नैरोबी में हमला:क्या यह आतंकवाद का नया दौर शुरू हुआ है-हिंदी लेख


                        कीनिया के नैरौबी तथा पाकिस्तान के पेशावर में एक ही दिन में आतंकवाद की दो बड़ी घटनायें एक साथ होना किसी बड़ी योजना का हिस्सा हो सकती है। इस घटना में शामिल आतंकियों ने अपने धर्म से प्रथक विचाराधारा के लोगों को बेरहमी से मार दिया।  पेशावर में एक चर्च में एक धार्मिक विचाराधारा के लोगों को मारा गया। पाकिस्तानी समाज में इसको लेकर कितना सदमा है यह पता नहीं क्योंकि वहां सभ्य लोगों को इस बात से संतोष हो सकता है कि मरने वाले उनके सहधर्मी नहीं है। अंतर्राट्रीय स्तर पर भी पेशावर की घटना पर अधिक चिंता नहीं दिखी जितना नैरोबी में मॉल पर हुए हमले में दिखी है।  इसका कारण यह है कि सर्वशक्तिमान के किसी भी स्वरूप का दरबार हो वह अब आज के आधुनिक भौतिक युग में उतना प्रासांगिक नहीं रहा।  आज के युग में मॉल सबसे मॉल, होटल तथा मनोरंजक पार्क हो गये है।  पेशावर के चर्च में मरे लोगों  सहधर्मी पश्चिम देशों में बहुत हैं पर वह भी यह सोचकर ठंडी प्रतिक्रिया दे रहे हैं कि दक्षिण एशिया में आतंकवाद की घटनायें होना आम बात है फिर उसमें मरने वाले गोर वर्ण के  नहीं है।

                        कीनिया की राजधानी नैरोबी के मॉल में हुए विस्फोट की प्रतिक्रिया जरूर पूरे विश्व में हुई है।  पेशावर और नैरोबी दोनों जगह की घटनायें अत्यंत दर्दनाक है इसमें संशय नहीं है। ऐसा लगता है कि यह दूसरे दौर के आतंकवाद की शुरुआत है। इन घटनाओं का आपस में तारतम्य न हो यह संभव नहीं है क्योंकि जिन प्रमुख आतंकवादी संगठनों का कार्यक्षेत्र पाकिस्तान है उन्हीं के उपसंगठन कीनिया में भी सक्रिय है।  हम जैसे आम लेखकों के लिये कोई ज्यादा जानकारी के साधन उपलब्ध नहीं होते पर समाचारों को देखकर ऐसा लगता है कि आतंकवादी के पेशेवर प्रबंधकों ने अपना लक्ष्य जिस तरह रखा है उससे यही लगता है कि वह कुछ इस प्रकार का संदेश दे रहे हैं कि हम अभी मरे नहंी है।  पिछले अनेक दिनों से  लग रहा था कि धार्मिक आतंकवाद थम गया है और उसका पेशा करने वाले संगठन कमजोर हो गये हैं।  संभवतः इस कारण से पूंजीपतियों ने उनको पैसा देना बंद या कम कर दिया हो। एक सुविधाजनक मॉल में विस्फोट करना इसी बात का संकेत भी हो सकता है।  इतना ही नहीं चर्च में विस्फोट कर धर्मं विशेष के लोगों को मारकर उनके सहधर्मी संपन्न राष्ट्रों को चेतावनी भी दी हो। यह अनुमान ही है पर इतना तय है कि जमीन पर भ्रामक धार्मिक विचारों के कारण हिंसा करने वाले लोग भले ही बेकसूरों को मारकर प्रसन्न होते हों पर सच यह है कि उनके प्रायोजक कोई न कोई अपना लक्ष्य अवश्य साधते हैं। यही कारण है कि अधिकतर हमलावर मारे जाते हैं पर उनके नामचीन स्वामियों का कुछ नहीं बिगड़ता। दरअसल यह नामीचीन लोग  आतंकवाद के प्रबंधक हैं।  वह अपने संगठनों को कंपनियों की तरह चलाते हैं। आपस में प्रतिस्पर्धा करते हुए दूसरे पर भी हमला वैसे ही करतें हैं जैसे एक ही व्यवसाय करने वाले दो लोग करते हैं।

