अन्ना भक्तों के राजनीतिक क्षमताओं की परीक्षा अभी बाकी-हिंदी चिन्तन लेख


            अभी हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए।  इन चुनावों के परिणाम आने के साथ ही नयी सरकारों के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है।  एक स्वतंत्र फोकटिया लेखक होने के कारण हमने इन चुनावों पर एक आम आदमी की तरह दिलचस्पी ली।  मध्यप्रदेश, राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ राज्यों के चुनाव तथा उसके परिणामों में इस लेखक की  स्वाभाविक दिलचस्पी थी। मध्यप्रदेश तो स्वयं का राज्य है और छत्तीसगढ़ कभी चूंकि इसी प्रदेश का भाग था तो उससे अभी भी आत्मीयता बरकरार है। राजस्थान एक तो पड़ौसी राज्य है दूसरा वहां इस लेखक की ससुराल है इस कारण उसमें भी रुचि होना स्वभाविक है।  अब कौनसा दल हारा और कौनसा जीता, यह तो बड़े विद्वानों के लिये विश्लेषण का विषय है मगर  अपनी दिलचस्पी तो बस इतनी है कि शासन सहजता से चले ताकि अपना जीवन शांति से चलता रहे।  चुनाव तो दिल्ली में भी हुए पर उसे हम अधिक महत्व नहीं दे रहे थे।  इसका कारण यह था कि वहां के विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र की शायद जितनी सीमा होगी वह मध्यप्रदेश में कुछ नगरनिगमों के एक वार्ड से भी कम होगी।   बहुत कम लोगों को पता होगा कि संसद की सीटों का राज्यों के गठन के समय निर्धारण जनसंख्या के आधार पर हुआ था जो कि आज तक चल रहा है। उस कारण क्षेत्रफल की दृष्टि से सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद मध्यप्रदेश के लिये कम संसदीय क्षेत्र बने जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार राज्यों को अधिक स्थान मिले।  दिल्ली की सात लोकसभा क्षेत्रों का जितना क्षेत्र है वह मध्यप्रदेश दो नहीं तो तीन लोकसभा क्षेत्रों से भी कम होगा। सही क्षेत्रफल का आंकड़ा नहीं वरना हम कह सकते थे कि मध्यप्रदेश का कोई लोकसभा क्षेत्र दिल्ली के सात लोकसभा क्षेत्रों के बराबर भी हो सकता है।

            आमतौर से भारतीय प्रचार माध्यम बृहद शहरों को ही भारत का प्रतीक मानते हैं पर हम उनसे सहमत नहीं हो पाते। वजह जब हम उन पर प्रसारित समाचारों तथा बहस की विषयों को देखते हैं तो लगता है कि वह भारी गलतफहमी में रहते हैं। उनके अनेक विषयों में हमारे शहर के बहुत कम लोग रुचि लेते दिखते हैं।  अभी दिल्ली में हुए चुनावों के परिणाम बहुत दिलचस्प थे पर इतने नहीं कि उसमें देश के लिये कोई विशेष संदेश ढूंढा जा सके।  ऐसा नहीं है कि हमारी दिलचस्पी दिल्ली के चुनावों के कतई नहीं थी पर चूंकि उससे अपना कुछ बनता बिगड़ता नहीं है इसलिये मन में उत्साह नहीं था।  अन्ना भक्तों ने इस चुनाव में सफलता इतनी प्राप्त की है कि वह वहां एक राष्ट्रीय दल को तीसरे स्थान पर पहुंचा सके तो दूसरा बहुमत से वंचित हो गया।  यह अलग बात है कि यह दल अन्ना भक्तों से आगे रहा है।  हमने अन्ना भक्त इसलिये कहा क्योंकि हम उनकी पहचान इसी तरह करते हैं, यह अलग बात है कि अन्ना हजारे ने किसी राजनीतिक दल से संपर्क न रखने के निर्णय के चलते उनसे नाता तोड़ लिया है।  एक बात तय है कि अन्ना हजारे का आंदोलन देश में व्यापक भावनात्मक प्रभाव डालने में सफल रहा है तो यह भी सत्य है कि अन्ना के भक्त से राजनीतिक चोला पहनने वाले इन लोगों ने उनसे अपने पुराने संबंधों को पूरी तरह से चुनावों में अधूरी सफलता प्राप्त कर भुना ही लिया।  अब अन्ना हजारे साहब  ने इनके बिना अपना अनशन जनलोकपाल के लिये पुनः प्रारंभ कर लिया है और यकीनन अन्ना भक्तों को अब उनके साथ किये गये प्रयासों को लाभ नहीं मिलने वाला।  सीधी बात कहें तो अन्ना हजारे जी के साथ आंदोलन करने के लिये जो उन्होंने श्रमदान किया उसका पूरा पुण्य कमा चुके हैं और जब वह अपने राजनीतिक अभियान को दिल्ली से चलाकर पूरे देश में चलाने की बात कह रहे हैं तो उन्हें अब उन्हें श्रमदान के नये प्रयास करने होंगे।

