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वृंदावन के श्री कृष्ण और अयोध्या के श्री राम, शक्ति मिलती है लेते ही नाम-हिन्दी लेख (bhagwan shri ram aur krishan ke nam mein hee shakti-hindi lekh)


वृंदावन के कृष्ण और अयोध्या के राम भारतीय अध्यात्म दर्शन और धर्म के ऐसे स्तंभ है जिनको उन बड़े बड़े संतों ने भी माना है जो अपनी भक्ति और तपस्या से जनमानस में भगवत् स्वरूप माने जाते हैं। महाकवि तुलसीदास, संत प्रवर कबीरदास, कविवर रहीम, तपस्विनी मीरा तथा अन्य अनेक महापुरुषों ने अपने जीवन चरित्र से भारतीय जनमानस में भगवत्रूप की स्थिति प्राप्त की और इन सभी ने भगवान श्रीकृष्ण और राम के चरित्रों को अपने मन में स्थान दिया। स्पष्ष्टतः इन दोनों के बिना भारतीय अध्यात्म ज्ञान तथा जनमानस की भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।
भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का समूचा जीवन ही लीलामय झांकी प्रस्तुत करता है और जैसे कि हम जानते हैं कि यह समूचा जीवन अनेक रंगों से व्याप्त है। यही कारण है कि हर इंसान के जीवन चरित्र में विविध रूप स्वयमेव नज़र आते हैं ऐसे में शरीर धारण करने वाले अवतारी पुरुष भी सभी रंगों में दृष्टिगोचर होते है। चूंकि भगवान श्री राम तथा श्रीकृष्ण भगवान के मानव स्वरूप अवतार माने जाते हैं इसलिये उनका जीवन भी इसी तरह बीता। सृष्टि के नियमों के अनुसार उन्होंने अपना बाल्यकाल, युवावस्था तथा अधेड़ावस्था में बिताया इसलिये उनके विभिन्न स्वरूप निर्मित हुए। दोनों महान योगी थे। उनके संदेश आज भी स्वाभाविक इसलिये लगते हैं कि प्रकृति और उसके जीवन के स्वरूप में बदलाव आता है पर मौलिक स्वभाव कभी नहीं बदलता। यही कारण है कि आज भी उनका चरित्र स्वाभाविक लगता है पर विविधता के कारण सभी अपने मन के अनुसार स्वरूप स्मरण करने के लिये चुनते हैं ।

अगर सहजता के साथ दोनों या किसी एक के भी स्वरूप में अपने ध्यान के साथ भक्ति की जाये तो शक्ति प्राप्त होती है मगर मुश्किल यह है कि सामान्य जन सकाम भक्ति में लीन होना पसंद करते हैं या फिर उनके चरित्र की चर्चा को ही सत्संग समझ लेते हैं और यहीं से शुरु होता है संतों और धर्मगुरुओं का उपदेश देने का सिलसिला जो अंततः पेशा बन जाता है। उसके बाद भी ऐसे लोग बहुत से हैं जो धर्म की आड़ में अपना लक्ष्य पाना चाहते हैं ताकि उनकी लोकप्रियता का नकदी में रूप में परिवर्तन किया जा सके। यही कारण है कि जब भारत के बाहर भारतीय अध्यात्म अनुसंधान का विषय बन रहा है वहीं यहां उनके जन्मस्थान तक ही लोगों का मन सीमित रखने का प्रयास हो रहा है। वर्तमान में भारतीय जनमानस अखबार, टीवी, इंटरनेट तथा रेडियो तक सीमित हो गया है और धर्म के आधार पर प्रचार पाने वाले यही सक्रियता अधिक दिखाते हैं। इससे सामान्य जनमानस प्रभावित भी होता है। कितना प्रभावित होता है यह भी अब विश्लेषण का विषय है।

इस समय अयोध्या की रामजन्म भूमि फिर चर्चा में है क्योंकि उसके विवाद का निर्णय संभवत आने वाला है। इसका बकायदा प्रचार हो रहा है। प्रचारकों को प्रसिद्धि मिल रही है तो व्यवसायिक प्रचार माध्यमों का समय पास हो रहा है जो अंततः विज्ञापन के सहारे ही व्यतीत होता है।

एक प्रश्न अक्सर लोग कहते हैं कि धर्म के आधार पर हिन्दू एक क्यों नहीं होते? कुछ लोग झुंझलाते हैं कि अन्य धर्म के लोग अपने इष्ट के नाम पर एक हो जाते हैं पर हिन्दू समाज हमेशा ही बिखरा रहता है। कुछ विद्वान तो हिन्दू समाज के बंटवारे का कारण अधिक देवताओं की उपासना करना बताते हैं तो कुछ समाज को स्वार्थों में लिप्त होकर रहने का दोष देते हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे लोग अन्य समाजों की अंदरूनी स्थिति को नहीं जानते और उनके मुकाबले अपने समाज को कमतर होने का उनको अफसोस होता है। ऐसे विद्वानों को गीता अवश्य पढ़नी चाहिए जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की सामग्री भी अंतर्निहित है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी।

आर्ती भक्त वह होते हैं जो विपत्ति आने पर भगवान की दरबार में पहुंचते हैं। अर्थार्थी वह होते हैं जो अपनी मनोकामना पूर्ण होती रहे इस उद्देश्य से जाते हैं। जिज्ञासु भक्त वह हैं जो यह देखने के लिये जाते हैं कि वहां जाने से उन पर क्या प्रभाव होता है। सबसे ऊंचे ज्ञानी है जो निष्काम भाव से मंदिर यह सोचकर जाते हैं कि वहां जाने से ध्यान का लाभ होगा जिनसे उनमें मानसिक शुद्धि आयेगी। समाज को किसी एक इष्ट के नाम एक रखने के प्रयास करने और सफल न होने पर झुंझलाने वाले इस तरह का ज्ञान नहीं रखते।

अब करते हैं भारतीय समाज की बात! यहां श्रीमद्भागवत गीता के संदेश हर आदमी जानता है। उसे यह भी मालुम है कि धर्म के नाम पर पाखंड यहां खूब होता है। राम जन्म भूमि के समय समाज में जोरदार एकता आयी थी पर कालांतर में उसका प्रभाव कम हो गया। इसका कारण यह रहा कि उस समय लोगों के पास यह एक ऐसा विषय था जो ज्वलंत था और धर्म से संबंधित अन्य कोई विषय उनके उनके पास मन लगाने के लिये नहीं था। फिर अब ऐसा क्या हो गया कि समाज अब उदासीन हो गया? यहां लोग धर्म के नाम पर कोई न कोई चर्चा चाहते हैें फिर राम जो सभी के हृदय के नायक हैं उनकी जन्मभूमि के नाम पर क्यों उत्तेजित नहीं हो रहे। इसका कारण यह है कि अब बाबा रामदेव ने योग का जो परचम पूरे विश्व में फहराया है उसने भारतीय जनमानस में भी गहरी पैठ बना ली है। कम से कम जिज्ञासु और ज्ञानी भक्तों के के दिमाग में यह बात आ गयी है कि भगवान राम और श्री कृष्ण हमारे अध्यात्मिक दर्शन का आधार है पर उसके साथ ही उनकी लीलाऐं और संदेश भी बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्वकाल में रामजन्मभूमि आंदोलन के समय प्रचार माध्यम इतने सशक्त और व्यापक नहीं थे जितने अब दिखाई देते हैं। उस समय दिल्ली दूरदर्शन के अलावा अन्य कोई साधन नहंी था और अब तो टीवी चैनलों की संख्या तीन सौ से ऊपर ही होगी ऐसा लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों की भावनाओं का दोहन अब एक तरीके से नहीं किया जा सकता और न ही किसी पुराने विषय को फिर वैसे ही संवेदनशील बनाया जा सकता है।

इधर भारतीय योग दर्शन तथा श्रीगीता के संदेश की वैश्विक स्तर पर चर्चा और अनुसंधान का विषय बन बन गया है है। इससे यह बात तो स्थापित हो ही गयी है कि हमार अध्यात्म भले ही एक इष्ट पर निर्भर नहीं है पर बहुत सारे उसके स्वरूप का निराकार चरित्र का प्रतिबिंब हैं। निष्काम और सकाम भक्ति का स्वरूप अब स्पष्ट होता जा रहा है। मूर्तिपूजा करना और निरंकार का ध्यान करना अलग विधियां हैं पर दोनों का लक्ष्य एक ही है कि सर्वशक्तिमान का स्मरण कर अपने मन और विचारों को शुरु और पवित्र बनाना। अतः दोनों प्रकार के भक्तों में आपसी विरोध नहीं होता। यह अलग बात है कि सकाम भक्त निष्काम भक्तों को नास्तिक या अल्प आस्थावान समझते हैं पर ज्ञानी लोग इस तथ्य को जानते हुए चुप्पी साध लेते हैं ।

आखरी बात यह कि भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम इस धरती पर पैदा हुए तो समाज कल्याण का काम किया। ऐसा करते हुए उन्होंने अपने और पराये क्षेत्र का विचार नहीं किया। सारे संसार को अपना घर और समस्त प्रजाजनों को अपने से रक्षित माना। दोनों ने अपने महत्वपूर्ण काम अपने जन्म स्थान से परे होकर किये। श्रीकृष्ण तो वृंदावन से दूर होकर द्वारका में बसे और फिर आतिताइयों का नाश किया। एक बार वृंदावन से निकले तो फिर लौटे ही नहंीं। जिन गोपियों के साथ रासलीला करते थे वह उनकी प्रतीक्षा ही करती रहीं। जिस कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण जी ने गीता संदेश देकर अपना सवौच्च लक्ष्य पूरा किया वह भी उनके जन्मस्थान से बहुत दूर था। भगवान श्रीराम ने एक भी राक्षस का संहार अयोध्या में नहीं किया। सीधी बात यह है कि उन्होंने जन्मभूमि से अधिक पूरी धरती को अपनी कर्मभूमि मानकर कार्य किया। वैसे भी कहा जाता है कि आदमी को प्रतिष्ठा घर से बाहर काम करने पर ही मिलती है। यही कारण है कि इन दोनों के भक्त पूरे विश्व में हैं और कई तो ऐसे हैं कि जिनकी रुचि दोनों में होने के बावजूद उनकी जन्मभूमियों नहीं है। ऐसे में उन भक्तों को उदासीन यह कायर कतई नहीं कहा जा सकता। अगर कोई ऐसा कहता तो यकीनन वह भक्तों की भावनाओं का दोहन न होने के कारण ऐसा कह रहा है। रामजन्मभूमि का निर्णय अब अदालत में होना है। ऐसे में भी अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी उनमें रुचि जिज्ञासा के कारण है न कि आस्था के कारण। मुश्किल यह भी है कि जो लोग यह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये वही अपनी सुविधा के अनुसार ऐसे विवादों को न केवल पैदा करते हैं बल्कि निरपेक्ष दिखते हुए भी एक पक्ष की तरफ झुकते नज़र आते हैं। ऐसे में आम जनमानस की कोई बड़ी भूमिका नहीं दिखती और उसकी खामोशी को तटस्थता समझा जाये या उदासीनता यह विश्लेषकों के चिंतन का विषय हो सकता है।
————
लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior

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इन्टरनेट के प्रयोग से होने वाले दोषों से बचाती है योग साधना-हिंदी आलेख


कुछ समाचारों के अनुसार इंटरनेट पर अधिक काम करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इंटरनेट का संबंध कंप्यूटर से ही है जिसके उपयोग से वैसे भी अनेक बीमारियां पैदा होती हैं। एक खबर के अनुसार कंप्यूटर पर काम करने वालों में विटामिन डी की कमी हो जाती है इसलिये लोगों को धूप का सेवन अवश्य करना चाहिये। अगर इन खबरों का विश्लेषण करें तो उनसे यही निष्कर्ष निकलता है कि कंप्यूटर और इंटरनेट के अधिक प्रयोग से ही शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा इनके उपयोग के समय अपने आपको अनावश्यक रूप से थकाने के साथ ही अपनी शारीरिक तथामानसिक स्थिति पर पर्याप्त ध्यान न देना बहुत तकलीफदेह यह होता है। सच बात तो यह है कि इंटरनेट तथा कंप्यूटर पर काम करने वालों के पास उससे होने वाली शारीरिक और मानसिक व्याधियों से बचने का एकमात्र उपाय योग साधना के अलावा अन्य कोई उपाय नज़र नहीं आता।
दरअसल कंप्यूटर के साथ अन्य प्रकार की शारीरिक तथा मानसिक सावधानियां रखने के नुस्खे पहले बहुत पढ़ने को मिलते थे पर आजकल कहीं दिखाई नहीं देते । कुछ हमारी स्मृति में हैें, जो इस प्रकार हैं-
कंप्यूटर पर बीस मिनट काम करने के बाद विश्राम लें। पानी अवश्य पीते रहें। खाने में नियमित रूप से आहार लेते रहें। पानी पीते हुए मुंह में भरकर आंखों पर पानी के छींटे अवश्य मारें। अगर कंप्यूटर कक्ष से बाहर नहीं आ सकें तो हर बीस मिनट बार अपनी कुर्सी पर ही दो मिनट आंख बंद कर बैठ जायें-इसे आप ध्यान भी कह सकते हैं। काम खत्म करने पर बाहर आकर आकाश की तरफ जरूर अपनी आंखें केंद्रित करें ताकि संकीर्ण दायरे में काम कर रही आंखें व्यापक दृश्य देख सकें।
दरअसल हम भारतीयों में अधिकतर नयी आधुनिक वस्तुओं के उपयोग की भावना इतनी प्रबल रहती है कि हम अपने शरीर की सावधनी रखना फालतु का विषय समझते हैं। जहां तक बीमारियों का सवाल है तो वह शराब, सिगरेट और मांस के सेवन से भी पैदा होती हैं इसलिये इंटरनेटर और कंप्यूटर की बीमारियों से इतना भय खाने की आवश्यकता नहीं है मगर पर्याप्त सावधानी जरूर रखना चाहिए।
इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करने वाले हमारे देश में दो तरह लोग हैं। एक तो वह है जो शौकिया इससे जुड़े हैं और दूसरे जिनको इससे व्यवसायिक बाध्यता ने पकड़ा है। जो शौकिया है उनके लिये तो यह संभव है कि वह सावधानी रखते हुए काम करें-हालांकि उनके मनोरंजन की प्यास इतनी गहरी होती है कि वह इसे समझेंगे नहीं-पर जिनको नौकरी या व्यवसाय के कारण कंप्यूटर या इंटरनेट चलाना है उनके स्थिति बहुत दयनीय होती है। दरअसल इंटरनेट और कंप्यूटर पर काम करते हुए आदमी की आंखें और दिमाग बुरी तरह थक जाती हैं। यह तकनीकी काम है पर इसमें काम करने वालों के साथ एक आम कर्मचारी की तरह व्यवहार किया जाता है। जहां कंप्यूटर या इंटरनेट पर काम करते एक लक्ष्य दिया जाता है वहां काम करने वालों के लिये यह भारी तनाव का कारण बनता है। दरअसल हमारे देश में जिनको कलम से अपने कर्मचारियेां को नियंत्रित करने की ताकत मिली है वह स्वयं कंप्यूटर पर काम करना अपने लिये वैसे ही हेय समझते हैं जैसे लिपिकीय कार्य को। वह जमीन गड़ढा खोदने वाले मजदूरो की तरह अपने आपरेटरों से व्यवहार करते हैं। शारीरिक श्रम करने वाले की बुद्धि सदैव सक्रिय रहती है इसलिये वह अपने साथ होने वाले अनाचार या बेईमानी का मुकाबला कर सकता है। हालांकि यह एक