राजनीति में बहुरूपिया बनना ही पड़ता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख


      यह एक ध्रुव सत्य है कि राजनीति करने वाले को अनेक तरह के रंग दिखाने ही पड़ते हैं। जो अपना जीवनशांति, भक्ति और अध्यात्म ज्ञान के साथ बिताना चाहते हैं उनके लिये राजनीतिकरना संभव नहीं है। ज्ञानी लोग इसलिये राजनीति से समाज में परिवर्तन कीआशा नहीं करते बल्कि वह तो समाज और पारिवारिक संबंधों में राज्य केहस्तक्षेप का कड़ा विरोध भी करते हैं। सामान्य भाषा में राजनीति का सीधा आशय राज्य प्राप्तकरने और उसे चलाने के कार्य करने के लिये अपनायी जाने वाली नीति से है।बहुरंगी औरआकर्षक होने के कारण अधिकतर लोगों को यही करना रास आता है। अन्यकी बात तो छोडि़ये धार्मिक किताब पढ़कर फिर उसका ज्ञान लोगों को सुनाकरपहले उनके दिल में स्थान बनाने वाले कई कथित गुरु राजनीति को स्वच्छबनाने के लिये उसमें घुस जाते हैं-यह लोकतंत्र व्यवस्था होने के कारण हुआहै क्योंकि लोग राजनीति विजय को प्रतिष्ठा का अंतिम चरम मानते हैं।लेखक, पत्रकार, अभिनेता-अभिनेत्रियां तथा अन्य व्यवसायों मं प्रतिष्ठत लोगराजनीति के अखाड़े को पसंद करते हैं।इतना ही नहीं अन्य क्षेत्रों मेंप्रसिद्ध लोग राजनीति में शीर्ष स्थान पर बैठे लोगों की दरबार में हाजिरीदेते हैं तो वह भी उनका उपयोग करते हैं।लोकतंत्र में आम आदमी के दिलोदिमाग में स्थापित लोगों का उपयोग अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। कोईव्यक्ति अपने लेखन, कला और कौशल की वजह से कितना भी लोकप्रिय क्यों न हो वह उससे सतुष्ट नहीं होता वरन उसे   लगता है कि स्वयं को चुनावी राजनीति में आकार कोई प्रतिष्टित किये  स्थापित किये बिना वह अधूरा है।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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सत्याऽनृता च परुषा प्रियवादिनी च

हिंस्त्रा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या|

नित्यव्यया प्रचुरनित्य धनागमा च

वारांगनेव नृपनीतिनेक रूपा||

     हिंदी में भावार्थ-राज्यकर्म में लिप्त राजाओं को राजनीति करते हुए बहुरुपिया बनना ही पडता है। कभी सत्य तो कभी झूठ, कभी दया तो कभी हिंसा, कभी कटु तो कभी मधुरकभी, धन व्यय करने में उदार तो कभी धनलोलुप, कभी अपव्यय तो कभी धनसंचय कीनीति अपनानी पड़ती है क्योंकि राजनीति तो बहुरुपिया पुरुष और स्त्री की तरहहोती है।

      यहाँ हम बता दें कि राजनीति से हमारा आशय आधुनिक चुनावी राजनीति  से है| व्यापक रूप से इस शब्द का अर्थ विस्तृत है|  राजसी कर्म हर व्यक्ति को करने होते हैं और उसे उसके लिए नीतिगत ढंग चलना ही होता है| यानी अपने अर्थकर्म के लिए रजा हो या रंक सभी को राजनीति करनी ही होती है|

      राजनीति तो बहुरुपियेकी तरह रंग बदलने का नाम है।लोकप्रियता के साथ कभी अलोकप्रिय भी होना पड़ता है।हमेशा मृद भाषा सेकाम नहीं चलता बल्कि कभी कठोर वचन भी बोलने पड़ते हैं। हमेशा धन कमाने सेकाम नहीं चलता कभी व्यय भी करना पड़ता है-लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो भारीधन का व्यय करने का अवसर भी आता है तो फिर उसके लिये धन संग्रह भी करनापड़ता है। कभी किसी को प्यार करने के लिये किसी के साथ घृणा भी करना पड़तीहै।

