एतिहासिक घटनायें बदलती हैं पर तत्वज्ञान नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख


            विषयों में निर्लिप्त भाव अपनाने से आशय क्या है? हमने आज तक अनेक कथित विद्वानों को सुना पर लगता नहीं है कि वह इसे समझे जो दूसरे को समझा पायें। हमने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन कर यह समझा है कि किसी व्यक्ति, विषय वस्तु के संपर्क में आना बुरा नहीं है वरन् निरंतर उसका स्मरण करना ही लिप्तता है। श्रीमद्भागवत गीता में गृहस्थ धर्म का पालन करने हुए भी योग प्राप्ति संभव बताई गयी है।  ऐसे में यह संभव नहीं है कि विषयों से संपर्क न रखना ही निर्लिप्त भाव माना जाये। हमारे अनुसार तो लिप्तता का आश लिपटने से है। अपने दैहिक आवश्कता की पूर्ति के बाद संबंधित विषय से विमुख होना ही निर्लिप्पता है।  मुख्य बात यह है कि हम अपनी इंद्रियों का सांसरिक विषयों से संपर्क तो  रोक नहीं सकते  पर हम अपने मस्तिष्क में निरंतर भौतिक संसार के चिंत्तन से परे रहकर निर्लिप्त रह सकते हैं।

            हमने पशु पक्षियों का जीवन देखा होगा।  पेट भरने के बाद बचे भोजन का पशु पक्षी  त्याग कर देते हैं, पर मनुष्य उसे बचाकर रख देता है-यह लिप्तता का भाव है। सिंह एक बार किसी मृग कर शिकार कर लेता है तो उसके पास चाहे कितने भी अन्य मृग विचरण करें वह उनसे मुंह फेर लेता है।  गाय को एक बार रोटी दे दी जाये तो वह उस दरवाजे का त्याग कर चली जाती है।  चिड़िया जमीन पर रखे दानों का सेवन करती है पर पेट भर जाने पर वह उसे छोड़ जाती है।  कोई भी पशु पक्षी संग्रह नहीं करता यही उसका निर्लिप्त भाव है। अनेक पशु पक्षी अपने बच्चे के युवा होने पर उसका त्याग कर देते हैं। कभी कभी तो यह लगता है कि वह बच्चे उनकी स्मृति से ही बाहर हो गये हैं।  मनुष्य ही नहीं वरन् सृष्टि के समस्त जीवों में अपनी संतान के प्रति लगाव देखा जाता है मगर अन्य जीव अधिक समय तक न संतान साथ रखते हैं न वह रहती है।  पशु पक्षियों का यही उन्मुक्त भाव निर्लिप्त भाव है।

            सांसरिक विषयों से देह के भरण पोषण से अधिक संपर्क रखना तो ठीक पर उनका निंरतर चिंत्तन करने से उपभोग के प्रति अनेक प्रकार  की अनेक नयी  कामनायें मन में पैदा होती हैं। इनमें से कई पूर्ण होती है तो कई में नाकामी हाथ आती है।  नाकामी से क्रोध और क्रोध से मूढ़ भाव पैदा होता है। मूढ़ भाव से ज्ञान शक्ति का हृास होता है और उसके बाद मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है।

            हम अक्सर यह कहते हैं कि ज्ञानी कभी पतन को प्राप्त नहीं होता पर सच यह है कि भौतिकता या माया का जाल इतना विकट है कि बड़े से बड़ा ज्ञानी भी उसमें फंस सकता है। ज्ञान किसके पास कितना है यह प्रश्न महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह देखना चाहिये कि उसमें धारणा शक्ति कितनी है।  जब मनुष्य सांसरिक विषयों में अत्यंत रुचि के साथ जुड़ता है तब उसके पास तत्व ज्ञान कितना भी हो धारणा शक्ति के हृास के साथ वह पतन की तरफ जाता ही है।

