Category Archives: आचरण

ऑक्टोपस की फुटबाल-हिन्दी हास्य व्यंग्य


यह पश्चिम वाले भी उतने ही अजूबा हैं जितने हमारे देश के लोग। उतने ही अंधविश्वास और अज्ञानी जितने हमारे यहां बसते हैं। पहले अक्सर यह सुनने और पढ़ने को मिलता था कि पश्चिम में भारतीय लोगों के प्रति अच्छी धारणा व्याप्त नहीं है। भारत को वहां के लोग सन्यासियों, सांपों और संकीर्ण मानसिकता वाला मानते हैं। बात अपने समझ में तब भी नहीं आयी और अब भी नहीं आती क्योंकि अमेरिका और ब्रिटेन के बारे की कई इमारतों में भूत होने की बातें भी पढ़ने को मिलती हैं। इसके अलावा उनके उतने ही अंधविश्वासी होने के प्रमाण मिलते रहे हैं जितने हमारे यहां के लोग हैं। कई बड़े नामी गिरामी लोगों को भूत दिखने के दावे किये जाते हैं। अपने यहां तोते की भविष्यवाणियों पर हंसने वाले यह पश्चिमी देश अब एक समुद्रीजीव ऑक्टोपस पकड़ लाये हैं जिसके बारे में दावा यह कि 2010 के विश्व कप फुटबाल के मैचों के बारे में सही भविष्यवाणी कर रहा है। आठ पांव वाले इस जीव को पकड़ना ही पर्यावरणवादियों को ललकारने जैसा है पर पश्चिम में सब चलता है।
जहां तक फुटबाल खेल का सवाल है वह भी हमने खूब देखा पर यह टीवी और अखबार वाले उसमें भी फिक्सिंग जैसी बातें होने की बात कहते हैं इस कारण उसमें अरुचि हो गयी। जब तक क्रिकेट में फिक्सिंग की बात नहीं थी तब तक उसे खूब देखा पर एक बार जब दिमाग में मैच फिक्स होने की बात आयी तो उसे छोड़ दिया। फुटबाल भी खूब देखा पर उसमें भी यही बात आयी तो यह शायद पहला विश्व कप है जिसके मैच नहीं देखे। अर्र्जेटीना, फृ्रांस, ब्राजील और ब्रिटेन की टीमें देखते देखते बाहर हो गयी। इनको हमेशा ललकारने वाली जर्मनी की टीम का हारना भी कम चौंकाने वाला नहीं था। स्पेन और हालैंड की टीमें फायनल खेलेंगी। फुटबाल कोई क्रिकेट की तरह अवसर का खेल नहीं है पर हैरानी की बात है कि उसे भी अब इसी दृष्टि से देखा जायेगा। क्रिकेट में अनफिट खिलाड़ी चल सकता है पर फुटबाल में यह संभव नहीं है पर लगता है कि सटोरियों और पूंजीपतियों के दबाव के चलते अब वह भी विज्ञापनों के बोझ तले दब गया है। शायद यही कारण है कि दुनियां की जानी मानी टीमें अपने साथ हारने के लिये अनफिट खिलाड़ी जायी थी ताकि समय पड़ने पर मनोमुताबिक परिणाम निकाले जा सकें-कहते हैं न कि दूध का जला छांछ को भी फूंक फूंक कर पीता है इसलिये क्रिकेट को देखकर यह बात अनुमान से ही लिखी जा रही है। जर्मनी जिस तरह प्रतियोगिता में आगे बढ़ रहा था उसे देखते हुए उसका एकदम बाहर हो जाना शक पैदा करेगा ही-जो टीम एक मैच में चार गोल करती है दूसरे मैच में एक गोल को तरस जाती है तो सोचना स्वभाविक क्योंकि आखिर यह क्रिकेट नहीं है।
आक्टोपस को पॉल बाबा भी कहा जा रहा है-पता नहीं इस शब्द का उपयोग विदेशी प्रचार माध्यम कर रहे हैं कि नहीं पर भारत में तो यही नाम दिया गया है। पॉल बाबा ने फुटबाल में फायनल मैच में जर्मनी के हारने की भविष्यवाणी की थी। जर्मनी हार गया तो अब यह कहना कठिन है कि उन्होंने अपने देश के ऑक्टोपस ज्योतिषी की भविष्यवाणी का सम्मान किया या फिर उन दांव लगाने वालों को निपटाया जो उसकी भविष्यवाणी पर भरोसा नहंी कर रहे थे। अब इस पॉल बाबा ने स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी की है। चूंकि हमने मैच नहीं देखे पर पिछली टीमों की स्थिति देखते हुए हमारा दावा है कि यह फाइनल मैच हालैंड वाले जीतेंगे। वजह! हालैंड के खिलाड़ी दुनियां में सबसे जीवट वाले माने जाते हैं। फायनल मैच अगर हमारे अनुकूल समय के अनुसार हुआ तो जरूर देखेंगे और नहीं हुआ तो अखबार में तो रोज इस बारे में पढ़ते ही हैं।