संभावना ही है कि उसमें साहस आ सकता है पर कंप्यूटर पर काम करने वाले के लिये दिमागी थकावट इतनी गहरी होती है कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता काम के तत्काल बाद समाप्त ही हो जाती है। इसलिये जो लोग शौकिया कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े हैं वह अपने घर या व्यवसाय में परेशानी होने पर इससे एकदम दूर हो जायें। जिनका यह व्यवसाय है वह भी अपने साइबर कैफे बंद कर घर बैठे या किसी निजी संस्थान में कार्यरत हैं तो पहले अवकाश लें और फिर तभी लौटें जब स्थिति सामान्य हो या उसका आश्वासन मिले। जब आपको लगता हो कि अब आपको दिमागी रूप से संघर्ष करना है तो तुरंत कीबोर्ड से हट जायें। घर, व्यवसाय या संस्थान में अपने विरोधी तत्वों के साथ जब तक अमन का यकीन न हो तब कंप्यूटर से दूर ही रहें ताकि आपके अंदर स्वाभाविक मस्तिष्कीय ऊर्जा बनी रहे।
कंप्यूटर पर लगातार माउस से काम करना भी अधिक थकाने वाला है। जिन लोगों को लेखन कार्य करना है अगर वह पहले कहीं कागज पर अपनी रचना लिखे और फिर इसे टाईप करें। इससे कंप्यूटर से भी दूरी बनी रहेगी दूसरे टाईप करते हुए आंखें कंप्यूटर पर अधिक देर नहंी रहेंगी। जो लेाग सीधे टाईप करते हैं वह आंखें बंद कर अपने दिमाग में विचार करते हुए टंकित करें।
वैसे गूगल के फायरफाक्स में बिना माउस के कंप्यूटर चलाया जा चलाया जा सकता है। जहां तक हो सके माउस का उपयोग कम से कम करें। वैसे भी बेहतर कंप्यूटर आपरेटर वही माना जाता है जो माउस का उपयोग कम से कम करता है।
कुछ लोगों का कहना है कि कंप्यूटर पर काम करने से आदमी का पेट बाहर निकल आता है क्योंकि उसमें से कुछ ऐसी किरणें निकलती हैं जिससे आपरेटर की चर्बी बढती है। इस पर थोड़ा कम यकीन आता है। दरअसल आदमी जब कंप्यूटर पर काम करता है तो वह घूमना फिरना कम कर देता है जिसकी वजह से उसकी चर्बी बढ़ने लगती है। अगर सुबह कोई नियमित रूप से घूमें तो उसकी चर्बी नही बढ़ेगी। यह अनुभव किया गया है कि कुछ लोगों को पेट कंप्यूटर पर काम करते हुए बढ़ गया पर अनेक लोग ऐसे हैं जो निरंतर काम करते हुए पतले बने हुए हैं।
आखिरी बात यह है कि कंप्यूटर पर काम करने वाले योगसाधना जरूर करें। प्राणायाम करते हुए उन्हेंइस बात की अनुभूति अवश्य होगी कि हमारे दिमाग की तरफ एक ठंडी हवा का प्रवाह हो रहा हैं। सुबह प्राणायाम करने से पूर्व तो कदापि कंप्यूटर पर न आयें। रात को कंप्यूटर पर अधिक देर काम करना अपनी देह के साथ खिलवाड़ करना ही है। सुबह जल्दी उठकर पहले जरूर पानी जमकर पियें और उसके बाद अनुलोम विलोम प्राणायाम निरंतर करंें। इससे पांव से लेकर सिर तक वायु और जल प्रवाहित होगा उससे अनेक प्रकार के विकार बाहर निकल आयेंगे। जब आप करेंगे तो आपको यह लगने लगेगा कि आपने एक दिन पूर्व जो हानि उठाई थी उसकी भरपाई हो गयी। यह नवीनता का अनुभव प्रतिदिन करेंगे। वैसे कंप्यूटर पर काम करते समय बीच बीच में आंखें बंद कर ध्यान अपनी भृकुटि पर केद्रित करें तो अनुभव होगा कि शरीर में राहत मिल रही है। अपने साथ काम करने वालों को यह बता दें कि यह आप अपने स्वास्थ्य के लिये कर रहे हैं वरना लोग हंसेंगे या सोचेंगे कि आप सो रहे हैं।
किसी की परवाह न करें क्योंकि सबसे बड़ी बात तो यह है कि जान है तो जहान हैं। भले ही इस लेख की बातें कुछ लोगों को हास्यप्रद लगें पर जब योगासन, ध्यान, प्राणायाम तथा मंत्रोच्चार-गायत्री मंत्र तथा शांति पाठ के सा ओम का जाप- करेंगे और प्रतिदिन नवीनता के बोध के साथ इंटरनेट या कंप्यूटर से खेलें्रगे तक इसकी गंभीरता का अनुभव होगा।

