Category Archives: संपादकीय

गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

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जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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स्त्रियों के प्रति अपराध करने वालों के लिये क्रूर सजायें जरूरी-हिन्दी लेख (crural punishment must for crime against woman-hindi article)


                  ईरान में अपनी प्रेमिका के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने वाले एक शख्स की आंखें फोड़ दी गयी हैं। ऐसा वहां की न्यायपालिका की सजा के आधार पर किया गया है। आमतौर से ईरान को एक सभ्य राष्ट्र माना जाता है और वहां ऐसी बर्बर सजा देना आम नहीं है। अलबत्ता कभी कभी धर्म आधार पर वहां ऐसे समाचार आते रहते हैं जिसमें सजायें दिल दहलाने वाली होती हैं। उनकी खूब आलोचना भी होती है। वहां की धर्म आधार व्यवस्था के अनुसार चोरी की सजा हाथ काटकर दी जाती है। इससे कुछ लोग सहमत नहीं होते। खासतौर से जब कोई बच्चा रोटी चुराते पकड़ा जाये और उसको ऐसी सजा देने की बात सामने आये तब यह कहना पड़ता है कि यह सजा बर्बर है। अपना पेट भरना हर किसी का धर्म है इसलिये धन चुराने और रोटी चुराने के अपराध में फर्क किया जाना चाहिए। मानवीय आधार पर कहें तो मजबूरीवश रोटी चुराना अपराध नहीं माना जा सकता।
अपनी प्रेमिका की आंखें फोड़ने वाले आशिक की आंखें फोड़ने की सजा को शायद कुछ लोग बर्बर मानेंगे पर सच बात यह है कि इसके अलावा अब कोई रास्ता दुनियां में नज़र नहीं आता। बात चाहे ईरान की हो या भारत की हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते क्रूर अपराधों की अनदेखी नहीं कर सकते। अब यहां पर कुछ मानवाधिकारी विद्वान दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। वह कहते हैं कि क्रूर सजा अपराध नहीं रोक सकती। अलबत्ता ऐसा दावा करने वाले फंासी जैसी सरल सजा पर ही सोचते हैं। फांसी से आदमी मर जाता है उसके बाद उसका कोई दर्द शेष नहीं रह जाता। हाथ काटना या आंख फोड़ना मनुष्य के लिये मौत से बदतर सजा है इस बात को पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित विद्वान नहीं जानते। कम से कम स्त्रियों के प्रति क्रूर अपराध रोकने के लिये ऐसी सजायें तो अपनानी होंगी।
                 हम एशियाई देशों में स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों को देखें तो ऐसी क्रूर सजाओं को अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आता। एशियाई देशों के अ्रग्रेजी संस्कृति समर्थक विद्वान अक्सर पश्चिमी और पूर्वीै समाज में अंतर नहीं करते। वह सोचते है कि जिस तरह वह पश्चिमी संस्कृति में ढले है वैसे ही पूरा एशियाई समाज भी हो गया है। हम शहरी भारतीय समाज को देखें तो यहां स्पष्टतः दो भागों में बंटा समाज है। एक तो वह जो पाश्चात्य ढंग का पहनावा अपनाने के साथ ही विचारधारा भी वैसी रखते हैं। दूसरा वह जो दिखता तो पश्चिमी सभ्यता से रंगा है पर उसकी मानसिकता ग्रामीण पृष्ठभूमि वाली है। ऐसे नवपश्चात्यवादी उसी तरह ही खतरनाक हो रहे हैं जैसे कि नवधनाढ्य! हम ग्रामीण परिवेश में रहने वाले समाजों के लोगों की बात करें तो उनमें भी कुछ लोग नारियों के प्रति क्रूरता का व्यवहार करते हैं पर वह मारपीट तक ही सीमित होते हैं या हथियार से मारकर एक बार ही दर्द देने वाले होते हैं। जबकि नवपाश्चात्यवादी तेजाब फैंककर या बलात्कार ऐसी सजा स्त्री को देते हैं जो उसकी जिंदगी को मौत से बदतर बना देती हैं। पश्चिमी विचारधारा के विद्वान इस बात को नहीं देखते।
                    दूसरी यह भी बात है कि पाश्चात्य देशों की समशीतोष्ण जलवायु की बनिस्बत एशियाई देशों की ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण हमारे यहां के लोगों के दिमाग भी अधिक गर्म रहते हैं। ऐसा नहंी है कि पाश्चात्य देशों में स्त्रियों के प्रति अपराध नहीं होते पर वहां तेजाब डालकर असुंदर या अंधा बनाने जैसी घटनाओं की जानकारी नहीं मिलती जबकि हमारे भारत में निरंतर ऐसी घटनायें हो रही हैं। हम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों के कारणों पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि अब कठोर सजाओं की नहीं बल्कि क्रूर सजाओं की आवश्यकता है।
             हमारे देश में कुछ ऐसे कारण हैं जो देश में महिलाओं के प्रति अपराध बढ़ा रहे हैं।
           1.कन्या भ्रुण हत्याओं की वजह से लिंग संतुलन बिगड़ा है, जिससे विवाहों के लिये सही वर वधु का चुनाव कठिन होता जा रहा है। जिससे युवाओं को बड़ी उम्र तक अविवाहित रहना पड़ता है। लड़कियों की शादी में दहेज भी एक समस्या है।
           2.ग्रीष्मोष्ण जलवायु के कारण पश्चिम के समशीतोष्ण जलवायु में रहने वालो लोगों की बनिस्बत कामोतेजना यहां के लोगों में ज्यादा है।
           3.कानून का भय किसी को नहीं है। आजीवन कारावास से अपराधियों को कोई परेशानी नहंी है और फांसी मिल जाये तो एक बार में सारा दर्द खत्म हो जाता है। फांसी मिल भी जाये तो पहले तो बरसो लग जाते हैं और मिलने वाली हो तो मानवाधिकार कार्यकर्ता नायक बना देते हैं।
           4.हमारे मनोरंजन के साधन कामोतेजना के साथ ही पुरुष के अंदर पुरुषत्व का अहंकार बढ़ाने तथा नारी को उपभोग्या की मान्यता स्थापित करने वाले प्रकाशन और प्रसारण कर रहे हैं।
                कहने का अभिप्राय यह है कि जिस तरह कुछ नवपाश्चात्यवादी अपने आधुनिक होने के अहंकार तथा घर के बाहर की नारी को उपभोग की वस्तु मानकर चल रहे हैं उनके अंदर भय पैदा करने के लिये ऐसी क्रूर सजाऐं जरूरी हैं। यहां स्पष्ट कर दें कि पश्चिमी विद्वान यह दावा करते हैं कि कठोर सजाओं से अपराध नियंत्रित नहीं होते पर क्रूर सजाओं के बारे में उनकी राय साफ नहीं है हालांकि तब वह मानवाधिकारों की बात कर उसे विषय से भटका देते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

