ को इसका लाभ यह मिलता है कि किसी अभियान या आंदोलन में सक्रियता से अगर सब ठीक है तो उसे श्रेय मिलता है पर अगर कुछ नाकामी है तो वह अपने  अनुवर्ती  सगंठनों के पदाधिकारियों को जवाबदेही के लिये आगे कर देता है। इससे संघ को यह लाभ तो हुआ कि उसकी छबि हमेशा धवल रही पर इसका नुक्सान यह हुआ कि प्रचार के इस युग में सक्रियता या एक्शन न होने की वजह से वह नयी पीढ़ी की दृष्टि से ओझल होता जा रहा है। यह तो उसके आलोचक गाहेबगाहे उसका विरोध कर उसका नाम जनमानस में बनाये हुए हैं वरना अपने स्वयं सेवकों के सहारे उसका प्रचार नगण्य है हालांकि वह समाज में चेतना लाने का काम करते हैं।
संघ के कर्णधार अपनी गिरती सदस्य संख्या से चिंतित हैं और उसे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। यह स्थिति तब है जब आज भी भारतीय जनमानस और पुराने प्रबुद्ध वर्ग में उसकी छबि धवल और बौद्धिकता से संपन्न मानी जाती है। आज भी पुरानी पीढ़ी के अनेक प्रबुद्ध लोग हैं जो संघ  का नाम सम्मान से लेते हैं। तब ऐसा क्या हो गया कि संघ अपनी घटती साख तथा सदस्य संख्या जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।
यह कहना तो ठीक नहीं है कि संघ के बुद्धिमान लोग उन सच्चाईयों से अवगत नहीं है जिनसे यह समस्यायें पैदा हुई हैं पर प्रचार से दूर रहने वाले इस संगठन के मंचों से ऐसा होने का प्रमाण नहीं मिलता। समूचे भारत में आधुनिक समाज का सपना देखने वाले संघ के बुद्धिमान नियंत्रणकर्ता यह तय नहीं कर पा रहे कि संघ को अनुवर्ती  संगठनों के माध्यम से आगे बढ़ायें या स्वयं यह काम करें। जब वह आज अपनी शाखाओं में युवा सदस्यों की कम संख्या देखते हैं तो निराशा उनको होती होगी पर यह भूल जाते हैं कि उसके अनुवर्ती  संगठन ही उसके प्रतिद्वंद्वी हैं क्योंकि वह नेपथ्य में नहीं वरन् लोगों की आंखों के सामने सक्रिय या एक्शन करते नज़र आते हैं। धर्म, शिक्षा, राजनीति, श्रम संगठन तथा साहित्य संस्थाओं में सक्रिय संघ के नाम लेकर ही चल रहे हैं जिसकी धवल छबि से उनको समाज  सहानुभूति के साथ युवा वर्ग के  सदस्य  मिल भी जाते हैं। संघ ने जो 10 नवंबर को प्रदर्शन किया उसमें भी इन्ही अनुवर्ती  संगठनों के कर्ताधर्ताओं ने ही कार्यकर्ता जुटाये होंगे इसमें संदेह नहीं है क्योंकि उनके मंचों पर धर्म से जुड़ी संस्थाओं के लोग भी बैठे थे। इस देश में प्रबुद्ध वर्ग के अनेक ऐसे लोग हैं जो संघ के अस्तित्व बने रहने की आवश्यकता इस देश के प्रबुद्ध वर्ग के अनेक लेखक, बुद्धिजीवी और जागरुक नागरिक अनुभव करते हैं पर उससे पूरे होने वाले लक्ष्य वह नहीं जानते। अगर जानते हैं तो कहते नहीं है क्योंकि संघ में दोतरफा संवाद का अभाव है और उच्च स्तर से निर्णय लेकर नीचे नियमित सदस्यों तथा अनुवर्ती  संगठनों का संचालन किया जाता है-ऐसा इससे जुड़े लोग कहते हैं। यह तब तक ही ठीक था जब राजनीति और शिक्षा में सक्रिय उसके अनुवर्ती   संगठन सीमित लक्ष्य और साधनों से काम रहे थे। अब वह सभी आर्थिक, सामाजिक, राजनीति तथा सदस्य की दृष्टि से इतने शक्तिशाली हो गये हैं कि संघ का आकर्षण उनके फीका पड़ जाता है। रामजन्मभूमि आंदोलन के चलते उसके धार्मिक संगठनों ने बहुत प्रचार पाया और यही संघ के लिये परेशानी का सबब