रैगिंग की प्रथा हिन्दू धर्म के सिद्धांतों प्रतिकूल-चाणक्य नीति और मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख


      भारत में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति अपनाये जाने के बाद समाज के कथित सभ्रांत ने समूह  रहन सहन और खान पान में ऐसी परंपराओं को जन्म दिया है जो उसे सामान्य लोगों से अलग करती है। एक तरह से कहा जाये तो धनिक वर्ग ने सामान्य समाज में सभ्रांत दिखने के लिये पाश्चात्य परंपराओं को इसलिये नहीं अपनाया कि वह वास्तव में सभ्य है वरन् स्वयं को श्रेष्ठ दिखने क्रे लिये उन्होंने वह अतार्किक व्यवहार अपनाया है जिसके औचित्य वर सामान्य लोग कुछ कह नहीं पाते।  इन्हीं परंपराओं में एक प्रथा है रैगिंग परंपरा जिसका निर्वाह विद्यालयों, महाविद्यालयों और छात्रावासों में वरिष्ठ छात्र कनिष्ठों को परेशान करने के लिये करते हैं।  यह परंपरा पहले भी थी पर उसका रूप इतना निकृष्ट नहीं था जितना अब दिखाई देता है।

      रैगिंग के दौरान वरिष्ठ छात्र कनिष्ठ छात्रों के साथ मजाक की परंपरा निभाने के लिये अत्यंत घृणित व्यवहार करते हैं-यह शिकायतें अब आम हो गयी है। इस तरह की घटनायें तब प्रकाश में आती हैं जब कोई छात्र अपनी जाने खो बैठता है।  दरअसल हमारी शिक्षा प्रणाली में आकर्षण लाने के लिये जिस व्यवसायिक भाव को अपनाया गया है उसमें अधिक से अधिक छात्र एकत्रित करने का प्रयास उस व्यापारी की तरह किया जाता है जो अपने सामान के लिये अधिक से अधिक ग्राहक चाहता है।  जब शिक्षा के क्षेत्र में राज्य का प्रभाव था तब तक कोई समस्या नहीं थी पर अब निजीकरण ने इस क्षेत्र को बेलगाम बना दिया है।  दूसरी बात यह कि निजी क्षेत्र में शिक्षा का स्वामित्व ऐसे लोगों के पास चला गया है जो धन, पद और बाहुबल के दम पर अपना काम चलाते हैं उनके यहां शिक्षक एक लिपिक से अधिक माननीय नहीं होता।  निजी क्षेत्र के शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा का वादा नहीं करते वरन् वह खेल, मनोरंजन और नौकरी दिलाने तक की उन सुविधाओं का वादा करते हैं जिन्हें इतर प्रयास ही माना जा सकता है। उनके प्रचार विज्ञापनों में छात्रों को पाठ्यक्रम से अधिक सुख सुविधाओं की चर्चा होती है।

चाणक्य ने कहा है कि

————-

सुखार्थी वा त्यजेद्विधां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्।

सुखार्थिन कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतोः सुखम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-सुख की कामना वाले को विद्या औरं विद्या की कामना वाले को  सुख का त्याग कर देना चाहिये। सुख चाहने वाले को विद्या और विद्या चाहने वाले को सुख नहीं मिल सकता।

      आजकल मोबाइल, कंप्यूटर और वाहनों का प्रभाव समाज में इस तरह बढ़ा है कि हर वर्ग का सदस्य उसका प्रयोक्ता है। स्थिति यह है कि बच्चों को आज खिलौने  से अधिक उनके पालक मोबाइल, कंप्यूटर और वाहन दिलाने की चिंता करते हैं। अब तो यह मान्यता बन गयी है कि अच्छी सुविधा होगी तो बच्चा अधिक अच्छे ढंग से पढ़ सकता है। जबकि हमने आधुनिक इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुषों के बारे में पढ़ा है जिन्होंने भारी कष्टों के साथ जीवन बिताते हुए शिक्षा प्राप्त करने के अपने प्रयासों से प्रतिष्ठा का शिखर पाया।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

—————–

द्यूतं च जनवादं च परिवादं तथाऽनृतम!।

स्त्रीणां च प्रेक्षणालम्भावुपघातं परस्य च।।

     हिन्दी में भावार्थ-विद्यार्थी को चाहिये कि वह जुआ, झगड़े, विवाद झूठ तथा हंसीमजाक करने के साथ ही दूसरों को हानि पहुंचाने से दूर रहे।

शैक्षणिक गतिविधियों से इतर सुविधाओं ने छात्रों को इतना बहिर्मुखी बना दिया है कि जिस काल में एकांत चिंत्तन की आवश्यकता होती है उस समय वह  मनोरंजन में अपना समय बर्बाद करते हैं।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो यह मानता है कि शिक्षा के दौरान अन्य प्रकार की गतिविधियां न केवल अनुचित हैं वरन् धर्मविरोधी भी हैं।  चाणक्य तथा मनुस्मृति में यह स्पष्ट कहा गया है कि शिक्षा की अवधि में छात्रों को सुख सुविधाओं से दूर रहना चाहिये।  इतना ही नहीं गुरुकुल या छात्रावासों में रहना जरूरी हो तो सभी का सम्मान किया जाये। जुआ, मनोरंजन, निंदा, झगड़े तथा विवादों से विद्यार्थियों को बचना चाहिये।  यह हमारी धार्मिक पुस्तकें स्पष्ट रूप कहती हैं पर हैरानी की बात है कि कथित धर्म प्रवचनकर्ता कभी रैगिंग के विरुद्ध टिप्पणी नहीं करते। वैसे उनका दोष नहीं है क्योंकि अगर उन्होंने रैगिंग को धर्म विरोधी कहा तो उनके विरुद्ध प्रचार यह कहते हुए शुरु हो जायेगा कि वह सांप्रदायिक हैं।  यही प्रचार माध्यम जो रैगिंग के वीभत्स समाचार देकर विलाप कर रहे हैं उसे धर्म विरोधी घोषित करने पर समर्थन देने लगेंगे और दावा यह करेंगे कि एक दो छोटी घटना पर रैगिंग को निंदित नहीं कहा जा सकता।

हम जैसे सामान्य लेखकों के पाठक कम ही होते हैं इसलिये इस बात की चिंता नहीं रहती कि कोई बड़ी बहस प्रारंभ हो जायेगी। दूसरी बात यह कि हम भारतीय अध्यात्मिक संदेशों के नये संदर्भों में चर्चा के लिये प्रस्तुत करते हैं तो अक्सर यह विचार आता है कि क्यों न ऐसा लिखा जाये जिससे लोग आकर्षित हों इसलिये यह सब लिखा दिया।  यह विचार इसलिये भी आया कि रैगिंग की घटनाओं से जब कुछ युवा जान गंवाते हैं तो तकलीफ होती है।  इसलिये हम चाहते हैं कि युवा वर्ग अपने प्राचीन अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन कर इस तरह की घटनाओं से बचे।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: