Category Archives: आध्यात्म

गुरु पूर्णिमा-तत्वज्ञान दे वही होता है सच्चा गुरु (article in hindi on guru purnima


गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव।
दो बूड़े वापूरे,चढ़ि पाथर की नाव

         जहां गुरु लोभी और शिष्य लालची हों वह दोनों ही अपने दांव खेलते हैं पर अंततः पत्थर बांध कर नदिया पर करते हुए उसमें डूब जाते हैं।

            आज पूरे देश में गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है। भारतीय अध्यात्म में गुरु का बहुत महत्व है और बचपन से ही हर माता पिता अपने बच्चे को गुरु का सम्मान करने का संस्कार इस तरह देते हैं कि वह उसे कभी भूल ही नहीं सकता। मुख्य बात यह है कि गुरु कौन है?
दरअसल सांसरिक विषयों का ज्ञान देने वाला शिक्षक होता है पर जो तत्व ज्ञान से अवगत कराये उसे ही गुरु कहा जाता है। यह तत्वज्ञान श्रीगीता में वर्णित है। इस ज्ञान को अध्ययन या श्रवण कर प्राप्त किया जा सकता है। अब सवाल यह है कि अगर कोई हमें श्रीगीता का ज्ञान देता है तो हम क्या उसे गुरु मान लें? नहीं! पहले उसे गुरु मानकर श्रीगीता का ज्ञान प्राप्त करें फिर स्वयं ही उसका अध्ययन करें और देखें कि आपको जो ज्ञान गुरु ने दिया और वह वैसा का वैसा ही है कि नहीं। अगर दोनों मे साम्यता हो तो अपने गुरु को प्रणाम करें और फिर चल पड़ें अपनी राह पर।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीगीता में गुरु की सेवा को बहुत महत्व दिया है पर उनका आशय यही है कि जब आप उनसे शिक्षा लेते हैं तो उनकी दैहिक सेवा कर उसकी कीमत चुकायें। जहां तक श्रीकृष्ण जी के जीवन चरित्र का सवाल है तो इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि उन्होंने अपने गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हर वर्ष उनके यहां चक्कर लगाये।
गुरु तो वह भी हो सकता है जो आपसे कुछ क्षण मिले और श्रीगीता पढ़ने के लिये प्रेरित करे। उसके बाद                    अगर आपको तत्वज्ञान की अनुभूति हो तो आप उस गुरु के पास जाकर उसकी एक बार सेवा अवश्य करें। हम यहां स्पष्ट करें कि तत्वज्ञान जीवन सहजता पूर्ण ढंग से व्यतीत करने के लिये अत्यंत आवश्यक है और वह केवल श्रीगीता में संपूर्ण रूप से कहा गया है। श्रीगीता से बाहर कोई तत्व ज्ञान नहीं है। इससे भी आगे बात करें तो श्रीगीता के बाहर कोई अन्य विज्ञान भी नहीं है।
इस देश के अधिकतर गुरु अपने शिष्यों को कथायें सुनाते हैं पर उनकी वाणी तत्वाज्ञान से कोसों दूर रहती है। सच तो यह है कि वह कथाप्रवचक है कि ज्ञानी महापुरुष। यह लोग गुरु की सेवा का संदेश इस तरह जैसे कि हैंण्ड पंप चलाकर अपने लिये पानी निकाल रहे हैं। कई बार कथा में यह गुरु की सेवा की बात कहते हैं।
सच बात तो यह है गुरुओं को प्रेम करने वाले अनेक निष्कपट भक्त हैं पर उनके निकट केवल ढोंगी चेलों का झुंड रहता है। आप किसी भी आश्रम में जाकर देखें वहा गुरुओं के खास चेले कभी कथा कीर्तन सुनते नहीं मिलेंगे। कहीं वह उस दौरान वह व्यवस्था बनाते हुए लोगों पर अपना प्रभाव जमाते नजर आयेंगे या इधर उधर फोन करते हुए ऐसे दिखायेंगे जैसे कि वह गुरु की सेवा कर रहे हों।

कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिये कहा है कि

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जाका गुरु आंधरा, चेला खरा निरंध।
अन्धे को अन्धा मिला, पड़ा काल के फंद।

      “जहां गुरु ज्ञान से अंधा होगा वहां चेला तो उससे भी बड़ा साबित होगा। दोनों अंधे मिलकर काल के फंदे में फंस जाते है।”