बना। उसके बाद तो संघ के अनुवांषिक संगठनों ने भारत में राजनीति, धर्म, व्यापार तथा समाज के क्षेत्र में अपनी छबि बनायी और उसका भौतिक लाभ भी लेकर शक्ति अर्जित की। मगर याद रखने लायक बात यह है कि केवल संघ के नियमित सदस्यों की बौद्धिकता या उसके अनुवर्ती  संगठनों की आक्रमकता की वजह से यह रथ नहीं चला बल्कि देश के अनेक स्वंतत्र, मौलिक तथा निष्कामी बुद्धिजीवियों ने संघ और उसके  अनुवर्ती   संगठनों को निस्वार्थ सहानुभूति दी। संघ के आलोचक खुलकर यह बात कहते हैं कि उसने कोई ऐजेंडा नहीं बनाया बल्कि जो प्रचार में आया उसे जब्त कर लिया। मतलब यह कि देश के अनेक स्वतंत्र बुद्धिजीवियों का ऐजेंडा स्वाभाविक रूप से संघ से मिल गया। देखते देखते राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ सत्ता के गलियारों में एक ताकत बन गया मगर नेपथ्य में रहने की उसकी परंपरा ने उसे यहीं घोखा दिया। भारत ही नहीं विश्व जनमानस  का यह स्वभाव है कि वह नेपथ्य की बजाय पर्दे पर सक्रिय या एक्शन करने वाले पात्र को ही मान्यता देता है। राष्ट्रीय स्वयं संघ के बुद्धिमान लोग कह सकते हैं कि हमारा सत्ता से क्या लेना देना? मगर क्या इसे सभी मान लेंगे, यह नहीं माना  जा सकता है।
मगर जब आप समाज को सुधारने की बात कहते हैं तो सत्ता उसका एक साधन हुआ करती है और अध्यात्म तथा समाज पर दृष्टि रखने वाले प्रबुद्ध वर्ग को आप भरमा नहीं सकते। फिर भारत जैसे देश में जहां अनेक राजा भगवान का दर्जा प्राप्त कर गये वहां इस तरह की बात जमती नहीं। दूसरी बात यह कि जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने सदस्यों को समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं में जाने के लिये उतार रहा है तब वह इस बात को भूल रहा था कि लोग उसकी साख के कारण  उसके   अनुवर्ती  संगठनों को समर्थन दे रहे हैं। भले ही संघ के कर्ताधर्ता यह दावा करते हैं कि उसके  अनुवर्ती  संगठन स्वतंत्र रूप से काम करते हैं पर स्वतंत्र और मौलिक प्रबुद्ध वर्ग के लिये यह कथन अधिक महत्व नहीं रखता था क्योंकि वह मानकर चल रहा था कि संघ अपने अनुवर्ती  संगठनों पर नियंत्रण करेगा दिखाने के लिये कुछ भी कहा जा रहा हो-दूसरे शब्दों में कहें तो यह उसके प्रति ही यह एक बहुत बड़ा विश्वास था। बाद में दखल न देने के दावे ने उसकी दृढ़ छबि को हानि पहुंचाई क्योंकि निष्पक्ष तथा स्वतंत्र प्रबुद्ध वर्ग उसे अप्रत्यक्ष से दखल देता हुए देखना चाहते थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कर्ताधर्ता इस बात का अनुमान करते नहीं दिखते कि उनके सदस्यों से अधिक संख्या तो उनके ऐसे समर्थकों की रही है जो उसके कार्यक्रमों या शाखाओं में आते ही नहीं बल्कि आम आदमी के बीच आम आदमी की तरह अपनी दिनचर्या निभाते हैं। उन्हें लाभ की कोई चाहत नहीं थी बल्कि देश में एक मज़बूत समाज देखना की इच्छा ने उनके अंदर संघ के प्रति सहानुभूति पैदा की। यही वर्ग उसके प्रति उदासीन हो गया है। एक तरह से कहें तो आम आदमी और संघ के कार्यकर्ता का अंतर भी अनेक जगह खत्म हो गया था।
