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हास्य कविता का प्रेरक गुस्सा-हास्य व्यंग्य कविता (hasya kavita)


हास्य कवि ढूंढ रहा था
कोई जोरदार कविता
मिल गयी पुरानी प्रेमिका
जिसका नाम भी था कविता।

उसे देखते ही चहकते हुए वह बोली
‘’अरे, कवि
तुम भी अब बुढ़ाने लगे हो
फिर भी बाज नहीं आते
हास्य कविता गुड़गुड़ाने लगे हो
शर्म नहीं आती
पर मुझे बहुत आती
जब पति के सामने
तुम्हारे पुराने प्रेम का किस्सा सुनाती
तब वह बिफर कर कहते हैं
‘क्या बेतुके हास्य कवि से इश्क लड़ाया
मेरा जीवन ही एक मजाक बनाया
कोई श्रृंगार रस वाला कवि नहीं मिला
जो ऐसे हास्य कवि से प्रेम रचाया
जिसका सभी जगह होता गिला
कहीं सड़े टमाटर फिकते हैं
तो कहीं अंड़े पड़ते दिखते हैं’
उनकी बात सुनकर दुःख होता है
सच यह है तुम्हारी वजह से
मैंने अपना पूरा जीवन ही नरक बनाया
फिर भी इस बात की खुशी है
कि मेरे प्यार ने एक आदमी को कवि बनाया’

उसकी बात सुनकर कवि ने कहा
‘मेरे बेतुके हास्य कवि होने पर
मेरी पत्नी को भी शर्म आती है
पर वह थी मेरी पांचवी प्रेमिका
जिसके मिलन ने ही मुझे हास्य कवि बनाया
प्रेम में गंभीर लगता है
पर मिलन मजाक है
यह बाद में समझ आया।
गलतफहमी में मत रहना कि
तुमने कवि बनाया।
तुम्हारे साथ अकेले नहीं
बल्कि पांच के साथ मैंने प्रेम रचाया।
तुम्हारी कद काठी देखकर लगता है कि
अच्छा हुआ तुमसे विरह पाया
कहीं हो जाता मिलन तो
शायद गमों में शायरी लिखता
जिंदगी का बोझ शेरों में ढोता दिखता।
भले ही घर में अपनी गोटी गलत फिट है
पर हास्य कविता कुछ हिट है
दहेज में मिला ढेर सारा सामान
साथ में मिला बहुत बड़ा मकान
जिसके किराये से घर चलता है
उसी पर अपना काव्य पलता है
तुमसे भागकर शादी की होती
तो मेरी जेब ही सारा बोझ ढोती
तब भला कौन सुनता गम की कविता
पांचवीं प्रेमिका और वर्तमान पत्नी भी
कम नहीं है
पर उसके गुस्से ने
मुझे हास्य कवि बनाया

…………………………………

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इजरायल और चीन से सीखने लायक क्या है-आलेख


पता नहीं क्यों भारत के लेखकों और बुद्धिजीवियों एक तरफ से तो देशप्रेम से ओतप्रोत रहते हैं दूसरी तरफ अपने लेखों और वक्तव्यों में दूसरे देशों से सीख लेने का संदेश देते हैं। इनमें दो देशों के नाम बहुत आते हैं एक चीन का दूसरा इजरायल का। ऐसी बातें कहते और लिखते हुए लेखक और बुद्धिजीवी अपने देश के उपलब्धियों को भूल जाते हैं चाहे वह आर्थिक और सामाजिक हों या वैज्ञानिक-तकनीकी या स्वास्थ्य। हो सकता है इन दोनों देशों ने कड़े संघर्ष के बाद उपलब्धियों प्राप्त की हों पर उनसे भी अधिक हमारे देश के लोगों की सफलता हो। वैसे तो इस विषय पर अधिकतर वही राजनीतिक विषयों पर लिखने वाले लेखक लिखते हैं पर वह इसके सामाजिक प्रभावों का आंकलन नहीं करते जो हमारे देश के लोगों पर पड़ता है।

