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बाबा रामदेव समाज में चेतना लाये बिना सफल नहीं हो सकते-हिन्दी लेख (baba ramdev,bharshtachar aur samajik chetna-hindi lekh


भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वामी रामदेव का अभियान अब देश में चर्चा का विषय बन चुका है। बाबा रामदेव अब खुलकर अपने योग मंच का उपयोग भ्रष्टाचार तथा काले धन के विरुद्ध शब्द योद्धा की तरह कर रहे हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि देश की हर समस्या की जड़ में भ्रष्टाचार को जानने वाले जागरुक लोग बाबा रामदेव की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कुछ लोगों को तसल्ली हो गयी है कि अब कोई नया अवतार उनके उद्धार के लिये आ गया है। हम यहां बाबा रामदेव की अभियान पर कोई विपरीत टिप्पणी नहीं कर रहे क्योंकि यह अब एक राजनीतिक विषय बन चुका है और वह अपना राजनीतिक दल बनाने की घोषणा भी कर चुके हैं। हां, यह सवाल पूछ रहे हैं कि अगर देश की दुर्दशा के लिये भ्रष्टाचार जिम्मेदार हैं तो फिर भ्रष्टाचार के लिये कौन जिम्मेदार हैं? क्या इसकी पहचान कर ली गयी है?
एक बात यहां हम बता दें कि यह लेखक निजी रूप से बाबा रामदेव को नहीं जानता पर टीवी पर उनकी योग शिक्षा की सराहना करता है और उनके वक्तव्यों को समझने का प्रयास भी करता है। दूसरी बात यह भी बता दें कि श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अध्ययन भी किया है और उनके परिप्रेक्ष्य में बाबा की सभी प्रकार की गतिविधियों को देखने का प्रयास यह लेखक करता है। बाबा रामदेव अब आक्रामक ढंग से राष्ट्रधर्म के निर्वाह के लिये तत्पर दिखते हैं, यह अच्छी बात है पर एक बात यह भी समझना चाहिए कि राजनीतिक क्रांतियां तो विश्व के अनेक देशों में समय समय पर होती रही हैं पर वहां के समाजों को इसका क्या परिणाम मिला इसकी व्यापक चर्चा कोई नहंी करता। इसका कारण यह है कि राष्ट्रधर्म निर्वाह करने वाले लोग अपने देश की समस्याओं का मूल रूप नहीं समझतें।
भारत में भ्रष्टाचार समस्या नहीं बल्कि अनेक प्रकार की सामाजिक, धार्मिक तथा पारिवारिक रूढ़िवादी परंपराओं की वजह से आम आदमी में दूसरे से अधिक धन कमाकर खर्च कर समाज में सम्मान पाने की इच्छा का परिणाम है।
बाबा रामदेव बाबा समाज के शिखर पुरुषों को ही इसके लिये जिम्मेदार मानते हैं पर सच यह है कि इस देश में ईमानदार वही है जिसे बेईमान होने का अवसर नहीं मिलता।
भारत का अध्यात्मिक ज्ञान विश्व में शायद इसलिये ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि सर्वाधिक मूढ़ता यही पाई जाती है जिसे हम भोलेपन और सादगी कहकर आत्ममुग्ध भी हो सकते हैं। हमारे ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने समाज के इसी चरित्र की कमियों को देखते हुए सत्य की खोज करते हुए तत्वज्ञान का सृजन किया। शादी, गमी, जन्मदिन और अन्य तरह के सामूहिक कार्यक्रमों में खर्च करते हुए सामान्य लोग फूले नहीं समाते। लोगों को यही नहीं मालुम कि अच्छा क्या है और बुरा क्या है? भ्रष्टाचार को समाज ने एक तरह से शिष्टाचार मान लिया है? क्या