            भारत के आंदोलनों से बने नेता लोकप्रिय बनते हैं। चुनावों में उनकी सफलता कदम भी चूमती है पर एक प्रशासक के रूप में सभी की छवि धवल बनी रहे, यह कभी नहीं देखा गया।  कुछ की छवि जहां जनहित करने वाली बनी तो कुछ की छवि मलिन होती भी देखी गयी है।  अन्ना भक्तों ने दो राष्ट्रीय दलों का सामना अपने इष्ट के साथ खड़ी तस्वीरों के साथ ही किया यह भूलना नहीं चाहिये।  अन्ना भक्तों की छवि इसलिये अभी तक धवल है क्योंकि उन्होंने अभी राजकाज के क्षेत्र में कदम ही नहीं रखा। दिल्ली में उनको इतनी सीटें मिली है कि एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के बिना शर्त समर्थन से वह सरकार बना सकते हैं पर वह इसके लिये तैयार नहीं है।  उनका मानना है कि दोबारा चुनाव हों ताकि किसी एक दल के पक्ष में फैसला हो सके।  उनको अपनी धवल छवि का इतना भरोसा है दोबारा चुनाव पर उनको पूर्ण बहुमत मिल जायेगा पर राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों को लगता है कि यह अतिआत्मविश्वास है।  एक डेढ़ वर्ष से सक्रिय प्रयासों से उन्होंने यह सफलता प्राप्त की। अब दोबारा चुनाव तक वह उसे जारी रख पायेंगे इसमें संदेह न भी हो पर मतदाता की लगातार उनमें दिलचस्पी रहे यह शंकास्पद है।  अन्ना भक्त देश में बदलाव लाने की प्रक्रिया में निंरतर लग गये हैं पर आम आदमी अपना मनोबल बनाये रखेगा इसमें संदेह है।  मुख्य बात यह है कि दिल्ली की जिस सफलता पर वह पूरे देश में छाने की बात कह रहे हैं वह वैसी नहीं है जैसा वह तथा उनके समर्थक प्रचार माध्यम कह रहे है।  दिल्ली में अगर सरकार नहीं बनती तो  अन्ना भक्तों की विजेता की छवि नहीं बनती दिखती  जो आगे के अभियान में  सहायक होने वाली थी।  जनता संघर्ष करने वाले को देखते प्रसन्न होती है पर वह उसे विजेता भी देखना चाहती है।  अगर उनसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल भी सरकार नहीं बनाता तो यह अनिर्णय की स्थिति जनता में चिढ़ पैदा करेगी।  सीधी बात कहें तो अन्ना भक्त या तो विजेता के रूप में जायें या पराजित योद्धा की छवि के साथ आगे जायें।  इसमें भी पैचं है। अगर सबसे अधिक स्थान प्राप्त राष्ट्रीय दल ने सरकार बना ली तो अन्ना भक्त हारे दिखेंगे तब भारतीय जनमानस की उनसे सहानुभूति होगी या नहीं कहना कठिन है। जिस दिल्ली के चुनाव में दूसरे स्थान पर रहकर अन्ना भक्त प्रसन्न हैं हमारे हिसाब से वही उनके लिये उलझा विषय बनने वाला है।  दूसरों की क्या कहें अपने अनेक वर्ग के अनेक लोगों से अन्ना भक्तों की छवि पर मन टटोला। सभी उनकी सफलता पर चमत्कृत तो हैं पर यह प्रश्न भी उठा रहे हैं कि क्या वह सरकार बनायेंगे?