 
बहुत कटु सत्य यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक स्वर्णिम शब्दों का बड़ा भारी भंडार है जिसकी रोशनी में ही यह ढोंगी संत चमक रहे हैं। इसलिये ही भारत में अध्यात्म एक व्यापार बन गया है। श्रीगीता के ज्ञान को एक तरह से ढंकने के लिये यह संत लोग लोगों को सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। भगवान श्रीगीता में भगवान ने अंधविश्वासों से परे होकर निराकर ईश्वर की उपासना का संदेश दिया और प्रेत या पितरों की पूजा को एक तरह से निषिद्ध किया है परंतु कथित रूप से श्रीकृष्ण के भक्त हर मौके पर हर तरह की देवता की पूजा करने लग जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर इन गुरुओं की तो पितृ पक्ष में पितरों को तर्पण देते हैं।
मुक्ति क्या है? अधिकतर लोग यह कहते हैं कि मुक्ति इस जीवन के बाद दूसरा जीवन न मिलने से है। यह गलत है। मुक्ति का आशय है कि इस संसार में रहकर मोह माया से मुक्ति ताकि मृत्यु के समय उसका मोह सताये नहीं। सकाम भक्ति में ढेर सारे बंधन हैं और वही तनाव का कारण बनते हैं। निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया ऐसे ब्रह्मास्त्र हैं जिनसे आप जीवन भर मुक्त भाव से विचरण करते हैं और यही कहलाता मोक्ष। अपने गुरु या पितरों का हर वर्ष दैहिक और मानसिक रूप से चक्कर लगाना भी एक सांसरिक बंधन है। यह बंधन कभी सुख का कारण नहीं होता। इस संसार में देह धारण की है तो अपनी इंद्रियों को कार्य करने से रोकना तामस वृत्ति है और उन पर नियंत्रण करना ही सात्विकता है। माया से भागकर कहीं जाना नहीं है बल्कि उस पर सवारी करनी है न कि उसे अपने ऊपर सवार बनाना है। अपनी देह में ही ईश्वर है अन्य किसी की देह को मत मानो। जब तुम अपनी देह में ईश्वर देखोगे तब तुम दूसरों के कल्याण के लिये प्रवृत्त होगे और यही होता है मोक्ष।
इस लेखक के गुरु एक पत्रकार थे। वह शराब आदि का सेवन भी करते थे। अध्यात्मिक ज्ञान तो कभी उन्होंने प्राप्त नहीं किया पर उनके हृदय में अपनी देह को लेकर कोई मोह नहीं था। वह एक तरह से निर्मोही जीवन जीते थे। उन्होंने ही इस लेखक को जीवन में दृढ़ता से चलने की शिक्षा दी। माता पिता तथा अध्यात्मिक ग्रंथों से ज्ञान तो पहले ही मिला था पर उन गुरु जी जो दृढ़ता का भाव प्रदान किया उसके लिये उनको नमन करता हूं। अंतर्जाल पर इस लेखक को पढ़ने वाले शायद नहीं जानते होंगे कि उन्होंने अपने तय किये हुए रास्ते पर चलने के लिये जो दृढ़ता भाव रखने की प्रेरणा दी थी वही यहां तक ले आयी। वह गुरु इस लेखक के अल्लहड़पन से बहुत प्रभावित थे और यही कारण है कि वह उस समय भी इस तरह के चिंतन लिखवाते थे जो बाद में इस लेखक की पहचान बने। उन्हीं गुरुजी को समर्पित यह रचना।
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वृंदावन के श्री कृष्ण और अयोध्या के श्री राम, शक्ति मिलती है लेते ही नाम-हिन्दी लेख (bhagwan shri ram aur krishan ke nam mein hee shakti-hindi lekh)


वृंदावन के कृष्ण और अयोध्या के राम भारतीय अध्यात्म दर्शन और धर्म के ऐसे स्तंभ है जिनको उन बड़े बड़े संतों ने भी माना है जो अपनी भक्ति और तपस्या से जनमानस में भगवत् स्वरूप माने जाते हैं। महाकवि तुलसीदास, संत प्रवर कबीरदास, कविवर रहीम, तपस्विनी मीरा तथा अन्य अनेक महापुरुषों ने अपने जीवन चरित्र से भारतीय जनमानस में भगवत्रूप की स्थिति प्राप्त की और इन सभी ने भगवान श्रीकृष्ण और राम के चरित्रों को अपने मन में स्थान दिया। स्पष्ष्टतः इन दोनों के बिना भारतीय अध्यात्म ज्ञान तथा जनमानस की भक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।
भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण का समूचा जीवन ही लीलामय झांकी प्रस्तुत करता है और जैसे कि हम जानते हैं कि यह समूचा जीवन अनेक रंगों से व्याप्त है। यही कारण है कि हर इंसान के जीवन चरित्र में विविध रूप स्वयमेव नज़र आते हैं ऐसे में शरीर धारण करने वाले अवतारी पुरुष भी सभी रंगों में दृष्टिगोचर होते है। चूंकि भगवान श्री राम तथा श्रीकृष्ण भगवान के मानव स्वरूप अवतार माने जाते हैं इसलिये उनका जीवन भी इसी तरह बीता। सृष्टि के नियमों के अनुसार उन्होंने अपना बाल्यकाल, युवावस्था तथा अधेड़ावस्था में बिताया इसलिये उनके विभिन्न स्वरूप निर्मित हुए। दोनों महान योगी थे। उनके संदेश आज भी स्वाभाविक इसलिये लगते हैं कि प्रकृति और उसके जीवन के स्वरूप में बदलाव आता है पर मौलिक स्वभाव कभी नहीं बदलता। यही कारण है कि आज भी उनका चरित्र स्वाभाविक लगता है पर विविधता के कारण सभी अपने मन के अनुसार स्वरूप स्मरण करने के लिये चुनते हैं ।