आपने कभी सुना है कि किसी रिश्वत लेने वाले अधिकारी याद कर्मचारी को उसके मित्र या परिचित सामने रिश्वतखोर कहने का साहस कर पाते हैं। इतना ही नहीं सभी जानते हैं कि अमुक आदमी रिश्वत लेता है पर उसकी दावतों में लोग खुशी से जाते हैं। समाज में चेतना नाम की भी नहीं है। इसका सीधा मतलब यह कि समाज स्वयं कुछ नहीं करता बल्कि किसी के रिश्वत में पकड़े जाने पर वाह वाह करता है। उसकी जमकर सामूहिक निंदा होती है और इसमें वह लोग भी शामिल होते हैं जो बेईमान हैं पर पकड़े नहीं गये। आज यह स्थिति यह है कि जो पकड़ा गया वही चोर है वरना तो सभी ईमानदार हैं।
आखिर यह भ्रष्टाचार पनपा कैसे? आप यकीन नहीं करेंगे कि अगर देश के सभी बड़े शहरों में अतिक्रमण विरोधी अभियान चल जाये तो पता लगेगा कि वहां चमकती हुए अनेक इमारतें ही खंडहर बन जायेंगी। नई नई कालोनियों में शायद ही कोई ऐसा मकान मिले जो अतिक्रमण न मिले। सभी लोग अपने सामर्थ्य अनुसार भूखंड लेते हैं पर जब मकान बनता है तो इस प्रयास में लग जाते हैं कि उसका विस्तार कैसे हो। पहली मंजिल पर अपनी छत बाहर इस उद्देश्य से निकाल देते हैं कि ऊपर अच्छी जगह मिल जायेगी। बड़े बड़े भूखंड है पर चार पांच फुट उनको अधिक चाहिये वह भी मुफ्त में। यह मुफ्त का मोह कालांतर में भ्रष्टाचार का कारण बनता है। जितना भूखंड है उसमें अगर चैन से रहा जाये तो भी बहुत उन लोगों के लिये बड़ा है पर मन है कि मानता नहीं।
विवाह नाम की परंपरा तो भ्रष्टाचार का एक बहुत बड़ा कारण है। बेटे को दुधारु बैल समझकर ं हर परिवार चाहता है कि उसके लिये अच्छा दहेज मिले। लड़की को बेचारी गऊ मानकर उसे धन देकर घर से धकेला जाता है। शादी के अवसर पर शराब आदि का सेवन अब परंपरा बन गयी है। स्थिति यह है कि अधिक से अधिक दिखावा करना, पाखंड करते हुंए धार्मिक कार्यक्रम करना और दूसरों से अधिक धनी दिखने के मोह ने पूरे समाज को अंधा कर दिया है। बाबा रामदेव ने स्वयं ही एक बार बताया था कि जब तक मुफ्त में योग सिखाते थे तब कम संख्या में लोग आते थे। जब धन लेना शुरु किया तो उनके शिष्य और लोकप्रियता दोनों ही गुणात्मक रूप से बढ़े। सीधी सी बात है कि समाज पैसा खर्च करने और कमाने वाले पर ही विश्वास करता है। अज्ञान में भटकते इस समाज को संभालने का काम संत इतिहास में करते रहे हैं पर आज तो पंच सितारे आश्रमों में प्रवचन और दीक्षा का कार्यक्रम होता है। आज भी कोई ऐसा प्रसिद्ध संत कोई बता दे जो कबीर दास और रविदास की तरह फक्कड़ हो तो मान जायें। हम यहां बाबा रामदेव की संपत्ति का मामला नहीं उठाना चाहते पर पतंजलि योग पीठ की भव्यता उनसे जुड़े लोगों की वजह से है यह तो वह भी मानते हैं। हम यहां स्पष्ट करना चाहेंगे कि पतंजलि योग पीठ की भव्य इमारत वह नहीं बनाते तो भी उनका सम्मान आम आदमी में कम नहीं होता। जिस तरह धन आने पर उन्होंने भव्य आश्रम बनाया वैसे ही देश के दूसरी धनी भी यही करते हैं। वह सड़क पर फुटपाथ पर कब्जा कर लेते हैं। फिर उससे ऊपर आगे अपनी इमारत ले जाकर सड़के के मध्य तक पहुंच जाते हैं। धन आने पर अनेक लोगों की मति इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि उनको पता ही नहीं चलता कि अतिक्रमण होता क्या है? जमीन से ऊपर उठे तो उनको लगता है कि आकाश तो भगवान की देन है।