            अभी हाल ही में एक कथित संत ऐसे ही मायावी जाल में फंस गया।  हमने उसके प्रवचन सुने। सच बात तो यह कि उसमें ज्ञान की कोई कमी नहीं थी।  उसने अनेक प्रकार के उपाय कर बड़ा आश्रम बनाया। उस आश्रम में उसने अपने भक्तों के रहने, खाने और सत्संग के लिये बढ़िया सुविधा बनायी। ज्ञान में कमी नहीं थी पर अपनी या दूसरे की देह का चिंत्तन अंततः एक सांसरिक विषय है।  आश्रम के लिये तमाम चिंत्तायें उन संत के मन में रही होंगी। इतना ही नहीं जब भक्तों के सुविधा के लिये चिंता करेंगे तो अपने लिये भी क्या कम रखते होंगे? न्यायालय के एक प्रकरण में निंरतर उपस्थित नहीं रहे तो उनके विरुद्ध अवमानना का नया विषय उपस्थित हो गया। इधर सांसरिक विषयों में भारी उपलब्धि का अहंकार उनके मन में आने से न्यायालय की शक्ति का ज्ञान लुप्त हो गया होगा।  परिणाम यह हुआ कि न्यायालयीन आदेश पर पुलिस ने आश्रम घेरा।  उनके कथित शिष्यों ने प्रहरियों पर हमला कर दिया।  आपाधापी में छह अन्य लोग भी मर गये। अब उन कथित संत को  पुराने प्रकरण से अधिक तो नये प्रकरण भारी पड़ने वाले हैं। हमारे प्रचार माध्यम संतों के ज्ञान और कार्यों पर प्रश्न उठा रहे हैं।  यह कैसे हुआ? संत ने ही इसका जवाब भी दिया कि‘मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी थी?’’

            वास्तव में यह एक ऐसे ज्ञानी की स्वीक्रोक्ति है जिससे लोभ और लालच ने अपराध के मार्ग पर पहुुंचा दिया।  हमारा तो पहले से ही निष्कर्ष था कि उनके पास ज्ञान हमेशा ही रहा है पर लगता है कि सांसरिक विषयों ने उनकी धारण शक्ति को क्षीण कर दिया। इसी घटना के परिप्रेक्ष्य में हमारा यह भी निष्कर्ष है कि प्रथ्वी के भूगोल और जीव की प्रकृत्ति में कोई बदलाव नहीं होता। इतिहास बदल जाता है हम उससे भ्रमित हो जाते है।  रामायण में श्रीसीता ने श्रीराम जी को एक कथा सुनाई थी जो इससे मिलती जुलती है। सतयुग में  एक महान तपस्वी थे।  उनके तप से इंद्र व्यथित हो उठे। उनको लगा कि यह तो उनका सिंहासन ही हर लेगा।  एक दिन वह एक योगी का रूप धर कर उस तपस्वी के पास आये और उन्हें अपना फरसा हाथ में देकर बोले-हम तपस्या करने जा रहे हैं जब तक लौटकर आयें आप इसकी रक्षा करें।’’

            परोपकार में तत्पर रहने वाला वह तपस्वी प्रसन्न हो गया और इंद्र चले गये। अब तपस्वी का मन तो उस फरसे में ही रहने लगा।  स्थिति यह कि ध्यान में भी वह फरसा बसने लगा।  एक दिन जिज्ञासावश उन्होंने अपने हाथ में उठाकर देखा तो उन्हें लगा कि अपनी रक्षा के लिये यह अत्यंत उपयुक्त है। बस फिर क्या तो इस तरह के चिंत्तन में ऐसा फंसे कि  धीमे धीमे हिंसा में ही लीन हो गये और अंततः उनको उसका दंड भोगना ही पड़ा।

            हमने इन कथित संत और रामायणकालीन उस तपस्वी के जीवन में समानता देखी और यह माना कि अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से प्रथ्वी का भूगोल और जीव की स्वाभाविक प्रकृत्तियां नहीं बदलती यह अलग बात है कि एतिहासिक घटनायें पात्र का नाम बदलकर प्रस्तुत होती हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: