कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समाज के काम का न हो तो धनपति का धन व्यर्थ


      देश में आगामी लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान चुनावी राजनीति में सक्रिय राजनेता प्रचार के दौरान अनेक प्रकार के मुद्दे उठा रहे है तो टीवी तथा समाचार पत्रों में पेशेवर बुद्धिजीवी भी अपने अनुसार इन मुद्दों पर अपनी राय रख रहे हैं।  देश में गरीबी, बेरोजगारी, समाज का बिगड़ता शारीरिक स्वास्थ्य तथा भ्रष्टाचार के साथ ही महंगाई जैसे मुद्दे इस चुनाव में छाये हुए हैं। हम यहां राजनेताओं के भाषणों पर कुछ नहीं कहना चाहते क्योंकि उन्हें मतदाता को रिझाने के लिये प्रयास करने का पूरा हक है पर हैरानी तो देश के पेशेवर बुद्धिजीवियों पर है जो केवल उनके भाषणों के समर्थन या विरोध तक सीमित रहकर अपनी कोई राय नहीं रख रहे। इन मुद्दों में एक मुद्दा काले धन का भी है जिसे भ्रष्टाचार का पुत्र या पिता ही कहा जा सकता है। पुत्र इसलिये कि यह भ्रष्टाचार से कमाया गया लगता है तो पिता इसलिये ही कि भ्रष्टाचार किया ही इसलिये जाता है कि धनपतियों धन प्रदान करें ताकि उसे विदेश भेजा जा सके।

      इन चुनावों के प्रचार के दौरान यह देखा जा रहा है कि कुछ लोग भारत के धनपतियों को प्रत्यक्ष रूप से निशाना बना रहे हैं जो आज तक देखा नहीं गया था। मजे की बात यह है कि उन्हें प्रचार माध्यमों में सुर्खियां मिलने से जिससे जनमानस में लोकप्रियता भी प्राप्त हो रही हैं।  इन धनपतियों के लिये जिस तरह की बातें जनमानस में प्रचारित हो रही हैं वह उनके लिये चिंत्तन का विषय है।  हालांकि धन  पूरी तरह से चिंत्तन क्षमता हर लेता है फिर धनपति अपने साथ ऐसे बुद्धिमानों को नहीं रखते जो उनको असलियत बता सकैं। इन धनपतियों ने खेल, प्रचार, साहित्य, कला, तथा समाज का जिस तरह बाज़ारीकरण किया है उसके चलते यह संभव नहीं है कि कोई भी व्यक्ति समाज के शिखर पर पहुंच सके।  संगठित प्रचार माध्यमों में इनकी पकड़ है इसलिये गैर पेशेवर सत्य बोलने वाले बुद्धिजीवियों का वहां आना संभव नहीं है। प्रचार माध्यमों में केवल सतही ज्ञान रखने वाले बुद्धिमानों को ही इसलिये बुलाया जाता है ताकि आमजनमानस अधिक ज्ञानी  न बन पाये।  उसके अंदर बस इतना ही उत्साह रहे कि वह भेड़ की तरह भीड़ में शामिल होने को लालायित रहे।  आम आदमी केवल मनोरंजन में उलझा रहे और इन धनपतियों का साम्राज्य बढ़ता रहे।

