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नेपाल की उठापठक और हिंदुत्व-हिंदी लेख


नेपाल कभी हिन्दू राष्ट्र था जिसे अब धर्मनिरपेक्ष घोषित किया गया है। वहां की निवासिनी और भारतीय हिन्दी फिल्मों की अभिनेत्री मनीक्षा कोइराला ने अब जाकर इसकी आलोचना की है। उनका मानना है कि नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्र ही होना चाहिए था। दरअसल नेपाल की यह स्थिति इसलिये बनी क्योंकि वह राजशाही का पतन हो गया। वहां के राजा को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता था या हम कहें कि उनको ऐसी प्रतिष्ठा दी जाती थी। दूसरी बात यह है कि नेपाल के हिन्दू राष्ट्र के पतन को एक व्यापक रूप में देखा जाना चाहिए न कि इसके केवल सैद्धान्तिक स्वरूप पर नारे लगाकर भ्रम फैलाना चाहिये। इसलिये यह जरूरी है कि हम हिन्दुत्व की मूल अवधारणाओं को समझें।
वैसे हिन्दुत्व कोई विचाराधारा नहीं है और न ही यह कोई नारा है। अगर हम थोड़ा विस्तार से देखें तो हिन्दुत्व दूसरे रूप में प्राकृतिक रूप से मनुष्य को जीने की शिक्षा देने वाला एक समग्र दर्शन है। अंग्रेजों और मुगलों ने इसी हिन्दुत्व को कुचलते हुए भारतवर्ष में राज्य किया किया। अनेक डकैत और खलासी यहां आकर राजा या बादशाह बन गये। अंग्रेजों ने तो अपनी ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे कि यहां का आदमी उनके जाने के बाद भी उनकी गुलामी कर रहा है। देश के शिक्षित युवक युवतियां इस बात के लिये बेताब रहते हैं कि कब उनको अवसर मिले और अमेरिका या ब्रिटेन में जाकर वहां के निवासियों की गुलामी का अवसर मिले।
मुगलों और अंग्रेजों ने यहां के उच्च वर्ग में शासक बनने की ऐसी प्रवृत्ति जगा दी है कि वह गुलामी को ही शासन समझने लगे हैं। अक्सर समाचार पत्र पत्रिकाओं में ऐसी खबरे आती हैं कि अमुक भारतवंशी को नोबल मिला या अमुक को अमेरिका का यह पुरस्कार मिला। अमुक व्यक्ति अमेरिका की वैज्ञानिक संस्था में यह काम कर रहा है-ऐसी उपलब्धियों को यहां प्रचार कर यह साबित किया जाता है कि यहां एक तरह से नकारा और अज्ञानी लोग रहते हैं। सीधी भाषा में बात कहें तो कि अगर आप बाहर अपनी सिद्धि दिखायें तभी यहां आपको सिद्ध माना जायेगा। उससे भी बड़ी बात यह है कि आप अंग्रेजी में लिख या बोलकर विदेशियों को प्रभावित करें तभी आपकी योग्यता की प्रमाणिकता यहां स्वीकार की जायेगी। नतीजा यह है कि यहां का हर प्रतिभाशाली आदमी यह सोचकर विदेश का मुंह ताकता है कि वहां के प्रमाणपत्र के बिना अपने देश में नाम और नामा तो मिल ही नहीं सकता।
मुगलों ने यहां के लोगों की सोच को कुंद किया तो अंग्रेज अक्ल ही उठाकर ले गये। परिणाम यह हुआ कि समाज का मार्ग दर्शन करने का जिम्मा ढोने वाला बौद्धिक वर्ग विदेशी विचाराधाराओं के आधार पर यहां पहले अपना आधार बनाकर फिर समाज को समझाना चाहता है। कहने को विदेशी विचारधाराओं की भी ढेर सारी किताबें हैं पर मनुष्य को एकदम बेवकूफ मानकर लिखी गयी हैं। उनके रचयिताओं की नज़र में मनुष्य को सभ्य जीवन बिताने के लिये ऐसे ही सिखाने की जरूरत है जैसे पालतु कुत्ते या बिल्ली को मालिक सिखाता है। मनुष्य में मनुष्य होने के कारण कुछ गुण स्वाभाविक रूप से होते हैं और उसे अनेक बातें सिखाने की जरूरत नहीं है। जैसे कि अहिंसा, परोपकार, प्रेम तथा चिंतन करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। कोई भी मनुष्य मुट्ठी भींचकर अधिक देर तक नहीं बैठ सकता। उसे वह खोलनी ही पड़ती हैं।
चार साल का बच्चा घर के बाहर खड़ा है। कोई पथिक उससे पीने के लिये पानी मांगता है। वह बिना किसी सोच के उसे अपने घर के अंदर से पानी लाकर देता है। उस बच्चे ने न तो को पवित्र पुस्तक पढ़ी है और न ही उसे किसी ने सिखाया है कि ‘प्यासे को पानी पिलाना चाहिये’ फिर भी वह करता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपनी सहज प्रवृत्तियों की वजह से सज्जन तो रहता ही है पर समाज का एक वर्ग उसकी जेब से पैसा निकालने या उससे सस्ता श्रम कराने के लिये उसे असहज बनाने का हर समय प्रयास करता है। विदेशी विचारधाराओं तथा बाजार से मनुष्य को काल्पनिक स्वप्न तथा सुख दिखकार उसे असहज बनाने का हमारे देश के लोगों ने ही किया है। इन्ही विचाराधाराओं में एक है साम्यवाद।
इसी साम्यवादी की प्रतिलिपि है समाजवाद। इनकी छत्रछाया में ही बुद्धिजीवियों के भी दो वर्ग बने हैं-जनवादी तथा प्रगतिशील। नेपाल को साम्यवादियों ने अपने लपेटे में लिया और उसका हिन्दुत्व का स्वरूप नष्ट कर दिया। सारी दुनियां को सुखी बनाने का ख्वाब दिखाने वाली साम्यवादी और समाजवादी विचारधाराओं में मूल में क्या है, इस पर अधिक लिखना बेकार है पर इनकी राह पर चले समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने अपने अलावा किसी को खुश रखने का प्रयास नहीं किया। सारी दुनियां में एक जैसे लोग हो कैसे सकते हैं जब प्रकृत्ति ने उनको एक जैसा नहीं बनाया जबकि कथित विकासवादी बुद्धिजीवी ऐसे ही सपने बेचते हैं।
अब बात करें हम हिन्दुत्व की। हिन्दुत्व वादी समाज सेवक और बुद्धिजीवी भी बातें खूब करते हैं पर उनकी कार्य और विचार शैली जनवादियों और प्रगतिशीलों से उधार ली गयी लगती है। हिन्दुत्व को विचाराधारा बताते हुए वह भी उनकी तरह नारे गढ़ने लगते हैं। नेपाल में हिन्दुत्व के पतन के लिये साम्यवाद या जनवाद पर दोषारोपण करने के पहले इस बात भी विचार करना चाहिये कि वहां के हिन्दू समाज की बहुलता होते हुए भी ऐसा क्यों हुआ?