इधर पूर्व में भी एक तोता ज्योतिषी आ गया है जिसका दावा है कि यह मैच हालैंड जीतेगा। अब यह सट्टे वालों पर निर्भर है कि वह कितना इस खेल को प्रभावित कर पाते हैं। क्रिकेट में तो उनको बहुत मौका होता है पर फुटबाल में यह संभव नहीं होता कि बीच में जाकर प्रयास किये जायें या फिर अंपायर से दो चार गलत निर्णय करा लें।
वैसे सट्टे वाले भी आजकल भविष्यवाणी करते दिखते हैं तो भविष्यवाणी करने वाले भी अपना प्रभाव जमाने के लिये यह एक तरह से सट्टा खेलते हैं। सट्टे का का संबंध भविष्य के अनुमानों से है तो ज्योतिष का भी यही आधार हैै। अनेक लोग ज्योतिष नहीं जानते पर भविष्यवाणी करते हैं। सही निकली तो पौबाहर नहीं तो भाग्य का सहारा लेकर कह दिया कि ‘अमुक कारण से यह विपरीत परिणाम आया।’
अलबत्ता जैसे प्रचार माध्यमों की सक्रियता से विश्व निकट आ रहा है उससे अब पता लग रहा है कि सारे विश्व में सभी लोगों की मानसिकता एक जैसी है। ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता की याद आ ही जाती है। वैसे एक अध्यात्मिक और सामयिक लेखक होने के नाते दोनों विषयों को मिलाना नहीं चाहिए पर आदमी की प्रवृत्तियों का क्या करें? जो हर खेल में प्रकट होती हैं और उनकी पहचान श्रीगीता में वर्णित प्रकृत्तियों से मेल खाती है। आदमी में दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियां होती हैं। दैवीय प्रकृत्ति जहां सत्कर्म में लगाती है वहीं आसुरी प्रकृत्ति प्रमाद, मोह, लोभ तथा काम की तरफ ही प्रेरित करती है। ऐसे में हमें अपना अध्यात्मिक ज्ञान स्वर्ण संदेशों से सराबोर दिखाई देता है और उनका उल्लेख करने को लोभ व्यंग्य लिखते हुए भी छोड़ना मुश्किल हो जाता है।
मान लीजिये ऑक्टोपस ज्योतिषी यान पॉल बाबा की भविष्य सही साबित भी हुई और स्पेन जीत गया तो भी हम उसे दैवीय नहीं आसुरी चमत्कार मानेंगे। साफ कहें तो कहीं न कहीं फिक्सिंग    का संदेह होगा। कभी कभी तो लगता है कि अध्यात्मिक लेखक होने के नाते हास्य व्यंग्य जैसी रचनायें न लिखें पर ज्योतिष तो वैसे भी अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा विषय माना जाता है और जब उसको लेकर हास्यास्पद स्थिति बनायी जाये तो फिर उस पर लिखा भी वैसा ही जा सकता है। अब खेलों में भविष्यवाणी हो रही है तो कहना ही पड़ता है कि भविष्यवाणी एक खेल हो गया है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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डॉलर से इश्क-हिन्दी व्यंग्य कविता (love and dollar-hindi comic poem)


सच्चा प्यार जो दिल से मिले
अब कहां मिलता है,
अब तो वह डालरों में बिकता है।
आशिक हो मालामाल
माशुका हो खूबसूरत तो
दिल से दिल जरूर मिलता है।
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आज के शायर गा रहे हैं