यहूदी धर्म को मानने वाले इजरायल की चर्चा आजकल इस देश में अधिक ही होने लगी है। खास तौर से फलस्तीन के आतंकवादियों के खिलाफ हमलों के कारण उसे बहुत प्रचार मिला। हिटलर की प्रताड़ना के कारण जर्मनी से यहूदियों ने पलायन किया और फलस्तीन की खाली जमीन पर कब्जा कर अपना देश बसा लिया। यहूंदियों ने अपनी कर्मठता और परिश्रम से अपना देश तो बसा लिया पर फलस्तीन ने कभी उसे चैन से नहीं बैठने दिया। उनके साथ संघर्ष करते हुए इजरायल ने अपने आपको बचा रखा है उसके लिये उसकी प्रशंसा होती हैं। विज्ञान,तकनीकी,कृषि,शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों में उसने खूब प्रगति की पर इसी कारण उसे अपना आदर्श मानकर देश के लोगोे को उसी राह पर चलने का संदेश देना थोड़ा अजीब लगता है। यहूदियों ने अपने उद्यम और परिश्रम से न केवल विश्व में बल्कि इजरायल में भी खूब तरक्की की है पर उनको अमेरिका और पश्चिमी देशों का नैतिक समर्थन भी खूब मिला। अनेक अनुसंधानों की वजह से यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिले पर यहां बात याद रखने लायक है कि इसके पीछे अमेरिक और पश्चिमी देशों का पूरा समर्थन उसके साथ रहा है। सच बात तो यह है कि एक तरह से यहूदियों का उनकी प्रतिभा का पश्चिमी देशों खासतौर से अमेरिका ने खूब दोहन किया है ऐसे में अगर उनको पुरस्कार मिल गये तो इसमें आश्चर्य क्या है? खास तौर से जब वह अपनी स्थापना के समय से ही अमेरिका पर आश्रित रहा है। जिस तरह अमरिका की धमकी के बाद वह फलस्तीनियों के विरुद्ध वह कार्यवाही या युद्ध बंद करता है उससे तो कभी तो वह अमेरिका का उपनिवेश अधिक लगता है। कभी कभी तो यह संदेह होता है कि कहीं यहूदियों की प्रतिभा का उपयोग करने के लिये ही तो कहीं अमेरिका ने उनको वहां स्थापित करने की योजना तो नहीं बनायी थी। यहां यह बात याद रखने लायक है कि किसी समय हिटलर अमेरिका का मित्र था और आजकल जैसी अंतर्राष्ट्रीय राजनीति चल रही है वह पहले भी थी और कोई बड़ी बात नहीं ऐसी ही कोई दूरगामी योजना के तहत यहूदियों को वहां लाया गया हो-यह बात कहीं इतिहास मेंं नहंी लिखी पर जिस तरह इजरायल हमेशा समर्थन के लिये अमेरिका पर निर्भर रहा है उससे यही लगता है।

याद रखने वाली बात यह भी है कि इजरायल हथियारों को बेचने वाला देश है और इसलिये कुछ लोग उस पर कुछ आतंकवादी गुटों को सहायता देने के आरोप भी लगाते हैं। हथियार कोई शांतिकाल में नहीं बिकते इसके लिये जरूरी है कि विश्व में अशांत क्षेत्र बने रहें। इतना ही नहीं एक मजेदार बात यह भी हुई है कि किसी समय अमेरिका की जासूसी संस्था सी.आई.ए. पर जिस तरह दूसरे देशों में अस्थिरता फैलाने के आरोप लगते थे वैसे ही अब इजरायल की जासूसी संस्था पर भी लगने लगे हैं। हम इजरायल द्वारा आतंकवाद के मुकाबले के लिये अनेक प्रकार के हथियार और तकनीकी के अविष्कार की बातें सुनते हें और तय बात है कि उसे बेचा वही जायेगा जहां आंककवाद होगा। आतंकवाद भी वहीं होगा जहां हथियार और तकनीकी खरीदने के लिये धन होगा। ऐसे में विश्व के हथियार के सौदागरों पर यही आरोप लगते हैं कि वह हथियार बेचने के लिये अपने लिये बाजार बनाते हैं ओर इसलिये इजरायल की रणनीति संदेह से परे नहीं हो सकती।

इजरायल की शक्ति का भी अधिक प्रचार होता लग रहा हैं। बरसों से सुन रहे हैं कि इजरायल ईरान के परमाणु संयंत्रों को नष्ट कर सकता है पर कभी नहीं किया। बीच में तो यह भी सुनने में आया कि वह पाकिस्तान के परमाणु संयंत्रों पर हमला करेगा पर यह दूर की कौड़ी ही रही।

फिर इजरायल एक छोटा देश है और भारत बहुत बृहद देश है। अगर मान लीजिये किसी परिवार में दो बच्चे हैं और मकान में भी दो कमरे में है तो वह आसानी संभल जाता है। गृहस्वामिनी आसानी से घर की साफ सफाई कर लेती है। जबकि किसी परिवार में पांच बच्चे हों और रहने के लिये आठ कमरे तो उसकी साफ सफाई के लिये बाहर से मदद लेनी पड़ती है। कहने का तात्पर्य है कि सीमित दायरे में विकास और आपसी संपर्क बहुत मजबूत होते हैं। यहां हम सड़क पर निकलते हैं तो कितने अनजान लोग निकल जाते हैं पर हम उनकी तरफ नहीं देखते पर कहीं अगर विदेश में हों तो कोई भारतीय सड़क पर मिल जाये तो उससे बात करने के लिये जरूर मन मचलेगा। भारत एक बृहद देश है और उसके जो फायदे और नुक्सान हैं उसकी वजह से इजरायल के संदर्भ देकर अपने देश के लोगों को समझाना ठीक नहंीं लगता।

