अध्यात्मिक ज्ञान के नाम पर धर्म के धंधे में सब संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख


                        एक धार्मिक कथावाचक पर अपने ही एक शिष्य की नाबालिग कन्या से बलात्कार करने का प्रकरण इस समय पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है।  कथित गुरु अब जेल में है पर जिस तरह प्रचार माध्यमों ने अपने विज्ञापनों का समय पास करने के लिये विषय को भुनाया है वह अत्यंत चिंता का विषय है।  सच बात तो यह कहें यह कथा वाचक अध्यात्मिक ज्ञान पर कभी कभी बोलते जरूर हैं पर उनकी लोकप्रियता सांसरिक विषयों पर बौद्धिक ज्ञान देने की वजह से अधिक है।  वह प्राचीन ग्रंथों से अनेक कथायें सुनाते हैं तो बीच बीच में स्वास्थ्य के नुस्खें की बताते जाते हैं।  यहां तक कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन से भरपूर ग्रंथ  जहां ब्रह्मचर्य की बात करते है वहीं ं वह लोगों को मर्दानगी बनाये रखने के उपाय बताते हैं।  यही कारण है कि देश में उनके देश में अनेक भक्त हैं।  सच बात तो यह है कि भारतीय अध्यात्म और धर्म के नाम का जैसा उन्होंने व्यवसायिक उपयोग किया वैसा शायद ही कोई दूसरा कथित संत कर पाया हो।  यही कारण है कि उनसे अनेक कथित गुरु बहुत ईर्ष्या करते हैं। वह उनको गुरु मानने की बजाय कथावाचक मानते हैं। कुछ तो उनको कथावाचक भी मानने से इंकार करते हैं। इसके बावजूद यह एक वास्तविकता है कि उन्होंने अपने प्रवचनों के सहारे ढेर सारा शिष्य समूह बनाया है।

        उन पर नाबालिग बालिका से बलात्कार का जो आरोप लगा है वह अब न्यायलयीन दायरे में है पर जिस तरह प्रचार माध्यम सारी मर्यादायें तोड़कर उनके विरुद्ध विषवमन कर रहे हैं वह उन कथित गुरु के शिष्यों के लिये दर्दनाक है।  एक योग साधक तथा गीता पाठक होने के नाते उन जैसे गुरुओं के शिष्य या भक्त कम से कम हम जैसे लोग तो नहीं होते। हम यह भी मानते हैं कि दुनियां के सारे बुरे काम धर्म की आड़ में होते हैं। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमें तो यह अनुभव होता है कि भक्ति, योगासन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्रजाप एकांत का विषय है।  अपने मन, बुद्धि और विचारों की शुद्धता एकांत साधना में ही संभव है। समस्या यह है कि आदमी का मन बाहर के विषयों में रमता है।  इंद्रियां आंतरिक अध्यात्मिक भंडार से अधिक बाह्य विषयों में रस लेने में सहजता अनुभव करती है।  मन जब आसपास के वस्तुओं से ऊबता है तब शांति के लिये भी बाहर ही  झांकता है।  इसी मन पर नियंत्रण करने की कला योग तथा ज्ञान से हो सकती है पर अध्यात्म का यह सत्य विरले ही जान पाते हैं। यही कारण है कि अधिकतर लोग धर्म के नाम पर भी मनोरंजन होने पर उसमें रमते हुए यह सोचते हैं कि हम भक्ति कर रहे हैं।  यही से पेशेवर धर्म कथावाचकों का काम शुरु हो जाता है।  अगर हम गीता के आधार पर कहें तो सच्चाई यह है कि संभव है कि सन्यासी सबसे बड़ा भोगी  और गृहस्थ महान सन्यासी की तरह बर्ताव करे।  इसलिये किसी भी धर्म की पहचान करने वाले  विशिष्ट रंग पहने लोगों को ज्ञानी मान लेना गलत है। अभी जिन कथित कथावाचक पर जो अपने आरोप के कारण कहर टूटा है उस पर अनेक धार्मिक पहचान वाले वस्त्र पहनने वाले लोग उन पर तमाम टिप्पणियां करते हुए उनको ब्रह्मज्ञानी मानने से भी इंकार कर देते हैं। गोया कि स्वयं कोई बड़े ब्रह्मज्ञानी हों। हम न सिद्ध हैं न ब्रह्मज्ञानी पर इतना दावा जरूर करते हैं कि इस तरह की बहसों में अपना चेहरा दिखाने का मोह नहीं पालते।