इश्क पर लिखे पुराने शायरों के कलाम,
लिखने के जिनके बाद
गुज़र गयी सदियां
पता नहीं कितनी बीती सुबह और शाम।
बताते हैं वह कि
इश्क नहीं देखता देस और परदेस
बना देता है आदमी को दीवाना,
देना नहीं उसे कोई ताना,
तरस आता है उनके बयानों पर,
ढूंढते हैं अमन जाकर मयखानों पर,
जिस इश्क की गालिब सुना गये
वह दिल से नहीं होता,
डालरों से करे आशिक जो
माशुका को सराबोर
उसी से प्यार होता,
क्यों पाक रिश्ते ढूंढ रह हो
आजकल के इश्क में
होता है जो रोज यहां नीलाम।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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पति पत्नी के बीच में दखल और कानून-हिन्दी लेख


श्रीमद्भागवत गीता ‘भेदात्मक बुद्धि’ रखने वालों को आसुरी प्रवृत्ति का मानती है। इसलिये किसी भी ज्ञानी ध्यानी को मनुष्यों के कर्म पर बोलते या लिखते समय उसकी जाति, भाषा या कथित धर्म-इनको भ्रम भी कहा जा सकता है-का उल्लेख नहीं करते। मुश्किल तब शुरु होती है जब कोई आदमी अपनी जाति, भाषा, धर्म या क्षेत्र के नाम से ही परिचय देकर इस बात की जिद्द करता है कि उसे अपने समूह से जोड़कर देखा जाये। ऐसी बाध्यता अगर सामने है तो फिर अपनी बात कहने में रुकना भी नहीं चाहिये।
यह लेखक पहली बार मुसलमान समाज पर इसलिये लिख रहा है क्योंकि इसके ब्लाग पर अनेक बार इसी समाज से जुड़े लोग टिप्पणी करते हैं। दूसरी बात यह कि उनमें भारतीय अध्यात्म के प्रति झुकाव भी देखा गया है। टिप्पणियाों की संख्या पाठकों की संख्या से बहुत कम होती है। ऐसे में यह मानना पड़ता है कि इस लेखक के पाठों पर मुस्लिम समाज के पाठकों की संख्या देश की आबादी के अनुरूप ही होगी। इसी विश्वास के कारण यह लिखा जा रहा है। इसमें आलोचना हो सकती है पर यह परंपरागत रूप से वैसी नहीं होगी जैसी अक्सर चिढ़ाने वाली होती है। कोई नाखुश बंदा इस लेख का गलत अर्थ न लगाये इसलिये यह सफाई लिखनी पड़ रही है।
हम पति पत्नी और मियां बीवी के-यह लेखक लकीर का फकीर है इसलिये जैसा कि धर्म के ठेकेदार भाषा से उसको जोड़ते हैं इसलिये यह बताना जरूरी है कि हिन्दू में पति पत्नी और मुसलमानों में मियां बीवी-रिश्तों में अक्सर धर्म के कथित तत्वों को देखना चाहते हैं। यह इच्छा दो ही कारण से पैदा होती है। एक तो अपने आंख, कान तथा दिमाग को दूसरे के घर में आग देखकर प्रसन्नता के कारण होती है। दूसरा स्वयं को ज्ञानी साबित करने के लिये पंच होकर जाने का अवसर मिलता है। हिन्दू धर्म कभी एक संगठन के रूप में नहीं रहा इसलिये उसमें किसी भी संस्था द्वारा नियम बनाने का प्रावधान नहीं है और न ही पति पत्नी के संबंधों में राज्य, समाज या किसी समूह द्वारा हस्तक्षेप का प्रावधान है। पति पत्नी के संबंध टूटें या जुड़ें इसके लिये वह जिम्मेदार होते हैं। सदियों तक तो यह कायदा रहा है कि घर से विवाह कर जाती हुई बेटी को बाप कहता है कि ‘बेटी, जिस घर तेरी डोली जा रही है, वहीं से तेरी अर्थी उठेगी।’
