संत कवियित्री सहजोबाई के दर्शन पर आधारित चिंत्तन-शेर से ज्यादा प्रेमी बकरी के बच्चे को मिलते हैं


 

      जीवन में भौतिक साधनों का होना आवश्यक है पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उनका संचय इतना किया जाये कि संभालना कठिन हो। अनेक लोग यह सपना देखते हैं कि उनको कोई राजपद मिल जाये या इतनी संपदा का संचय उनके पास हो ज कि समाज पर उनका स्वाभाविक रूप से शासन चले-वह एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बने। यह राजसी प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक रूप से रहती है कि वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से ही संतुष्ट नहीं रहता वरन् वह दूसरों से अपनी पूजा भी करवाना चाहता है। यह तो एक मान्य तथ्य है कि सामूहिक रूप से लोग उसका ही सम्मान करते हैं जो किसी राजपद पर प्रतिष्ठित हो जिससे दंड आदि का भय हो  या इतना धनी हो कि उससे मदद की आशा की जा सके।  इस वजह से अनेक लोग खास इंसान  बनने की जद्दोजेहद में लगे रहते हैं। कुछ लोगों को भाग्य साथ भी देता है और वह अपना ऊंचा लक्ष्य प्राप्त भी कर लेते हैं। यह अलग बात है कि बाद में अपने वैभव की रक्षा करने में ही उनका जीवन नष्ट हो जाता है। छिन जाने का भय उनके रातों की नींद हराम किये रहता है। इसके विपरीत सामान्य मनुष्य भले ही अपनी हालातों से संघर्ष करता है पर उसके मन में कोई भय नहीं रहता।

संत कवियित्री सहजोबाई कहती हैं कि

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साहन कूं तो भय घना, ‘सहजोनिर्भय रंक।

कुंजर को पग बेड़ियां, चींटी फिरै निशंक।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनवान हमेशा भयभीत रहता है जबकि गरीब को अपनी किसी वस्तु के खोने की आशंका नहीं रहती। हाथी मूल्यवान होता है इसलिये उसके पांव में बेड़िया रहती है जबकि चींटी स्वतंत्र विचरण करती है।

अभिमानी नाहर बड़ो, भरमत फिरत उजाड़।

सहजोनन्हीं बकरी, प्यार करै संसार।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जंगल का राजा होकर भी सिंह अकेला ही जंगल में फिरता है उसके पास भय के कारण उसक पास कोई नहीं जाता जबकि छोटी बकरी जहां भी हो उसे प्यार करने वाले बहुत होते हैं।

      जीवन की यही सच्चाई है कि सांसरिक विषयों के संचय में जितनी प्रवीणता होगी उतना भी भौतिक भंडार भी भरेगा पर उसके साथ ही भय की भावना भी बलवती होगी। इतना ही नहीं जितना अपने शक्तिशाली, प्रतिभाशाली और सुंदर होने पर अहंकार करेंगे उतना ही अपने लिये संकट भी बुलायेंगे।  शक्तिशाली के पास तो कोई दूसरा मनुष्य भय के कारण पास नहीं आता तो प्रतिभाशाली व्यक्ति से हर कोई काम लेना चाहता है इस बात की चिंता किये बिना कि उसे कितनी परेशानी होती है।  उसी तरह सुंदर स्त्री का अहंकार देखकर हर कोई उसे अपने नाम की बेड़ी डालना चाहता है। आजकल स्त्रियों के साथ बढ़ते अपराध मनुष्य में व्याप्त स्वाभाविक उस हिंसक प्रवृत्ति का ही परिचायक है जो प्रणय निवेदन में नाकाम होने या नारी सुलभ चंचलता के कारण अपमानित होने  पर बदला लेने के लिये प्रेरित करती है।

      कहने का अभिप्राय यही है कि अति सर्वदा वर्जयते।  धन, पद, प्रतिष्ठा की अधिकता भी भय पैदा करने वाली होती है जो कि स्वाभाविक है। इसलिये अपनी स्थिति से संतोष करना ही एक श्रेष्ठ कला है।  इतना ही नहीं अगर अन्य लोगों से धन, पद और प्रतिष्ठा अधिक भी हो तो उसे दूसरों के सामने बघार कर उसमें कुंठा का भाव नहीं लाना चाहिए।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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