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आतंकवाद से लड़ने के दावे-हास्य कविता और चिंत्तन लेख


आतंकवाद एक व्यापार है, और यह संभव नहीं है कि बिना पैसे लिये कोई आतंक फैलाता हो। अभी अखबार में एक खबर पढ़ी थी कि उत्तरपूर्व में केंद्र सरकार ने आर्थिक विकास के लिये जो धन दिया उसमें से कुछ आतंकी संगठनों के पास पहुंचा जिससे आतंकियों ने हथियार खरीदे। स्पष्टतः इन हथियारों का पैसा उसके निर्माताओं को मिला होगा। इस संबंध में केंद्रीय खुफिया ऐजेंसियों की जानकारी के आधार पर कुछ सरकारी अधिकारियों, ठेकेदारों तथा अन्य लोगों के खिलाफ़ मामला दर्ज किया गया है और यकीनन यह इस तरह के सफेदपोश लोग हैं जो कहीं न कहीं समाज में अपना चेहरा पाक साफ दिखते हैं। जब आतंक की बात आती है तो चंद मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रभावित क्षेत्रों में धर्म और धन के आधार पर शोषण का आरोप लगाते हैं पर जब विकास के धन से आतंक को सहायता मिलती है तो उस पर खामोश हो जाते हैं।
ऐसे में आतंक को रंग से पहचाने वाले बुद्धिजीवियों पर तरस आता है पर उनको भी क्या दोष दें। सभी किसी न किसी रंग से प्रायोजित हैं और उनको अपने प्रायोजकों की बज़ानी है। एक स्वतंत्र और मौलिक लेखक होने के नाते हमने तो यह अनुभव किया है कि संगठित प्रचार माध्यमों-टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा रेडियो-में हमें जगह इसलिये नहीं मिल पाई क्योंकि किसी रंग ने प्रयोजित नहीं किया। हम इस पर अफसोस नहीं जता रहे बल्कि अपने जैसे स्वतंत्र लेखकों ओर पाठकों को यह समझा रहे हैं कि जब किसी आतंकवाद या उग्र आंदोलन का समर्थक कोई प्रसिद्ध बुद्धिजीवी बयान दे तो समझ लें कि वह दौलतमंदों का प्रयोजित बुत बोल रहा है। यकीनन उसे प्रयोजित करने वाला कोई ऐसा दौलतमंद ही हो सकता है जो अपने रंग की रक्षा केवल इसलिये करना चाहता है जिससे कि उसके काले धंधे चलते रहें। पहले गुस्सा आता था पर अब हंसी आती है जब आतंक या उग्रता की पहचान लिये आंदोलनों के समर्थक बुद्धिजीवी बयान देते हैंे और समझते हैं कि कोई इस बात को जानता नहीं है। एक रंग समर्थक बुद्धिजीवी उग्र बयान देता है तो उस पर अनेक बयान आने लगते हैं इस तरह आतंक के साथ ही उस पर बयान और बहस भी प्रचार का व्यापार हो गये हैं।
इस पर एक हास्य कविता लिखने का मन था पर लगा कि उसमें पूरी बात नहीं कह पायेंगे इसलिये यह गद्य भी लिखकर मन की भड़ास निकाल दी। इसका उद्देश्य यही है कि दुनियां भर के सभी शासक आतंकवाद से लड़ने का दावा करते हैं पर वह है कि बढ़ता ही जा रहा है। स्पष्टतः ऐसे में जिम्मेदार लोगों की अकुशलता, कुप्रबंधन के साथ इसमें कहीं न कहीं सहभागिता का भी शक होता है। सभी देश अपने अपने ढंग से आतंकवाद को समझ रहे हैं इसलिये लड़ कोई नहीं रहा। दावे केवल दावे लगते हैं
इस पर यह एक बेतुकी हास्य कविता प्रस्तुत है।