इसके बावजूद हिन्दुओं के लिये विवाह विच्छेद का कानून बना पर इसका किसी ने विरोध नहीं किया क्योंकि कोई व्यक्ति या संगठन ऐसा करने का न तो आधार रखता है और न उसके पास जनसमर्थन होता है। इसलिये ही हिन्दुओं के विवाह और तलाक के विषय आज के आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों के लिये कोई विषय नहीं बनते। मगर हाल ही में पाकिस्तान के एक दूल्हे को लेकर भारत की दो लड़कियों के बीच जो जंग हुई उसमें तलाक और शादी दोनों ही इसलिये ही प्रचार का विषय बने क्योंकि तीनों ही मुसलमान थे। इस पर नियम से काम करने वाला उनका संगठन है जिसमें शायद काजी और मौलवी होते हैं। मुसलमानों में तलाक जितनी आसानी से मुंहजबानी होता है वैसा हिन्दुओं में नहीं है। यह अच्छी बात है पर जिस तरह तलाक का नाटक उक्त प्रकरण में देखने को मिला उससे जरूर मुस्लिम ज्ञानी भी नाराज हुए होंगे। मगर उनको यह समझ लेना चाहिये कि उनके नियमों ने ही आधुनिक बाजार आधारित प्रचार माध्यमों को यह अवसर प्रदान किया। इस लेखक का मानना है कि जहां विवाह न निभता हो वहां तलाक आसानी से होने देना चाहिये पर जिस तरह पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी अपने मियां से तलाक लेकर दूसरी शादी करने के लिये दबाव बना रही थी और दूसरी होनी वाली बीवी पहली वाली का मजाक बना रही थी वह चर्चा का विषय बना। सच तो यह है कि जिस तरह इसमें क्रिकेट और मध्य एशिया देशों के नाम आये उससे लगा कि कहीं न कहीं इसमें प्रायोजन है-पाकिस्तानी क्रिकेटर पर दूसरी लड़की को प्रभावित करने के लिये 16 करोड़ का खर्च तथा तलाक के लिये पहली बीवी को पंद्रह करोड़ देने जैसी बातें यह समाचार माध्यम करेंगे तो यह शक होना स्वाभाविक है।
अब आते हैं असली बात पर! जब यह प्रकरण चल रहा था तब पाकिस्तानी क्रिकेटर की पहली बीवी ने तलाक न देने के कारण अपने ही देश की दूसरी लड़की से निकाह करने अपने ही शहर में आये उस शौहर पर ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दायर कर दिया। मामला पुलिसा तक ही रहा। इस मामले के अदालत में जाने की संभावना नगण्य ही थी क्योंकि तब यह पेचीदा हो जाता। चूंकि तलाक होना था और निकाह भी इसलिये पर्दे के पीछे खेल चलता रहा।
इधर बहस भी हो रही थी। जिसमें कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी, पत्रकार, तथा मुल्ला मौलवी भी शामिल थे। वह अपनी किताबों के अनुसार बहस कर रहे थे पर वह नहीं जानते थे कि वह ऐसा कर कानूनी संकट को न्यौता भी दे रहे थे। चलो यह प्रकरण तो चूंकि बाज़ार और प्रचार का संयुक्त प्रायोजन था-यह भी संभव है कि इन दोनों की सयुक्त समर्थक कोई लॉबी इससे जुड़ी हुई हो-इसलिये यह सब चल गया। भविष्य में वह याद रखें कि भारत में अब दहेज विरोधी कानून तथा घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं जो पति पत्नी तथा मियां बीवी पर समान रूप से लागू होते हैं। दहेज एक्ट तो केवल परिवार तथा रिश्तेदारों तक ही सीमित रहता है पर यह घरेलू हिंसा कानून तो किसी को भी लपेटे में ले सकता है।
उक्त बहस में पहली बीवी की शादी की वैधानिकता पर सवाल उठाने वाले बहुत जोखिम ले रहे थे। एक पुराने अभिनेता की शायद मुराद थी कि क्रिकेटर की शादी दूसरी वाली लड़की से हो जाये इसलिये उसने पहली वाली पर सवाल उठाया कि ‘निकाह नामे में गवाहों की वल्दियत है पर दूल्हा दुल्हन का नाम नहीं है। इसलिये यह शादी नहीं मानी जा सकती।’