                        एक बात अपने अभ्यास से हमने अनुभव की है। वह यह कि जब योगासन, प्राणायाम और ध्यान के बाद शरीर में स्फूर्ति आती है उस समय एक रोमांच अनुभव होता है।  यदि श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान न हो तो यही रोमांच स्वयं रोमांचक बनकर लोगों में वाहवाही लूटने का भाव उत्पन्न कर सकता है।  योग साधना से मन, बुद्धि और विचार शुद्ध होते हैं पर उनका निरंतर बनाये रखने के लिये तत्वज्ञान का होना आवश्यक है वरना किसी भी मनुष्य में भटकाव भी आ सकता है। यह भटकाव उसे खतरे में भी डाल सकता है।  इसलिये योग साधना के साथ श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान और विज्ञान का भी अध्ययन साधकों को करते रहना चाहिये। हमने ऐसे दो महान संत देखे हैं जिनका स्वास्थ्य देखें तो अच्छा खासा युवक भी शरमा जाये पर यह भी अनुभव हुआ है कि उन्हें सांसरिक विषयों में लिप्पता की वजह से संकट का सामना करना पड़ा। उनकी दृढ़ व्यक्तित्व’’ वाली छवि धूमिल हुई है। दरअसल इसका कारण यह है कि श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का जस की तस उन्होंने सुनाकर वाहवाही जरूर लूटी हो पर स्वयं उनको समझा है इस पर यकीन नहीं होता।

                        इस घटना से अनेक भारतीय आहत हुए हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि धर्म को लेकर हमारे देश के लोग अत्यंत संवेदनशील हैं।  कथित कथावाचक के शिष्य ही नहीं वरन् अन्य धर्मभीरु लोगों को इस घटना से अत्यंत त्रास दिया है। उस पर अनेक हिन्दी समाचार चैनल बिना सोचे समझे एक न्यायालयीन विषय पर जिस तरह उन गुरु के विरुद्ध अनापशनाप बातें कर रहा है उससे भी अनेक लोग दुःखी हैं।  हिन्दी समाचार चैनलों ने त्वरित लाभ के लिये भले ही आक्रामकता दिखाई है पर कालांतर में इसके दुष्परिणाम उनको ही भोगना है।  वह सोच रहे हैं कि इससे उनकी टीआरपी बढ़ रही है पर सच तो यह है कि अनेक ऐसे अध्यात्मिक लोगों को भी इन हिन्दी चैनलों से विरक्ति हो सकती है जो उन कथावाचक के न शिष्य है न भक्त और न  उनके कृत्य का समर्थन करते हैं। बहरहाल योग साधकों और अध्यात्मिक ज्ञान पाठकों इस समाचार से विचलित नहीं होना चाहिये।  यह समाचार चैनल अपने व्यवसायिक हितों के लिये मर्यादायें तोड़ रहे हैं पर ऐसे में योग साधकों और अध्यात्मिक ज्ञान पाठकों को अपनी मानसिक शक्ति का परीक्षण करते हुए दृढ़ विचार अपनाना चाहिये।  जहां तक उन गुरु के शिष्यों और भक्तों की भावनाओं का प्रश्न है तो हम इस पर इतना ही कह सकते हैं कि जिस तरह हिन्दी समाचार चैनल उन पर पिल पड़े है उस आक्रमण को झेलने की भगवान उनको शक्ति दे।  एक फोकटिया ब्लॉग लेखक अपने नियमित योगभ्यास और श्रीगीता के पाठ पठन से अर्जित शक्ति पर इतना ही लिख सकता है। हम यह अभ्यास भी इसलिये नहीं करते कि कोई सिद्ध होकर प्रवचन करें। अपना लक्ष्य तो बस इतना ही रहता है कि योगाभ्यास और ज्ञानार्जन से हम कुछ लिखते रहने का सामर्थ्य रखें। अपना जीवन ठीकठाक चलता रहे। जय श्रीकृष्ण।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com 

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।

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