                        जैसा कि टीवी पर एक विशेषज्ञ एक बहस में कह भी रहे थे कि यह आतंकवाद का यह दूसरा दौर शुरु हो गया है। इसका मतलब क्या यह माना जाये कि अब आतंकवाद अपनी योजना बदलने वाला है।  अभी हाल ही में  एक आतंकवादी पेशेवर ने अपने लोगों को धार्मिक स्थलों, बाज़ारों और अन्य सार्वजनिक स्थानों  के साथ ही पराये धर्म के लोगों पर हमला न करने का निर्देश दिया। यह पढ़कर हैरानी हुई क्योकि यह बयान यकीन योग्य नहीं था। इसके मात्र दो दिन बाद यह वारदात हो गयी। ऐसा लगता है कि यह बयान प्रचार समूहों ने उसका नाम भुनाने के लिये उपयोग किया ताकि लोग उनके साधनों पर ध्यान केंद्रित किये रहें।  ऐसा लगता है कि यह भ्रम दूर हो गया होगा।  इन पेशेवर आतंकवादियों का निर्दोष लोगों को बिना कम चल ही नहीं सकता।  अगर वह किसी बड़े आदमी को मारेंगे तो आम लोगों के बीच उनका प्रचार इतना नहीं होता जितना निर्दोष लोगों को मारने से होता है।

                        हमारा मानना है कि यह आतंकवाद का पेशा विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों के राजनयिकों और पूंजीपतियों की शह पर ही चल रहा है।  आजकल सफेद प्रकार के व्यवसायों में इतना लाभ नहीं रहा जितना मादक द्रव्य, सोना आदि बहुमूल्य पदार्थों की तस्करी और सट्टेबाजी में हैं।  इन काले धंधों से पुलिस प्रशासन का ध्यान बंटाने के लिये ऐसी घटनायें की जाती हैं ताकि वह उन्हीं में व्यस्त रहे। दूसरा यह भी विश्व के ढेर सारे उन्हीं घटनाओं पर ध्यान केंद्रित किये रहें जिस बेरहमी से यह आतंकवादी लोगों को मारते हैं उससे एक बात साफ लगती है  वह मानसिक रूप से ही असुर हैं या फिर मादक द्रव्यों के उपयोग करने के बाद सभी यह करते हैं। सामान्य हालत में ऐसा कोई इंसान कर सकता है इस पर यकीन करना कठिन है।  वैसे देखा जाये कि पूरे विश्व को मादक द्रव्यों के सेवन के बढ़ते प्रकोप ने घेर लिया है।  इसी व्यवसाय से जुड़े लोग अत्यंत धनवान भी है।  ऐसे में उनके हाथ से इन आतंकवादियों को पैसा मिलता हो तो कोए  आश्चर्य की बात नहीं ।  दूसरा शक हथियार और बारूद के सौदागर पर भी होता है क्योंकि अगर वह इस तरह अपना सामान नहीं बेचेंगे तो जिंदा कैसे रहेंगे।  वैसे हमारे अध्यात्मिक दर्शन में कहा जाता है कि जिसके हाथ में हथियार हो उसकी बुद्धि में क्रूरता आ ही जाती है पर जिस तरह की अतिक्रूरता यह आतंकवादी दिखाते हैं उससे साफ लगता है कि वह मादक द्रव्यों का सेवन जरूर करते हैं।  डर अब इस बात का है कि विश्व भर के अनेक बड़े शहरों में ढेर सारे मॉल हैं जिनको आधुनिक धर्म स्थान माना जा सकता है ऐसे में आतंकवाद का दूसरा दौर अत्यंत बृहद रूप में दिख सकता है।  जब यह बारह साल धार्मिक आतंकवाद प्रारंभ हुआ था तब उसका लक्ष्य शासकीय क्षेत्र तक सीमित था जो अब निजी क्षेत्र तक फैल गया है।  ऐसे में यह भयानक आतंकवाद कितना कहर बरपाएगा यह कल्पना कर भी हृदय सिहर हो उठता है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप

ग्वालियर मध्य प्रदेश
Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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