राजनीति में संधाय आसन की प्रासंगिकता-हिंदी लेख


                बाबा रामदेव ने फिर अपना आंदोलन प्रारंभ किया है।  उन्होंने तारीख चुनी है नौ अगस्त जिस दिन स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारत अंग्रेजों का नारा बुलंद किया गया था।  मूलतः बाबा रामदेव एक योग शिक्षक हैं यह अलग बात है कि उन्होंने अपने व्यवसायिक प्रयासों ने भारतीय योग विद्या को जिस तरह प्रचार माध्यमों में प्रतिष्ठित किया उससे उनके भक्त उनमें देवत्व के दर्शन करते हैं।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनके योग प्रचार की क्षमताओं को कोई चुनौती नहीं देता।  देना चाहिए भी नहीं क्योंकि उन्होंने जो किया है वह आसानी से नहीं किया जा सकता।

योगासन और प्राणायाम से मनुष्य के अंदर जिस मनुष्यत्व की स्थापना स्वतः होती है उसका अनुभव तो केवल गुरु और उनके साधक ही कर सकते हैं। इसमें संदेह नहीं है मगर इसका आशय यह कतई नहीं है कि योग साधक या गुरु मनुष्यत्व में ज्ञान तत्व की स्थापना कर सकें।  हमारे देश में एक बात देखी जाती है कि लोग हर विषय में ज्ञानी होने का दावा करते हैं। स्थिति यह है कि कोई भी किसी भी व्यवसाय में कूद जाता है।  अगर कोई सार्वजनिक महत्व का काम हो तो सभी अपना महत्व सिद्ध करने  लगते हैं।  खासतौर से जब ज्ञान की बात हो तो प्राचीन ग्रंथों से पढ़ी बात को कोई भी सुना सकता है।

बाबा रामदेव आष्टांग योग में आसन और प्राणायाम में सिद्ध हस्त हैं पर जिस तरह वह जिस सामाजिक अभियान को चला रहे हैं उसके लिये राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना आवश्यक है।  वही क्या हमारा मानना है कि राजनीति में आने वाले हर व्यक्ति को राजनीति शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए।  हमारे यहां पद प्राप्ति को ही राजनीतिक लक्ष्य और उपलब्धि माना जाता है। इतना ही नहीं जो बरसों से पदासीन रहे उसे चाणक्य तक कहा जाता है।  राज्य में पद प्राप्त करने वाले की प्रजा के प्रति जो जिम्मेदारी होती है और उसका निर्वाह करने के लिये जो तरीके हैं उसका ज्ञान कितनों को होता है यह अलग से विचार का विषय है।

बाबा रामदेव के बारे में हमारी धारणा है कि उनके अंदर किसी सामान्य मनुष्य की अपेक्षा अधिक दैहिक तथा मानसिक शक्ति है जो योग साधना का परिणाम है।  इस शक्ति का उपयोग करने के लिये जिस ज्ञान की आवश्यकता होती है उसमें अवश्य संदेह होता है।  इसके लिये आवश्यक होता है संबंधित विषय का ज्ञान होना और बाबा रामदेव राजनीति शास्त्र के अध्ययन के बिना राष्ट्रहित का आंदोलन चलाने निकल पड़े हैं।

इस बार के आंदोलन में उनका ध्येय अस्पष्ट है।  तेवर ढीले हैं।  अन्ना हजारे के साथ उन्होंने कुछ ही दिन पहले संयुक्त रूप से पत्रकार वार्ता की थी उसमें दोनों ने साथ साथ रहने की कसम खाई थी।  अन्ना हजारे अपना आंदोलन बीच में खत्म कर अपने गांव वापस चले गये।  उन्होंने जिस तरह अपना आंदोलन खत्म किया वह अत्यंत निराशाजनक था।  हमारे जैसे निष्पक्ष आम लेखकों का मानना है कि अन्ना हजारे हों या स्वामी रामदेव इन दोनों के राष्ट्र सुधार के लिये किये गये आंदोलन केवल प्रचार माध्यमों के सहारे ही लंबे चले।  तब दोनों आंदोलनों के समाचारों और बहसों के बीच हर मिनट में विज्ञापन के दर्शन होते थे।  चूंकि आंदोलन गंभीर मुद्दों पर सतही योजना पर आधारित रहे हैं इसलिये लोगों की इनमें दिलचस्पी अधिक नहीं रही।  यही कारण है कि अब प्रचार माध्यम इनसे दूरी बना रहे हैं क्योंकि उनके प्रबंधकों को नहीं लगता कि दिन भर इनके सहारे विज्ञापनों का समय पास किया जा सकता है।

बहरहाल बाबा रामदेव दिल्ली के रामलीला मैदान में जो आंदोलन कर रहे हैं उसमें वह संधाय आसन करते हुए दिख रहे हें

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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अरेश्व विजिगीषोश्व विग्रहे हीयामानयोः।

सन्धाय यदवस्थानं सन्धायान्मुच्यते।।

हिन्दी में भावार्थ- जब दोनों शत्रु युद्ध में हीन हो उस समय मिल बैठ रहने को संधाय आसन कहते हैं।

पहले जब वह अनशन पर बैठे थे तब विदेशों में जमा भारत के  काले धन को देश में लाने के मुद्दे पर जमकर गरजे थे।  उनके शत्रु कौन है यह तो पता नहीं पर काले धन को लेकर वह जब आक्रामक रवैया अपनाये हुए थे तब लग रहा था कि  पर्दे के पीछे कोई न कोई शत्रु है जिससे वह ललकार रहे हैं।  विदेशों में काला धन रखने वालों को उन्होंने राष्ट्र का शत्रु तक घोषित कर दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने उनके नाम तक अपने पास होने का दावा करते हुए कहा था कि समय आने पर बता दूंगा।  इस बार वह केवल हवा में अपनी बातें उछाल रहे हैं।  हम किसी के विरोधी नहीं है।  हमारा कोई शत्रु नहीं है।  आदि आदि मीठी बातें करते हुए वह ऐसे लगते हैं जैसे कि सामने बैठी भीड़ की बजाय कहीं दूर बैठे अज्ञात लोगों को प्रसन्न कर रहे हैं।

बाबा रामदेव के  विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही की संभावना भी नहीं लगती। ऐसा लगता है कि पर्दे के पीछे विराजमान उनके शत्रु भी अब शांत हो गये हैं।  कम से कम अभी तक बाबा रामदेव ऐसे लग रहे हैं कि जैसे कि खानापूरी करने आये हों और उनके अभियान से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है।  बाबा रामदेव को शायद पता नहीं होगा  आसनों के प्रकार पतंजलि योग में कहीं नहीं बताये गये पर के कौटिल्य महाराज ने अपने शास्त्र में अनेक आसनों का जिक्र किया है।  उनसे यह भी पता चलता है कि बैठने या उठने के ही आसन नहीं होते बल्कि मनुष्य की मानसिक तथा शारीरिक क्रियाओं के साथ ही व्यवहार के भी आसन होते हैं।  रामलीला मैदान में आंदोलन समाप्त होने के बाद वह आपस में द्वंद्वरत लोगों को हिंसा की बजाय संधाय आसन करने की प्रेरणा दे सकते हैं ताकि देश में मैत्रीवत भावना का विकास हो।

वि, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर

poet,writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwaliro

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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