पोते ने दादा से कहा
‘‘बड़ा होकर मैं भी आतंकवादी बनूंगा
क्योंकि उनके साक्षात्कार टीवी पर आते हैं,
समाचारों में भी वह छाते हैं,
पूरी दुनियां में मेरा नाम छा जायेगा।
अमेरिका भी मुझसे घबड़ायेगा।’’

तब दादा ने हंसते हुए कहा
‘‘बेटा, यह क्या सपना तूने पाल लिया,
आतंकवादी सबसे बड़ा है यह कैसे मान लिया,
तू मादक द्रव्य का तस्कर बन जाना,
चाहे तो क्रिकेट पर सट्टा भी लगवाना,
मन में आये तो जुआ घर खोल देना,
अपहरण उद्योग भी बुरा नहीं है,
अपहृत के बदले भारी रकम मोल लेना,
जब ढेर सारा पैसा तेरे पास आयेगा,
तब क्या पहरेदार, क्या चोर,
आतंकवादी भी तेरे आगे सिर झुकायेगा।
बेटा, यह भी एक व्यापार है,
पर इसमें खतरे अपार हैं,
धंधा चाहे काला हो
पर दौलत होगी तो
हमेशा अपने को सफेदपोश पायेगा,
आतंकी बनकर भी रहेगा गुलाम,
हर कोई अपना रंग तुझ पर चढ़ायेगा।
टीवी पर चेहरा आने ,
या अखबार में खबर छप जाने पर
तेरे को चैन नहीं आयेगा,
मरने का डर तेरे को सतायेगा,
काम निकल जाने पर प्रायोजक ही

तेरा बैरी होकर ज़माने का नायक बन जायेगा
पहले तेरे को मरवायेगा,
या फिर इधर से उधर दौड़ाते हुए
तेरा पीछा करते अपने को दिखायेगा।
मेरी सलाह है
न तो सफेदपोश प्रयोजक बन,
न आतंकवादी होकर तन,
अपना छोटा धंधा या नौकरी करना,
चाहे तो कविता लिखना
या चित्र बनाकर उसमें रंग भरना,
दूसरे खुश हो या नहीं
तुम अपने होने का खुद करना अहसास,
दिल की खुशी का बाहर नहीं अंदर ही है वास,
ऐसा चेहरा रखना अपना
जो खुद आईने में देख सके,
दौलत, शौहरत और ताकत में
अंधे समाज को भला क्या दिखायेगा।
मुझे गर्व होगा तब भी जब
आतंकवादी की तरह प्रसिद्ध न होकर
अज्ञात श्रमजीवी की सूची में अपना नाम लिखायेगा।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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वृंदावन के श्री कृष्ण और अयोध्या के श्री राम, शक्ति मिलती है लेते ही नाम-हिन्दी लेख (bhagwan shri ram aur krishan ke nam mein hee shakti-hindi lekh)