अगर सहजता के साथ दोनों या किसी एक के भी स्वरूप में अपने ध्यान के साथ भक्ति की जाये तो शक्ति प्राप्त होती है मगर मुश्किल यह है कि सामान्य जन सकाम भक्ति में लीन होना पसंद करते हैं या फिर उनके चरित्र की चर्चा को ही सत्संग समझ लेते हैं और यहीं से शुरु होता है संतों और धर्मगुरुओं का उपदेश देने का सिलसिला जो अंततः पेशा बन जाता है। उसके बाद भी ऐसे लोग बहुत से हैं जो धर्म की आड़ में अपना लक्ष्य पाना चाहते हैं ताकि उनकी लोकप्रियता का नकदी में रूप में परिवर्तन किया जा सके। यही कारण है कि जब भारत के बाहर भारतीय अध्यात्म अनुसंधान का विषय बन रहा है वहीं यहां उनके जन्मस्थान तक ही लोगों का मन सीमित रखने का प्रयास हो रहा है। वर्तमान में भारतीय जनमानस अखबार, टीवी, इंटरनेट तथा रेडियो तक सीमित हो गया है और धर्म के आधार पर प्रचार पाने वाले यही सक्रियता अधिक दिखाते हैं। इससे सामान्य जनमानस प्रभावित भी होता है। कितना प्रभावित होता है यह भी अब विश्लेषण का विषय है।

इस समय अयोध्या की रामजन्म भूमि फिर चर्चा में है क्योंकि उसके विवाद का निर्णय संभवत आने वाला है। इसका बकायदा प्रचार हो रहा है। प्रचारकों को प्रसिद्धि मिल रही है तो व्यवसायिक प्रचार माध्यमों का समय पास हो रहा है जो अंततः विज्ञापन के सहारे ही व्यतीत होता है।

एक प्रश्न अक्सर लोग कहते हैं कि धर्म के आधार पर हिन्दू एक क्यों नहीं होते? कुछ लोग झुंझलाते हैं कि अन्य धर्म के लोग अपने इष्ट के नाम पर एक हो जाते हैं पर हिन्दू समाज हमेशा ही बिखरा रहता है। कुछ विद्वान तो हिन्दू समाज के बंटवारे का कारण अधिक देवताओं की उपासना करना बताते हैं तो कुछ समाज को स्वार्थों में लिप्त होकर रहने का दोष देते हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे लोग अन्य समाजों की अंदरूनी स्थिति को नहीं जानते और उनके मुकाबले अपने समाज को कमतर होने का उनको अफसोस होता है। ऐसे विद्वानों को गीता अवश्य पढ़नी चाहिए जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की सामग्री भी अंतर्निहित है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट कर दिया गया है कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी।

आर्ती भक्त वह होते हैं जो विपत्ति आने पर भगवान की दरबार में पहुंचते हैं। अर्थार्थी वह होते हैं जो अपनी मनोकामना पूर्ण होती रहे इस उद्देश्य से जाते हैं। जिज्ञासु भक्त वह हैं जो यह देखने के लिये जाते हैं कि वहां जाने से उन पर क्या प्रभाव होता है। सबसे ऊंचे ज्ञानी है जो निष्काम भाव से मंदिर यह सोचकर जाते हैं कि वहां जाने से ध्यान का लाभ होगा जिनसे उनमें मानसिक शुद्धि आयेगी। समाज को किसी एक इष्ट के नाम एक रखने के प्रयास करने और सफल न होने पर झुंझलाने वाले इस तरह का ज्ञान नहीं रखते।

अब करते हैं भारतीय समाज की बात! यहां श्रीमद्भागवत गीता के संदेश हर आदमी जानता है। उसे यह भी मालुम है कि धर्म के नाम पर पाखंड यहां खूब होता है। राम जन्म भूमि के समय समाज में जोरदार एकता आयी थी पर कालांतर में उसका प्रभाव कम हो गया। इसका कारण यह रहा कि उस समय लोगों के पास यह एक ऐसा विषय था जो ज्वलंत था और धर्म से संबंधित अन्य कोई विषय उनके उनके पास मन लगाने के लिये नहीं था। फिर अब ऐसा क्या हो गया कि समाज अब उदासीन हो गया? यहां लोग धर्म के नाम पर कोई न कोई चर्चा चाहते हैें फिर राम जो सभी के हृदय के नायक हैं उनकी जन्मभूमि के नाम पर क्यों उत्तेजित नहीं हो रहे। इसका कारण यह है कि अब बाबा रामदेव ने योग का जो परचम पूरे विश्व में फहराया है उसने भारतीय जनमानस में भी गहरी पैठ बना ली है। कम से कम जिज्ञासु और ज्ञानी भक्तों के के दिमाग में यह बात आ गयी है कि भगवान राम और श्री कृष्ण हमारे अध्यात्मिक दर्शन का आधार है पर उसके साथ ही उनकी लीलाऐं और संदेश भी बहुत महत्वपूर्ण है। पूर्वकाल में रामजन्मभूमि आंदोलन के समय प्रचार माध्यम इतने सशक्त और व्यापक नहीं थे जितने अब दिखाई देते हैं। उस समय दिल्ली दूरदर्शन के अलावा अन्य कोई साधन नहंी था और अब तो टीवी चैनलों की संख्या तीन सौ से ऊपर ही होगी ऐसा लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों की भावनाओं का दोहन अब एक तरीके से नहीं किया जा सकता और न ही किसी पुराने विषय को फिर वैसे ही संवेदनशील बनाया जा सकता है।