मुख्य बात यह है कि अंततः धन माया का रूप है जो अपना खेल दिखाती है। इसके लिये जरूरी था कि धार्मिक संत सामाजिक चेतना का रथ निरंतर चलाते रहें पर हुआ यह कि संतों के चोले व्यापारियों ने पहन लिये और अपने महलों और होटलों को आश्रम का नाम दे दिया। बाबा रामदेव पर अधिक टिप्पणियां करने का हमारा इरादा नहीं है पर यह बता दें कि जब तक समाज में चेतना नहीं होगी तब भ्रष्टाचार नहीं मिट सकता। एक जायेगा दूसरा आयेगा। मायावी लोगों का समूह ताकतवर है और उसे अपना व्यापार चलाने और बढ़ाने के लिये बाबा रामदेव को भी मुखौटा बनाने में झिझक नहीं होगी। अगर समाज स्वयं जागरुक नहीं है तो फिर कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। यह तभी संभव है कि योग शिक्षा के साथ अध्यात्मिक ज्ञान भी हो। बाबा रामदेव जब अपने विषय में की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों को उत्तेजित होकर बयान दे रहे थे तब वह एक तत्वज्ञानी योगी नहीं लगे। उनके चेहरे पर जो भाव थे वह उनके मन की असहजता को प्रदर्शित कर रहे थे। हम यह नहीं कहते कि उत्तेजित होना अज्ञान का प्रमाण है पर कम से उनका स्थिरप्रज्ञ न होना तो दिखता ही है। वह केवल शिखर पुरुषों को कोसते हैं और समाज में व्याप्त मूढ़तापूर्ण स्थिति पर कुछ नहीं कहते। ऐसे में उनसे यह अपेक्षा भी की जा सकती है कि वह समाज को अपने अंदर की व्यवस्था के बारे में मार्गदर्शन दें।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior
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अंग्रेज आज भी कर रहे राज-हिन्दी हास्य कविताऐं


फिर एक बार वह लोग
स्वतंत्रता दिवस मनायेंगे,
अपनी गुलामी के जख्म याद कर
उससे मुक्ति पर मुस्करायेंगे।
जिनसे मुक्ति पाई थी
उनको एक दिन दे लेंगे गालियां,
बजेंगी फिर तालियां,
मगर फिर छोड़ी है जो मालिकों ने वसीयत
गुलामों को बांटने की
मुखिया और बंधुआ को छांटने की
उसे पूरा करने में जुट जायेंगे।
———
कुछ लोग कहते हैं कि
अंग्रेज भारत छोड़ गये,
कुछ उनका शुक्रिया अदा करते हैं कि
वह भारत को जोड़ गये।
सच तो यह है कि
अंग्रेज आज भी कर रहे राज
बस,
नाम का स्वराज छोड़ गये।
———–
गुलाम बनाने के कानून में
आज़ादी की असलियत तलाश रहे हैं,
मालिक छोड़ गये राज
मगर सिंहासन पर चरण पादुकाऐं छोड़े गये
उसमें खुद मुख्तियारी की आस कर रहे हैं।
————————

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भारतीय बाज़ार और प्रचार संस्थानों की राष्ट्रनिरपेक्षता-हिन्दी लेख


हमारे लिय यह प्रमाणित करना कठिन है भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित भगवान के अवतार वास्तव में सत्य हैं। अनेक लोग इनको कल्पित मानते हैं तो कुछ लोग इनको सत्य मानते हुए उनकी जीवन चरित्र से जुड़ी चमत्कारी घटनाओं को साहित्यक अतिश्योक्ति मानते हैं। बहरहाल अब यह बहस का मुद्दा नहीं बल्कि विश्वास का बन गया है। मानो तो भगवान नहीं तो पत्थर तो हूं ही-एक तरह से भगवान का ही यह कथन लगता है।