वृंदावन के कृष्ण और अयोध्या के राम भारतीय अध्यात्म दर्शन और धर्म के ऐसे स्तंभ है जिनको उन बड़े बड़े संतों ने भी माना है जो अपनी भक्ति और तपस्या से जनमानस में भगवत् स्वरूप माने जाते हैं। महाकवि तुलसीदास, संत प्रवर कबीरदास, कविवर रहीम, तपस्विनी मीरा तथा अन्य अनेक महापुरुषों ने अपने जीवन चरित्र से भारतीय जनमानस में भगवत्रूप की स्थिति प्राप्त की और इन सभी ने भगवान श्रीकृष्ण और राम के चरित्रों को अपने मन में स्थान दिया। स्पष्ष्टतः इन दोनों के बिना भारतीय अध्यात्म ज्ञान तथा जनमानस की भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।
भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का समूचा जीवन ही लीलामय झांकी प्रस्तुत करता है और जैसे कि हम जानते हैं कि यह समूचा जीवन अनेक रंगों से व्याप्त है। यही कारण है कि हर इंसान के जीवन चरित्र में विविध रूप स्वयमेव नज़र आते हैं ऐसे में शरीर धारण करने वाले अवतारी पुरुष भी सभी रंगों में दृष्टिगोचर होते है। चूंकि भगवान श्री राम तथा श्रीकृष्ण भगवान के मानव स्वरूप अवतार माने जाते हैं इसलिये उनका जीवन भी इसी तरह बीता। सृष्टि के नियमों के अनुसार उन्होंने अपना बाल्यकाल, युवावस्था तथा अधेड़ावस्था में बिताया इसलिये उनके विभिन्न स्वरूप निर्मित हुए। दोनों महान योगी थे। उनके संदेश आज भी स्वाभाविक इसलिये लगते हैं कि प्रकृति और उसके जीवन के स्वरूप में बदलाव आता है पर मौलिक स्वभाव कभी नहीं बदलता। यही कारण है कि आज भी उनका चरित्र स्वाभाविक लगता है पर विविधता के कारण सभी अपने मन के अनुसार स्वरूप स्मरण करने के लिये चुनते हैं ।

अगर सहजता के साथ दोनों या किसी एक के भी स्वरूप में अपने ध्यान के साथ भक्ति की जाये तो शक्ति प्राप्त होती है मगर मुश्किल यह है कि सामान्य जन सकाम भक्ति में लीन होना पसंद करते हैं या फिर उनके चरित्र की चर्चा को ही सत्संग समझ लेते हैं और यहीं से शुरु होता है संतों और धर्मगुरुओं का उपदेश देने का सिलसिला जो अंततः पेशा बन जाता है। उसके बाद भी ऐसे लोग बहुत से हैं जो धर्म की आड़ में अपना लक्ष्य पाना चाहते हैं ताकि उनकी लोकप्रियता का नकदी में रूप में परिवर्तन किया जा सके। यही कारण है कि जब भारत के बाहर भारतीय अध्यात्म अनुसंधान का विषय बन रहा है वहीं यहां उनके जन्मस्थान तक ही लोगों का मन सीमित रखने का प्रयास हो रहा है। वर्तमान में भारतीय जनमानस अखबार, टीवी, इंटरनेट तथा रेडियो तक सीमित हो गया है और धर्म के आधार पर प्रचार पाने वाले यही सक्रियता अधिक दिखाते हैं। इससे सामान्य जनमानस प्रभावित भी होता है। कितना प्रभावित होता है यह भी अब विश्लेषण का विषय है।

इस समय अयोध्या की रामजन्म भूमि फिर चर्चा में है क्योंकि उसके विवाद का निर्णय संभवत आने वाला है। इसका बकायदा प्रचार हो रहा है। प्रचारकों को प्रसिद्धि मिल रही है तो व्यवसायिक प्रचार माध्यमों का समय पास हो रहा है जो अंततः विज्ञापन के सहारे ही व्यतीत होता है।