इधर भारतीय योग दर्शन तथा श्रीगीता के संदेश की वैश्विक स्तर पर चर्चा और अनुसंधान का विषय बन बन गया है है। इससे यह बात तो स्थापित हो ही गयी है कि हमार अध्यात्म भले ही एक इष्ट पर निर्भर नहीं है पर बहुत सारे उसके स्वरूप का निराकार चरित्र का प्रतिबिंब हैं। निष्काम और सकाम भक्ति का स्वरूप अब स्पष्ट होता जा रहा है। मूर्तिपूजा करना और निरंकार का ध्यान करना अलग विधियां हैं पर दोनों का लक्ष्य एक ही है कि सर्वशक्तिमान का स्मरण कर अपने मन और विचारों को शुरु और पवित्र बनाना। अतः दोनों प्रकार के भक्तों में आपसी विरोध नहीं होता। यह अलग बात है कि सकाम भक्त निष्काम भक्तों को नास्तिक या अल्प आस्थावान समझते हैं पर ज्ञानी लोग इस तथ्य को जानते हुए चुप्पी साध लेते हैं ।

आखरी बात यह कि भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराम इस धरती पर पैदा हुए तो समाज कल्याण का काम किया। ऐसा करते हुए उन्होंने अपने और पराये क्षेत्र का विचार नहीं किया। सारे संसार को अपना घर और समस्त प्रजाजनों को अपने से रक्षित माना। दोनों ने अपने महत्वपूर्ण काम अपने जन्म स्थान से परे होकर किये। श्रीकृष्ण तो वृंदावन से दूर होकर द्वारका में बसे और फिर आतिताइयों का नाश किया। एक बार वृंदावन से निकले तो फिर लौटे ही नहंीं। जिन गोपियों के साथ रासलीला करते थे वह उनकी प्रतीक्षा ही करती रहीं। जिस कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण जी ने गीता संदेश देकर अपना सवौच्च लक्ष्य पूरा किया वह भी उनके जन्मस्थान से बहुत दूर था। भगवान श्रीराम ने एक भी राक्षस का संहार अयोध्या में नहीं किया। सीधी बात यह है कि उन्होंने जन्मभूमि से अधिक पूरी धरती को अपनी कर्मभूमि मानकर कार्य किया। वैसे भी कहा जाता है कि आदमी को प्रतिष्ठा घर से बाहर काम करने पर ही मिलती है। यही कारण है कि इन दोनों के भक्त पूरे विश्व में हैं और कई तो ऐसे हैं कि जिनकी रुचि दोनों में होने के बावजूद उनकी जन्मभूमियों नहीं है। ऐसे में उन भक्तों को उदासीन यह कायर कतई नहीं कहा जा सकता। अगर कोई ऐसा कहता तो यकीनन वह भक्तों की भावनाओं का दोहन न होने के कारण ऐसा कह रहा है। रामजन्मभूमि का निर्णय अब अदालत में होना है। ऐसे में भी अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी उनमें रुचि जिज्ञासा के कारण है न कि आस्था के कारण। मुश्किल यह भी है कि जो लोग यह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये वही अपनी सुविधा के अनुसार ऐसे विवादों को न केवल पैदा करते हैं बल्कि निरपेक्ष दिखते हुए भी एक पक्ष की तरफ झुकते नज़र आते हैं। ऐसे में आम जनमानस की कोई बड़ी भूमिका नहीं दिखती और उसकी खामोशी को तटस्थता समझा जाये या उदासीनता यह विश्लेषकों के चिंतन का विषय हो सकता है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,Gwalior

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सुख और दुःख का सर्वेक्षण-हिन्दी व्यंग्य (sukh dukh ka surve-hindi vyangya