ऐसे ही संघ को आज जब भारतीय जनमानस की उदासीनता का सामना करना पड़ रहा है तो कहना पड़ता है कि समय बलवान है। यहां संघ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठते हैं। जब संघ और उसके अनुवर्ती संगठन शिखर पर थे तब उनके आकर्षण की वजह से युवा पीढ़ी उनकी तरफ गयी और यकीनन इसका प्रभाव उसकी शाखाओं में जाने वाले सदस्यों की कमी के रूप में प्रकट हुआ होगा। दूसरा यह भी राज्य और समाज पर नियंत्रण के दौरान ऊंच नीच होता है और उसका परिणाम उनमें काम करने वालों को भोगना होता है पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मामले में अपने ही अनुवर्ती  संगठनों के असंतोष दुष्प्रभाव उसे ही झेलना पड़ा। मतलब संघ के कर्ताधर्ता भले ही राजनीति की काज़ल काली कोठरी से दूर रहने का दावा करते रहे हों पर उनके समर्थक इसे मानने को राजी नहीं थे। देश के स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा मौलिक विचारों के प्रबुद्ध लोगों का मानना था कि न केवल इस संगठनों पर काबू रखे बल्कि वह दिखे भी। वह चाहते थे कि संघ से बड़ा उसका  अनुवर्ती संगठन नहीं होना चाहिए। मगर कहते हैं कि राजकाज तो काज़ल की कोठरी है वहां से कोई सफेद नहीं निकल सकता। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के  अनुवर्ती संगठनों को न केवल अपने सदस्यों बल्कि स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा मौलिक विचारों वाले बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला पर उन्होंने इस बात की परवाह नहीं की न संघ इसके लिये उनको बाध्य कर सका।
देखते देखते क्या हो गया? संघ के कार्यकर्ता सम्मानीय होते थे। उनसे मित्रता होना अच्छी बात समझी जाती थी। मगर इधर  अनुवर्ती  संगठनों में ऐसे लोग आ गये तो बौद्धिकता से अधिक शक्ति  के पूजक हैं। अगर हम घटनाओं का विस्तार करेंगे तो अंबार लग जायेगा पर संक्षेप में इतना कह सकते हैं कि देश के प्रबुद्ध वर्ग ने देखा कि अब राष्ट्रीय स्वयं संघ संघ के पुराने और बौद्धिक कार्यकर्ताओं से समाज को कोई मदद नहीं मिल सकती और उसके आनुवांषिक संगठनों की ताकत इतनी बढ़ गयी है जिसकी मस्ती में उनकी कार्यशैली वैसी हो गयी जिनकी आलोचना संघ का बौद्धिक वर्ग करता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कर्ताधर्ता भूल गये कि वह अपने अनुवर्ती  संगठनों को दिखावे की स्वतंत्रता देना देश के स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रबुद्ध वर्ग को स्वीकार्य है पर वास्तविकता में वह न है और न होना चाहिए। मतलब यह कि  अनुवर्ती  संगठनों की शक्ति बढ़ी तो संघ की भी बढ़ती दिखना चाहिये। संघ प्रत्यक्ष रूप से कहीं दखल न दे पर अप्रत्यक्ष रूप से दिखना चाहिए। ऐसा हुआ कि नहीं पर यह तय है कि संघ की साख पर ही उसके संगठन आगे बढ़े थे और अगर उन पर कुछ दाग लगे तो संघ उससे बच नहीं सकता। जब संघ अपने अनुवर्ती  संगठनों को आगे बढ़ा रहा था तब प्रबुद्ध वर्ग उसे आगे बढ़ता देख रहा था। उसकी इस कार्यशैली पर कोई आपत्ति नहीं थी पर इसका मतलब यह नहीं कि संघ का यह दावा कि उसके अनुवर्ती  संगठन स्वतंत्र है मान ली जाये-प्रबुद्ध वर्ग यह स्वीकार कर भी नहीं सकता क्योंकि वह संघ की साख पर ही उनको अपनी सहानुभूति दे रहे था। सीधी बात कहें कि संघ कितना भी कहे वह अनुवर्ती  संगठनों को स्वतंत्र दे पर उसका नियंत्रक वही दिखना चाहिये।