जहां तक तरक्की की बात है तो याद रखें कि भारत ने अभी हाल ही में चंद्रयान भेजा था और वह आज भी इजरायल के उपग्रह भेजता है। भारत ने यह उपलब्धि चीन और इजरायल से पहले हासिल की हैं। दरअसल छोटे क्षेत्र में विकास दृष्टिगोचर होता है जबकि बृहद क्षेत्र में अधिक होने पर भी वही कम लगता है। शायद लोगों ने इस बात पर कम ही गौर किया होगा कि चंद्रयान भेजने के बाद भारत में अप्रिय वारदातें एकदम बढ़ गयीं थीं। चंद्रयान की उपलब्धि से कोई खुश नहंीं है। यहां तक कि आजकल भारतीय बुद्धिजीवियों और लेखकों के लाड़ले ओबामा तक ने इस पर चुनाव प्रचार के दौरान अपनी चिंता जताई थी। आशय यह है कि भारत की प्रगति को चीन या इजरायल के संदर्भ में देखने की बजाय अमेरिका से तुलना करना चाहिये। चंद्रयान के प्रक्षेपण को कुछ लोग कम आंकते हैं तो कुछ मजाक उड़ाते हैं। दरअसल एक बात याद रखने वाली यह भी है कि इस देश का विकास इसलिये कम लगता है क्योंकि यह आबादी बड़े पैमाने पर बढ़ती जा रही है। कुछ लोग तो इस देश के हर वैज्ञानिक उपलब्धि पर यही कहते हैं कि पहले अपने देश की गरीबी मिटा लो फिर बाकी काम करो। उन्हें यह समझाना जरूरी है कि इस हिसाब से भारत को अगले एक हजार वर्ष तक कुछ नहीं करना चाहिये और तब भी पूरा विश्व हम पर हंसेगा।

इजरायलियों और यहूदियों के अपनी नस्ल से प्रेम की भी बात करें। ऐसा लगता है कि वह कुछ अधिक ही रूढ़ हैं। कुछ समय पूर्व इजरायल ने गाजा पट्टी का एक हिस्सा फलस्तीन को सौपा था तब वहां उसने सेना भेजकर पचास हजार यहूदी वहां से हटा कर अपने यहां बसाये। फलस्तीनियों ने इसका विरोध किया और कहा कि वह उन यहूदियों की सुरक्षा का पूरा जिम्मा लेते हैं। यहां तक कि वह यहूदी भी अपनी पैतृक संपतियों और वैभव छोड़कर नहीं जाना चाहते थे पर उनको जबरन खींच लिया गया अनेक लोगों ने रोते हुए अपने घर छोड़े ठीक है अपनी जाति और नस्ल से प्रेम करना चाहिये और मानवीय दृष्टि से स्वाभाविक भी है पर यह प्रकृति के विरुद्ध भी है। समय के अनुसार इस दुनियां में परिवर्तन आते हैं और नस्ल और जातियों के स्वरूप में बदलाव आते हैं। उनको रेाकने या बनाने का मानवीय प्रयास हमेशा ऐसे संघर्षों को जन्म देता है जो लंबे समय तक चलते है। इजरायल के लोगों को अपने छोटे देश में कामयाबी से कार्य करने पर शाबाशी दी जानी चाहिये पर अपने देश के प्रति कोई कुंठा पालना ठीक नहीं है।
फिर देश को सिखायें क्या? सच बात तो यह है कि चीन और इजरायल की जिस भौतिक समृद्धि को लेकर हम अपने देश को जो सिखा रहे हैं वह असहजता पैदा करने वाली है। अपनी जाति,नस्ल और विचार पर अहंकार हमेशा असहजता को उत्पन्न करने का कारण होता है। हां, कुछ लोगों को यहां बता देना जरूरी है कि जिनको अपने देश के अध्यात्म गुरु होने की परवाह नहीं हैं वह स्वयं असहजता की और अग्रसर हैं। भगवान श्रीकृष्ण से मनुष्य को सहजयोग का पाठ पढ़ाया हैं उसके आगे पूरा विश्व नतमस्तक हैंं। उन्होंने मनुष्य को ज्ञान के साथ विज्ञान में भी पारंगत होने का संदेश दिया है। यही कारण है कि अनेक भारतीय वैज्ञानिक जिन्होंने विज्ञान में विशेषज्ञता का प्राप्त की वह भी गीता के संदेशों के आगे नतमस्तक होते हैं। चंद्रयान प्रक्षेपण शायद भारत के बुद्धिजीवियों को एक मामूली घटना लगती है पर विदेश में इससे जो भारत की मान्यता हुई है उससे वही जानते हैं। शायद विदेशी भी अपने यहां यही संदेश देते हों कि ‘‘भारत से सीखो जिसने अध्यात्मिक ज्ञान के साथ विज्ञान में भी तरक्की की है। भारतीय डाक्टरों ने अमेरिका तक में अपना परचम फैलाया है। भारतीय वैज्ञानिकों ने भी कोई कम सफलतायें प्राप्त नहीं की और नोबल न मिलने से वह कम नहीं हो जाती। यहां भारत में दूसरों से सीखने की शिक्षा दी जा रही है। हो सकता है कि इसे ही कहते हों कि ‘दूर के ढोल सुहावने।’
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हिंदू विचारधारा:भारतीय और अफ़गानी-आलेख