पश्चिमी वैज्ञानिकों ने एक शोध किया है जिसके अनुसार लोग अपने दुःख से कम दूसरे के सुख से अधिक तनाव ग्रस्त रहते हैं। 24 देशों के 19 हजार लोगों पर यह शोध किया गया है। इससे पता चलता है कि लोग अपने वेतन कम होने से नहीं बल्कि दूसरे की ज्यादा है इससे ज्यादा परेशान हैं। अब यह पता नहीं कि इसमें अपना देश शामिल है कि नहीं पर इतना संतोष है कि 23 दूसरे देश भी इसमें शामिल हैं जहां अपनी तरह के लोग रहते हैं। अगर अकेले अपने देश की बात होती तो कितना तनाव बढ़ता यह समझ ही सकते हैं।
आश्चर्य इस बात का है कि पश्चिमी विज्ञान तथा शिक्षा संस्थाओं को हर चीज के लिये अनुसंधान की आवश्यकता होती है। वह आज जिस विषय पर शोध कर अपना निष्कर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं उस पर हमारे देश की राय बहुत पुरानी है। यही कारण है कि हमारे देश के अध्यात्मिक महापुरुष हमेशा ही ईर्ष्या और द्वेष से दूर रहने की बात करते हैं-यह अलग बात है कि लोग सुनते खूब हैं पर उस पर अमल नहीं करते।
अपने यहां तो इस संबंध में अनेक कथायें हैं। एक भक्त की भक्ति पर सर्वशक्तिमान प्रसन्न हो गये और उससे वरदान मांगने को कहा। उसने कहा कि ‘भगवान मेरे पड़ौस में सभी बड़े लोग रहते हैं एक में ही तुच्छ आदमी यहां फंसा हूं। अतः ऐसा कुछ करिये कि मैं भी सभ्रांत वर्ग में आ जाऊं।’
सर्वशक्तिमान ने कहा‘तथास्तु! मगर पड़ौस की समस्या तो भाग्य से आई है उसे मैं बदल नहीं सकता। अलबत्ता तुम्हारा कल्याण करने का मेरा दायित्व है। इसलिये तुम्हारे पास ढेर सारा धन आयेगा। तुम जैसी चाहत करोगे वैसा होगा पर पड़ौसी के पास उससे दुगुना जायेगा। इसे मैं बदल नहीं सकता।’
सर्वशक्तिमान ने वरदान दिया और गायब हो गये।
उस भक्त ने कहा-‘मुझे अपनी पत्नी के लिये दो कंगन चाहिए।’
तत्कला कंगन वहां प्रकट हो गये, मगर पड़ौसन के घर चार गये।
भक्त ने कहा-‘मुझे एक कार चाहिये।
कार आ गयी वह वातनुकूलित पर पड़ौसी के पास दो पहुंच गयी।
भक्त अपनी उपलब्धि में यह भूल गया कि पड़ौसी उसकी तपस्या का बिना किसी मेहनत के दोगुना लाभ उठा रहा है।
इधर पत्नी कंगन लेकर पड़ौसन के पास पहुंची और इतराती हुई बोली-‘‘हमारे वो दो कंगन लाये हैं। साथ में एक जोरदार वातानुकूलित कार भी खरीदी है।’
पड़ौसन बोली-उंह! मेरे पति चार कंगन ले आये हैं और दो कार खरीदी हैं। हमारे से तो तुुम्हारी तुलना न कल थी और न आज है।’
भक्त की पत्नी तो जैसे जमीन पर आकर गिरी। घर आकर पति से लड़ते हुए बोली-‘चाहे कुछ भी हो जाये। हम फकीर हो जायें पर पड़ौसी अधिक अमीर नहीं बनना चाहिये।’
भक्त सहम गया उसने पहले तो अपने कंगन और कार गायबी की जिससे पड़ौसी को दुगुनी हानि हुई। अब उसने कहा कि-‘मेरी एक आंख फूट जाये, एक हाथ निकल जाये।’
पड़ौसी की दोनों आंखें चली गयी और हाथ भी। ऐसा प्राकृतिक संकट देखकर सर्वशक्तिमान प्रकट हुए और भक्त से बोल -‘यार, भ्रमित होकर तुम्हें वरदान दे गया था सो वापस ले रहा हूं। इस तरह की खुराफात करना हमारे धर्म के विरुद्ध है। ये ले अपनी एक आंख और एक हाथ ताकि पड़ौसी संकट से मुक्त हो जाये।’
भक्त को गुस्सा आया और वह बोला-‘यह क्या? आंख और हाथ मेरे हैं अगर में उनको त्याग रहा हूं तो उससे आपका क्या मतलब?’’
सर्वशक्तिमान बोले-‘यह महान त्याग है, पर मेरे पास दूसरा वरदान देने का अधिकार नहीं है क्योंकि घर से निकलते हुए पत्नी ने मुझे चेता दिया था कि अगर अब ऐसा हुआ तो घर में घुसने नहीं दूंगी।’
पुरानी कहानी है जिसे हास्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। पश्चिम वैज्ञानिक अगर भारतीय अध्यात्म दर्शन तथा पंचतंत्र में से कहानियां उठाकर देखें तो उनको अनेक प्रकार के प्रयोग करने के लिये पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मगर उनसे क्या कहें देश के बुद्धिजीवियों के ही बुरे हाल हैं सभी विदेशियों के प्रशंसक हैं। अपने अध्यात्म ज्ञान में तो उनको पोंगापंथी दिखाई देती है। अब देखना इसी पश्चिमी निष्कर्ष पर बुद्धिजीवी समाज बहस करता दिखेगा। जहां तक हम जैसे आम लोगों का सवाल है ऐसे अनेक निष्कर्षों से अपने महापुरुषों की कृपा से पहले से ही अवगत है। यही कारण है कि दूसरे के सुख को देखकर मुंह फेर लेते हैं कि कहीं अपने दुःख न याद आने लगें। वह सुख उससे छोड़ दे इसकी तो कामना भी नहीं करते। इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि इससे केवल अपना खून जलता है। इस सच को भी जानते हैं कि भारत में गरीबी, बेकारी और भ्रष्टाचार चाहे कितना भी है पर लोग दुःखी इस बात से अधिक हैं कि उनके आसपास के लोग सुखी हैं। नतीजा यह है कि कोई सुखी नहीं है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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धर्म की आड़ में अपराध-विशेष हिन्दी लेख (Dharm aur Insan-special hindi article)


