क्रिकेट मैच में फिक्सिंग-खेल अब देखने का मजा ही नहीं रहा


          क्रिकेट मैचों में फिक्सिंग का मामला का कोई नया नहीं है। अनेक बार बहुत सारे प्रकरण सामने आये पर हुआ कुछ नहीं।  यथावत सब चलता रहा।  कहने को बीसीसीआई और आईसीसीआई की भ्रष्टाचार विरोधी इकाईयां सक्रिय रहती हैं पर फिक्सिंग रुकने का नाम नहीं ले रही।  इस बार मामला थोड़ा अलग है।  अभी तक फिक्सिंग का मामले मैदान से मैदान में रह जाते थे।  मैदान से अगर उठे तो ड्रांइग रूमों तक ही गये।  कभी कोई संवैधानिक जांच एजेंसी सक्रिय रूप से मैच फिक्सिंग रोकने के लिये अवसर नहीं तलाश पायी। यही कारण है कि फिक्सिंग करने वालों को लगा कि वह तो वह श्वेत पर्दे के पीछे ही रहेंगे।  अगर कोई दाग उछला भी तो श्वेत पर्दे पर ही आयेगा।  कभी कोई खाकी वर्दी वाला उनके दरवाजे तक आयेगा इसका डर किसी को नहीं था।  यही कारण है कि काली नीयत और श्वेतवस्त्र धारी बेखौफ मैच फिक्सिंग में लग रहे।  यह  कहना तो कठिन है कि दिल्ली पुलिस की कार्यवाही से आगे मैच फिक्सिंग रुक जायेगी पर इतना तय है कि अब यह कार्य केवल शातिर लोगों के बस का रह जायेगा।  जिस तरह दूसरे अपराधों में हम देखते हैं कि सामान्य मनुष्य अपराधी नहीं करता क्योंकि उसे पुलिस का डर रहता है जबकि शातिर आदमी बैखौफ कर जाता है।

       यह उन तीन युवा खिलाड़ियों को अपना दुर्भाग्य ही मानना चाहिये कि बैखौफ चल रहे मैच फिक्सिंग जैसे अपराध में किसी संवैधानिक जांच एजेंसी के हस्तक्षेप का पहला शिकार बने।  इन तीनों ने पहले किसी खिलाड़ी को इस अपराध में जेल जाते नहीं देखा। किसी खाकी वाले को किसी क्रिकेट खिलाड़ी के घर की चौखट पर डंडा बजाते हुए नहीं सुना। इनकी मासूमियत में कभी खाकी का खौफ नहीं था वरन् श्वेतवस्त्रधारियों का संरक्षण उन्हें देवता के आशीर्वाद की तरह लगता रहा था।  मासूम हमने इसलिये कहा क्योंकि इन तीनों खिलाड़ियों के खाकी वस्त्रधारी सुरक्षाप्रहरियों के सामने बिना किसी प्रयास के सारे राज खोल दिये।  शातिर अपराधियों से पुलिस इतनी आसानी से अपराध नहीं उगलवा पाती।

    इन तीनों खिलाड़ियों की वजह से तनाव झेल रही उनकी टीम के खिलाड़ियों को इनकी गिरफ्तारी के बाद खेले गये मैच में हार का सामना करना पड़ा। अनुभवी लोग उसके खिलाड़ियों के खेल पर इनकी गिरफ्तारी का तनाव साफ देख सकते थे।  बहरहाल इतना तय है कि मैच फिक्सिंग अब इतना आसान नहीं रहने वाला। दूसरी बात यह कि संविधान की सरंक्षक संस्था पुलिस का इसमें हस्तक्षेप हो गया है वह रुकने वाला नहीं है।  इससे मासूम दिल वाले नये  क्रिकेट खिलाड़ी जरूर डरेंगे।

      पुराने क्रिकेट खिलाड़ियों ने पुलिस को स्टेडियम में अपनी रक्षा करते हुए देखा है। उनके लिये वह न तो दर्शक होते हैं न प्रशंसक बल्कि केवल सरकार के वेतन भोगी उनकी सेवा में रत रक्षक होते हैं।  यही भावना नये खिलाड़ियों में घर कर गयी है। जब से देश में आंतकवाद बढ़ा है तब से क्रिकेट मैचों की रक्षा के लिये स्थानीय पुलिस प्राणप्रण से जुट जाती है।  यह अलग बात है कि इन मैचों से पैसा कमाने वाले कुछ लोगों पर आतंकवादियों को भी पैसा देने का संदेह होता है।  विदेशों में बैठे कुछ कथित अपराधियों पर मैच फिक्सिंग यानि सट्टे से पैसा कमाने के साथ ही आतंकवादियों की मदद का भी आरोप की चर्चा अनेक  प्रचार माध्यमोें पर होता रहा है। सच क्या है? यह तो कभी सामने नहीं आया पर इतना तय है कि फिक्सिंग का खेल कोई कमजोर लोगों का काम नहीं रहने वाला है। 