एक बात निश्चित है कि धर्म नितांत एक निजी विषय है और उस पर सार्वजनिक विषय पर चर्चा करना केवल एक दिखावा करना लगता है। दूसरी बात यह है कि किसी धर्म की स्थापना या प्रचार का कार्य एक व्यवसाय का रूप ले चुका है और आम आदमी इस बात को समझ गया है और वह इन प्रचारकों को गंभीरता ने नहीं लेता। फिर भी समूह में रहने के अभ्यस्त इंसानों के लिये यह आवश्यक है कि वह भाषा,जाति और धर्म के नाम पर बने समूहों के प्रति निष्ठा जताते रहें ताकि विपत्ति के समय उनकी सहायता की आशा की जा सके।

इन्हीं समूहों में बदलाव आते जाते हैं और कई जगह झगड़े चलते हुए भी उनको रोकना कठिन लगता है। धर्म और अध्यात्म में अंतर है। धर्म मनुष्य को बर्हिमुखी और अध्यात्म अंतर्मुखी बनता है। सारे विवादों के बावजूद एक बात अंतिम सत्य के रूप में सामने आ चुकी है कि भारतीय अध्यात्म ज्ञान में ही वह शक्ति है जिसको ग्रहण और धारण कर कोई भी व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से शक्तिशाली हो सकता हैं। इस अध्यात्म ज्ञान की वजह से हिंदू धर्म निर्मित हुआ है। लंबे समय तक हिंदू धर्म को लेकर अेनक सवाल उठते रहे हैं पर उनके उत्तर में केवल विवाद ही खड़े होते हैं।

इस लेखक ने अपने एक पाठ में लिखा था कि ‘ हिंदी हिदू और हिंदूत्व’ शब्द में एक ऐसा बोध है जिसे धारण कर कोई भी अपने को शक्तिशाली समझने लगता है क्योंकि उसमें एक आकर्षण है। एकतरफ जहां हिंदू धर्म के बचाने और विस्तार करने के प्रयास हो रहे हैं तो दूसरी तरफ उसके नाम पर बने एक बृहद समाज के स्वरूप में बदलाव आते जा रहे हैं जिस पर विद्वान दृष्टिपात नहीं कर पाते। पहला तो यह है कि हमारे समाज में पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव इतना पड़ चुका है कि पता ही नहीं लगता कि हम धर्म या अध्यात्म ज्ञान के विषय में कहां खड़े हैं? धार्मिक कर्मकांड और अध्यात्मिक ज्ञान के के प्रथक होने की अनुभूति नहीं होने के कारण विचारों में भटकाव होता है और यही समाज को भी भ्रमित कर रहा है।

कल एक ब्लाग पढ़ रहा था। उसके लेखक श्री रजनीश मंगला ने जर्मनी में हिंदू मंदिर और अफगान हिंदू मंदिर बने होने की चर्चा अत्यंत दिलचस्प ढंग से उठाई थी। उसमें लिखा गया था कि आतंक से परेशान अफगानी हिंदुओं ने जर्मनी में पनाह ली और वहां उन्होंने आकर्षक मंदिरों का निर्माण कराया है। मंदिर मनाने के मामले में वहां भारतीय हिंदूओं के मुकाबले अफगानी हिंदू आगे हैं। किसी उत्सव पर भारतीय हिंदू मंदिर के मुकाबले अफगानी हिंदू मंदिर में कम ही भीड़ होती हैं। अफगानी मंदिर कर्ज लेकर बनाये गये हैं जिसकी वापसी किश्तों में की जा रही है। उन मंदिरों में पुजारी भारत के ही हैं।
अफगानियों के मंदिरों पर ही लिखा गया है ‘अफगानी हिंदू मंदिर’। रजनीश मंगला ने इस आलेख में सवाल उठाया कि क्या अफगानी हिंदू मंदिरों से कभी अफगानी हट जायेगा या कोई ःअफगानी हिदू विचारधारा के रूप में अलग धारा बहेगी। रजनीश मंगला के इस आलेख को दो बार मैंने पढ़ा क्योंकि उसमें मेरी दिलचस्पी बहुत थी। जहां तक अलगा धारा का प्रश्न है तो लगता है कि वह आगे ही बढ़ेगी कम शायद ही हो। सच तो यह है कि अलग धारा बहनी ही चाहिये क्योंकि हिंदू अध्यात्म एक हिमालय की तरह है जहां से कई धारायें प्रवाहित होंगी। अभी नहीं तो आगे इसकी संभावना है। एक ही धारा की कल्पना कर हिंदू धर्म को ही सीमित दायरे मेेंें बांधना होगा।

