अथर्ववेद से संदेश-मातृभूमि हमें शुद्ध बुद्धि प्रदान करे


         हमारे देश में मातृभूमि का अत्यंत महत्व दिया जाता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन का स्पष्ट मानना है कि देहधारी मनुष्य की इस संसार में उपस्थिति माता पिता के साथ ही मातृभूमि के कारण भी है।  आधुनिककाल  में देशभक्ति के भाव से अनेक गीत तथा प्रार्थनायें लिखी गयी हैं पर उनमें केवल आर्तभाव है।  इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मातृभूमि की आराधना में शक्तिशाली भाव पैदा करने के लिये अनेक मंत्रों का प्रवर्तक है।  हमारे यहां साकार तथा सकाम भक्ति के  दो प्रकार होते हैं-एक तो है आरती दूसरा है मंत्र जाप।  आरती  अत्यंत स्पष्ट रूप से परमात्मा के इष्ट स्वरूप से याचना के भाव से गायी जाती है।  उसमें अपने अभावों तथा कमजोरियों का उल्लेख किया जाता है। यहां तक कि उसमें स्वयं को अत्यंत हेय जीव बताया जाता है। इसके विपरीत मंत्र में परमात्मा के इष्ट स्वरूप को आह्वान किया जाता है।  अपने हेय रूप की बजाय अपने तपरूप से परमात्मा को आकर्षित किया जता है।  आरती मेें आशा का तत्व होता है ताकि परमात्मा प्रसन्न होकर इच्छित फल प्रदान करें जबकि मंत्रजाप में यह विश्वास होता है कि परमात्मा निश्चय ही किसी विषय में सफलता या वस्तु प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करेंगे।

अथर्ववेद में कहा गया है कि

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सा नो भूमिर्वि सृजता माता पुत्रय में पचः।

          हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार माता पिता अपने बच्चों को पालते हैं उसी तरह भूमि हमें समस्त आवश्यक पदार्थ प्रदान करें।

ता नः प्रजाः सं दुहतां समग्रा वाचो मधु प्रथिवी धेहि महान्।

          हिन्दी में भावार्थ-हे मातृभूमि! हम तुम्हारी प्रजा एकत्र हों मधुर वाणी बोले। हमको मधुर वचन बोलने की शक्ति दे।

उदीराणा उतासीनास्तिष्ठन्तः प्रकामन्तः।

पद्मयां दक्षिणसव्याभ्यां मा यथिष्महि  भूम्याम्।

          हिन्दी में भावार्थ-चलते फिरते, उठते बैठते, दायें बायें पांव से टहलते हुए भूमि में हम किसी को दुःख न दें।

भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठितम्।

संविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।

        हिन्दी में भावार्थ-हे मातृभूमि ! कल्याणकारी बुद्धि से हमें युक्त कर मुझको प्रतिदिन सब विषयों को ज्ञान कराओ ताकि प्रथ्वी की संपत्ति प्राप्त हो।

            हमारे देश में स्वतंत्रता के बाद जणगणमण के रूप में राष्ट्रीय गीत तथा गान के रूप में वंदेमातरम को मान्य किया गया।  जनमगमन में अधिनायक शब्द पर अनेक लोग चर्चा करते हुए उसमें तानाशाह की वृत्ति देखते हैं। उसी तरह वंदेमातरम में भी अनेक लोगों को अप्रसन्नता होती है।  इन दोनों से प्रथक कभी किसी अन्य गीत या प्रार्थना को अधिक महत्व नहीं दिया जाता हैै।  दरअसल मातृभूमि हमारे लिये इस देह की उसी तरह सहायक होती है जैसे निरंकार ब्रह्म सहायक होता है।  हमारी बुद्धि शुद्ध होने के साथ ही विचार पवित्र हों इसके लिये अगर किसी सुविधाजनक मंत्र का जाप किया जाये तो निश्चित रूप से कल्याण होगा। अथर्ववेद के मंत्रों में ऐसा भाव है जिससे लगता है कि उसके जाप से मनुष्य में शक्ति आवश्यक रूप से आयेगी।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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टिप्पणियाँ

  • vachaspati dwivedi  On सितम्बर 12, 2013 at 11:47 पूर्वाह्न

    jab aap shlokon ka udaharan dete hain to unka reference bhi diya karen.

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