स्थिति आज भी यही है कि संघ के अनुवर्ती  संगठनों के आलोचक संघ को निशाना बनाते हैं तब उसके समर्थक खामोश बैठ जाते हैं। पुराना प्रबुद्ध वर्ग तो यह सोचकर निराश हो जाता है कि संघ भले ही प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं दिख रहा था पर अप्रत्यक्ष रूप से उसे दृढ़तापूर्वक अपनी भूमिका निभानी थी तो नया वर्ग तो वैसे भी सक्रियता या एक्शन देखकर प्रभावित होता है ऐसे में संघ की सदस्य संख्या और साख में कमी दर्ज हुई तो कोई आश्चर्य नहीं है। ऐसे में संघ के  अनुवर्ती  संगठनों के कुछ सदस्यों के हिंसा में लिप्त होने के आरोप उसके लिये चिंता की बात है क्योंकि जो लक्ष्य राजनीतिक शक्ति होने पर प्राप्त किये जा सकते हैं उसके लिये हिंसा की आवश्यकता नहीं है-भारतीय जनमानस इतना मूर्ख नहीं है कि वह यह बात नहीं जानता। संघ के कर्ताधर्ता जानते हैं कि यह समाज ऐसी हिंसा को मान्यता नहीं देता। यही कारण है कि संघ के कार्यधर्ता इस बात को मान रहे हैं कि उनका हिंसा में विश्वास नहीं है। हालांकि जनमानस में विश्वास बढ़ाने के लिये उनको अभी बहुत कुछ करना है। अभी इस विषय पर इतना ही लिख रहे हैं। अगली कड़ी भी लिखी जा सकती है अगर इसका कोई सख्त विरोध नहीं हुआ। यहां संघ समर्थक इस बात का ध्यान रखें कि यह एक स्वतंत्र, निष्पक्ष तथा मौलिक लेखक का पाठ है जो संघ का कार्यकर्ता नहीं रहा पर उसके कार्यक्रमों के समाचारों में बाहर बैठकर रुचि लेता रहा है। इस लेखक का संघ को सिखाने या समझाने का कोई इरादा भी नहीं है। यह एक चर्चा है तो मन में आयी लिख दी। ऐसा लगता है कि कुछ छूट रहा है और उसे अगली कड़ी में लिखने का प्रयास करेंगे। कब मालुम नहीं।

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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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आतंकवाद से लड़ने के दावे-हास्य कविता और चिंत्तन लेख


आतंकवाद एक व्यापार है, और यह संभव नहीं है कि बिना पैसे लिये कोई आतंक फैलाता हो। अभी अखबार में एक खबर पढ़ी थी कि उत्तरपूर्व में केंद्र सरकार ने आर्थिक विकास के लिये जो धन दिया उसमें से कुछ आतंकी संगठनों के पास पहुंचा जिससे आतंकियों ने हथियार खरीदे। स्पष्टतः इन हथियारों का पैसा उसके निर्माताओं को मिला होगा। इस संबंध में केंद्रीय खुफिया ऐजेंसियों की जानकारी के आधार पर कुछ सरकारी अधिकारियों, ठेकेदारों तथा अन्य लोगों के खिलाफ़ मामला दर्ज किया गया है और यकीनन यह इस तरह के सफेदपोश लोग हैं जो कहीं न कहीं समाज में अपना चेहरा पाक साफ दिखते हैं। जब आतंक की बात आती है तो चंद मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रभावित क्षेत्रों में धर्म और धन के आधार पर शोषण का आरोप लगाते हैं पर जब विकास के धन से आतंक को सहायता मिलती है तो उस पर खामोश हो जाते हैं।
