विश्व योग दिवस मनाने का सुझाव सराहनीय-हिन्दी चिंत्तन लेख


            प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने संबोधन में सारे विश्व में योग दिवस मनाने का प्रस्ताव दिया है। इस तरह की बात विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक मंच पर अधिकारिक रूप से पहली बार कही गयी है इसलिये इसका महत्व निश्चित रूप से बहुत है।  इसकी भारत में स्वाभाविक रूप से प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई।  हम जैसे अध्यात्मिक और ज्ञान साधकों के लिये इस तरह के घटनाक्रम न केवल रुचिकर होते हैं बल्कि शोध का अवसर भी प्रदान करते हैं।

            देश में अनेक प्रतिक्रियायें आयीं। उनमें एक योग शिक्षक ने एक  महत्वपूर्ण बात कही कि योग के विषय पर जब कोई साधना करने वाला बोलता है तब उसका महत्व बहुत होता है।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं योग साधना करते हैं इसलिये उनके पास इस विषय पर बोलने का अधिकार है।  उन्होंने एक तरह से अपना अनुभव बांटा है।  इसकी हमारे जैसे लोगों पर सुखद प्रतिक्रिया होती है पर जब हम अन्य लोगों को योग विषय बोलते और लिखते हुए देखते हैं तो यह यकीन करना कठिन होता है कि उनके पास योग का कोई ज्ञान भी है। मोदी जी को योग साहित्य का ज्ञान भी है यह देखकर प्रसन्नता होती है पर उनके संबोधन पर प्रसन्न होने वालों में ऐसे लोग भी हैं जो केवल भारतीय विचाराधारा के प्रचार पर ही उछलते हैं पर उसके मूल सिद्धांतों को नहीं समझते।

            जिस योग साधना की बात होती है वह अनेक लोगों के लिये इसलिये कठिन नहीं है क्योंकि   उसमें समय और श्रम का व्यय होता है जिससे आज के भौतिक प्रभाव में फंसे समाज के अनेक लोग बचना चाहते हैं।  योग साधना मनुष्य को शक्तिशाली, आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी सहज वाणी का प्रवाहक बनाती है। इसके प्रभाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसे योग साधना में निरंतर सक्रिय रहने वाले  लोग ही अनुभव कर सकते हैं।

            योग के आठ भाग हैं।  आमतौर से लोग प्राणायाम और आसनों को ही योग साधना समझते हैं।  एक तरह से समाज इसे  व्यायाम समझता है जबकि मोदी ने अपने संबोधन में यह स्पष्ट रूप से बताया कि यह एक व्यापक सिद्धि प्रदान करने वाली साधना है। हम यहां बता दें कि इस सिद्धि का यह आशय कतई नहीं समझना चाहिये कि इससे कोई आकाश से तारे जमीन पर उतार कर ला सकता है। योग साधना मनुष्य के व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व में ऐसे तत्व स्थापित कर देती है कि वह इस जीवन सागर में बिना थपेड़ों के तैरता है-हमारा अभिप्राय यही है।

            मुख्य बात संकल्प की है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर संसार के सारे भूत स्थित हैं पर वह किसी में स्थित नहीं है।  उससे यह समझना चाहिये कि जिस तरह का हमारा संकल्प होगा उसी तरह का संसार हमारे सामने होगा पर हम उसमें नहीं समा सकते।  हमारी समस्या यह है कि  परमात्मा के इस संसार का भाग अपने ही अपने ही संकल्प के कारण सामने आता है हम उसमें समाना चाहते हैं या सोचते हैं कि वह हमारे अंदर समा जाये।  मकान मिला तो उसमें हम समाना चाहते हैं या चाहते हैं कि वह हमारे अंदर समाज जाये। इसी तरह का दृष्टिकोण संतान, धन, वाहन तथा अन्य भौतिक उपलब्धियों के बारे में रहता है। ऐसा हो नहीं सकता पर हमारा पूरा जीवन इसी प्रयास में नष्ट हो जाता है। देखा जाये तो हर इंसान योग करता ही है।  अज्ञानी लोग  भौतिकता से जुड़ने का प्रयास करते हैं। इसे हम असहज योग भी कह सकते हैं क्योंकि अंतत इससे तनाव ही पैदा होता है। उनका मन उन्हें अपना बंधुआ बना लेता है। सहज योगी स्वयं से जुड़कर संसार के विषयों से अपनी आवश्यकतानुसार संबंध रखते हैं।  वह कभी मन से कभी किसी भी विषय से संयोग करने के लिये बाध्य नहीं किये जाते।

            विश्व में योग दिवस मनाये जाने के प्रस्ताव पर भी अनेक लोग विश्व का अध्यात्मिक गुरु बनने का सपना देखकर प्रसन्न हो रहे हैं। हमारा मानना है कि भारत की यह पहले से बनी बनायी छवि है जिसके लिये प्रथक प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। पतंजलि योग साहित्य के अलावा हमारी श्रीमद्भावगत गीता भी एक ऐसा स्वर्णिम ज्ञान ग्रंथ है जिससे पूरा विश्व परिचित है।

            हम तो यह चाहते हैं कि विश्व समुदाय से पहले हमारे ही देश का अपना रुग्ण मानसिकता से बाहर आये। योग की बातें बहुत होती हैं पर साधना करने वालों की संख्या अभी भी नगण्य है। विश्व में क्रांति आने की हमारी कल्पना तभी सफल होगी जब हम पहले अपने देश में योग साधना को दिन चर्या का एक अभिन्न भाग बनायेंगे।  हम जैसे अप्रचारित योग साधकों के पास ऐसे साधन नहीं होते कि अपने इस प्राचीन विज्ञान पर जनसामान्य में अपनी बात कह सकें, इसलिये प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी जैसे प्रतिष्ठित लोग जब योग विषय का प्रचार करते हैं तो मन प्रसन्न कर लेते हैं। इसके लिये हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आभारी भी है कि उन्होंने योग प्रचार के लिये वह भूमिका निभाई जिसकी हम प्रतिष्ठित लोगों से अपेक्षा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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