अभी हाल में भारत में कुछ कथित हिन्दू धर्माचार्यों पर आर्थिक, सामाजिक तथा यौन अपराध करने की रहस्योद्घाटन करने वाले समाचार देखने को मिले थे तब कुछ लोगों ने उस धर्म से जोड़ने की नाकामा कोशिश की थी। इन समाचारों को लेकर ऐसा प्रचार किया गया कि जैसे कि यह केवल हिन्दू धर्म में ही संभव है। अब पश्चिमी देशों में कुछ पादरियों द्वारा ऐसी ही घटनाओं की जानकारी आयी है और उन पर बालकों के साथ यौन शोषण जैसे गंभीर आरोप लगे हैं। इसके बावजूद हमारा यह मानना है कि इसे ईसाई धर्म से जोड़ना गलत होगा। यह कहना भी गलत होगा कि ईसाई समाज के अधिकतर पादरी इसमें लिप्त हैं। दरअसल आज के आधुनिक संचार माध्यमों का उपयोग करते हुए अपने चिंतन और विवेक को पुराने दायरों से बाहर निकलकर सोचना चाहिये। अगर हम ऐसा नहीं करते तो निश्चित रूप से समाज और उससे जुड़े धर्मों के प्रति कोई नया नज़रिया नहीं बन पायेगा और पुराने ढर्रे पर आपस संघर्ष और विवाद चलते रहेंगे।
सच बात तो यह है कि कहीं भी धर्म की स्थापना के लिये जन चेतना आंदोलन की आवश्यकता तो हो सकती है पर वहां संगठन बनाने और उसे चलाने की आवश्कता ही नहीं है। जहां संगठन बनते हैं वहां पर पदाधिकारियों की नियुक्ति होती है और तब वहां आम और खास का अंतर भी निर्मित होता है। यही अंतर धर्म की आड़ में अधर्म करने का आधार बनता है क्योंकि वहां आम आदमी को धाार्मिक स्थानों और आयोजनों में एक ग्राहक और खास को उत्पादक या व्यवसायी बना देता है। जहां व्यवसाय वाली बात आई वहां भ्रष्टाचार स्वाभाविक रूप से पनपता है चाहे भले ही वह धर्म प्रचार से क्यो न जुंड़ा हो ऐसे में विश्व में चल रहे किसी भी धर्म के आचार्य पर जब कोई आर्थिक, यौन अथवा राजनीतिक अपराध करने का कोई आरोप लगता है तो उसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है।
हमें यह पता नहीं है कि पश्चिमी में पैदा धर्मों में आध्यात्मिक ज्ञान का कितना तत्व है पर इतना तय है भारतीय धर्मों उससे सराबोर हैं। अध्यात्मिक ज्ञान के बिना कोई भी ज्ञानी यह दावा नहीं कर सकता कि वह धार्मिक प्रवृत्तियों को धारण करने वाला है। इस अध्यात्म ज्ञान को गुरु से ग्रहण किया जाता है पर मुश्किल यह है कि इसको सुनाने वाले तो बहुत हैं पर धारण करने वाले ज्ञानी नगण्य हैं। आखिर आदमी को अध्यात्मिक शांति के लिये कहंी न कहीं जाना है-चाहे वह धनी हो या गरीब, स्त्री हो या पुरुष, वृद्ध हो या युवा-और इसके लिये वह गुरु को ढूंढता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के संपूर्ण होने का प्रमाण यह भी है कि यहां के धर्म में गुरु को जितना महत्व दिया गया उतना अन्य कहीं देखने को नहीं मिलता। इस बात पर गौरव करना चाहिये पर हमारे देश के अनेक कथित गुरुओं ने अपने लाभ के लिये जिस तरह लोगों की भावनाओं का दोहन किया है उसे देखकर ऐसा करने में संकोच भी होता है। दूसरी बात यह भी है कि जितने भी गुरु हैं उनमें से शायद ही कोई तत्व ज्ञान को समझता हो-रट भले ही लिया हो पर समझ में उनके कुछ नहीं आता।
दरअसल लोग इस बात को नहीं समझते और इसलिये वह धर्म के नाम पर विश्व भर में फैले पाखंड का प्रतिकार करने की सोच भी नहीं पाते। पहली बात तो यह कि धर्म कोइ्र प्रत्यक्ष रूप से लाभ दिलाने वाला कोई माध्यम नहीं है, अगर आप ऐसी अपेक्षा करेंगेे तो यकीनन चालाकियों के जाल में फंसते जायेंगे या फिर इतना ज्ञान प्राप्त करेंगे कि दूसरों के लिये जाल बुन सकते हैं। धर्म का आधार अध्यात्म है। अध्यात्म यानि वह आत्मा जो हमारे अंदर विचरण कर रहा है। उसे जानना और समझना ही तत्व ज्ञान है। जब हम उसे जान और समझ लेते हैं तब हमें इस संसार का सार भी समझ आ जाता है और दुःख हमें विचलित नहीं कर सकते और सुख किसी संकट में नहीं डाल सकते।