एक प्रश्न अक्सर लोग कहते हैं कि धर्म के आधार पर हिन्दू एक क्यों नहीं होते? कुछ लोग झुंझलाते हैं कि अन्य धर्म के लोग अपने इष्ट के नाम पर एक हो जाते हैं पर हिन्दू समाज हमेशा ही बिखरा रहता है। कुछ विद्वान तो हिन्दू समाज के बंटवारे का कारण अधिक देवताओं की उपासना करना बताते हैं तो कुछ समाज को स्वार्थों में लिप्त होकर रहने का दोष देते हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे लोग अन्य समाजों की अंदरूनी स्थिति को नहीं जानते और उनके मुकाबले अपने समाज को कमतर होने का उनको अफसोस होता है। ऐसे विद्वानों को गीता अवश्य पढ़नी चाहिए जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की सामग्री भी अंतर्निहित है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी।

आर्ती भक्त वह होते हैं जो विपत्ति आने पर भगवान की दरबार में पहुंचते हैं। अर्थार्थी वह होते हैं जो अपनी मनोकामना पूर्ण होती रहे इस उद्देश्य से जाते हैं। जिज्ञासु भक्त वह हैं जो यह देखने के लिये जाते हैं कि वहां जाने से उन पर क्या प्रभाव होता है। सबसे ऊंचे ज्ञानी है जो निष्काम भाव से मंदिर यह सोचकर जाते हैं कि वहां जाने से ध्यान का लाभ होगा जिनसे उनमें मानसिक शुद्धि आयेगी। समाज को किसी एक इष्ट के नाम एक रखने के प्रयास करने और सफल न होने पर झुंझलाने वाले इस तरह का ज्ञान नहीं रखते।

अब करते हैं भारतीय समाज की बात! यहां श्रीमद्भागवत गीता के संदेश हर आदमी जानता है। उसे यह भी मालुम है कि धर्म के नाम पर पाखंड यहां खूब होता है। राम जन्म भूमि के समय समाज में जोरदार एकता आयी थी पर कालांतर में उसका प्रभाव कम हो गया। इसका कारण यह रहा कि उस समय लोगों के पास यह एक ऐसा विषय था जो ज्वलंत था और धर्म से संबंधित अन्य कोई विषय उनके उनके पास मन लगाने के लिये नहीं था। फिर अब ऐसा क्या हो गया कि समाज अब उदासीन हो गया? यहां लोग धर्म के नाम पर कोई न कोई चर्चा चाहते हैें फिर राम जो सभी के हृदय के नायक हैं उनकी जन्मभूमि के नाम पर क्यों उत्तेजित नहीं हो रहे। इसका कारण यह है कि अब बाबा रामदेव ने योग का जो परचम पूरे विश्व में फहराया है उसने भारतीय जनमानस में भी गहरी पैठ बना ली है। कम से कम जिज्ञासु और ज्ञानी भक्तों के के दिमाग में यह बात आ गयी है कि भगवान राम और श्री कृष्ण हमारे अध्यात्मिक दर्शन का आधार है पर उसके साथ ही उनकी लीलाऐं और संदेश भी बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्वकाल में रामजन्मभूमि आंदोलन के समय प्रचार माध्यम इतने सशक्त और व्यापक नहीं थे जितने अब दिखाई देते हैं। उस समय दिल्ली दूरदर्शन के अलावा अन्य कोई साधन नहंी था और अब तो टीवी चैनलों की संख्या तीन सौ से ऊपर ही होगी ऐसा लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों की भावनाओं का दोहन अब एक तरीके से नहीं किया जा सकता और न ही किसी पुराने विषय को फिर वैसे ही संवेदनशील बनाया जा सकता है।

इधर भारतीय योग दर्शन तथा श्रीगीता के संदेश की वैश्विक स्तर पर चर्चा और अनुसंधान का विषय बन बन गया है है। इससे यह बात तो स्थापित हो ही गयी है कि हमार अध्यात्म भले ही एक इष्ट पर निर्भर नहीं है पर बहुत सारे उसके स्वरूप का निराकार चरित्र का प्रतिबिंब हैं। निष्काम और सकाम भक्ति का स्वरूप अब स्पष्ट होता जा रहा है। मूर्तिपूजा करना और निरंकार का ध्यान करना अलग विधियां हैं पर दोनों का लक्ष्य एक ही है कि सर्वशक्तिमान का स्मरण कर अपने मन और विचारों को शुरु और पवित्र बनाना। अतः दोनों प्रकार के भक्तों में आपसी विरोध नहीं होता। यह अलग बात है कि सकाम भक्त निष्काम भक्तों को नास्तिक या अल्प आस्थावान समझते हैं पर ज्ञानी लोग इस तथ्य को जानते हुए चुप्पी साध लेते हैं ।