हिन्दुत्व एक प्राकृतिक विचाराधारा है। हिन्दू दर्शन समाज के हर वर्ग को अपनी जिम्मेदारी बताता है। सबसे अधिक जिम्मेदारी श्रेष्ठ वर्ग पर आती है। यह जिम्मेदारी उसे उठाना भी चाहिए क्योंकि समाज की सुरक्षा से ही उसकी सुरक्षा अधिक होती है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग्य बुद्धिजीवियों को संरक्षण देने के साथ ही गरीब और मजदूर वर्ग का पालन करे। यही कारण है कि हमारे यहां दान को महत्व दिया गया है। श्रीमद्भागवत गीता में अकुशल श्रम को हेय समझना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।
मगर हुआ क्या? हिन्दू समाज के शिखर पुरुषों ने विदेशियों की संगत करते हुए मान लिया कि समाज कल्याण तो केवल राज्य का विषय है। यहीं से शुरु होती है हिन्दुत्व के पतन की कहानी जिसका नेपाल एक प्रतीक बना। आर्थिक शिखर पुरुषों ने अपना पूरा ध्यान धन संचय पर केंद्रित किया फिर अपनी सुरक्षा के लिये अपराधियों का भी महिमा मंडन किया। भारत के अनेक अपराधी नेपाल के रास्ते अपना काम चलाते रहे। वहां गैर हिन्दुओं ने मध्य एशिया के देशों के सहारे अपना शक्ति बढ़ा ली। फिर चीन उनका संरक्षक बना। यहां एक बात याद रखने लायक है कि अनेक अमेरिकी मानते हैं कि चीन के विकास में अपराध से कमाये पैसे का बड़ा योगदान है।
भारत के शिखर पुरुष अगर नेपाल पर ध्यान देते तो शायद ऐसा नहीं होता पर जिस तरह अपने देश में भी अपराधियों का महिमामंडन देखा जाता है उससे देखते हुए यह आशा करना ही बेकार है। सबसे बड़ी बात यह है कि नेपाल की आम जनता ने ही आखिर ऐसी बेरुखी क्यों दिखाई? तय बात है कि हिन्दुत्व की विचारधारा मानने वालों से उसको कोई आसरा नही मिला होगा। नेपाल और भारत के हिन्दुत्ववादी आर्थिक शिखर पुरुष दोनों ही देशों के समाजों को विचारधारा के अनुसार चलाते तो शायद ऐसा नहीं होता। हिन्दुत्व एक विचाराधारा नहीं है बल्कि एक दर्शन है। उसके अनुसार धनी, बुद्धिमान और शक्तिशाली वर्ग के लोगों को प्रत्यक्ष रूप से निम्न वर्ग का संरक्षण करना चाहिये। कुशल और अकुशल श्रम को समान दृष्टि से देखना चाहिये पर पाश्चात्य सभ्यता को ओढ़ चुका समाज यह नहीं समझता। यहां तो सभी अंग्रेजों जैसे साहब बनना चाहते हैं। जो गरीब या मजदूर तबका है उसे तो कीड़े मकौड़ों की तरह समझा जाता है। इस बात को भुला दिया गया है कि धर्म की रक्षा यही गरीब और मजदूर वर्ग अपने खून और पसीने से लड़कर समाज रक्षा करता है।
हमारे देश में कई ऐसे संगठन हैं जो हिन्दुत्व की विचारधारा अपनाते हुए अब गरीबों और मजदूरों के संरक्षण कर रहे हैं। उनको चाहिये कि वह अपने कार्य का विस्तार करें और भारत से बाहर भी अपनी भूमिका निभायें पर वह केवल नारे लगाने तक नहीं रहना चाहिये। इन हिन्दू संगठनों को परिणामों में शीघ्रता की आशा न करते हुए दूरदृष्टि से अपने कार्यक्रम बनाना चाहिये।
नेपाल का हिन्दू राष्ट्र न रहना इतनी बड़ी समस्या नहीं है जितनी परेशानी इस बात पर होने वाली है कि वह एक अप्राकृतिक विचाराधारा की तरफ बढ़ गया है जो वहां की संस्कृति और धर्म के वैसे ही नष्ट कर डालेगी जैसे कि चीन में किया है। भारत और नेपाल के आपस में जैसे घनिष्ट संबंध हैं उसे देखते हुए यहां के आर्थिक, सामाजिक तथा बौद्धिक शिखर पुरुषों को उस पर ध्यान देना चाहिये।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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अच्छी फिल्म को सामान्य दर्शक ही हिट बनाते हैं-हिन्दी लेख