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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पहचान के लिए परेशान पूरा ज़माना-हिन्दी चिंतन और कविता (trouble of identity-hindi article and poem)


प्राकृतिक का नियम है परिवर्तन! दिन हुआ है तो रात भी होगी। सूरज उगा है तो जरूर डूबेगा। धूप है तो अंधेरा भी होगा। यह तो प्रतिदिन होने वाले नियम हैं इसलिये दिखाई देते हैं और इनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करने की शक्ति हमें अपने अंदर अनुभव नहीं करते इसलिये कोई दावा नहीं करते। मगर परिवर्तनशील प्रकृत्ति के अन्य भी बहुत सारे नियम हैं जो हमें दिखाई नहीं देते। कई जगह छहः महीने का दिन और रात तो कई जगह दशकों का दिन और रात होता है। केवल समय और दिन ही परिवर्तन शील नहीं है बल्कि प्रकृत्ति का स्वरूप भी परिवर्तनशील है। अनेक प्रकार के जीव यहां बने और मिट गये। डायनासोर की चर्चा तो हमने सुनी होगी जिनके बारे में कहा जाता है कि आसमान से टपके किसी कहर की वजह से वह नष्ट हो गये।
इस पृथ्वी का सच कोई नहीं जानता। सभी अनुमान से कहते हैंे कि इस तरह है या उस तरह है। कहने का तात्पर्य यह है कि यहां किसी वस्तु, व्यक्ति, खनिज, अन्न का जो स्वरूप आज है वह कल कुछ दूसरा हो सकता है और आज से पहले कुछ दूसरा रहा होगा। अलबत्ता जीवन निर्माण की प्रक्रिया में कोई परिवर्तन नहीं आता दिखता पर उसके दृश्यव्य बाह्य रूप में परिवर्तन होता है और होता रहेगा।
भाषा, समाज, जाति, तथा अन्य आधारों पर बने व्यक्ति समूहों की यही हश्र होना है इसे कोई रोक नहीं सकता। मनुष्य प्रकृत्ति का दोहन अपनी शक्ति के अनुसार अधिक से अधिक कर सकता है पर उस पर नियंत्रण कभी नही कर सकता। ऐसे में कुछ लोगा यह दावा करते हैं कि वह भाषा, जाति, धर्म, और वर्ण के आधार पर बने अपने समूहों की पहचान बरकरार रखेंगे।
अगर उनसे पूछे कि‘क्यों?’
इसके बिना इस धरा का जीवन नष्ट हो जायेगा। अगर अपनी पहचान नहीं बचाकर रखी तो दूसरी पहचान वाले हमें नष्ट कर देंगे। यह पहचान हमारी अस्मिता है? आदि आदि प्रकार के जवाब।
भला यह कैसे संभव है जो समाज प्राकृतिक परिवर्तनों से बने हैं वह उन्हीं की वजह से नष्ट होने से बच जायें? मगर दावा करने वाले करते हैं। मनुष्य के मन में भावनायें होती हैं और वही उसका संचालन करती हैं। उनका दोहन अपने लाभ के लिये करने वाले व्यापारी उसमें भय, आशंकायें और स्वप्नों का एक जाल रचते हैं। वह ऐसे असंभव काम को अपने हाथों से करने का दावा करते हैं जो उनके बस का है ही नहीं। परिवर्तन को रोकना कठिन है। सौ बरस में मनुष्य का और दो सौ बरस में परिवार का अस्त्तिव मिटने के साथ अपनी पहचान खोता है तो हजार साल में समूह भी अपना अस्तित्व नहीं बचा सकते हैं। जाति, भाषा, धर्म तथा अन्य आधारों पर बने समूह कोई स्थाई पिंजरा नहीं है जिसमें आकर भगवान का हर जीवन हमेशा फंसता रहे। फिर सवाल यह है कि अपनी पहचान किसलिये बनाये रखना चाहिये? अरे, अपना जीवन आदमी शांति और भक्ति के साथ जिये तो उसे फिर पहचान की क्या जरूरत है? ऐसे में पहचान का ढोंग न करें चाहिये न उसमें फंसे।इस पर प्रस्तुत हैं काव्यात्मक अभिव्यक्ति-

धरती पर उगे हैं इंसान
पर वह उसमें गड़े मुर्दों में
अपनी पहचान खोजते हैं।
अपने लहू से सींचे चमन का
मजा लेने की भला कैसे सोचें
पूरी जिंदगी अपनी पहचान के
संकट से जूझते
उनके पसीने का मजा
जिंदगी के दलाल भोगते हैं।।
————-
उसने नारा लगाया कि
‘आओ मेरे पीछे
मैं तुम्हें अपनी पहचान बताता हूं
कैसे बचाओ उसे
इसका रास्ता भी बताऊंगा।’
लोग बिना सोचे समझे
चल पड़े उसके पीछे
पर पहचान नहीं मिली
रास्ते पर रखे पत्थरों का
इतिहास सुनाते हुए वह चलता रहा
भीड़ का कारवां भी उसके पीछे था
उसने सौदागरों के इतिहास में
अपना नाम दर्ज कर लिया
पर पहचान का पता किसी को न दिया
कभी जाति की
तो कभी धर्म की
कभी भाषा की चादर बिछाता रहा
पहचान का प्रमाण दिखाता रहा
बस कहता रहा जिंदगी भर
समूह की एकता की बात
जब थक गया तो कहने लगा कि
‘चलते रहो मेरे साथ
आने वाली पीढ़ियों को भी
इसी पहचान की राह चलना है
इसी में जीना और मरना है
मेरी बात मानना बंद किया तो
फिर भूत की तरह सताऊंगा।’

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com

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हिंदी ब्लाग लेखन के लिये खुला है आकाश-संपादकीय


हिंदी ब्लाग जगत के कुछ ब्लाग लेखक अंतर्जाल पर वैसी ही गुटबाजी देख रहे हैं जैसी कि सामान्य रूप से बाहर देखने को मिलती है। यहां हम इस बात पर विचार नहीं करेंगे कि क्या वाकई कोई गुटबाजी है या नहीं बल्कि इस बात पर विचार करेंगे कि उन्हें ऐसा देखना चाहिये कि नहीं। सच कहें तो हम हिंदी ब्लाग जगत में सक्रिय ऐसे ब्लाग लेखकों से आग्रह करेंगे कि वह गुलामी की मानसिकता से बाहर निकलकर इस कथित गुटबाजी को देखना ही बंद कर दें। दिखती हो तो आंखें फेर लें। यहां सवाल कुछ ब्लाग लेखकों की गुटबाजी से अधिक उनकी सोच पर उठेगा जो कि स्वतंत्र एवं मौलिक हैं पर उनकी सोच वैसी नहीं हो पाई।