आखिर अलग धारा का प्रश्न क्यों उठा? अगर हम भारत में हिंदू धर्म की बात करें तो यहां का समाज जातियों और उपजातियेां में बंटा हुआ है और यही उसके शक्तिशाली होने कारण भी है। फिर अफगान हिंदू धारा के बहने से होगा यह कि आगे चलकर अन्य देशों के हिंदू भी इसी तरह अपनी धारा बहायेंगे। इस बात की भी संभावना है कि जब विश्व में सामाजिक और धार्मिक बदलाव आयेंगे तो तो अपनी अध्यात्मिक ज्ञान की शक्ति के कारण हिंदू धर्म ही विस्तार रूप से लेगा। यह लेखक इतिहास को एक कूड़ेदान की तरह मानता है पर उसमें वर्णित घटनाओं पर विचार करें तो हर भारतीय हिंदूओ की कार्यपद्धति को देखें। हिंदू धर्म की रक्षा के लिये सभी तैयार बैठे हैं पर केवल इसी देश के अंदर। बाहर भी हिंदू रहते हैं पर उनके लिये किसी ने कार्य नहीं किया। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हिंदू धर्म से आशय उन सभी धर्मों से है जिनका उदय भारत में हुआ। यहां के शासकों का राज्य अफगानिस्तान तक फैला था पर धीरे धीरे वह सिकुड़ता गया। वजह यह है कि सीमावर्ती राज्यों पर आक्रमण होते रहे पर उनको अपने पीछे के क्षेत्रों से सहयोग न मिलने के कारण हारना पड़ा। इतिहास में इस बारे में बहुत सारे तथ्य दर्ज हैं। अंधविश्वास,कुप्रथाओं और अहंकार में फंसे हिंदू समाज के विभिन्न उपसमूहों में बंटे लोगों और उनके राजाओं ने कभी भी ईमानदारी से विचाराधारा और प्रजा की रक्षा का विचार ही नहीं किया। अपनी राज्य की सीमाओं को अंतिम और अखंड होने के अहंकार ने इस देश के पहले विदेशी आक्रमणकारियों और अब विचाराधाराओं के जाल में फंसा दिया। दो हजार वर्ष तक यह देश गुलाम रहा इस बात को भुलाया नहीं जा सकता।

स्वतंत्रता के बाद विदेशों से आयातित विचारधाराआों की आलोचना या समर्थन में समय नष्ट किया गया जिससे कुछ हाथ नहीं आना था न आया। सत्य यही है कि भौतिकतावाद से उपजे तनाव से बचने के लिये केवल शक्ति ‘भारतीय अध्यात्म ज्ञान’ में ही है। जिसका मूल मंत्र यही है कि प्रातः उठकर योगासन, प्राणायम,ध्यान और प्रार्थना के द्वारा अपने तन,मन और विचार के विकार बाहर निकालकर फिर नया दिन प्रारंभ किया जाये।
भारतीय अध्यात्म की सबसे बड़ी शक्ति ध्यान है। कुछ धार्मिक लोगों ने मूर्तिपूजा का विस्तार किया क्योंकि एक सामान्य आदमी के लिये एकदम ध्यान लगाना कठिन होता है। इसलिये किसी स्वरूप को मन में स्थापित कर उसकी आराधना करने से भी ध्यान का लाभ मिल सकता है। दरअसल ध्यान से आशय यह है कि अपने दिन प्रतिदिन के दैहिक कार्य से हटकर उसे कही अन्यत्र लगाया जाये। इसी मूर्तिपूजा का विरोध अन्य विचारधारा के लोगों ने ही नहीं बल्कि अनेक हिंदू भी करते हैं पर वह इसका महत्व नहीं समझते। विदेशी विचाराधारा से ओतप्रोत लोग भटकाव की स्थिति में दो ही मार्ग ढूंढते हैं-आत्म हत्या या दूसरे की हत्या। जबकि भारतीय निराशा की स्थिति में मंदिर की राह लेते हैं। हमारे देश में अपने अध्यात्म से दूर होने का कारण यहां भी हिंसा का प्रभाव बढ़ रहा है।

बहुत लंबे समय तक भारत के बाहर के हिंदूओं ने प्रतीक्षा की है कि वह भारत में रह रहे हिंदुओं से नैतिक समर्थन प्राप्त करें पर वह शायद नहीं मिल पाया। दूसरा यह है कि हम भारतीय हिंदूओं इस बात को समझ लें कि हमारी शक्ति धार्मिक कर्मकांड नहीं बल्कि अध्यात्मिक ज्ञान है जिस पर अभी तक केवल हम अपना ही अधिकार सकझते हैं। अब वह विश्व में फैल रहा हैं। भारतीय योग परंपरा और श्रीगीता के बारे में अब पूरा विश्व जान चुका है। संत कबीर जी के संदेशों से विदेशी भी प्रभावित हैं-यहां याद रहे कि संत कबीर ने सभी प्रकार के धार्मिक अंधविश्वासों का विरोध किया और किसी भी धर्म को उन्होंने बख्शा नहीं।