एक फिल्म बनी थी संतोषी मां! वह इतनी जोरदार हिट हुई थी कि उसके निर्माताओं की चांदी हो गयी। उसकी इतनी जोरदार सफलता की आशा तो उसके निर्माता निर्देशक तक ने  भी नहीं की।  वह फिल्म महिलाओं को बहुत पसंद आयी और वह दोपहर के शो में अपने घर का निपटाकर मोहल्ले से झुंड बनाकर  देखने जाती थीं।  हमारे शहर में वह फिल्म एक ऐसे थिऐटर में लगी जिसमें पुरानी फिल्में ही लगती थीं। उसका फर्नीचर भी निहायत घटिया था।  कम से कम वह थियेटर इस लायक नहीं था कि अमीर और  गरीब दोनों वर्ग की महिलायें वहां जाना पसंद करें। इसलिये उसमें नई फिल्में नहीं  लगती थीं। संतोषी मां एक छोटे बजट  की धार्मिक फिल्म थी इसलिये कम दर के कारण उसे वह थियेटर मिल गया।
भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में कहीं भी संतोषी मां नाम का पात्र नहीं मिलता, मगर धर्म का ऐसा महत्व है कि वह फिल्म पूरे देश में एतिहासिक कीर्तिमान बनाती रही।  कोई प्रचार नहीं! जो फिल्म देखकर आया उसने दूसरे को बताया और दूसरे ने तीसरे को। साथ ही यह भी बात फैलती रही  एक शहर से दूसरे और दूसरे से तीसरे! आज का  टीवी, रेडियो या अखबार का प्रचार उसके सामने फीका लगता है।  उस फिल्म के बाद ही हमारे देश में शुक्रवार को माता का व्रत रखने का सिलसिला शुरु हुआ जो आज तक जारी है।  एक फिल्म क्या कर सकती है ‘संतोषी मां’ इसका प्रमाण है। साथ ही यह भी कि अगर फिल्म में दम हो तो  वह बिना प्रचार के ही चल सकती है।
आजकल मुंबईया फिल्मों को पहले दिन के दर्शक जुटाने के लिये भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है। इसका कारण  है कि देश में मनोरंजन के ढेर सारे साधन हैं और इतने सारे विकल्प हैं कि थोक भाव में लोगों का पहले दिन मिलना मुश्किल काम है।  यही कारण है कि आजकल फिल्मों के प्रसारण से पहले उससे विवाद जोड़ने का प्रचलन शुरु हुआ है। वैसे वह ऐसा न भी करें तो भी फिल्मों को पहले दिन दर्शक मिल जायेंगे।  समस्या तो अगले दिनों की है।
अधिकतर फिल्मी विशेषज्ञ सप्ताह भर के आंकड़ों पर ही फिल्म की सफलता और असफलता का विश्लेषण करते हैं। एक आम आदमी के रूप हमारे लिये किसी  फिल्म की सफलता का आधार यह होता है कि आम  लोग  कितने महीनों तक उसे याद रखते हैं। शोले, सन्यासी, त्रिशुल, दीवार, राम और श्याम, जंजीर और अन्य कई फिल्में ऐसी हैं जिनको लोग आज तक याद करते हैं। अमिताभ बच्चन को इसलिये ही सर्वाधिक सफल माना जाता है क्योंकि उनकी सबसे अधिक यादगार फिल्में हैं।  देखा जाये तो उनके बाद अनिल कपूर ही ऐसे हैं जो सुपर स्टार की पदवी पर रहे।  उनके बाद के अभिनेताओं की फिल्में यादगार नहीं रही।  यही कारण है कि आज के अभिनेता अपनी यादगार इतिहास में बनाये रखने  के लिये आस्कर आदि जैसे विदेशी पुरस्कारों का मुंह जोहते हैं।
अभी हाल ही में दो फिल्में रिलीज हुई। उनको लेकर ढेर सारा विवाद खड़ा हुआ। विशेषज्ञ मानते हैं कि वह भीड़ खींचने के लिये किया गया।  अभी दूसरी  फिल्म का परिणाम तो आना है पर पहले वाली फिल्म का नाम तक लोग भूल गये हैं ।
दरअसल किसी भी फिल्म को पहले और दूसरे दिन फिल्म देखने वाले दर्शक ही उसके भविष्य का निर्माता भी होते हैं क्योंकि वह बाहर आकर जब लोगों का अपना विचार बताते हैं तब अन्य दर्शक वर्ग देखने जाता है। विवादों की वजह से शुरुआती एक या दो दिन अच्छे दर्शक मिल जाते हैं पर  बाद फिल्म की विषय सामग्री ही उसे चला सकती है।