आखरी बात यह कि भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम इस धरती पर पैदा हुए तो समाज कल्याण का काम किया। ऐसा करते हुए उन्होंने अपने और पराये क्षेत्र का विचार नहीं किया। सारे संसार को अपना घर और समस्त प्रजाजनों को अपने से रक्षित माना। दोनों ने अपने महत्वपूर्ण काम अपने जन्म स्थान से परे होकर किये। श्रीकृष्ण तो वृंदावन से दूर होकर द्वारका में बसे और फिर आतिताइयों का नाश किया। एक बार वृंदावन से निकले तो फिर लौटे ही नहंीं। जिन गोपियों के साथ रासलीला करते थे वह उनकी प्रतीक्षा ही करती रहीं। जिस कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण जी ने गीता संदेश देकर अपना सवौच्च लक्ष्य पूरा किया वह भी उनके जन्मस्थान से बहुत दूर था। भगवान श्रीराम ने एक भी राक्षस का संहार अयोध्या में नहीं किया। सीधी बात यह है कि उन्होंने जन्मभूमि से अधिक पूरी धरती को अपनी कर्मभूमि मानकर कार्य किया। वैसे भी कहा जाता है कि आदमी को प्रतिष्ठा घर से बाहर काम करने पर ही मिलती है। यही कारण है कि इन दोनों के भक्त पूरे विश्व में हैं और कई तो ऐसे हैं कि जिनकी रुचि दोनों में होने के बावजूद उनकी जन्मभूमियों नहीं है। ऐसे में उन भक्तों को उदासीन यह कायर कतई नहीं कहा जा सकता। अगर कोई ऐसा कहता तो यकीनन वह भक्तों की भावनाओं का दोहन न होने के कारण ऐसा कह रहा है। रामजन्मभूमि का निर्णय अब अदालत में होना है। ऐसे में भी अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी उनमें रुचि जिज्ञासा के कारण है न कि आस्था के कारण। मुश्किल यह भी है कि जो लोग यह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये वही अपनी सुविधा के अनुसार ऐसे विवादों को न केवल पैदा करते हैं बल्कि निरपेक्ष दिखते हुए भी एक पक्ष की तरफ झुकते नज़र आते हैं। ऐसे में आम जनमानस की कोई बड़ी भूमिका नहीं दिखती और उसकी खामोशी को तटस्थता समझा जाये या उदासीनता यह विश्लेषकों के चिंतन का विषय हो सकता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior

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गुलामों की भाषा जारी रखने का प्रयास-हिन्दी लेख