इंसान को जो प्रकृति के तरफ से जो सबसे कीमती तोहफा मिला है वह बुद्धि की व्यापकता जो अन्य जीवों में नहीं पायी जाती। इसी इंसान की देह में रहने वाला मन भी उतना ही सोचता है जितनी बुद्धि से ऊर्जा पाता है। यही मन मनुष्य का मित्र और शत्रु है। अब यह मनुष्य के संकल्प पर निर्भर होता है कि वह उसे क्या बनाता है। यही मन चमत्कार देखना चाहता है क्योंकि कोई इंसान स्वयं नहीं कर सकता।
मगर चमत्कार होते नहीं और न ही किये जा सकते हैं। प्रकृति के नियम हैं उनको कोई बदल नहीं सकता मगर इंसान उसे बदलते देखना चाहता है। यही से शुरुआत होती है उन मनुष्यों की गतिविधियों की जो व्यापार करते हैं। उन्हें अपने सामान बेचना है तो उसका प्रचार करना है। प्रचार करने के लिये उनको ऐसे पात्र बताना है जो उन चीजों का उपयोग करते हैं या उनका नाम उनसे जुड़ा है जो चमत्कार करते हैं। चमत्कार होते नहीं पर उनका होना दिखाना पड़ता है। इंसान को दूर के ढोल सुहावने लगते हैं इसलिये ऐसे पात्र दूर स्थित रखने पड़ते हैं ताकि उसके दृष्टि पथ में न आये। अब तो छोटे और बड़े पर्दे ने व्यापारियों को यह सुविधा आसानी से दे दी है।
आदमी को बुखार आ गया तो उसे जाना है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान बताता है कि आदमी के अंदर ही रोग प्रतिरोधक क्षमतायें होती हैं और किसी समय उनमें कमी आ जाती है पर फिर स्वतः उसकी वापसी होती है। यही कारण है कि अधिकतर दवाईयां दर्द प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिये बनती हैं और उनसे रोग निवारण नहीं होता। ऐसे में किसी का बुखार अगर आराम करने से चला गया तो वह चमत्कार नहीं होता पर मान लिया जाता है।
माया चंचल है। आज यहां तो वहां। इसलिये किसी का मालामाल होना भी चमत्कार नहीं है और न गरीब हो जाना। अभ्यास करते करते मूर्ख ज्ञानी हो जाता है। आदमी की बुद्धि व्यापक है और वह निंरतर सक्रिय रहती है ऐसे में जो भी अपने व्यवसाय में लगा है वह उसक हर हुनर में माहिर होता है। जिस तरह दुकानदार अपनी अलमारी में किसी को सजावट ऐसे करता है जिससे उसकी वस्तुऐं ग्राहक की दृष्टि में आये उसी तरह सड़क पर प्रदर्शन करने वाला नट और जादूगर भी यही करता है कि लोग उसके करतब से प्रभावित हों। बहुत पहले सांप और नेवले की लड़ाई देखते थे। नेवला सांप को घायल कर देता था। बाद में सांप और नेवला लाने वाला लोगों से पैसा देने का आग्रह कर था। लोग उसे पैसा देते थे। ऐसा दिन में वह कई बार कई जगह करता था। उसकां सांप भी विचित्र होता था। अब कुछ लोग कहते हैं कि शायद वह सांप प्लस्टिक का रहता होगा और उस पर वह कोई ऐसा द्रव्य लगाता होगा जो उसके नेवले का प्रिय हो जिसे चूसने के लिये वह उस पर हमला करता हो। कहने का अभिप्राय यह है कि इस तरह के नट और जादूकर हर युग में रहे हैं जो इंसान के मन में चमत्कार और दूसरों के द्वंद्वों का आनंद लेने की लालसा रहती है। इसका व्यवसायिक दोहन करने की कला का नाम ही व्यापार है।
