प्याज पर प्रायोजित प्रचार युद्ध-हिंदी व्यंग्य लेख


   प्याज की बढ़ती कीमतों पर हमारे प्रचार माध्यम जमकर आंसु बेच रहे हैं। यह हर साल होता है पर इस बार शायद चुनावी साल है तो  इन आंसुओं पर राजनीतिक रंग चढ़ाया जा रहा है।  हमने देखा है कि बरसात के दिनों में जब आवागमन के साधनों में रेल और बस परिवहन बाधित होता है तब प्याज के ही नहीं वरन् समस्त सब्जियों के दाम बढ़ते ही हैं।  इस बार भी यही हो रहा है पर प्याज का मामला कुछ अलग हो जाता है और उसके भाव बढ़ने पर  सार्वजनिक रुदन आसानी से गरीबों के नाम पर बिक जाता है।  प्याज के मामले में ही नहीं वरन् जिस विषय से भी गरीब को जोड़ दिया जाये वह संवदेनशील हो जाता है। यही कारण है कि प्याज खाते तो सभी हैं पर उसके भाव बढ़ने पर गरीब की चिंता का प्रचार कर समाचार को संवेदनशील बनाया जाता है। बहस हो तो विद्वान लोग सहजता से गरीबों का नाम लेकर आंसु बहा सकते हैं।

     प्याज के बारे में इतना अवश्य कहा जाता है कि अगर गरीब के पास रोटी लायक पैसा हो तो वह एक प्याज से पूरे परिवार के साथ नमक मिलाकर खाना खा जाता है।  भोजन की दृष्टि से यह कोई आदर्श स्थिति नहीं है पर भारतीय समाज में गरीबी की दृष्टि से इसे स्वीकार किया जाता है।  वैसे प्याज सभी लोग सेवन करें यह आवश्यक नहीं है। अनेक लोग तो प्याज खाना तो दूर उसे खाने वाले से भी दूर रहने की बात करते हैं।  अनेक मकान मालिक किरायेदार से यह शर्त रखते हैं किअगर हमारे यहां रहोगे तो प्याज नहीं खाओगे  इसका मतलब यह है कि प्याज के बिना भी जिंदा रहा जा सकता है। बात अगर गरीब की रोटी को हो तो आप यह तर्क नहीं दे सकते वरना गरीबों को उद्धारक आपका विरोध करेंगे। हमारे देश में गरीबों के कल्याण का नारा अत्यंत बिकाऊ है। अभिनेता, नेता, चित्रकार, साहित्यकार, पत्रकार तथा व्यापारी चाहे जो भी व्यक्ति हो अगर उसे समाज में महान छविबनानी है तो उसे केवल गरीबों के कल्याण करने का दावा करना ही चाहिये।  करे या न करे यह कोई देखने नहीं जाता। एक बार प्रचार माध्यमों में गरीबों के कल्याण की बात कहकर सभी को अपनी छवि चमकाने का प्रयास करना ही चाहिये।

      अब प्रचार माध्यमों में कुछ दृश्यों  का विवरण देखिये।

       आर्थिक दृष्टि से एक मध्यम वर्गीय  महिला कह रही थी कि प्याज के बिना खाना खाने का मजा नहीं रहता। इतना महंगा हो गया है कि उसे खरीदने में आंसु बह रहे हैं।  गरीबों के लिये तो बहुत मुश्किल है क्योकि वह तो नमक मिलाकर भी सब्जी की जगह इसका उपयोग करते हैं।

    एक मध्यम वर्गीय बुजुर्ग पुरुष ने प्याज के भाव बढ़ना अपनी समस्या तो नहीं माना बल्कि गरीबों का ही तर्क दिया।  हमने उनका चेहरा तथा पहनावा देखकर  उनको  मध्यम वर्गीय इसलिये माना क्योंकि उच्च वर्ग वाले कभी बाज़ार में इस तरह सब्जी खरीदने नहीं जाते।  बहरहाल प्याज के भाव बढ़ने का विषय प्रचार माध्यमों के लिये विज्ञापनों के बीच समाचार तथा बहस प्रसारित करने का अवसर हर साल लाता है।

  हम जैसे लोगों के लिये प्याज गर्मी के समय अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उस समय प्याज महंगा नहीं होता पर खाने से अधिक जेब में रखकर सड़क पर निकलने का साहस तो वही देता है। कहते हैं कि गर्मी में प्याज अगर हाथ में रखकर निकला जाये तो गर्म हवा देह को दंडित नहीं करती। हम प्याज जेब में रखकर निकलते हैं। उसकी वजह से गर्मी के प्रकोप से बचे कि नहीं यह साबित करने का हमारे पास कोई उदाहरण तो नहीं है पर मन में यह विश्वास रहता है कि हमें लू नहीं लगेगी।  खाने में प्याज के स्वाद को लेकर कोई ललक नहीं रहती।  उल्टे यह लगता है प्याज खाने से हमारे अंदर जुकाम हो जाता है। इससे कभी संास लेने मे तकलीफ होती है। हमेशा ऐसा नहीं होता पर कभी होता है तो याद आता है कि हमने आज प्याज वाली सब्जी खायी थी। मूलतः प्याज हमारी सब्जी का भाग नहीं है पर न खाते हों यह भी नहीं।  कभी कहीं बाहर होने पर प्याज की मांग नहीं रखते।  ऐसे में प्याज के भाव बढ़ने पर हमारी संवदेनायें सुप्तावस्था में रहती हैं।

        प्याज के बढ़ने का संबंध है गरीब से है तो यकीनन उसका प्रचार बड़े स्तर पर होगा।  ऐसे में सरकार के लिये प्याज के भाव बढ़ने का विषय भारी चिंता का कारण होता है। सरकार के लिये हमेशा किसी भी विषय का नकारात्मक पक्ष ही चिंता का कारण होता है। सकारात्मक पक्ष होने पर उसकी कोई प्रशंसा नहीं करता।  यह प्याज कुछ समय बाद स्वतः सस्ता हो जायेगा। कितना होगा यह पता नहीं, पर इतना तय है कि वह सामान्य स्तर तक आ जायेगा।  ऐसे में यह विषय स्वतः ही अपना महत्व खो बैठेगा।  

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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