यह निकाहनामा दूल्हे ने पाकिस्तान में बनवाया था। मुस्लिम कानून के हिसाब से यह शादी अवैध भी होती तो भी वह घरेलू हिंसा के आरोप से बच नहीं सकता था उल्टे यही उसके खिलाफ सबूत भी बन सकता था कि उसने चालाकी की। बात यहीं नहीं रुकती। पीड़ित लड़की अगर उस समाचार की सीडी वगैरह लेकर अदालत में सीधे ‘घरेलू हिंसा’ का मामला दूल्हे पर दायर करती और साथ में अभिनेता का भी नाम यह कहते हुए देती कि यह भी हैं हमारे पाकिस्तानी क्रिकेटर मियां के भारतीय अभिनेता समर्थक।’ तब उनके लिये मुश्किल हो सकती थी। बाद में फैसला चाहे जो भी होता पर फिलहाल उनको अदालत में तो जाना ही पड़ सकता था।
कुछ मुल्ला मौलवी भी पहली बीवी के निकाह पर शक कर रहे थे पर यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता था। कारण दहेज निरोध तथा घरेलू हिंसा कानून ऐसे हैं जिनमें किसी धर्म की पुस्तक का अध्ययन शामिल नहीं है। यही सही है कि इन कानूनों का दुरुपयोग इसलिये न्यायाधीश तथा पुलिस वाले बहुत सतर्कता पूर्वक विवेचना कर निर्णय तथा कार्यवाही करते हैं पर अगर उनको यकीन हो जाये कि महिला वाकई पीड़ित है तो उसके बाद जो होता है वह अभियुक्त के लिये तकलीफदेह हो सकता है।
इस प्रसंग में एक दिलचस्प बात पता चली कि पाकिस्तान में भी एक कानून है कि पहली पत्नी के रहते दूसरा विवाह करने पर वहां एक साल की सजा है। अनेक गैर मुस्लिम यहां ऐसा कानून न होने पर आपत्तियां कर रहे हैं। उनको शायद अंदाजा नहीं है कि घरेलू हिंसा तथा दहेज निरोध कानून ऐसे हैं जिनके चलते ऐसा कानून न होना कोई मायने नहीं रखता। अभी तक मुस्लिम समाज को लेकर अनेक ऐसे प्रायोजित समाचार और बहसें सुनने में आती हैं जिनका निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता। मुल्ला मौलवी भी वहां आकर अपने धार्मिक कानून की वकालत करते हैं। अब उनके पास ऐसे अवसर आये तो वह पहले इस बात की तहकीकात कर लें कि जिस बहस में वह जा रहे हैं वह तथा जिस समाचार के लिये हो रही है वह प्रायोजित है। यह भी पक्का कर लें कि वह न्यायालय में नहीं जायेगा। कहने का आशय यह है कि नकली मुठभेड़ हो। अगर कहीं असली वाक्या हुआ और वह इसी तरह ही बयानबाजी करते रहे, उधर कोई महिला अत्यंत दुःखी है और इस तरह का अपमान होने पर वह क्रुद्ध हो उठी तो यह दहेज एक्ट और घरेलू हिंसा ऐसे कानून हैं कि उनको भी दायरे में वह पति उसके परिवार तथा सहयोगियों को भी ले सकती है। वैसे मुस्लिम महिलाओं की स्थिति देखते हुए ऐसी संभावना कम ही लगती है क्योंकि अभी भी मुस्लिम महिलायें सामाजिक शिकंजे में फंसी है जो मुक्त है वह ऐसे प्रायोजित प्रचारकों के दायरे बाहर रहती हैं।
यह सही है कि मुसलमानों के लिये अलग से व्यक्तिगत कानून हैं पर दहेज एक्ट तथा घरेलू हिंसा कानून आने से महिलाओं पर दबाव बनाये रखने की मुस्लिम शिखर पुरुषों की शक्ति अब वैसी नहीं रही। वैसे इन दोनों कानूनों में अधिकतर मामले हिन्दू समाज के ही दर्ज होने का अनुमान लगता है-सच का पता किसी को नहीं है-पर उस पाकिस्तानी दूल्हे की एक लड़की से बेवफाई तथा दूसरी से प्यार के नाटक में ‘घरेलू हिंसा’ कानून का उल्लेख होने के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सो न केवल बहसों से बचें बल्कि मियां बीवी के निजी मसलों पर