यहां हो यह रहा है कि फिल्म आने से पहले उसका विवाद खड़ा किया जाता है। लोग देखने पहुंचते हैं तो पता लगता है कि ‘सामान्य फिल्म’ है और उनकी यह निराशा अन्य दर्शकों को वहां नहीं पहुंचने देती।  किसी फिल्म की सफलता इस आधार पर विश्लेषक देखते हैं कि उसने कितना राजस्व फिल्म उद्योग को दिलवाया।  अगर विश्लेषकों की बात माने तो अनेक बहुचर्चित फिल्में इस प्रयास में नाकाम रही हैं।  किसी हीरो की लोकप्रियता का भी यही आधार है और इसमें अनेक अभिनेता सफल नहीं हैं।  एक मजे की बात है कि एक दो वर्ष पहले अक्षय कुमार के बारे में कहीं हमने पढ़ा था कि वह सबसे अधिक कमाई फिल्म उद्योग को कराने वाला कलाकार है-जबकि प्रचार में अन्य कलाकारों को बताया जा रहा था।   हालांकि उनकी आखिरी फिल्म भी फ्लाप हो गयी जो कि उनके साथ बहुत कम होता है-फिल्म उद्योग में अधिक राजस्व दिलाने में उनका क्या योगदान है यह भी अब पता नहीं है।  
कहने का अभिप्राय यह है  किसी फिल्म पर एक या दो दिन में अपनी कोई राय कायम नहीं की जा सकती।  अभी हाल ही में विवादों से प्रचार पा चुकी दो फिल्मों के बारे में देखने वालों की यह टिप्पणी है कि वह अत्यंत साधारण हैं। यकीनन यह बात उनके आगामी दर्शकों का मार्ग रोकेगी।
हमारा दूसरा ही अपना आधार है। वह यह कि कौनसी वह फिल्म है जो हमें पूरी देर बैठने को विवश करती है। अभी टीवी पर  नसीरुद्दीन और अनुपम खेर द्वारा अभिनीत  आतंकवाद के विषय पर बनी एक फिल्म ने पूरी तरह हमको बांधे रखा।  उस फिल्म का नाम याद नहीं है पर इतन तय है कि उसे अधिक सफलता नहीं मिली होगी क्योंकि वह संगीत और गीत रहित थी जबकि हिन्दी फिल्मों में सफलता के लिये उनका होना जरूरी है।  किसी भी फिल्म को चहुंमुखी सफलता तभी मिल पाती है जब उसकी कथा, पटकथा, गीत और संगीत समाज के हर प्रकारे की  आयु तथा आर्थिक वर्ग के लोगों को एक साथ प्रभावित करे। इस तरह की फिल्में अब बन ही नहीं रही-यह  निराशा की बात है। यही कारण है कि अब सुपर स्टार बनते नहीं भले ही प्रचारित किये जाते हों।



कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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पहचान के लिए परेशान पूरा ज़माना-हिन्दी चिंतन और कविता (trouble of identity-hindi article and poem)


प्राकृतिक का नियम है परिवर्तन! दिन हुआ है तो रात भी होगी। सूरज उगा है तो जरूर डूबेगा। धूप है तो अंधेरा भी होगा। यह तो प्रतिदिन होने वाले नियम हैं इसलिये दिखाई देते हैं और इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करने की शक्ति हमें अपने अंदर अनुभव नहीं करते इसलिये कोई दावा नहीं करते। मगर परिवर्तनशील प्रकृत्ति के अन्य भी बहुत सारे नियम हैं जो हमें दिखाई नहीं देते। कई जगह छहः महीने का दिन और रात तो कई जगह दशकों का दिन और रात होता है। केवल समय और दिन ही परिवर्तन शील नहीं है बल्कि प्रकृत्ति का स्वरूप भी परिवर्तनशील है। अनेक प्रकार के जीव यहां बने और मिट गये। डायनासोर की चर्चा तो हमने सुनी होगी जिनके बारे में कहा जाता है कि आसमान से टपके किसी कहर की वजह से वह नष्ट हो गये।
इस पृथ्वी का सच कोई नहीं जानता। सभी अनुमान से कहते हैंे कि इस तरह है या उस तरह है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहां किसी वस्तु, व्यक्ति, खनिज, अन्न का जो स्वरूप आज है वह कल कुछ दूसरा हो सकता है और आज से पहले कुछ दूसरा रहा होगा। अलबत्ता जीवन निर्माण की प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं आता दिखता पर उसके दृश्यव्य बाह्य रूप में परिवर्तन होता है और होता रहेगा।
भाषा, समाज, जाति, तथा अन्य आधारों पर बने व्यक्ति समूहों की यही हश्र होना है इसे कोई रोक नहीं सकता। मनुष्य प्रकृत्ति का दोहन अपनी शक्ति के अनुसार अधिक से अधिक कर सकता है पर उस पर नियंत्रण कभी नही कर सकता। ऐसे में कुछ लोगा यह दावा करते हैं कि वह भाषा, जाति, धर्म, और वर्ण के आधार पर बने अपने समूहों की पहचान बरकरार रखेंगे।
अगर उनसे पूछे कि‘क्यों?’