      यही कारण है कि अनेक लेखक,कलाकार और प्रसिद्ध संत चुनावी  राजनीति से परेरहते हैं। हालांकि उनके प्रशंसक और अनुयायी उन पर दबाव डालते हैं पर वह फिरभी नहीं आते क्योंकि राजनीति में हमेशा सत्य नहीं चल सकता। अगर हम अपनेएतिहासिक और प्रसिद्ध संतों और लेखकों की रचनाओं को देखें तो उन्होंनेराजनीति पर कोई अधिक विचार इसलिये नहीं रखा क्योंकि वह जानते थे कि राजनीतिमें पूर्ण शुद्धता तो कोई अपना ही नहीं सकता। आज भी अनेक लेखक, कलाकर औरसंत हैं जो राजनीति से दूर रहकर अपना कार्य करते हैं।यह अलग बात है किउनको वैसी लोकप्रियता नहीं मिलती जैसे राजनीति से जुड़े लोगों को मिलती हैपर कालांतर में उनका रचना कर्म और संदेश ही स्थाई बनता है। राजनीति विषयोंपर लिखने वाले लेखक भी बहुत लोकप्रिय होते है पर अंततः सामाजिक औरअध्यात्मिक विषयोंपर लिखने वालों का ही समाज का पथप्रदर्शक बनता है।

      राजनीति के बहुरूपों के साथ बदलता हुआ आदमी अपना मौलिकस्वरूप खो बैठता है और इसलिये जो लेखक, कलाकर और संत राजनीति में आये वह फिरअपने मूल क्षेत्र के साथ वैसा न ही जुड़ सके जैसा पहले जुडे थे।इतना हीनहीं उनके प्रशंसक और अनुयायी भी उनको वैसा सम्मान नहीं दे पाते जैसा पहलेदेते थे। सब जानते हैं कि राजनीति तो काजल  की कोठरी है जहां से बिना दागके कोई बाहर नहीं आ पाता।वैसे यह वह क्षेत्र से बाहर आना पसंद नहीं करता।हां, अपने पारिवारिक वारिस को अपना राजनीतिक स्थान देने का मसला आये तोकुछ लोग तैयार हो जाते हैं।

      आखिर किसी को तो राजनीति करनी है और उसे उसके हर रूप सेसामना करना है जो वह सामने लेकर आती है। सच तो यह है कि राजनीति करना भीहरेक के बूते का नहीं है इसलिये जो कर रहे हैं उनकी आलोचना कभी ज्ञानी लोगनहीं करते।इसमें कई बार अपना मन मारना पड़ता है।कभी किसी पर दया करनीपड़ती है तो किसी के विरुद्ध हिंसक रूप भी दिखाना पड़ता है। आखिर अपने समाजऔर क्षेत्र के विरुद्ध हथियार उठाने वालों को कोई राज्य प्रमुख कैसे छोड़सकता है? अहिंसा का संदेश आम आदमी के लिये ठीक है पर राजनीति करने वालों कोकभी कभी अपने देश और लोगों पर आक्रमण करने वालों से कठोर व्यवहार करना हीपड़ता हैं। राज्य की रक्षा के लिये उन्हें कभी ईमानदार तो कभी शठ भी बननापड़ता है।अतः जिन लोगों को अपने अंदर राजनीति के विभिन्न रूपों से सामनाकरने की शक्ति अनुभव हो वही उसे अपनाते हैं।जो लोग राजनेताओं की आलोचनाकरते हैं वह राजनीति के ऐसे रूपों से वाकिफ नहीं होते।यही कारण है किअध्यात्मिक और सामाजिक ज्ञानी राजनीति सेदूर ही रहते हैं न वह इसकीआलोचना करते हैं न प्रशंसा। अनेक लेखक और रचनाकार राजनीतिक विषयों परइसलिये भी नहीं लिखते क्योंकि उनका विषय तो रंग बदल देता है पर उनका लिखारंग नहीं बदल सकता।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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टिप्पणियाँ

  • Anil Dubey  On जून 26, 2014 at 5:37 अपराह्न

    good thainking for the lestet matter ,  now what can i do.  anil dubey

    गुरुवार, 26 जून, 2014 12:21 PM को, दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका ने लिखा:

    WordPress.com दीपक भारतदीप posted: ”      यह एक ध्रुव सत्य है कि राजनीति करने वाले को अनेक तरह के रंग दिखाने ही पड़ते हैं। जो अपना जीवनशांति, भक्ति और अध्यात्म ज्ञान के साथ बिताना चाहते हैं उनके लिये राजनीतिकरना संभव नहीं है। ज्ञानी लोग इसलिये राजनीति से समाज में परिवर्तन कीआशा नहीं करते बल”

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