भक्ति और योग साधना एकांत में लाभप्रद होते हैं। यही सही है कि इनके करने के तौर तरीके सीखने के गुरु के पास जाना पड़ता है और वहां अन्य शिष्य भी उपस्थित रहते हैं। इसलिये वहां तन्मयता से सीखना चाहिये और फिर उस शिक्षा का उपयोग एकांत साधना में करना चाहिये। एक बार गुरु का दर छोड़ें तो पलट कर नहीं देखें-हमारे अनेक महापुरुषों ने गुरु किये और फिर वहां से निकले तो फिर समाज की सेवा की न कि हर बरस गुरुओं के घर चक्कर लगाकर जिंदगाी का कथित आनंद लिया। जहां भीड़ है वहां धर्म की आशा करना बेकार है क्योंकि अगर वहां एक भी दुष्ट है तो वह प्रत्यक्ष रूप से अपने कर्म तथा अप्रत्यक्ष रूप से अपनी सांसों से विषाक्त वातावरण निर्मित करता है।
एक बात यह भी है कि भारत में उत्पन्न धर्म संगठन पर आधारित नहीं है। उनका लक्ष्य व्यक्ति निर्माण है। यही कारण है कि यहां धर्मगुरुओं पर कोई अंकुश नहीं रहता। ऐसे में कुछ धार्मिक लोगों के पापों के लिये पूरे समाज को जिम्मेदारी नहंी ठहरा सकते। भारत के धर्म प्रत्यक्ष रूप से राजनीति के लिये प्रेरित नहीं करते इसलिये यहां के किसी राजा ने उसके विस्तार का प्रयास भी नहीं किया। इसके विपरीत भारत के बाहर उत्पन्न धर्म मनुष्य को इकाई में स्वतंत्र विचरण से रोककर उस संगठन के आधार से जुड़ने के लिये बाध्य करते हैं और उनमें राजनीतिक प्रभाव के सहारे विस्तार पाने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है।
पश्चिम में जिन धार्मिक लोगों पर यौन शोषण के आरोप लगे हैं उनके पीछे कहीं न कहंी संगठन है और वह चाहें तो उन पर कार्यवाही कर सकते हैं। दूसरी बात यह कि सबसे बड़े धार्मिक गुरु पर भी अनेक भ्रष्ट धार्मिक कर्मकांडियों को छोड़ने या उनकी अपराध की उपेक्षा करने का आरोप है। ऐसे में वहां का समाज कहीं न कहीं अपने को जिम्मेदार मान रहा है और यही कारण है कि अनेक बुद्धिजीवी आरोपियों के विरुद्ध मुखर हैं क्योंकि उनको लगता है कि नैतिक दबाव के चलते अपराधी धार्मिक कर्मकांडियों को उनके स्थानों से हटवाकर दंडित कराया जा सकता है। भारत में यह स्थित इसलिये नहीं बनती क्योंकि यहां के धार्मिक कर्मकांडी अपनी सत्ता के सहारे स्थापित रहते हैं ऐसे में उन अपराध के लिये कानूनी कार्यवाही तो की जा सकती है पर किसी तरह का सामाजिक दबाव नहीं बन पाता। ऐसे में भक्तों को ऐस भ्रष्ट मठाधीाशों के प्रति उपेक्षासन करने की प्रेरणा ही दी जा सकती है-यह अलग बात है कि ऐसा प्रयास भी नहीं हो पाता।
कहने का अभिप्राय यह है कि पूरे विश्व में धर्म के आधार पर भ्रष्टाचार को रोकने का एक ही उपाय है कि लोगों को अध्यात्म और धर्म में अंतर समझाया जाना चाहिये। हम धार्मिक कर्मकांड स्वर्ग पाने के लिये करते हैं या इस जीवन में शांति पाने की इच्छा होती है-पहले इस बात पर आत्ममंथन करना जरूरी है। धार्मिक कर्मकांडों से स्वर्ग मिलता है यह तो प्रमाणित नहीं है पर एकांत साधना से अध्यात्मिक अभ्यास से मन को शांति मिलती है यह निश्चित है। यह अध्यात्मिक अभ्यास किसी भी प्रचलित धर्म से संबंधित नहीं है। कम से कम भारत में तो किसी धर्म का नाम बहुत समय से प्रचलित नहीं है। यहां धर्म से आशय सत्कर्म, सुविचार और सत्संग से न कि केवल हिन्दू धर्म से। सभी जानते हैं कि हिन्दू धर्म से यहां के संबोधन का प्रचलन अधिक पुराना नहीं है। इसे विदेशियों ने पहचान के रूप में दिया है। इसके विपरीत विदेशी धर्म तो पहनावे, नाम और सर्वशक्तिमान के अपने प्रतीकों के अलावा किसी अन्य को तो मानते ही नहीं है। हम यहां यह नहीं कह रहे कि हमारा धर्म श्रेष्ठ है पर आशय यह है कि चाहे किसी भी धर्म का दलाल हो-जी हां गलत कर्म करने वालों के लिये ही शब्द ठीक लगता है-उसके दुष्कर्मों से पूरे धर्म समाज के लोग स्वयं को आहत न अनुभव करें। पूरी दुनियां के हर धर्म में अधर्म तो रहना ही है। अगर सारा संसार देवताओं से भरा होता तो फिर धर्म की आवश्यकता ही क्या होती? ऐसे में अपना समय कथित धार्मिक पापियों की चर्चा पर नष्ट करने की बजाय अपने चरित्र और विचार निर्माण की तरफ देना चाहिए। धर्म की आड़ में होने वाले धंधों को रोकने के लिये लोगों को जागरुक होकर धर्म और अध्यात्म में अंतर समझना चाहिये।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anantraj.blogspot.com
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यज्ञ की तरह है योग साधना-अध्यात्मिक सन्देश


योगांगनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
हिन्दी में भावार्थ-
योग साधना के द्वारा अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होने पर जो विवेक का प्रकाश फैलता है उससे निश्चित रूप से ख्याति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पतंजलि योग शास्त्र में न केवल योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान की व्याख्या है बल्कि उसका महत्व भी दिया गया है।  अक्सर लोग योगासनों को सामान्य व्यायाम कहकर प्रचारित करते हैं जबकि इसे पतंजलि वैसा ही अनुष्ठान मानते हैं जैसे कि द्रव्य द्वारा किये जाने वाले यज्ञ और हवन।
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण भी योग साधना को एक तरह से यज्ञ मानने का संदेश देते हैं। अगर उनका आशय समझा जाये तो एक तरह से वह अपने भक्तों से इसी यज्ञ की अपेक्षा करते हुए कहते हों कि ‘मुझे योग यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा ही समर्पित करें।’
भगवान श्रीकृष्ण का आशय समझा जाये तो वह  यज्ञ से उत्पन्न अग्नि से ही संतुष्ट होते हैं।  यह यज्ञ सामग्री एक तरह से हमारा पसीना है जिससे देह के विकार निकलकर बाहर आकर नष्ट होते हैं और फिर प्राणयाम तथा ध्यान के संयोग से  उत्पन्न अमृत से  संपन्न हृदय के भाव  हम मंत्रोच्चार के द्वारा परमात्मा को प्रसाद की तरह चढ़ाते हैं।  सर्वशक्तिमान की इच्छा यही होती है कि उसका हर बंदा प्रसन्न और शुद्ध भाव से युक्त हो। योगसाधना उसका एक मार्ग है।  जो लोग योग साधना करते हैं उनको किसी अन्य प्रकार के अनुष्ठान की तो आवश्यकता ही नहीं रह जाती क्योंकि अपने मन, विचार, और बुद्धि की शुद्धि करने से स्वयं ही भक्ति का भाव पैदा होता है।  यह प्रक्रिया इतनी स्वाभाविक होती है कि मनुष्य को फिर किसी अन्य प्रकार से भक्ति करना सुहाता ही नहीं है क्योंकि पूरा दिन उसका मन और शरीर प्रफुल्लित भाव से विचरण करता है और रात्रि को विश्रामकाल प्रतिदिन मोक्ष प्राप्त करते हुए व्यतीत हो जाता है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान से हमारी शरीर और मन की अशुद्धि दूर होने के बाद हमारे कर्म व्यवहार में जो आकर्षण उत्पन्न होता है उससे ख्याति फैलती है। इतना ही नहीं चेहरे पर तेजस्वी भाव देखकर दूसरे लोग प्रभावित भी होते हैं।  

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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