अब समय बदल गया है। आदमी के मनोरंजन के साधन बदल गये हैं। अब भीड़ सड़क पर सांप नेवले का द्वंद्व देखने नहीं जाती। इसलिये बड़े पर्दे की फिल्में और छोटे पर्दे की टीवी पर ही ऐसे चमत्कारों और द्वंद्वों का आयोजन किया जाने लगा है। बस, अंतर इतना है कि उनके प्लास्टिक के पात्रों जगह हाड़मांस से बने इंसान काम करते हैं। खासतौर से क्रिकेट और फिल्म में चमत्कार और द्वंद्व प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनको देखकर आदमी का मन झूमता है।
चमत्कारों और द्वंद्व देखने के अलावा मनुष्य की एक और बुराई है वह स्वयं उनसे जुड़ना चाहता है। जिस तरह नट का खेल देखने के बाद लोग पैसे डालते थे-एक तरह से दान देते थे कि आखिर उसने इतनी मेहनत की है। अब भी लोग डालते हैं। बस अंतर इतना है कि यहां वह दान की तरह नहीं दाम की तरह पैसे देते हैं। आदमी के मन में जुआ की प्रवृत्ति है और चमत्कार या द्वंद्व से सीधे जुड़ने की प्रवृत्ति के कारण सट्टे भी सुविधा का भी इंतजाम कर लिया गया है।
आदमी को कोई न कोई भगवान मन लगाने के लिये चाहिये सो बाज़ार ने फिल्म और क्रिकेट से ही उठा लिये हैं। एक नही सैंकड़ों। किसी का जन्म दिन है तो किसी की पुण्य तिथि। रेडियो, टीवी तथा समाचार पत्रों में रोज किसी भगवान की चर्चा होती है।
इधर भारत का बाजार क्रिकेट को धर्म कहकर प्रचारित कर रहा है और बकायदा एक भगवान भी ले आया है। । इस क्रिकेट खेल का जनक कौन है? अपने भारत में तो शायद यह उस खिलाड़ी के जन्म से ही शुरु हुआ होगा जिसे बाज़ार भगवान बता रहा है। 1983 में जब भारत ने विश्व कप जीता था तब उस समय आठ साल का भगवान आकाश से उड़कर वहां पहुंचा होगा। 2006 में भारत बांग्लादेश से भारत पिट गया तब शायद उस पर इस भगवान की कृपा रही होगी। हां, कभी कभी तो भगवान को भारत के पड़ौसी पर भी कृपा करना चाहिए। भारत के क्रिकेट खेल में सट्टे की चर्चा जोरों पर है। भगवान को शायद पता नहीं! बाज़ार का काम है सौदा करना। अधर्म बिके या धर्म! पैसे सौदे में दाम से आये या खेल में सट्टे से इसकी पहचान वह नहीं करना चाहता। इसलिये ही शायद एक भगवान बना रखा है। यानि जो लोग सट्टे या जुआ जैसे घृणित विषय को नहीं देखना चाहते वह भगवान को देखकर सात्विकता के साथ क्रिकेट प्रेमी बने रहें।
भगवान तो सर्वव्यापी होते हैं, चमत्कारी होते हैं, बाज़ार का यह ‘क्रिकेटियर भगवान’ कीर्तिमानों के लिये ही चमत्कारी हैं-अब यह अलग बात है कि विश्व कप जीतने का कीर्तिमान उसके नाम पर नहीं है। अब यह कहना कठिन है कि उनमें यह क्षमता है कि नहीं या फिर भगवान को सभी पर समान दृष्टि रखना चाहिये इसलिये विश्व कप में राष्ट्रनिरपेक्ष हो जाते हैं।
भारतीय बाज़ार के सौदागर भी अब अपने भगवान का अनुसरण करते राष्ट्रनिरपेक्ष होते जा रहे हैं। उनको नटों और जादूगरों की तरह सड़क पर खेल नहीं दिखाकर पैसे वसूल नहंी करना बल्कि छोटे और बड़े पर्दे पर कब्जा कर खातों में पैसे पहुंचाने हैं। यह बाज़ार है, उसके सौदागरों और ढिंढोरचियों पर जितना लिखो कम है। वह रोज एक नया शिगुफा छोड़ते हैं और अनेक बार तो लोगों की समझदानी काम हीं नहीं करती। जब सड़क छाप नट और जादूगरों ने पास में रहकर चला दिया तो यह तो दूर बैठे हैं। भले ही अपने को कहते भले ही कुछ हों पर हैं तो नट और जादूगर ही न!