ऐसे में आतंक को रंग से पहचाने वाले बुद्धिजीवियों पर तरस आता है पर उनको भी क्या दोष दें। सभी किसी न किसी रंग से प्रायोजित हैं और उनको अपने प्रायोजकों की बज़ानी है। एक स्वतंत्र और मौलिक लेखक होने के नाते हमने तो यह अनुभव किया है कि संगठित प्रचार माध्यमों-टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा रेडियो-में हमें जगह इसलिये नहीं मिल पाई क्योंकि किसी रंग ने प्रयोजित नहीं किया। हम इस पर अफसोस नहीं जता रहे बल्कि अपने जैसे स्वतंत्र लेखकों ओर पाठकों को यह समझा रहे हैं कि जब किसी आतंकवाद या उग्र आंदोलन का समर्थक कोई प्रसिद्ध बुद्धिजीवी बयान दे तो समझ लें कि वह दौलतमंदों का प्रयोजित बुत बोल रहा है। यकीनन उसे प्रयोजित करने वाला कोई ऐसा दौलतमंद ही हो सकता है जो अपने रंग की रक्षा केवल इसलिये करना चाहता है जिससे कि उसके काले धंधे चलते रहें। पहले गुस्सा आता था पर अब हंसी आती है जब आतंक या उग्रता की पहचान लिये आंदोलनों के समर्थक बुद्धिजीवी बयान देते हैंे और समझते हैं कि कोई इस बात को जानता नहीं है। एक रंग समर्थक बुद्धिजीवी उग्र बयान देता है तो उस पर अनेक बयान आने लगते हैं इस तरह आतंक के साथ ही उस पर बयान और बहस भी प्रचार का व्यापार हो गये हैं।
इस पर एक हास्य कविता लिखने का मन था पर लगा कि उसमें पूरी बात नहीं कह पायेंगे इसलिये यह गद्य भी लिखकर मन की भड़ास निकाल दी। इसका उद्देश्य यही है कि दुनियां भर के सभी शासक आतंकवाद से लड़ने का दावा करते हैं पर वह है कि बढ़ता ही जा रहा है। स्पष्टतः ऐसे में जिम्मेदार लोगों की अकुशलता, कुप्रबंधन के साथ इसमें कहीं न कहीं सहभागिता का भी शक होता है। सभी देश अपने अपने ढंग से आतंकवाद को समझ रहे हैं इसलिये लड़ कोई नहीं रहा। दावे केवल दावे लगते हैं
इस पर यह एक बेतुकी हास्य कविता प्रस्तुत है।

पोते ने दादा से कहा
‘‘बड़ा होकर मैं भी आतंकवादी बनूंगा
क्योंकि उनके साक्षात्कार टीवी पर आते हैं,
समाचारों में भी वह छाते हैं,
पूरी दुनियां में मेरा नाम छा जायेगा।
अमेरिका भी मुझसे घबड़ायेगा।’’

तब दादा ने हंसते हुए कहा
‘‘बेटा, यह क्या सपना तूने पाल लिया,
आतंकवादी सबसे बड़ा है यह कैसे मान लिया,
तू मादक द्रव्य का तस्कर बन जाना,
चाहे तो क्रिकेट पर सट्टा भी लगवाना,
मन में आये तो जुआ घर खोल देना,
अपहरण उद्योग भी बुरा नहीं है,
अपहृत के बदले भारी रकम मोल लेना,
जब ढेर सारा पैसा तेरे पास आयेगा,
तब क्या पहरेदार, क्या चोर,
आतंकवादी भी तेरे आगे सिर झुकायेगा।
बेटा, यह भी एक व्यापार है,
पर इसमें खतरे अपार हैं,
धंधा चाहे काला हो
पर दौलत होगी तो
हमेशा अपने को सफेदपोश पायेगा,
आतंकी बनकर भी रहेगा गुलाम,
हर कोई अपना रंग तुझ पर चढ़ायेगा।
टीवी पर चेहरा आने ,
या अखबार में खबर छप जाने पर
तेरे को चैन नहीं आयेगा,
मरने का डर तेरे को सतायेगा,
काम निकल जाने पर प्रायोजक ही

तेरा बैरी होकर ज़माने का नायक बन जायेगा
पहले तेरे को मरवायेगा,
या फिर इधर से उधर दौड़ाते हुए
तेरा पीछा करते अपने को दिखायेगा।
मेरी सलाह है
न तो सफेदपोश प्रयोजक बन,
न आतंकवादी होकर तन,
अपना छोटा धंधा या नौकरी करना,
चाहे तो कविता लिखना
या चित्र बनाकर उसमें रंग भरना,
दूसरे खुश हो या नहीं
तुम अपने होने का खुद करना अहसास,
दिल की खुशी का बाहर नहीं अंदर ही है वास,
ऐसा चेहरा रखना अपना
जो खुद आईने में देख सके,
दौलत, शौहरत और ताकत में
अंधे समाज को भला क्या दिखायेगा।
मुझे गर्व होगा तब भी जब
आतंकवादी की तरह प्रसिद्ध न होकर
अज्ञात श्रमजीवी की सूची में अपना नाम लिखायेगा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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