      ऐसा बरसों तक चला पर अब चूंकि अंतर्जाल ने आम बुद्धिजीवियों तथा लेखकों एक स्वतंत्र मंच प्रदान किया है।  ऐसे में  इन धनपतियों के लिये यह संभव नहीं रहा कि वह संगठित प्रचार माध्यम तथा सार्वजनिक संस्थाओं पर अपने धन के नियंत्रय से संतुष्ट होकर समाज में चल रही अंतर्जाल पर उनसे संबंध मे चल रही चर्चाओं में आंखें फेर लें।  अब तो सार्वजनिक मंचों पर ही उनके लिये निंदात्मक स्तुति प्रस्तुत की जा रही है।  सच बात यह है कि भारतीय धनपतियों की जहां पहले समाज में एक सम्मानीय स्थान था।  लोग उनसे यह आशा करते थे कि वह प्रत्यक्ष रूप से धन भले ही न दें पर अपने धनबल से वह समाज को संभाल लेंगे। अनेक भारतीय धनपतियों ने लंबे समय तक धर्म, संस्कृति और कला की रक्षा में निष्काम सहयोग दिया पर पिछले अनेक वर्षों से यह देखा जा रहा है कि अब उनका लक्ष्य समाज में उपभोग की प्रवृत्तियों का नया रूप स्थापित कर अपने लिये नकदीकरण करना रह गया है। इन्हंी धनपतियों की वजह से वह मध्यमवर्गीय समाज अस्थिर हुआ है जिसकी उपस्थित से उनको ही राहत होती थी।  यही कारण है कि अब धनपतियों को अपने महलों के इर्दगिर्द भारी सुरक्षा का इंतजाम रखना पड़ता है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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लक्षम्या लक्ष्मीवतां लोकेविकाशिन्या च किन्तया।

बन्धुभिश्व सहृद्विश्व विश्रबधं या न भुज्यते।।

     हिन्दी में भावार्थ-संसार में उस धनपति की समृद्धि का महत्व तब तक नहीं है जब तक उसके परिवार, मित्र तथा समाज के लोग उपभोग रहित हो।

      पहले समाज में धनपतियों से निम्न तथा मध्यम वर्गीय परिवारों की जो आशायें होती थीं वह अब समाप्त हो गयी हैं। परिणामस्वरूप अब इन धनपतियों से समाज की कोई सहानुभूति नहीं है। आजकल के धनपति यह समझते हैं कि उन्होंने अपने लिये सुरक्षा खरीद ली है पर उन्हें यह पता नहीं है कि उनके खरीदे हुए प्रचार माध्यम भले ही उन्हें सम्मानीय कह का स्तुति करते हों पर समाज अब उनके एक व्यवसायी कम अनुचित ढंग से  पैसा कमाने वाला अधिक समझते हैं।  इन धनपतियों पर न केवल राजस्व में कम योगदान का संदेह किया जाता है वरन् उसका जो व्यय आम आदमी पर होना चाहिये उसमें से भी हिस्सा हड़पने का आरोप लगाया जाता है।  हमारे देश में राजनीति, अर्थव्यवस्था, साहित्य, शिक्षा, कला, सामाजिक संस्कारों में पाश्चात्य विचाराधारा के तत्व शामिल किये गये हैं।  हम यहां भारतीय दर्शन के आधार पर कुछ न कहें तो भी पाश्चात्य साहित्यकार जार्ज बर्नाड शॉ का यह कथन तो बताना ही पड़ेगा कि इस संसार में कोई भी अमीर बिना  बेईमानी किये नहीं बन सकता।

      हमारे देश के धनपतियों के खरीदे प्रचार माध्यमों पर कोई इस कथन को दोहरा नहीं सकता पर सच यही है कि हमारे समाज में आर्थिक अस्थिरता ने एक बड़ा संकट पैदा किया है। इसके पीछे इन धनपतियों के दुष्कृत्य जिम्मेदार हैं।  हम यह नहीं कह सकते कि सभी धनपति बुरे हैं पर एक बात तय रही कि अब समाज उन्हें अपना हितैषी नहीं समझता और यही उनके लिये चिंता का विषय होना चाहिये।  आम जनमानस मान रहा है कि भारतीय धनपति उसके हितैषी नहीं वरन् उसके प्राकृतिक संसाधनों के अपहर्ता बन गये हैं। अपना समाज की सेवा करने की बजाय उनका ध्येय केवल उसके आर्थिक संसाधनों का दोहन कर विदेश में काला धन जमा करना रह गया है।  सीधी बात कहें तो उनके धन का इस देश के समाज के लिये कोई उपयोग नहीं रहा और अपनी गिरती छवि पर उन्हें स्वयं ही विचार करना चाहिए।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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