आजकल के बाज़ार और प्रचार का खेल देखकर लगता है कि कहीं न कहीं वह समाज को नियंत्रित करने के प्रयास निरंतर करता है। बुजुर्ग लोग कहते हैं कि ‘पीछे देख आगे बढ़’। हम पिछला इतिहास देखते हैं तो आगे का भविष्य लिखना मुश्किल होता है और वर्तमान में उसको देखकर आगे बढ़ते हैं तो समझ में यह नहीं आता कि पीछे वाले की रचना कैसी रही होगी? दूसरी बात यह भी कि पीछे वाले की चिंतन क्षमता और अभिव्यक्ति की शैली पर प्रश्न उठते हैं तो उसका निराकरण करना कठिन होता है। ऐसे में बेहतर तरीका यह है कि बहते हुए दरिया के किनारे पर बैठक उसमें बह रहे पानी स्त्रोत की कल्पना करें।
हमने देखा है कि सदा से ही राजनीति, समाज, तथा आर्थिक शिखर पुरुषों के प्रचार से भरा पड़ा रहा है। इसमें बुराई नहीं देखें पर आजकल तो बाज़ार तथा उसका प्रचार खुलकर शिखर पुरुषों के निर्माण का भी काम कर रहा है और इसमें कथित रूप आधुनिकता का दावा करने वाले पुराने वंशवाद के बीज समाज में बोते हैं-स्पष्टतः संदेश देते हैं कि आम आदमी की कोई औकात नहीं है। नेता के पुत्र-पुत्री को नेता, अभिनेता के पुत्र-पुत्री को अभिनेता तथा तथा पूंजीपति के पुत्र-पुत्री को पूंजीपति बताकर उनके शिखर पर बैठने से पहले ही उनका गुणगान करने लगते हैं। यह बाज़ार तथा उसका प्रचारतंत्र कभी कभी यह बताना भी नहीं भूलता कि समाजा के विभिन्न क्षेत्रों के शिखर पुरुषों के पुत्र पुत्रियां विरासत संभालने की तैयारी कर रहे हैं।
हम इस पर आपत्ति नहीं जता रहे बल्कि इतिहास को चुनौती देने जा रहे हैं क्योंकि भारत आज विश्व जगत पर महानतम होने की तरफ अग्रसर है पर उसका कोई शिखर पुरुष इसके योग्य नहीं है कि बाहरी दुनियां पर प्रभाव डाल सके। भारत में भी प्रचार माध्यम भले ही अपनी व्यवसायिक मजबूरियों के कारण भावी शिखर पुरुषों के स्वागत के लिये जुटा हुआ है पर आम जनता तो एक लाचार और बेबस सी दिखती है।
इसका मतलब यह है कि बाज़ार और उसका प्रचार तंत्र एक ऐसे नकली इतिहास का निर्माण करता है जो अस्तित्व नहीं होता। हमारा बाज़ार तथा प्रचार जिन शिखर पुरुषों को गढ़ता है विश्व समुदाय में उसका सम्मान न के बराबर है और है तो केवल इसलिये कि भारतीय समुदाय के शिखर पर वह बैठे हैं।
इधर एक दूसरी बात भी दिख रही है। विदेश में कोई किसी विश्वविद्यालय का कुलपति क्या प्रोफेसर बन जाये या किसी विदेशी प्रयोगशाला में काम करने लगे तो उसका खूब यहां प्रचार होता है। सवाल यह है क्या हमारे देश में कोई गौरवान्वित प्रतिभा नहीं है। दूसरी बात यह है कि देशभक्ति की बात करने वाले बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रचार प्रबंधक क्या इस बात को नहीं जानते कि हर कोई उस देश के लिये वफदार होता है जहां वह रहता है। ऐसे मे विदेश में प्रतिष्ठित भारतीयों से वह क्यों आशा करते हैं कि वह अपने देश के लिये वहां काम करेंगे?
खासतौर से ब्रिटेन और अमेरिका को लेकर भारतीय प्रचार माध्यम अपनी अस्थिर मनोवृति दिखाते हैं। सभी जानते हैं कि ब्रिटेन और अमेरिका स्वाभाविक समानताओं के बावजूद हमारे ही दुश्मन देश पर हाथ रखते हैं। अपने और भारत के आतंकवाद के बीच वह फर्क करते हैं। इतना ही नहीं मानवाधिकारों के नाम पर भारतीय आतंकवादियों को संरक्षण भी देते रहे हैं। सीधी बात कहें तो यह मित्र देश तो कतई नहीं कहे जा सकते। चीन का धोखा प्रमाणिक हैं पर इन दोनों देशों की मित्रता कोई प्रमाणिक नहीं है ऐसे में इनकी गुलामी करने वाले भारतीयों की अपने देश में गुणगान करने की बात समझ में नहीं आती। यह प्रचार माध्यमों की कमजोरी है जिसकी वजह से अमेरिका और ब्रिटेन के यही सोचते हैं कि हम चाहे भारत को कितना भी अपमानित करें वहां की जनता में हमारे विरुद्ध कभी वातावरण नहीं बन सकता क्योंकि वहां के प्रचार माध्यम तो हमारे यहां अपने गुलामों को देखकर खुश होते हैं।