इसके बिना इस धरा का जीवन नष्ट हो जायेगा। अगर अपनी पहचान नहीं बचाकर रखी तो दूसरी पहचान वाले हमें नष्ट कर देंगे। यह पहचान हमारी अस्मिता है? आदि आदि प्रकार के जवाब।
भला यह कैसे संभव है जो समाज प्राकृतिक परिवर्तनों से बने हैं वह उन्हीं की वजह से नष्ट होने से बच जायें? मगर दावा करने वाले करते हैं। मनुष्य के मन में भावनायें होती हैं और वही उसका संचालन करती हैं। उनका दोहन अपने लाभ के लिये करने वाले व्यापारी उसमें भय, आशंकायें और स्वप्नों का एक जाल रचते हैं। वह ऐसे असंभव काम को अपने हाथों से करने का दावा करते हैं जो उनके बस का है ही नहीं। परिवर्तन को रोकना कठिन है। सौ बरस में मनुष्य का और दो सौ बरस में परिवार का अस्त्तिव मिटने के साथ अपनी पहचान खोता है तो हजार साल में समूह भी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते हैं। जाति, भाषा, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समूह कोई स्थाई पिंजरा नहीं है जिसमें आकर भगवान का हर जीवन हमेशा फंसता रहे। फिर सवाल यह है कि अपनी पहचान किसलिये बनाये रखना चाहिये? अरे, अपना जीवन आदमी शांति और भक्ति के साथ जिये तो उसे फिर पहचान की क्या जरूरत है? ऐसे में पहचान का ढोंग न करें चाहिये न उसमें फंसे।इस पर प्रस्तुत हैं काव्यात्मक अभिव्यक्ति-

धरती पर उगे हैं इंसान
पर वह उसमें गड़े मुर्दों में
अपनी पहचान खोजते हैं।
अपने लहू से सींचे चमन का
मजा लेने की भला कैसे सोचें
पूरी जिंदगी अपनी पहचान के
संकट से जूझते
उनके पसीने का मजा
जिंदगी के दलाल भोगते हैं।।
————-
उसने नारा लगाया कि
‘आओ मेरे पीछे
मैं तुम्हें अपनी पहचान बताता हूं
कैसे बचाओ उसे
इसका रास्ता भी बताऊंगा।’
लोग बिना सोचे समझे
चल पड़े उसके पीछे
पर पहचान नहीं मिली
रास्ते पर रखे पत्थरों का
इतिहास सुनाते हुए वह चलता रहा
भीड़ का कारवां भी उसके पीछे था
उसने सौदागरों के इतिहास में
अपना नाम दर्ज कर लिया
पर पहचान का पता किसी को न दिया
कभी जाति की
तो कभी धर्म की
कभी भाषा की चादर बिछाता रहा
पहचान का प्रमाण दिखाता रहा
बस कहता रहा जिंदगी भर
समूह की एकता की बात
जब थक गया तो कहने लगा कि
‘चलते रहो मेरे साथ
आने वाली पीढ़ियों को भी
इसी पहचान की राह चलना है
इसी में जीना और मरना है
मेरी बात मानना बंद किया तो
फिर भूत की तरह सताऊंगा।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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मातृभक्त पति पसंद नहीं-हास्य व्यंग्य (matrubhakt pati pasand nahin-hasya vyangya)


अधिकतर लड़कियां अपनी मां की बात मानने या सुनने वाले लड़के पंसद नहीं करती। यह पता अब जाकर इस आधुनिक समाज को चला है। सच कहें तो सदियों से पेट में दबी बात अब जुबान में आयी है वरना तो कौन इसे मानता? आधुनिक संचार माध्यमों में तमाम बुराईयां हो सकती हैं पर उससे ऐसे सच सामने भी आने लगे हैं जिन पर समाज जानबूझकर पर्दा डालता आया है। अपने घर का सच बताने में हर पुरुष शर्माता है। चार लोगों के बीच वह यह साबित करता है कि उसका अपने घर पर पूरा नियंत्रण है। अगर कोई गलती से कह दे कि ‘मेरी घर में नहीं सुनी जाती है तो सुनने वाले उसकी मजाक उड़ायेंगे।
इसके विपरीत चार औरतें आपस में मिलेंगी तो अपने परिवार के दोष गिनाने में नहीं चूकेंगी। सासें एकत्रित हुईं तो बहुओं और अगर बहुऐं मिली तो सासों की शिकायत करती हैं।
कोई कोई तो कहते भी नहीं झिझकती कि ‘हमारे पति तो अपनी मां के चमचे हैं।’
कोई मां भी कह जाती है कि ‘मेरा लड़का तो जोरु का गुलाम है।
मान लीजिये ऐसे वार्तालाप में कोई पुरुष दूसरे की निंदा सुन रहा हो तो वह भी ऐसा जाल में फंसता है कि चर्चा किये जाने वाले पुरुष को वैसा ही समझ लेता है। अगर औरत के साथ पुरुष का रक्त संबंध हुआ तो वह उस पुरुष के बारे में प्रतिकूल टिप्पणी भी कर जाता है-‘कैसा आदमी है? क्या उसे घर चलाने की अक्ल नहीं है, लगता है बाप ने कुछ सिखाया ही नहीं है।’
एक औरत मां, पत्नी, बहिन सास तथा दादी तथा अन्य रिश्तों में पुरुष का साथ निभाती है तो पुरुष भी पुत्र, पति, ससुर तथा भाई के रूप में निभाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि स्त्री पुरुष के संबंध उसके रिश्तों के अनुसार बनते और बिगड़ते हैं। जब कहीं स्त्री पुरुष के आपसी रिश्ते बिगड़ते हैं तो रक्त संबंधों के अनुसार हर कोई किसी का पक्ष भी लेता है। कहते हैं कि स्त्री का चरित्र और पुरुष का भाग्य कोई नहीं जानता पर यह फार्मूला पुरुष पर भी समान रूप से लागू है।
सफल पुरुष वही है जो स्त्रियों के आपसी संबंधों में बस हां हु ही कहता रहे।
कई बार पत्नी ताना देती है कि ‘जाओ, अपनी मां की बात सुनो। मेरी सुनते ही कहां हो?’