            लोकतंत्र में आंदोलनों का महत्व तो है पर सरकार और विपक्ष का भी महत्व है। चुनाव के बाद किसी भी राजनीतिक दल के पास यही भूमिकायें होती हैं।  जिस दल का पहला चुनाव हो उसे सरकार या विपक्ष में रहकर अपनी प्रतिभा दिखानी होती है और दिल्ली में अन्ना भक्तों को वही कर दिखाने का अवसर है। उनमें जीत का उत्साह है और प्रचार माध्यम भी उनके साथ हैं पर क्या यह सब  भारतीय जनमानस वैसे ही ले रहा है जैसा वह चाहते हैं यह भी देखना होगा।  अगर विधानसभा त्रिशंकु रही तो लोग पूछेंगे कि कौनसी सफलता हासिल करके आ रहे हो और अगर सरकार बनायी तो दिल्ली में उलझे रहेंगे। विपक्ष में बैठे तो लोग पहले उनकी वहां की भूमिका जांचेंगे।  दूसरी बात यह कि पहला पत्थर रखने पर मूहूर्त होता है तब फावड़ा चलाया जाता है।  चुनावों के बाद सरकार या विपक्ष की भूमिका में बैठना इसी तरह का है।  कोई मकान बनाया जाता है तो भी उसका मूहूर्त किया जता है। अन्ना भक्त अभी भी आंदोलन की भूमिका है।  एक पत्थर लगाया और दूसरा लगाने चल पड़े। एक मकान बनाया और ताला लगाकर दूसरा बनाने चल पड़े।  लोग तो पहले के काम का हिसाब पूछेंगे कि वहां क्या कर आये हो?’

            पुराने प्रतिष्ठित दलों राजनीतिक दलों पर यह अन्ना भक्त अभी तक बरसते थे तब चूंकि चुनावी राजनीति से दूर थे इसलिये लोग उनकी बात ध्यान से सुनते थे पर जब वह इस क्षेत्र में आ ही गये हैं तो उन्हें अपनी सफलतायें पहले चुनाव से ही बतानी पड़ेंगी।  दूसरी बात यह भी कि इन स्थापित राजनीतिक दलों को अब उन पर व्यंग्य बाण छोड़ने की सुविधा भी होगी जिनका सामना करने के लिये उन्हें अब अतिरिक्त ऊर्जा चाहिये। अन्ना हजारे की जनलोकपाल की मांग से अब काम चलने वाला नहीं है। बहरहाल हमारे समझ में यह नहीं आया कि वह लिख क्या गये? फिर सोचते हैं कि हमने लिखा भी तो ऐसे लोगों के बारे में जिनको यही पता नहीं कि वह कर क्या रहे हैं।

            बहरहाल अन्ना हजारे और उनके राजनीतिक भक्तों में हमारी दिलचस्पी है सो उनकी गतिविधियां हमेंशा कुछ न कुछ लिखने को बाध्य करती हैं।  बहरहाल पांच चुनावों में जिन लोगों ने मतदाता के रूप में भाग लिया उनको ढेर सारी बधाई।  उन्होंने चाहे जिस दल को मत दिया हमें इससे हमारा कोई संबंध नहीं है पर उन्होंने एक निष्काम कर्म हृदय से किया यह पुण्य का काम है। मानव समाज में एक राजा का होना अनिवार्य है।  हम यह कहते हैं कि नेता कुछ काम नहीं कर रहे पर कम से कम राज्य व्यवस्था तो बनाये हुए हैं क्योंकि अगर यह नहीं हो तो उसका परिणाम क्या होगा, यह हम सभी जानते हैं। जब हम मत डालते हैं तो कम से कम एक राज्य व्यवस्था को बनाये रखने का समर्थन करते हैं तो मानव समाज में अनुशासन बनाये रखने के लिये आवश्यक है।

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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