एक वरिष्ठ पत्रकार ने एक बार भारत के बंटवारे के बारे में लिखा था। उसने जो लिखा था उसे पढ़कर तो हमें यही लगा-उसकी भाषा में सीधे नहीं लिखा गया था-कि उस समय की पूंजीपति ताकतें जहां तक भारत को संभाल सकती थी वहीं तक उन्होंने अपना देश बनाया। बाकी जगह पाकिस्तान बनने दिया। उन्होंने तो यह बात केवल कश्मीर के संबंध में कही थी कि वहां का उस समय के लोकप्रिय नेता ने कहा था कि वह तो इतना ही कश्मीर देख सकता है और बाकी तक उसकी पहुंच नहीं है-जहां पहुंच नहीं थी वह पाकिस्तान के पास है। उसे पढ़कर तो एक बारगी यह लगा कि पूरा का पूरा स्वतंत्रता आंदोलन ही समाज को व्यस्त रखने का एक बहाना भर था, असली रूपरेखा तो बाज़ार तथा उसके प्रचार माध्यम तय करने लगे थे। यकीनन उस समय बाज़ार तथा प्रचार माध्यम इस तरह ही शिखर पुरुषों का निर्माण करते रहे होंगे जैसे कि आज कर रहे हैं। इतिहास तो जो लिखा गया उस पर अब क्या लिखें।
अपने सामने ही ढेर सारे झूठ को इतिहास बनते देखा है। कई घटनाओं को एतिहासिक बताया गया पर उनका प्रभाव समाज पर स्थाई रूप से नहीं पड़ते देखा। कई कथित महापुरुष जिन्होंने शिखर पर बैठकर केवल मुखौटे की तरह काम किया आज उन्हें देवता बताकर प्रस्तुत किया जाता है। अनेक ऐसे आंदोलन चले जिनका परिणाम नहीं निकला पर चल रहे हैं। इतना ही अनेक आंदोलनों के पीछे उनके आर्थिक स्त्रोत भी संदिग्ध रूप से दिखते रहे हैं पर प्रचार माध्यमों में चर्चा की जाती है
सैद्धांतिक मुद्दों पर जिनका कोई मतलब नहीं दिखाई देता।
देश के आम आदमी से कोई विशिष्टता प्राप्त न करे इसके लिये शिखर पुरुष, पूंजीपति तथा प्रचार एकजुट हैं। हम समाज के किनारे बैठकर देखें तो आजादी से पहले जो महान थे उसके बाद कोई बना ही नहीं। आजादी से पहले भी एक ही महान शख्सियत थी, महात्मा गांधी और फिर कोई नहीं हुआ। हिन्दी साहित्य की बात करें! कितने पद्मश्री बंट गये पर संत कबीर, तुलसी, मीरा, रहीम तथा अन्य भक्तिकालीन रचयिताओं के मुकाबले कोई नहीं ठहरा। बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों ने कोशिश भी नहीं की केवल अपने अनुगामियों को ही आगे बढ़ाया। हालत यह हो गयी है कि अंग्रेजी से महान लेखक छांटे गये और जिनका नाम आम जनता के सामने नहीं आता उनको अनुवाद के माध्यम से लाया गया। हमने अनेक महान लेखक सुने, देखे और पढ़े पर जब भक्तिकालीन रचयिताओं पर नज़र डालते हैं तो सभी कंकड़ पत्थर लगते हैं।
बाज़ार और संगठित प्रचार माध्यमों का जब यह हाल देखते हैं तो उसमें सक्रिय लोगों की बुद्धि पर तरस आता है पर गुलामी संस्कृति के पोषकों से आशा भी क्या की जा सकती है। उनको पहले तो हिन्दी बोलने में ही हिचक होती है अगर बोलते हैं तो अंग्रेजी के शब्द उसमें मिलाते हैं ताकि आम आदमी से अलग लगें-वैसे यह उनकी भाषा संबंध कमजोरी भी हो सकती है। आजकल यह मांग भी होने लगी है कि हिन्दी में अंग्रेजी के शब्द शामिल किये जायें। दरअसल कुछ सतही सोच वाले विचार वालों का यह शगूफा है क्योंकि चाहे कितना भी कहा जाये पर सच यह है कि बाज़ार की जरूरत हिन्दी बन गयी है इसलिये हिन्दी न सीख सके वह अपनी पैठ बनाने के लिये ऐसे प्रयास कर रहे हैं क्योंकि अंग्रेजी में लिखेंगे तो उनको पढ़ेगा कौन? उसमें लिखने वाले भी कम थोड़े ही हैं। बहरहाल गुलामी संस्कृति को ढो रहा समाज अब भाषा के सहारे अपने ही देश के साफ सुथरी हिन्दी समझने वालों को भी अपना गुलाम बनाना चाह रहा है। बाज़ार में हिन्दी ही बिक रही है ऐसे में अंग्रेजी में पढ़े लिखे बौद्धिक वर्ग के पास अपना रोजगार बचाने के लिये यही एक रास्ता है कि वह अंग्रेज देश तथा वहां रहने वाले भारतीयों का गुणगान करने के साथ ही हिन्दी में अंग्रेजी शब्द लादने की वकालत करे ताकि शिखर पुरुषों के लिये वह जो चरण वंदना करे वह सुनी जाये क्योंकि वही तो इनाम बांटते और बंटवाते हैं। दरअसल उनकी भाषा ही गुलाम भाषा कही जा सकती है जिसमें स्वतंत्र और मौलिक रचनाओं की गुंजायश नहीं  रह जाती।

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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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