उसके तत्काल बाद मां की भी ताना मिल सकता है कि ‘जा जोरु के गुलाम! तेरी बात पर अब मेरा भरोसा नहीं रहा।’
एक दिन हम एक सेठजी की दुकान पर खड़े थे। उनका एक मित्र आया और बोला-‘तुझे कल सामान खरीदने बाहर चलना है कि नहीं। इतनी देर से दुकान पर न बताने आया और न ही नौकर के हाथ से संदेश भेजा।’
सेठजी ने कहा-‘यार, घर पर एक काम है। देखना पड़ेगा कि चल पाऊंगा कि नहीं।’
उस समय फोन की सुविधा ऐसी नहीं थी जैसी आज है। वह आदमी बोला-‘सीधा कह न! बीबी से पूछे बिना कोई काम नहीं कर सकता।’
सेठजी ने भी सरल भाव से कहा-‘तुम क्या बीबी से बिना पूछे चल रहे हो। परसों जब मैंने चलने को कहा था तो क्यों नहीं चला? तेरा नौकर बता रहा था कि घर से मना कर दिया है। अब तुम मेरे को अपनी सफाई मत देना।’
वह आदमी हंस कर चला गया। उसके जाने के बाद सेठजी हमसे बोले-‘एक बात कहूं। बाहर आदमी कितना भी शेर बनता हो पर घर में होते सभी भीगी बिल्ली हैं। यह अलग बात है कि कोई इस बात को मानता है कि नहीं।’
औरत अगर बहु है तो वह चाहती है कि पति अपनी मां यानि उसकी सास से पहले उसकी बात सुने। अगर मां है तो वह चाहती है कि इतने बरसों से जिस लड़के को पाला है वह मेरी बात सुने।’
फिर इस पर बहने और अन्य रिश्ते भी होते हैं। बहिन सोचती है कि भाई अपनी साली से अधिक हमें तवज्जो दे। साली है तो वह चाहती है कि जीजाजी हमें अपनी बहिन से अधिक सम्मान दें।
हमारे यहां समाज पुरुष प्रधान इसलिये है क्योंकि अभी भी अधिकतर प्रत्यक्ष आय का भार उस पर है-याद रहे अमेरिकी विशेषज्ञ कहते हैं कि सामान्य भारतीय गृहिणियां अपनी पति से अधिक आय करती हैं यानि वह इतना काम करती हैं कि अगर उनका रुपये में मूल्यांकन हो तो पति से अधिक आय उनकी होना चाहिये। इस प्रत्यक्ष आय के कारण उसका प्रभाव घर पर रहता है पर दूसरी समस्या उसके साथ यह है कि वह हमेशा घर से बाहर ही होता है। दिन में घर पर क्या हुआ? किसने क्या कहा? उसे पता तब चलता है जब वह शाम को घर वापस आता है। हर कोई अपने हिसाब से अपनी बात उसे सुनाता है। ऐसे मेें उसकी थकान और तनाव बढ़ जाता है। यह घर घर की कहानी है। इस पर हंसने जैसी कोई बात नहीं है। यदि इन बातों पर आप हंसते हैं तो इसका आशय यह है कि अभी आपका विवाह नहीं हुआ या फिर आप हमसे क्या अपने आपसे अपना सच छिपा रहे हैं।
अब सवाल है कि लड़कियां ही ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है तो फिर उसके जीवन साथी से आप क्या कहेंगे? मां की बात सुन क्योंकि पुरुष तो तू है। इधर दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा के भी कानून बना रखे हैं तब आदमी पर एक दबाव तो रहता ही है। एक अजीब संयोग है कि इस समय वंदेमातरम को लेकर तमाम तरह की चर्चा है ऐसे में ही एक टीवी चैनल से यह संदेश निकला कि ‘लड़कियां ऐसा लड़का पसंद नहीं करती जो मां की बात सुनता है।’ इन्हीं लड़कियों में ही भविष्य की मातायें हैं और कभी वंदेमातरम शब्द सुनकर उनको भी खुशी होगी पर अभी उनके लिये इसका क्या मतलब? ऐसे में अगर कोई लड़का अगर पसंद होने और करने के लिये-आजकल दोनों की मर्जी चलती है- किसी लड़की से मिलने गया और जाते ही बोला दिया ‘वंदेमातरम’, तब वह तो पहली नजर में ही अस्वीकृत कर दिया जायेगा। हमने टीवी चैनल के उस कार्यक्रम के कुछ हिस्से कभी कभी देखे हैं और उसमें लड़कियों की लड़कों की माताओं पर टिप्पणियां भी सुनी है तब यह सोचते हैं कि समाज ने बहुत समय से कई बातें दबा कर रखी हैं जो सामने आ रही हैं।
हमारे एक सेठ जी कहते थे कि सफल पुरुष वही है जो औरतों की विवाद में बस हां हु करता रहे। जिस आदमी ने सोचा कि मैं कोई फैसला कर शांति करवाऊं वह अपने घर के साथ ही अपने दिल की भी शांति ऐसे दांव पर लगा देगा कि काम पर भी उसका मन नहीं लगेगा।’