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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शायरी से जीत लो दुनियां-हिन्दी शायरी


तलवार से एक कत्ल करोगे,
पर खुद भी कभी उसके वार से मरोगे।
अपनी शायरी से जीत लो दुनियां
अपना नाम अक्लमंदों की सूची में भरोगे।
———
तलवारें है जिनके हाथ में
उन पर क्या भरोसा करना
कब कर बैठें वह अपने आदमी पर वार,
गरदना काटने पर बहादुरी
और कट जाने पर शहीद का दर्जा
भले ही जमाना देता है
पर शायरी से जीते हैं दिल जिन्होंने
उनको इतिहास अपने पन्नों में
हमदर्दों के रूप में दर्ज कर लेता है
सच कहा है कि किसी ने
लफ्ज़ों करते हैं जितना प्रहार
कर नहीं सकती वैसा तलवार।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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इन्टरनेट के प्रयोग से होने वाले दोषों से बचाती है योग साधना-हिंदी आलेख


कुछ समाचारों के अनुसार इंटरनेट पर अधिक काम करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इंटरनेट का संबंध कंप्यूटर से ही है जिसके उपयोग से वैसे भी अनेक बीमारियां पैदा होती हैं। एक खबर के अनुसार कंप्यूटर पर काम करने वालों में विटामिन डी की कमी हो जाती है इसलिये लोगों को धूप का सेवन अवश्य करना चाहिये। अगर इन खबरों का विश्लेषण करें तो उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि कंप्यूटर और इंटरनेट के अधिक प्रयोग से ही शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा इनके उपयोग के समय अपने आपको अनावश्यक रूप से थकाने के साथ ही अपनी शारीरिक तथामानसिक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान न देना बहुत तकलीफदेह यह होता है। सच बात तो यह है कि इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर काम करने वालों के पास उससे होने वाली शारीरिक और मानसिक व्याधियों से बचने का एकमात्र उपाय योग साधना के अलावा अन्य कोई उपाय नज़र नहीं आता।
दरअसल कंप्यूटर के साथ अन्य प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक सावधानियां रखने के नुस्खे पहले बहुत पढ़ने को मिलते थे पर आजकल कहीं दिखाई नहीं देते । कुछ हमारी स्मृति में हैें, जो इस प्रकार हैं-
कंप्यूटर पर बीस मिनट काम करने के बाद विश्राम लें। पानी अवश्य पीते रहें। खाने में नियमित रूप से आहार लेते रहें। पानी पीते हुए मुंह में भरकर आंखों पर पानी के छींटे अवश्य मारें। अगर कंप्यूटर कक्ष से बाहर नहीं आ सकें तो हर बीस मिनट बार अपनी कुर्सी पर ही दो मिनट आंख बंद कर बैठ जायें-इसे आप ध्यान भी कह सकते हैं। काम खत्म करने पर बाहर आकर आकाश की तरफ जरूर अपनी आंखें केंद्रित करें ताकि संकीर्ण दायरे में काम कर रही आंखें व्यापक दृश्य देख सकें।
दरअसल हम भारतीयों में अधिकतर नयी आधुनिक वस्तुओं के उपयोग की भावना इतनी प्रबल रहती है कि हम अपने शरीर की सावधनी रखना फालतु का विषय समझते हैं। जहां तक बीमारियों का सवाल है तो वह शराब, सिगरेट और मांस के सेवन से भी पैदा होती हैं इसलिये इंटरनेटर और कंप्यूटर की बीमारियों से इतना भय खाने की आवश्यकता नहीं है मगर पर्याप्त सावधानी जरूर रखना चाहिए।
इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करने वाले हमारे देश में दो तरह लोग हैं। एक तो वह है जो शौकिया इससे जुड़े हैं और दूसरे जिनको इससे व्यवसायिक बाध्यता ने पकड़ा है। जो शौकिया है उनके लिये तो यह संभव है कि वह सावधानी रखते हुए काम करें-हालांकि उनके मनोरंजन की प्यास इतनी गहरी होती है कि वह इसे समझेंगे नहीं-पर जिनको नौकरी या व्यवसाय के कारण कंप्यूटर या इंटरनेट चलाना है उनके स्थिति बहुत दयनीय होती है। दरअसल इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करते हुए आदमी की आंखें और दिमाग बुरी तरह थक जाती हैं। यह तकनीकी काम है पर इसमें काम करने वालों के साथ एक आम कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है। जहां कंप्यूटर या इंटरनेट पर काम करते एक लक्ष्य दिया जाता है वहां काम करने वालों के लिये यह भारी तनाव का कारण बनता है। दरअसल हमारे देश में जिनको कलम से अपने कर्मचारियेां को नियंत्रित