संत कबीर दर्शन-विषयों में आसक्ति अपराध के लिये प्रेरित करती है


 

      टीवी के पर्दे पर अनेक ऐसे कार्यक्रम प्रसारित होते हैं जिसमें दर्शकों को उपभोग संस्कृति के लिये इस तरह प्रेरित किया जाता है कि उसे पता ही नहीं लगता कि वह कैसे उसमें फंस रहा है। इन कार्यक्रमों की विषय वस्तु में शादी, जन्मदिन, पिकनिक तथा धार्मिक पर्वों की कहानियां इस तरह लिखी जाती हैं जिससे दर्शक बाहर मनोरंजन के लिये प्रेरित हों तथा उपभोग की वस्तुओं का क्रय करें। इतना ही नहीं धार्मिक कार्यक्रमों में अंधविश्वास फैलाने वाली वस्तुओं के क्रय की प्रेरणा तक दी जाती है।

       हमारे देर्श में धर्म एक गंभीर विषय होता है। देखा यह जा रहा है कि टीवी पर जहां धार्मिक कार्यक्रमों में अध्यात्मिक ज्ञान की चर्चा होनी चाहिये वहां उसमें बीमारियों के इलाज के लिये आयुर्वेद की दवायें खरीदने का विषय भी जोड़ दिया जाता है।  यह सही है कि आयुर्वेद ग्रंथ भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का एक भाग है पर इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि उससे बनी दवायें कोई अमृत होने का प्रमाण बन जाती है।  यह दवायें उपयोगी हो सकती है पर हमारा अध्यात्मिक दर्शन स्वस्थ रहने के लिये योग साधना तथा श्रमपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है ताकि मन, देह तथा विचारोें में ऐसे अमृत का निर्माण हो हमारा सहायक बने।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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कोटि करमकर पलक में, या मन विषया स्वाद।

सद्गुरु शब्द न मानहीं, जनम गंवाया वाद।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-यह मन विषयों में फंसाकर मनुष्य को  करोड़ों अपराध करने के लिये करता है। परमात्मा का स्मरण तथा अध्यात्मिक ज्ञान करने में अगर समय लगाया जाये तो यह जीवन अत्यंत आनंदमय हो जाये।

दौड़त दौड़त दौड़िया, जेती मन की दौर।

दौड़ि थके मन थिर भया, वस्तु ठौर की ठौर।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जहां तक मन की दौड़ हो सकती है वहां तक आदमी चला जाता है। जब मन थक जाता है तो वह बैठकर आराम करता है मगर अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में उसे कभी शंाति नहीं मिलती।

      देखा जाये तो हमारे देश में धर्म के नाम पर भी मनोरंजन करने की एक ऐसी व्यवसायिक परंपरा रही है जिससे चालाक लोग अपना घर परिवार चलाते हैं। इसे सामान्य केवल ज्ञान साधक ही जानते हैं।  सकाम और साकार भक्ति की प्रेरणा देकर व्यवसायिक धार्मिक लोग  अपना हित साधते हैं।  इतना ही नहीं जो शुद्ध रूप से मनोरंजन का व्यवसाय करते हैं वह भी कभी न कभी धर्म की आड़ लेते हैं।  आजकल विज्ञापन के दौर में तो ज्यादा ही सतर्कता बरतने की जरूरत है।  सच बात तो यह है कि बाहर कहीं स्वर्ग नहीं मिल सकता। स्वर्ग के आनंद की अनुभूति केवल अंतर्मन में ही की जा सकती है। एक बात तय रही कि भोग से नहीं त्याग से शांति मिलती है। उसी तरह शोर से कभी सुख नहीं मिलता वरन् मौन ही वह शक्ति देता है जिससे जीवन आनंदमय है। यह मौन केवल वाणी का नहीं वरन् समस्त इंद्रियों का होना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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