बहरहाल स्त्री और पुरुष के आपसी संबंधों के साथ ही स्त्रियों के आपसी रिश्ते भी होते हैं और उनके बीच जब पुरुष फंसता है और बात ऊंच नीच हुई तो पुरुष का ही नाम खराब होता है क्योंकि नाम उसके घर पर ही चलता है। इस विषय पर एक विद्वान का कथन याद आ रहा है। जब यह निर्णय किया गया कि स्कूल में प्रवेश के समय पिता के नाम की अनिवार्यता नहीं होगी और मां भी अपना नाम वहां लिखा सकती है। तब उन विद्वान ने कहा था कि ‘पुरुष का तो बस एक नाम ही था वरना तो घर तो चलाती स्त्रियां ही हैं। अब वह नाम भी पुरुष के हाथ से गया।’
कहने का तात्पर्य यही है कि इस संसार में किसी रिश्ते को समझना और उस बयान करना ही गलती है। हालात, समय और स्वार्थ अपने हिसाब से संबंध बदलते रहते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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सम्मेलन पर झगड़ा-हास्य व्यंग्य (hindi sammelan-hasya vyangya)


ब्लागर उस समय सो रहा था कि चेले ने आकर उसके हाथ हिलाकर जगाया। ब्लागर ने आखें खोली तो चेले ने कहा-‘साहब, बाहर कोई आया है। कह रहा है कि मैं ब्लागर हूं।’
ब्लागर एकदम उठ बैठा और बोला-‘जाकर बोल दे कि गुरुजी घर पर नहीं है।’
चेले ने कहा-’साहब, मैंने कहा था। तब उसने पूछा ‘तुम कौन हो’ तो मैंने बताया कि ‘मैं उनका शिष्य हूं। ब्लाग लिखना सीखने आया हूं’। तब वह बोला ‘तब तो वह यकीनन अंदर है और तुम झूठ बोल रहे हो, क्योंकि उसने सबसे पहले तो तुम्हें पहली शिक्षा यही दी होगी कि आनलाईन भले ही रहो पर ईमेल सैटिंग इस तरह कर दो कि आफलाईन लगो। जाकर उससे कहो कि तुम्हारा पुराना जानपहचान वाला आया है। और हां, यह मत कहना कि ब्लागर दोस्त आया है।’

ब्लागर बोला-‘अच्छा ले आ उसे।’
शिष्य बोला-‘आप   निकर छोड़कर पेंट  पहन लो। वरना क्या कहेगा।’
ब्लागर ने कहा-‘ क्या कहेगा ? वह कोई ब्लागर शाह है। खुद भी अपने घर पर इसी तरह तौलिया पहने  कई बार मिलता है। मैं तो फिर भी आधुनिक प्रकार की  नेकर पहने रहता  हूं, जिसे पहनकर लोग सुबह मोर्निंग वाक् पर जाते हैं।’
इधर दूसरे ब्लागर ने अंदर प्रवेश करते ही कहा-‘यह शिष्य कहां से ले आये? और यह ब्लागिंग में सिखाने लायक है क्या? बिचारे से मुफ्त में सेवायें ले रहे हो?’
पहले ब्लागर ने कहा-‘अरे, यह तो दोपहर ऐसे ही सीखने आ जाता है। मैं तुम्हारी तरह लोगों से फीस न लेता न सेवायें कराता हूं। बताओ कैसे आना हुआ।’
दूसरे ब्लागर ने कंप्यूटर की तरफ देखते हुए पूछा-‘यह तुम्हारा कंप्यूटर क्यों बंद है? आज कुछ लिख नहीं रहे। हां, भई लिखने के विषय बचे ही कहां होंगे? यह हास्य कवितायें भी कहां तक चलेंगी? चलो उठो, मैं तुम्हारे लिखने के लिये एक जोरदार समाचार लाया हूं। ब्लागर सम्मेलन का समाचार है इसे छाप देना।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘तुम खुद क्यों नहीं छाप देते। तुम्हें पता है कि ऐसे विषयों पर मैं नहीं लिखता।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘अरे, यार मैं अपने काम में इतना व्यस्त रहता हूं कि घर पर बैठ नहीं पाता। इसलिये कंप्यूटर बेच दिया और इंटरनेट कनेक्शन भी कटवा दिया। अब अपने एक दोस्त के यहां बैठकर कभी कभी ब्लाग लिख लेता हूं।’
पहले ब्लागर ने घूरकर पूछा-‘ब्लाग लिखता हूं से क्या मतलब? कहो न कि अभद्र टिप्पणियां लिखने के खतरे हैं इसलिये दोस्त के यहां बैठकर करता हूं। तुमने आज तक क्या लिखा है, पता नहीं क्या?’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘क्या बात करते हो? आज इतना बड़ा सम्मेलन कराकर आया हूं। इसकी रिपोर्ट लिखना है।’
पहले ब्लागर ने इंकार किया तो उसका शिष्य बीच में बोल पड़ा-‘गुरुजी! आप मेरे ब्लाग पर लिख दो।’
दूसरा ब्लागर बोला-‘अच्छा तो चेले का ब्लाग भी बना दिया! चलो अच्छा है! तब तो संभालो यह पैन ड्ाईव और कंप्यूटर खोलो उसमें सेव करो।’
शिष्य ने अपने हाथ में पैन ड्राईव लिया और कंप्यूटर खोला।
पहले ब्लागर ने पूछा-‘यह फोटो कौनसे हैं?
दूसरे ब्लागर ने एक लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा‘-जब तक यह इसके फोटो सेव करे तब तक तुम उसको देखो।
ब्लागर ने फोटो को एक एक कर देखना शुरु किया। एक फोटो देखकर उसने कहा-‘यह फोटो कहीं देखा लगता है। तुम्हारा जब सम्मान हुआ था तब तुमने भाषण किया था। शायद…………….’
दूसरे ब्लागर ने बीच में टोकते हुए कहा-‘शायद क्या? वही है।’
दूसरा फोटो देखकर ब्लागर ने कहा-‘यह चाय के ढाबे का फोटो। अरे यह तो उस दिन का है जब मेरे हाथ से नाम के लिये ही उद्घाटन कराकर मुझसे खुद और अपने चेलों के लिये चाय नाश्ते के पैसे खर्च करवाये थे। मेरा फोटो नहीं है पर तुम्हारे चमचों का…….’’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘अब मैं तुम्हारे इस चेले को भी चमचा कहूं तो तुम्हें बुरा लगेगा न! इतनी समझ तुम में नहीं कि ब्लागिंग कोई आसान नहीं है। जितना यह माध्यम शक्तिशाली है उतना कठिन है। लिखना आसान है, पर ब्लागिंग तकनीकी एक दिन में नहीं सीखी जा सकती। इसके लिये किसी ब्लागर गुरु का होना जरूरी है। सो किसी को तो यह जिम्मा उठाना ही है। तुम्हारी तरह थोड़े ही अपने चेले को घर बुलाकर सेवा कराओ। अरे ब्लागिंग सिखाना भी पुण्य का काम है। तुम तो बस अपनी हास्य कवितायें चिपकाने को ही ब्लागिंेग कहते हो।’
पहले ब्लागर ने कहा-‘हां, यह तो है! यह तीसरा फोटो तो आइस्क्रीम वाले के पास खड़े होकर तुम्हारा और चेलों का आईस्क्रीम खाने का है। यह आईसक्रीम वाला तो उस दिन मेरे सामने रास्ते पर तुमसे पुराना उधार मांग रहा था। तब तुमने मुझे आईसक्रीम खिलाकर दोनों के पैसे दिलवाकर अपनी जान बचाई थी।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘मेरे फोटो वापस करो।’
पहले ब्लागर ने सभी फोटो देखकर उसे वापस करते हुए कहा-‘यार, पर इसमें सभी जगह मंच के फोटो हैं जिसमें तुम्हारे जान पहचान के लोग बैठे हैं। क्या घरपर बैठकर खिंचवायी है या किसी कालिज या स्कूल पहुंच गये थे। सामने बैठे श्रोताओं और दर्शकों का कोई फोटो नहीं दिख रहा।’
दूसरे ब्लागर ने पूछा-‘तुम किसी ब्लागर सम्मेलन में गये हो?’
पहले ब्लागर ने सिर हिलाया-‘नहीं।’
दूसरा ब्लागर-‘तुम्हें मालुम होना चाहिये कि ब्लागर सम्मेलन में सिर्फ ब्लागर की ही फोटो खिंचती हैं। वहां कोई व्यवसायिक फोटोग्राफर तो होता नहीं है। अपने मोबाइल से जितने और जैसे फोटो खींच सकते हैं उतने ही लेते हैं। ज्यादा से क्या करना?
पहला ब्लागर-हां, वह तो ठीक है! ब्लागर सम्मेलन में आम लोग कहां आते हैं। अगर वह हुआ ही न हो तो?
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया-‘लाओ! मेरे फोटो और पैन ड्राइव वापस करो। तुमसे यह काम नहीं बनने का है। तुम तो लिख दोगे ‘ न हुए ब्लागर सम्मेलन की रिपोर्ट’।
पहला ब्लागर ने कहा-‘क्या मुझे पागल समझते हो। हालांकि तुम्हारे कुछ दोस्त कमेंट में लिख जाते हैं ईडियट! मगर वह खुद हैं! मैं तो लिखूंगा ‘छद्म सम्मेलन की रिपोर्ट!’
दूसरे ब्लागर को गुस्सा आ गया उसने कंप्यूटर में से खुद ही पेनड्राइव निकाल दिया और जाने लगा।
फिर रुका और बोला-‘पर इस ब्लागर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना। हां, इस ब्लागर सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना। तुम जानते नहीं इंटरनेट लेखकों के सम्मेलन और चर्चाऐं कैसे होती हैं? इंटरनेट पर अपने बायोडाटा से एक आदमी ने अट्ठारह लड़कियों को शादी कर बेवकूफ बनाया। एक आदमी ने ढेर सारे लोगों को करोड़ों का चूना लगाया। इस प्रकार के समाचार पढ़ते हुए तुम्हें हर चीज धोखा लगती है। इसलिये तुम्हें समझाना मुश्किल है। कभी कोई सम्मेलन किया हो तो जानते। इंटरनेट पर कैसे सम्मेलन होते हैं और उनकी रिपोर्ट कैसे बनती है, यह पहले हमसे सीखो। सम्मेलन करो तो जानो।’
पहले ब्लागर ने व्यंग्यात्मक लहजे में पूछा-ऐसे सम्मेलन कैसे कराऊं जो होते ही नहीं।’
दूसरे ब्लागर ने कहा-‘होते हैं, करना हमसे सीख लो।’
वह चला गया तो पहला ब्लागर सामान्य हुआ। उसने शिष्य से कहा-‘अरे, यार कम से कम उसके फोटो तो कंप्यूटर में लेना चाहिये थे।’
शिष्य ने कहा-‘ गुरुजी फोटो तो मैंने फटाफट पेनड्राइव से अपने कंप्यूटर से ले लिये।’
पहला ब्लागर कंप्यूटर पर बैठा और लिखने लगा। शिष्य ने पूछा’क्या लिख रहे हैं।
पहले ब्लागर ने कहा-‘जो उसने कहा था।’
शिष्य ने पूछा-‘यही न कि इस मुलाकात की बात लिख देना।’
ब्लागर ने जवाब दिया‘नहीं! उसने कहा था कि ‘इस सम्मेलन का जिक्र कहीं मत करना’।’’
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नोट-यह व्यंग्य पूरी तरह से काल्पनिक है। किसी घटना या सम्मेलन का इससे कोई लेना देना नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल हो जाये तो यह एक संयोग होगा। इसका लेखक किसी दूसरे ब्लागर से ब्लागर से मिला तक नहीं है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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