पहले करें हिंदी साहित्य और प्रचार जगत में फैली गुटबाजी की। उससे ऐसे अनेक लेखक-जिनमें इस ब्लाग/पत्रिका का लेखक भी-त्रस्त रहे हैं। यह त्रस्तता इतनी भयानक रही है कि कुछ लोगों ने तो लिखना ही बंद कर दिया और कुछ स्वांत सुखाय लिखते रहे पर उन्हें देश का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग नहीं पढ़ सका। दरअसल लेखक और पाठक के बीच जो बाजार या संस्थान हैं उनके केंद्र बिंदू में सक्रिय पूंजीपति, मठाधीशों और उनके प्रतिनिधियों ने अपनी शक्ति के आगे नतमस्तक लोगों का वहां बनाये रखा। बाजार को पैसे की तो हिंदी संस्थानों को प्रचार की जरूरत थी और जिसने उनकी जरूरतों को पूरा किया वही उनका लाड़ला बना। बाजार के पूंजीपति और हिंदी संस्थानों के कर्णधार अपनी प्रतिभा का उपयोग हिंदी के लेखकों को आगे आने देने की बजाय उनको भेड़ की तरह हांकने में करना चाहते हैं। उनकी मानसिकता एक सभ्य व्यापारी से अधिक ग्वाले की तरह है जो बस अपने पालित पशुओं को हांकना ही जानता है। सच कहें तो लेखकों को एक तरह से लिपिक माना गया।
परिणाम सामने है। पिछले कई दशकों से हिंदी में एक भी ऐसी पुस्तक या रचना नहीं आयी जिसे सदियों तक याद रखा जा सके। हम ब्लाग लेखकों में कई ऐसे हैं जो अपनी नौकरी और व्यापार से जुड़े रहते हुए अपना लेखन सामान्य पाठक तक पहुंचाने में नाकाम रहे पर इसका हमें क्षोभ या दुःख नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसे में हम इसे भाग्य कहें या कर्म कि अंतर्जाल पर स्वतंत्र रूप से ब्लाग/पत्रिका लिखने का अवसर मिला। यहां अंतर्जाल पर ऐसे लेखकों को असफल लेखक कहकर मजाक भी उड़ाया जाता है ऐसा कहने वाले पुरानी प्रवृत्ति के लोग हैं और उनके लिये सफलता का पैमाना अधिक छपना और प्रसिद्ध होने से अधिक कुछ नहीं है। किसी लेखक के पाठ की मौलिकता, गुणवत्ता और कालजयित से उनको कोई मतलब नहीं है। ऐसी रचनायें अब अंतर्जाल पर ही आना संभावित हैं जिसके सामने प्रकाशन व्यवसाय और हिंदी संस्थानों की शक्ति अत्यंत सीमित है।

यहां भले ही कोई पूंजीपति कुछ ब्लाग लेखकों को खरीदकर उसमें अपने यहां के प्रकाशन की पुस्तकों का प्रचार कराये या कोई हिंदी संस्थान अपने निर्धारित लेखकों के प्रचार के लिये कुछ ब्लाग लेखकों को तैयार करे पर समूचे हिंदी ब्लाग जगत का कोई स्वामी नहीं बन सकता। यहां हर ब्लाग लेखक एक प्रकाशन और संस्थान स्वयं हैं। वह किसी सेठ या मठाधीश का मोहताज नहीं है। अपने की बोर्ड को वह एक तोप या मिसाइल लांचर की तरह उपयोग कर अपने पाठ कहीं भी बम या मिसाइल की तरह पहुंचा सकता है। ब्लाग स्पाट या वर्डप्रेस के ब्लाग किसी भारतीय की संपत्ति नहीं है इसलिये पूरा हिंदी ब्लाग जगत किसी एक का बंधुआ बनने की संभावना नहीं है। जहां तक आर्थिक उपलब्धियों का प्रश्न है तो उसकी संभावना स्वतंत्र एवं मौलिक लेखकों के लिये इस समय लगभग नहीं के बराबर है। फिर जो इस समय लिख रहे हैं वह संभवतः आत्मनिर्भर हैं और शौकिया तौर पर ही यहां सक्रिय हैं। जब उनमें से कुछ लोग प्रसिद्धि पा लेंगे तो संभावना है कि बाजार उसका लाभ उठाना चाहे-उसमें भी इस देश से अधिक विदेश से ही संभावना है क्योंकि देशी बाजार के लिये हिंदी लेखक कोई मायने नहीं रखता, अगर स्वतंत्र और मौलिक है तो बिल्कुल नहीं। अनुवाद टूलों के जरिये हिंदी की रचनायें अन्य भाषाओं में पढ़ी जा रही हैं और हिंदी में मौलिक और स्वतंत्र लेखकों के प्रसिद्ध होने का यही एक मार्ग दिखता है। यही वह मार्ग है जहां हिंदी प्रकाशनों और संस्थानों के कर्णधारों की इच्छा और सहयोग के बिना हिंदी लेखकों का प्रसिद्धि के शिखर पर जाने का अवसर मिल सकता है।