    पहले भी अनेक प्रकरण आये पर कभी उन पर संवैधानिक जांच एजेंसी की वक्र दृष्टि नहीं गयी।  इस बार दिल्ली पुलिस दलबल के साथ मैच फिक्सिंग पकड़ने के लिये जुट गयी। स्थिति यह कि दिल्ली की पुलिस मुंबई से कथित आरोपियों को उठा लायी।  पहले कहा जाता था कि पुलिस की बजाय किसी दूसरी एजेंसी से जांच करायी जाये क्योंकि कोई पुलिस दूसरे राज्य जाकर जांच नहीं कर सकती।  कभी कभी क्रिकेट को नियंत्रित संस्थाओं से ही कहा जाता था कि तुम कुछ करो।  फिर कहा जाता था कि मैच फिक्सिंग रोकने का कोई कानून नहंी है।  इन्हीं बातों से नये लोगों मेें मैच फिक्सिंग करने की प्रवृत्ति बढ़ी हो तो आश्चर्य नहीं समझना चाहिये। दिल्ली पुलिस ने अपने पराक्रम से यह तो बता ही दिया कि यह सब बातें गलत थी।  सट्टेबाजी रोकने के लिये पुलिस के पास कानून है। ठगी रोकने का कानून है।  हालांकि अनेक राज्यों में स्थानीय पुलिस ने मैचों पर सट्टा लगवाने वाले पकड़े हैं पर खिलाड़ियों को पहली बार पकड़ा गया है।  दूसरी बात यह भी थी अभी तक पुलिस अन्य परंपरागत अपराधों से जुझती रही है।  उसे यह मानने में बहुत समय लगा है कि इस तरह मैच फिक्सिंग भी सट्टे जैसा अपराध है जिसमें वह बिना किसी उपरी आदेश के अपना पराक्रम दिखा सकती है।

     अब एक बार अगर इस मामले में दिल्ली पुलिस ने हस्तक्षेप किया है तो उसका प्रभाव  अन्य राज्यों और शहरों की पुलिस की मानसिकता पर भी पड़ेगा।  इसलिये वह अपने रक्षित क्रिकेट खिलाड़ियों पर वह कभी भी वक्र दृष्टि डाल सकती हैं।  अभी तक मामले की जांच चल रही है।  अनेक लोग कह रहे हैं कि इससे मैच फिक्सिंग रुकने वाली नहीं है।  जिस तरह चोर और डकैत पकड़े जाते है और छूटने पर  फिर  उनका काम जारी रहता है पर हमारा सोचना है कि क्रिकेट में ऐसा नहीं होगा।  क्रिकेट भद्रजनों का खेल है। अभी तक मैच फिक्सिंग भी एक भद्र अपराध बना हुआ था मगर पुलिस के हस्तक्षेप ने इसकी परिभाषा बदल दी है।  संभव है कि सटोरिये न माने और नये खिलाड़िायों को अपने मोहरे बनाने का क्रम बनाये रखें। एक दिक्कत उनको आयेगी वह यह कि उन्हें इसके लिये शाातिर और अपराधी दिमाग के खिलाड़ियों को चुनना पड़ेगा।  हर सामान्य क्रिकेट खिलाड़ी इसके लिये तैयार नही होगा।  दूसरी समस्या उन खिलाड़ियों के साथ भी आयेगी जो मैच फिक्सिंग करते हैंे पर पकड़े नहीं जाते।  उनके पास पैसा तो खूब होगा पर चैन की नींद नहीं सो पायेंगे। पुलिस का डर अच्छे खासे की नींद हराम कर देता है।  मैच फिक्सिंग भी नहीं छोड़ पायेंगे क्योंकि उनके आका सटोरिये ऐसा करने नहीं देंगे।

  कुछ विद्वान कह रहे हैं कि कुंऐ में भांग नहीं है बल्कि कुंआ ही भांग वाला है। बहरहाल अब क्रिकेट खिलाड़ियों की मैदान पर हर गतिविधि पर नज़र रखी जायेगी। पुलिस के अनुसार खिलाड़ियों ने सट्टेबाजों के अनुरूप गेंदबाजी करने से पूर्व तौलिया पैंट पर लटकाने, शर्ट को ऊपर नीचे करने तथा हाथ पर हाथ फेरने के संकेत देने की बातें कही थीं।  इससे होगा यह कि कोई किकेट खिलाड़ी अगर कहीं छींक देगा, कभी नाक रगड़ेगा या अपने ही बालों पर हाथ फेरेगा  तो लोग समझेंगे कि अपने आका सटोरिये को संदेश दे रहा है।  पहले फिक्सिंग के आरोपों के कारण हमने क्रिकेट देखना बंद कर दिया था पर अब यह देखने के लिये कभी देखेंगे कि खिलाड़ी कैसे कैसे संकेत बनाता है।  पहले  यह जानकार दुःख हुआ कि हमने फिक्स मैचों को सच समझा पर अब फिक्स मैंचों को देखकर व्यंग्य का आनंद लेंगे।  वैसे भी क्रिकेट मैचों को अब फिल्म की तरह दिखाया जाने लगा है।  ऐसा लगता है कि मैचों के परिणाम की पटकथा लिखी जाती है।  किसी की लिखी पटकथा आनंद उठाने में हर्ज ही क्या है?

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर

poet, writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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