करने की ताकत मिली है वह स्वयं कंप्यूटर पर काम करना अपने लिये वैसे ही हेय समझते हैं जैसे लिपिकीय कार्य को। वह जमीन गड़ढा खोदने वाले मजदूरो की तरह अपने आपरेटरों से व्यवहार करते हैं। शारीरिक श्रम करने वाले की बुद्धि सदैव सक्रिय रहती है इसलिये वह अपने साथ होने वाले अनाचार या बेईमानी का मुकाबला कर सकता है। हालांकि यह एक संभावना ही है कि उसमें साहस आ सकता है पर कंप्यूटर पर काम करने वाले के लिये दिमागी थकावट इतनी गहरी होती है कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता काम के तत्काल बाद समाप्त ही हो जाती है। इसलिये जो लोग शौकिया कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े हैं वह अपने घर या व्यवसाय में परेशानी होने पर इससे एकदम दूर हो जायें। जिनका यह व्यवसाय है वह भी अपने साइबर कैफे बंद कर घर बैठे या किसी निजी संस्थान में कार्यरत हैं तो पहले अवकाश लें और फिर तभी लौटें जब स्थिति सामान्य हो या उसका आश्वासन मिले। जब आपको लगता हो कि अब आपको दिमागी रूप से संघर्ष करना है तो तुरंत कीबोर्ड से हट जायें। घर, व्यवसाय या संस्थान में अपने विरोधी तत्वों के साथ जब तक अमन का यकीन न हो तब कंप्यूटर से दूर ही रहें ताकि आपके अंदर स्वाभाविक मस्तिष्कीय ऊर्जा बनी रहे।
कंप्यूटर पर लगातार माउस से काम करना भी अधिक थकाने वाला है। जिन लोगों को लेखन कार्य करना है अगर वह पहले कहीं कागज पर अपनी रचना लिखे और फिर इसे टाईप करें। इससे कंप्यूटर से भी दूरी बनी रहेगी दूसरे टाईप करते हुए आंखें कंप्यूटर पर अधिक देर नहंी रहेंगी। जो लेाग सीधे टाईप करते हैं वह आंखें बंद कर अपने दिमाग में विचार करते हुए टंकित करें।
वैसे गूगल के फायरफाक्स में बिना माउस के कंप्यूटर चलाया जा चलाया जा सकता है। जहां तक हो सके माउस का उपयोग कम से कम करें। वैसे भी बेहतर कंप्यूटर आपरेटर वही माना जाता है जो माउस का उपयोग कम से कम करता है।
कुछ लोगों का कहना है कि कंप्यूटर पर काम करने से आदमी का पेट बाहर निकल आता है क्योंकि उसमें से कुछ ऐसी किरणें निकलती हैं जिससे आपरेटर की चर्बी बढती है। इस पर थोड़ा कम यकीन आता है। दरअसल आदमी जब कंप्यूटर पर काम करता है तो वह घूमना फिरना कम कर देता है जिसकी वजह से उसकी चर्बी बढ़ने लगती है। अगर सुबह कोई नियमित रूप से घूमें तो उसकी चर्बी नही बढ़ेगी। यह अनुभव किया गया है कि कुछ लोगों को पेट कंप्यूटर पर काम करते हुए बढ़ गया पर अनेक लोग ऐसे हैं जो निरंतर काम करते हुए पतले बने हुए हैं।
आखिरी बात यह है कि कंप्यूटर पर काम करने वाले योगसाधना जरूर करें। प्राणायाम करते हुए उन्हेंइस बात की अनुभूति अवश्य होगी कि हमारे दिमाग की तरफ एक ठंडी हवा का प्रवाह हो रहा हैं। सुबह प्राणायाम करने से पूर्व तो कदापि कंप्यूटर पर न आयें। रात को कंप्यूटर पर अधिक देर काम करना अपनी देह के साथ खिलवाड़ करना ही है। सुबह जल्दी उठकर पहले जरूर पानी जमकर पियें और उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम निरंतर करंें। इससे पांव से लेकर सिर तक वायु और जल प्रवाहित होगा उससे अनेक प्रकार के विकार बाहर निकल आयेंगे। जब आप करेंगे तो आपको यह लगने लगेगा कि आपने एक दिन पूर्व जो हानि उठाई थी उसकी भरपाई हो गयी। यह नवीनता का अनुभव प्रतिदिन करेंगे। वैसे कंप्यूटर पर काम करते समय बीच बीच में आंखें बंद कर ध्यान अपनी भृकुटि पर केद्रित करें तो अनुभव होगा कि शरीर में राहत मिल रही है। अपने साथ काम करने वालों को यह बता दें कि यह आप अपने स्वास्थ्य के लिये कर रहे हैं वरना लोग हंसेंगे या सोचेंगे कि आप सो रहे हैं।
किसी की परवाह न करें क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि जान है तो जहान हैं। भले ही इस लेख की बातें कुछ लोगों को हास्यप्रद लगें पर जब योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रोच्चार-गायत्री मंत्र तथा शांति पाठ के सा ओम का जाप- करेंगे और प्रतिदिन नवीनता के बोध के साथ इंटरनेट या कंप्यूटर से खेलें्रगे तक इसकी गंभीरता का अनुभव होगा।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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