हो सकता है कि कुछ लेखक पुरानी प्रवृत्ति के चलते अंतर्जाल पर सक्रिय आर्थिक और सामाजिक शक्तियों के केंद्र बिन्दू में स्थित लोगों की चाटुकारिता करते हों और उनको लाभ भी मिले पर इसका आशय यह बिल्कुल नहीं है कि स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के लिये कोई संभावना नहीं है। कई मायनों में स्वतंत्र और मौलिक लेखकों को तो एक नया खुला आकाश मिला है विचरण करने के लिये-जहां वह अपनी कविताओं, कहानियों और हास्य व्यंग्यों को कबूतर की तरह उड़ाने के लिये जिससे उनका नाम भी चमकता नजर आयेगा। जो कथित रूप से गुटबाजी में व्यस्त हैं उनके लिये तो सीमित संभावनायें रहेंगी पर जो स्वतंत्र और मौलिक रूप से लिखने वाले हैं उनके लिये प्रसिद्धि के मोती प्रदान करने वाला विशाल सागर है।

ऐसे में स्वतंत्र लेखक अंतर्जाल की व्यापाकता के साथ बाहर मौजूद प्रकाशनों और संस्थाओं की सीमित उपलब्धियों को समझें। वहां सीमित उपलब्धियां थी और इसलिये उनमें से अपना भाग पाने की प्रतियोगिता ने वहां गुटबाजी पैदा की जिससे हिंदी साहित्य में बेहतर लेखक और रचनाओं का लगभग टोटा पड़ गया। अंतर्जाल पर अपनी सक्रियता को अपना भाग्य मानते हुए स्वतंत्र और मौलिक लेखक अपने रचनाकर्म से जुड़े रहें और कथित गुटबाजी देखने में वह अपनी ऊर्जा को नष्ट करना उनके लिये ठीक नहीं है। वह स्वयं ही लेखक, संपादक और प्रकाशक हैं और उसी स्वाभिमान के अनुरूप उनको व्यवहार करना चाहिये। जो लोग ऐसा नहीं करते और निरंतर गुटबाजी पर ही दृष्टिपात करते हैं उनको यह बात समझ लेना चाहिये कि इस स्वतंत्र आकाश में उनको पुरानी गुलाम मानसिकता का प्रतीक माना जा सकता है।
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चमत्कार को नमस्कार, सहजता से कोई नहीं सरोकार-आलेख


इस प्रथ्वी पर जीवन अपनी सहज धारा से बहता जाता है। अनेक आपदायें इस प्रथ्वी पर आती हैं पर फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। यहां सांस लेने वाला प्रत्येक जीव भी अपने जीवन में उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरता हुआ अपन जीवन सहजता से व्यतीत करता है। प्रथ्वी पर सभी प्राणी-जिसमे पेड़-पौद्ये, पशु-पक्षी और मनुष्य अपने जीवन में दुःख-सुख और आशा और निराशा के दौर से गुजरते है। बस फर्क इस बात का है कि इंसान उसे बयान कर सकता है दूसरे उसे सुन सकते हैं पर अगर दूसरे बयान करें तो इंसान उसे सुन नहीं सकता पर जिसमें चेतना है वह उसे महसूस कर सकता है।
कुल मिलाकर जीवन दुःख-सुख और आशा निराशा इसी सहज जीवन का हिस्सा है पर मनुष्य जो सब प्राणियो में विवेकवान है उसमें हर बुरी बात को त्रासदी और अच्छी बात को चमत्कार कहता है।

मनुष्य के मन में फैली इसी धारणा पर अनेक चालाक लोग अपनी रोटी सैंकते हैं। कभी किसी बाबा के नाम तो कभी किसी फकीर के नाम पर तो कभी किसी धार्मिक स्थान के निर्माण के नाम पर चमत्कार का भ्रमजाल फैलाते हैं। किसी घटना पर चमत्कार का रंग चढ़ाकर उसका प्रचार इस तरह करते हैं कि अपनी हालातों से परेशान लोग उस प्रतीक की तरफ आकर्षित हो जो उसके पीछे है।

14 वर्ष की एक लड़की का अपने ही घर में कत्ल हो गया। कत्ल होते ही जांचकर्ताओं ने माना कि कातिल कोई घर का आदमी है। पहले एक नौकर पर शक गया और उसकी तलाश शुरू की गयी। लड़की की देह पंचतत्वों मेंं विलीन अभी हुई थी कि उसी आरोपी नौकर का शव उसी घर की छत पर मिला जहां उस लड़की का कत्ल हुआ था। मामला उलझ गया। मृतक लड़की के बदहवास माता पिता क्या बतायें और क्या बोलें? सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे जैसे सरेआम मुकदमा चल रहा हो। टीवी चैनल सीधे प्रसारण कर रहे थे। बताओ कातिल कौन है? धीरे-धीरे कत्ल की सुई पिता की तरफ घुमाई गयी। उस तमाम तरह के आरोप लगाते हुए कहानियां गढ़ी गयी। उसके मित्रों पर संदेह किया गया। एक तरह से फैसला दिया गया कि पिता ही अपने पुत्री के कत्ल के लिये जिम्मेदार है। उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया।