देश में अधिक आबादी होने के कारण अतिविश्वास के कारण हम भारतीय हिंदू उस अध्यात्म ज्ञान को जानते हैंे पर जीवन में धारण करने से कतराते हैं। जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं वह इस ज्ञान का मतलब जानते हैं। अनेक भारतीय भी जो विदेशों मेेंं बहुत समय से रह रहे हैं वह भी इस बात को समझते हैं। यह अलग बात है कि उनके इसी भाव का दोहने अपने आर्थिक लाभ के लिये कथित साधु और संत करते हैं। ऐसे में विदेशी हिंदू अगर अपनी अलग धारा में बह रहे हैं तो एक उम्मीद तो बंधती है कि वह भी भारतीय अध्यात्म के हिमालय से निकल रही है। जहां ऐसी जगह पर भारतीय हिंदू हैं उनका मार्गदर्शन करना चाहिये। भारतीय अध्यात्म ज्ञान न तो गूढ़ हैं न ही व्यापक जैसा कि कुछ धार्मिक विद्वान कहते हैं। बस वह एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर देखा जा सकता है। भारतीय ज्ञान को गूढ या व्यापक कहना कुछ ऐसा ही है कि जैसे आप आगरा में खड़े होकर कहें कि मुझे दिल्ली जाना है क्योंंकि मुंबई दूर है या आप नासिक में खड़े होकर कहें कि मुझे मुंबई जाना है क्योंकि दिल्ली दूर है। ऐसे ही सत्य और माया के दो मार्ग हैं और सत्य का ज्ञान इतना दूर नहीं है जितना मायावी दूनियां की चाहत रखने वाले कथित संत और साधु कहते हैं।
अगर अफगानी लोगों ने लिख दिया है कि ‘अफगानी हिंदू मंदिर तो वह उसे शायद ही बदलें। इस धारा का बहना दिलचस्प भी है और इस बात का प्रमाण भी कि अब अन्य देशों में हिंदू भी खड़े होकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान की रक्षा करेंगे। ऐसे में भारतीय हिंदूओं को उनका हौंसला बढ़ाना ही चाहिये। आखिर वह निकली तो भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान रूपी हिमालय से ही तो है।
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मैत्री संदेशों से बचने की कोशिश-व्यंग्य


एक महिला ब्लाग लेखिका ने किसी वेबसाइट पर अपना प्रोफाइल लिखते हुए क्लिक किया होगा। बस उसके संपर्क में आने वाले हर ब्लाग लेखक के पास मित्रता का संदेश पहुंच गया। मेरे पास भी पहुंचा और मैने भी बिना विचार किये सामान्य ढंग सेे भरकर लौटा दिया। तब अंतर्जाल का मुझे अनुभव नहीं था इसलिये मैं सोच रहा था कि इस तरह से अलग से संपर्क सूत्र स्थापित रखने की हम ब्लाग लेखकों को भला क्या आवश्यकता है। एक दूसरे को पढ़कर और टिप्पणियां लिखकर यही काम तो कर रहे हैं। फिर अगर किसी से बात करनी हो तो आपस में कभी न कभी संवाद होता ही है और ईमेल पते तो गूगल पर बने ही रहते हैं। चाहे जब चैट कर लो। फिर चैट में भी क्या खाक बात करें? ऐसा कौनसा दिन है जो आपस में किसी की शक्ल न देखते हों। सबके तो ब्लाग पर फोटो टंगे है।
संदेश लौटाने के बाद अपने काम में लग गया। थोड़ी देर बात ही उस महिला ब्लाग लेखिका ने सूचित किया किया यह केवल उत्सुकतावश उस वेबसाइठ पर जिज्ञासा से कार्य करने के कारण गलती से आ गया। मुझे इस बात पर यकीन हो गया क्योंकि मुझे लगा कि यह गलती हुई होगी। कई बार मै भी कई वेब साईटों पर पहुंच जाता था और अपना खाता खोल लेता तो उनके संदेश अभी तक मेरे ईमेल पर आते हैं और उनको रोकने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है। अगर हो तो मुंझे पता नहीं। याहू के एक ईमेल पर थोक भाव में कविताऐं आतीं हैं और उनको हटाते हुए परेशान हो जाता हूं। यही परेशानी मुझे जीमेल भी आती है।

ब्लाग लिखते हुए मुझे एक माह भी नहीं हुआ तक एक मित्र ब्लाग का मित्रता करने का संदेश आया था। पता नहीं उसे जानबुझकर भेजा था उसने भी गलती की थी। पर मैंने उस समय भी उसका फार्म भर दिया। पता लगा कि उसका संदेश कई लोगों के पास गया। उस समय मैं कुछ नहीं समझा। धीरे-धीरे आभास होने लगा कि यह तो उन लोगों के लिए है जिनके पास ब्लाग लिखने के लिए न समय है न इच्छा न योग्यता-आखिर लिखना हर किसी के लिए संंभव नहीं है। ओरकुट की आवश्यकता किसी ब्लाग लेखक को दूसरे ब्लाग लेखक से संपर्क रखने के लिये हो सकती है यह मैं नहीं सोचता।

बहरहाल ऐसे अनेक संदेश आते हैं और मैं उन्हें मिटा देता हूं। मुश्किल तब आती है जब किसी ऐसे नाम से होते हैं जो हिंदी ब्लाग जगत की महिला लेखिकाओं से मिलते हैं। मैं हमेशा संशकित रहता हूं कि आखिर यह कोई और नाम है या वास्तव में कोई महिला ब्लाग लेखिका का है। मैं अब इन पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। अगर मैं दूं तो पता लगे कि किसी महिला ब्लाग लेखिका ने गलती से भर दिया है। यह हो तो ठीक है क्योंकि आपस में ऊंच नीच बात होने पर सब एक दूसरे को संभाल सकते हैं पर अगर किसी अन्य महिला का है और कहीं मुझे चलाने के लिये किया गया है तो फिर सतर्कता की आवश्यकता अनुभव करता हूं। एक दिलचस्प बात यह है कि यह संदेश मेरे उन्हीं ईमेल पर आते हैं जिनसे संबंधित ब्लाग अधिक ट्रैफिक में रहते हैं। कम वाले पर कोई नहीं आता। ऐसे संदेशों के साथ ऐसी वेबसाईटों से जुड़े रहते है जो एकदम नयी होती है। ऐसे में इसकी संभावना लगती है भी है कि किसी महिला ब्लाग लेखिका ने गलती से किया हो या उनके नाम भी इतने आम है कि कोई भी वेबसाइट अपने प्रचार के लिये उसका उपयोग कर सकती है।
हालांकि कुछ ऐसे भी मैत्री संदेश होते हैं जो किसी ब्लाग लेखक या लेखिका के नाम से नहीं मिलते पर उनमें जाओं तो…………आकर्षक फोटो होते है। मैं इन संदेशों पर स्वीकृति देने से इसलिये भी बचता हूं कि एक बार यह सिलसिला शुरू होता है तो फिर थमता नहीं हैं। बहरहाल ऐसे संदेश मिटाते हुए परेशान बहुत हो जाता हूं हालांकि इनमें कुछ के लिये स्वयं की जिज्ञासा को भी जिम्मदार मानता हूं। किसी भी वेबसाइट पर अपना प्रोफाइल लिखने से कतराता हूं कि कहीं यह अन्य ब्लाग लेखिकाओं के पास मैत्री संदेश लेकर पहुंच गया तो क्या सोचेंंगी कि अब यह बेवकूफी भरे व्यंग्य तो लिखता था ऐसी भी बेवकूफियों पर उतर आया है। कहीं चला गया तो फिर अपना वक्त खराब करता फिरूं सफाई देने के लिये। इससे अच्छा है तो ऐसे मैत्री संदेशों की अनदेखी की जाये।

मन के रोग का इलाज तो मन ही में है-आलेख



आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फिर भी उसकी मेरे से मित्रता बरसों पुरानी है। वह आर्केस्टा चलाता है। मैं कई बार विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर उसका कार्यक्रम सुन चुका हूं। उसने कभी मुझे स्वयं इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रण नहीं दिया क्योंकि उसकी और मेरी मित्रता ऐसी भी नहीं रही। वह जब कहीं मिलता है तो उससे बड़ी आत्मीयता से बातचीत हेाती हैं। इस तरह मेरे चार मित्र हैं जो रास्ते पर मिलते हैं और आत्मीय रूप से बातचीत कर अलग हो जाते हैं। यह आर्केस्ट्रा चलाने वाला मेरा मित्र कैसे बना यह तो मै भी नहीं जानता। हां, इतना याद है कि कुछ वर्ष पहले मैं अपनी एक रचना देने अखबार में गया तो वह वहीं काम से खड़ा था तब उसकी और मेरी बातचीत शुरू हुई। बाद में तो वह उस अखबार के दफ्तर में भी आता रहा जहां मैं काम करता था।

एक हिंदी फिल्म का गाना है। शायद पड़ौसन का! इक चतुर नार, बड़ी होशियार………………..उस गाने को वह जिस तरह मंत्रमुग्ध ढंग से गाता है वह मन को छू लेता है। वह जब भी कहीं जाता है लोग इस गाने की फरमाइश अवश्य करते है।

उस दिन रास्ते चलते हुए उससे मुलाकात हुई। मुझसे कहने लगा-‘यार आजकल तो ऐसा लगता है कि अधिकतर लोगों को साइकिटिस (मनोचिकित्सक)की आवश्यकता हैं। आजकल लोग क्या बात करते हैं समझ में नहीं आता।’
मनोचिकित्सक शब्द से मैं सतर्क हो गया। मैने उससे पूछा-‘क्या हुंआ।’
वह बताने लगा कि-‘ ‘‘मैं अभी एक आदमी के घर उसके लड़के की शिकायत लेकर गया था। वह मेरे भाई से बेकार में लड़ता रहता है तो वह कहने लगा कि बचपन में उसके लड़के को सिर पर चोट लगी थी तो उसके दिमाग में खराबी पैदा हो गयी थी। अब बताओं भला ऐसा कहीं होता है। अच्छी तरह खाता पीता है, बात करता है। भला ऐसा कहीं ऐसा होता है’’?’
मैंने कहा-‘‘पर उसने जब स्वयं कहा है तो होगा? वह अपने लड़के की इस कमजोरी को स्वयं ही मान रहा है क्या यही कम है।’
उसने कहा-‘‘हां यह बात तो सही है। उस आदमी ने बरसों से स्कूटर तक नहीं चलाया। शायद यही वजह रही होगी, पर मैं उसे अकेले की बात नहीं कर रहा। ऐसा लगता है कि मांबाइल, कंप्यूटर और तथा अन्य आधुनिक साधनों के उपयोग से अधिकतर लोग कही मानसिक रोगों का शिकार तो नहीं हो रहे।’