लिखित रूप से भी न कहें क्योंकि उसका इस्तेमाल सबूत के रूप में किसी महिला को पीड़ित करने में सहयोग करने के आरोप को सिद्ध करने में हो सकता है। यह लेखक न वकील है न इसे कोई धार्मिक प्रचारक, केवल इधर उधर देखे गये मामलों पर यह लिखा गया है। इसका पाठ का एक उद्देश्य अपने मुस्लिम समुदाय के पाठकों को यह समझाना भी है कि वह देशकाल की स्थिति को देखकर ही आगे चलें। जहां तक हो सके अपने घर की महिलाओं के प्रति सद्भाव रखें तथा दूसरे के पारिवारिक झगड़ों में पंचायत करने से बचें क्योंकि यह उनके लिये परेशानी का कारण बन सकता है। अब पुराना समय नहीं रहा और न चाहते हुए भी उनको अपनी सोच बदलनी होगी।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
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मनु स्मृति:आग और पानी की पवित्रता बनाए रखें


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  1. आग को मुहँ से नहीं फूंकना चाहिए। आग में मल-मूत्र नहीं फैंकना चाहिए तथा आग के सामने पैर रखकर तापना नहीं चाहिए।
  2. आग को किसी तरह के सामान (जैसे-मेज, कुर्सी, पलंग आदि) के नीचे नहीं रखना चाहिए, न आग को लांघना चाहिए और न ही कोइ ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे जीव हिंसा का भय हो।
  3. जो आग सूरज, चांद ,पानी मनुष्य, गाय और हवा के सामने मल-मूत्र का त्याग करता है उसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है।
  4. संध्याकाळ में भोजन भक्षण, यात्रा और विश्राम नहीं करना चाहिए और अपने गले में पहने हुई माला को नहीं उतरना चाहिऐ।
  5. जल में मल -मूत्र, कूडा,रक्त तथा विष आदि नहीं बहाना चाहिए, इससे पानी प्रदूषित हो जाता है, पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
  6. बद्धिमान व्यक्ति पानी पीती गाय को न तो स्वयं हांकते हैं न किसी को हांकने के लिए कहते हैं।
  7. चिकनाई निकाले गए पदार्थों का भोजन नहीं करना चाहिऐ, कई बार पेट भरकर भोजन नहीं करना चाहिए, बहुत सवेरे अथवा शाम हो जाने पर भोजन नहीं करना चाहिए। प्रात:काल भर पेट भोजन से तृप्त होने के बाद पुन: शाम को भोजन नहीं करना चाहिऐ।

हास्य कविता -भूल गया अपना ज्ञान


एक बुद्धिमान गया
अज्ञानियों के सम्मेलन में
पाया बहुत सम्मान
सब मिलकर बोले दो ‘हम को भी ज्ञान’
वह भी शुरू हो गया
देने लगा अपना भाषण
अपने विचारों का संपूर्णता से किया बखान
उसका भाषण ख़त्म हुआ
सबने बाजीं तालियाँ
ऐक अज्ञानी बोला
‘आपने ख़ूब अपनी बात कही
पर हमारी समझ से परे रही
अपने समझने की विधि का
नहीं दिया ज्ञान

कुछ दिनों बात वही बुद्धिमान गया
बुद्धिजीवियों के सम्मेंलन में
जैसे ही कार्यक्रम शूरू होने की घोषणा
सब मंच की तरफ भागे
बोलने के लिए सब दौडे
जैसे बेलगाम घोड़े
मच गयी वहाँ भगदड़
माइक और कुर्सियां को किया तहस-नहस
मारे एक दूसरे को लात और घूसे
फाड़ दिए कपडे
बिना शुरू हुए कार्यक्रम
हो गया सत्रावसान
नही बघारा जा सका एक भी
शब्द का ज्ञान
स्वनाम बुद्धिमान फटेहाल
वहाँ से बाहर निकला
इससे तो वह अज्ञानी भले थे
भले ही अज्ञान तले
समझने के विधि नहीं बताई
इसलिये सिर के ऊपर से
निकल गयी मेरी बात
पर इन बुद्धिमानों के लफडे में तो
भूल गया मैं अपना ज्ञान