जांच आगे बढ़ी। अब तीन अन्य नौकरों को घेरा गया। जांच पूरे पचास दिन चली। मृत लड़की का पिता जेल में था तो तीन अन्य नौकर भी इसी आरोप में धरे गये। जांच चलती रही। प्रचार माध्यम उस मृत लड़की की हत्या के समाचारों को बेचते रहे और तो और इतना भी भूल गये कि किसी मृतक के चरित्र पर सार्वजनिक आक्षेप करना तो दूर एकांत में भी लोग ऐसा करना अनुचित मानते हैं। सारी संस्कृति और संस्कारों का मखौल उड़ाते हुए एक 14 साल के मृत लड़की के बारे में जो बातें कहीं गयी उनको सुनकर ऐसा लगा जैसे कि किसी ने कानों में गरम सीसा डाल दिया।
आखिर जांचकर्ताओं ने अदालत में माना कि मृत लड़की के पिता के विरुद्ध लगाये गये आरोप के संबंध में उसके पास कोई साक्ष्य नहीं है। अदालत ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। पिता जेल से बाहर आ गया। यह कहानी है पर सब घटनायें समाज और देश के नियमों को अनुसार घटित हुईं। परेशान पिता जेल से छूटा तो अपनी पत्नी के साथ सांईबाबा के मंदिर गया।

बस प्रचार माध्यमों को अवसर मिल गया कि यह तो उनके चमत्कार की वजह से रिहा हुआ है। इस पर कई कार्यक्रम दिखाये और उसकी प्रष्ठभूमि में सांईबाबा के भजन बजाये। वैसे सांईबाबा के चमत्कारों के बारे में आजकल सभी चैनल जमकर प्रसारण कर रहे थे। यह उनके प्रति भक्ति भाव का नहीं बल्कि अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के कारण कर रहे है। लोग चमत्कार एक कार्यक्रम के रूप में देखें और उसे खरीदें-यही भाव उनके मन में रहता है।
उपरोक्त हत्याकांड की जांच में अनेक विशेषज्ञ जांचकर्ता लगे। उन्होंने उसके हर पहलू का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। उन्होंने समय लिया पर हत्याकांड की स्थिति को देखते हुये यह कोई बड़ी बात नहीं थी। जांचकर्ता तमाम तरह की शैक्षणिक उपाधियों के साथ अपने कार्य का अनुभव लिये हुए थे। उसी आधार पर उन्होंने अपनी बात अदालत में रखी। अदालत ने भी सब देखा और जमानत दी। यह एक सहज और सामान्य प्रक्रिया है।
मगर प्रचार माध्यमों को इसमें कुछ ऐसा चाहिये था जिसे वह बेच सकें और इसे चमत्कार का तत्व उनको मिल गया। अपनी लड़की की पहले मौत और फिर उसकी हत्या का आरोप अपने ऊपर लेने वाले पिता के लिये पूरा समय संघर्षपूर्ण था और उस दौरान उसके पास न तो हादसे पर रोने का समय था और न किसी चमत्कार की उम्मीद करने का। रिहा होने के बाद वह सांईबाबा के मंदिर गया इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। अपने देश में कई ऐसे लोग हैं जो ऐसे अवसरों पर मंदिर जाते हैं। अनेक लड़के और लड़कियों को परीक्षा परिणाम में उत्तीर्ण होने पर मंदिर जाते देखा जा सकता है। किसी को लड़का हुआ है पत्नी अस्पताल में है तो पति पहले अपने इष्ट के मंदिर जाता है। कई लोग अकारण भी जाते हैं। मजे की बात यह है कि सांईबाबा के मंदिर जाने के बावजूद उस पिता ने किसी से नहीं कहा कि ‘कोई चमत्कार हुआ है’, पर प्रचार माध्यम अपनी तरफ से अनेक बातें जैसे पहले जोड़ रहे थे अब भी जोड़ रहे हैं।

सांई बाबा के इस देश में करोड़ों भक्त हैं। इन पंक्तियों का लेखक हर गुरूवार को सांईबाबा के मंदिर जाकर ध्यान लगाता है। उनका मूल संदेश यही है कि ‘श्रद्धा और सब्र रखो जीवन में सारे काम होंगे।’ आशय यही है कि अपने अंदर परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखते हुए उसका ध्यान करते हुए धीरज रखो सारे सांसरिक कार्य सहजता से हो जायेंगे। इसके बावजूद कुछ लोग उनके नाम पर चमत्कारों का प्रचार कर असहजता का वातावरण फैलाते हैं। सांईबाबा कहते हैं कि जीवन में धीरज रखो पर उनकी भक्ति का व्यवसायिक दोहन करने वाले कहते हैं कि आप दौड़ो उनके पीछे तो चमत्कार हो जायेगा। सांईबाबा के मंदिर में जाकर मैं जिस तरह के दृश्य देखता हूं तो मुझे अचंभा होता है कि लोग किस तरह उनके द्वारा दिये गये सहज रहने के संदेश की अवहेलना करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो सांईबाबा के श्रद्धा और सब्र के संदेश के मार्ग पर चलेगा वह आनंद से जीवन व्यतीत करेगा पर यह चमत्कार नहीं है बल्कि उनके संदेश के अनुसार अपने जीवन को सहजता से जीने का सहज परिणाम है। चमत्कार शब्द तो असहजता का भाव पैदा करते हैं।

यह तो केवल एक घटना का उल्लेख भर किया गया है पर अनेक घटनायें ऐसी हैं जिनमें प्रचार माध्यम चमत्कार बनाकर अपने कार्यक्रमों को बेचते हैं। इस देश में ही श्रीगीता में निष्काम भाव से कार्य करने का संदेश दिया गया और यही वह देश है जिसमें सांसरिक कार्यों में सफलता के लिये चमत्कारों का प्रचार किया जाता है। ऐसा विरोधाभास शायद ही कहीं देखने को मिले। चमत्कारों को नमस्कार करते हुए सहज भाव का तिरस्कार करते हैं।
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दीपक भारतदीप