मैंने हंसते हुए कहा-‘आप तो जानते हो कि किसी अन्य व्यक्ति को मनोरोगी बताकर मैं अपने को मनोरोगी घोषित नहीं करना चाहतां।’
वह जोर से हंसा-‘अच्छा! याद आया! वही जो तुमने मानसिक चिकित्सालय के बोर्ड पर लिखी बातों का जिक्र किया था। हां, मैं भी सोचता हूं कि इस तरह दूसरों को मनोरोगी मानना छोड़ दूं।’

मेरा एक अन्य लेखक मित्र है और वह एक दिन मनोचिकित्सालय गया था। वहां उसने एक बोर्ड पढा, जिस पर दस प्रश्न लिखे थे। साथ ही यहा भी लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है तो आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। मुझे वह सभी प्रश्न याद नहीं है पर जितने याद हैं उतने लिख देता हूं। उस लेखक मित्र की बेटी ने उसे ब्लाग तो बना दिया है पर उसने अभी उस पर मेरे कहने के बावजूद लिखना शुरू नहीं किया। जब वह लिखेगा तो उससे कहूंगा कि वह दस के दस प्रश्न वैसे ही लिख दे। उनमें से जो प्रश्न मुझे याद हैं वह नीचे लिख देता हूं।

1.क्या आपको लगता है कि आप सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं पर बाकी सबका व्यवहार खराब है।
2.क्या आपको लगता है कि आप हमेशा सही सोचते हैं बाकी लोग गलत सोचते है।
3.क्या आपको लगता है कि आप दूसरों की सफलता देखकर खुश होते हैं और बाकी लोग आपकी सफलता या उपलब्धि से जलते है।
4. आप दूसरों का भला करते हैं पर सभी लोग आपका बुरा करने पर आमादा होते है।
5. क्या आपको लगता है कि आपकी नीयत अच्छी है अन्य सभी लोगों की खराब है।
6.आप सबसे अच्छा काम करते हैं पर उसकी कोई सराहना नहीं करता जबकि दूसरों के खराब काम को भी आप सराहते है।

मैने जब अपने मित्र की बात सुनी तबसे अपने आपको यह यकीन दिलाने का प्रयास करता हूं कि मैं मनोरोगी नहीं हूं। कई बार जब तनाव के पल आते है तब मैं सोचता हूं कि कहीं मैं मनोरोगी तो नहीं हूं तक यह प्रश्न अपने मन में दोहरात हूं साथ ही यह उत्तर भी कि नहीं। ताकि मुझे यह न लगे कि मै मनोरोग का शिकार हो रहा हूं।
अगर मैं कहीं ने लौटता हूं और मुझसे कोई पूछता है कि‘आपके साथ वहां कैसा व्यवहार हुआ?’
बुरा भी हुआ हो तो मैं कहता हूं कि‘अच्छा हुआ’
कोई पूछे-‘अमुक व्यक्ति कैसा है?’
मैं कहता हूं-‘ठीक है?’
अंतर्जाल पर कोई बात लिखते हुए कई बार यह स्पष्ट लिख देता हूं कि मैं कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं हूं जो मेरे विचार में परिवर्तन की संभावना न हो। इसके साथ ही यह भी बता देता हूं कि अपने लिखे का अच्छे या बुरे न होने का भार मै अपने मस्तिष्क पर नहीं डालता।
दूसरो का लिखा अगर समझ में न आये या अच्छा न लगे तब भी वहां नहीं लिखता कि यह ठीक नहीं है। सोचता हूं कि मुझे मुझे ठीक नहीं लगा तो क्या दूसरों को अच्छा लग सकता है। अगर किसी जगह प्रतिवाद स्वरूप टिप्पणी लिखनी तो जरूर लिखता हूं कि भई, आपके विचार पर मेरा यह विचार है परं और उससे पहले भी सोच लेता हूं कि वह बात इन प्रश्नों के दायरे ने बाहर है कि नहीं। प्रशंसा करना मनोरोग के दायरे में नहीं आता है पर आलोचना कहीं मनोरोग के प्रश्नों के दायरे में तो नहीं यह अवश्य देख लेता हूं।’

वैसे दूसरे क्या सोचते हैं यह अलग बात है। हां, अपने अंदर जरूर आजकल देखना चाहिए कि कहीं हम मनोरोग का शिकार तो नहीं हो रहे। हम जिस तरह विद्युतीय प्रवाह से चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं उसको देखकर मुझे लगता है कि हमारे अंदर मनोरोगों का होना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं डरा नहीं रहा हूं। हो सकता है कि शुरू में आप डर जायें पर एक बात याद रखें कि मनोरोगों की दवा भी मन में ही है और जब आप जान जायेंगे कि आप में उसका कोई अंश है तो बिना बताये अपना इलाज भी शुरू कर देंगे। जैसे मैंने अपने मित्र की बात सुनकर तय किया कि अब अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करूंगा और कोई करे तो उस पर नाचूंगा नहीं। किसी को अपने से कमतर नहीं बताऊंगा । अपनी वस्तु या पाठ को दूसरे के पाठ से श्रेष्ठ बताने का प्रयास से स्वयं परे रहूंगा। मन का इलाज मन से करने का प्रयास किया है अब सफल हुआ कि नहीं यह मुझे भी पता नहीं।