चुनाव परिणाम और चमत्कार के आशा-हिन्दी लेख


मतदाता खुद चमत्कार नहीं करते-हिन्दी व्यंग्य
लेखक दीपक भारतदीप
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                  चुनाव के समय नेताओं के आचरण पर अनेक तरह के कटाक्ष देखने को मिलते हैं मगर आम मतदाता पर कोई कुछ नहीं लिखता। यह मान लिया जाता है कि वह तो चेतन को धारण करने वाला जड़ वस्तु है। जैसा कहा जाएगा वैसा वह बिना हील हुज्जत के करेगा। स्थिति यह है हास्य कवि और व्यंग्यकार चुनावों के मौसम में नेताओं पर अनेक हास्य और व्यंग्य लिखकर और सुनाकर वाहवाही लूटते हैं। ऐसे में हम जैसे लोग धारा से अलग होकर लिखने की फिराक में रहते हैं। फोकटिया हैं इसलिए लिखने का मन नहीं करता। सोचते हैं कि कोई दूसरा लिखे तो हमारी भड़ास स्वयमेव ही ठंडी हो जाएगी। जब ऐसे नहीं होता तो लाचार और मजबूर होकर खुद ही लिखने बैठ जाते हैं। तनाव से मुक्ति का यह मार्ग भी कि आप अपने अंदर चल रही हलचल को बाहर अभिव्यक्त करें। फिर हम जैसे लेखक तो आत्ममुग्ध होते ही हैं जिनको लगता है कि चार लोगों में चर्चा कर क्या अपनी तौहीन कराएं सो कहीं लिखकर चाप दें। चापना इसलिए लिखा क्योंकि हमारे यहाँ छापना केवल दूसरों के अखबारों में ही होता है। बाकी लिखकर अपने यहाँ रख लिया तो उसे चापना ही कह सकते हैं।
         कुछ लोग पूछें कि मतदाताओं पर भला क्या लिखा जा सकता है? वह तो निरीह प्राणी है। हम नहीं मानते कि एक आम मतदाता के रूप में निरीह प्राणी है। कहते हैं कि गीदड़ कि तरह बरसों जीने से अच्छा है कि शेर कि तरह एक दिन जिया जाए। बाकी लोगों के क्या कहें हम स्वयं ही कभी मतदान के दिन शेरदिली का परिचय नहीं दे पाये। हम नहीं दे पाये तो बाकी लोग तो दे ही सकते थे, यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं। हाँ ! इस तरह दूसरों पर दोष देकर अपने आपको बारी कर देने में भी जिंदगी का सुख अनुभव होता है।
           इधर पाँच राज्यों में चुनाव समाप्त हुए तो संभावित परिणामों के विश्लेषण भी आ गए। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, इसमें हमारी दिलचस्पी नहीं है। कोय नृप हो हमें क्या हानि की तर्ज पर चलकर अनेक लोगों ने सुख पाया हम भी ले रहे हैं। नेताओं पर हास्य व्यंग्य करना हमें आता नहीं है। इधर यह भी लगता है कि एक आम मतदाता के रूप में हम स्वयं भी कम हास्यास्पद काम कम नहीं करते हैं।
             जब टीवी चैनलों पर इन चुनावों के संभावित परिणामों पर विश्लेषण सुने तो लगा कि आम मतदाता के मानस का विश्लेषण इस तरह हो रहा है जैसे वह जड़ हो। वह जाति के आधार पर मत डालेगा। अपने पूरे दिन में आने वाली समस्याओं से दूर होकर अपने धर्म को बचाने के लिए दूसरों के बहकावे पर वोट डालेगा। लब्बोलुवाब यह कि वह देश राज्य और शहर में परिवर्तन के लिए आम मतदाता स्वयं कोई चमत्कार नहीं करेगा। हाँ, एक विद्वान ने जो कहा उसका आशय यही था।
         वह विद्वान सही था या गलत इस पर हम कुछ नहीं कहेंगे, मगर एक एक बात तय है वाकई हमने आम मतदाताओं को कभी ऐसा चमत्कार करते नहीं देखा कि प्रायोजित प्रवाहित धाराओं से अलग कोई अप्रायोजित धारा बही हो। केवल एक दिन शेर की तरह जीने का अवसर मिलता है पर क्या बहुमत में उसका कभी प्रभाव दिखा है। लोग चार पाँच बुरों में एक कम बुरा चुनता है। यहाँ तक कि उसका निर्णय अपने आत्मविवेक से नहीं बल्कि प्रचलित संगठित प्रचार माध्यमों के प्रभाव में करता है। यही कारण है कि कभी ऐसा नहीं सुना गया कि कोई कम प्रचारित असंगठित उम्मीदवार जीतने का चमत्कार कर सका हो। मतलब यह कि जो लोग पाँच बरस तक यह उम्मीद करते हैं कि उनके हित के लिए कोई चमत्कार करे वह एक दिन का अवसर आने पर स्वयं कुछ नहीं करते। बस, संगठित प्रचारित धाराओं में बहते हुए चमत्कार कि सोचता है। कौन समझाये कि आधुनिक लोकतंत्र में चमत्कार बहुमत करता है न कि कोई एक व्यक्ति। भ्रष्टाचार को एक लोकपाल हटा देगा, यह भ्रम अपने यहाँ खूब चल रहा है। यह भ्रम फैलाने वाले भी नेताओं पर बरसते हैं पर मतदाता से चमत्कार को नहीं कहते क्योंकि वह एक आम आदमी है जिसका भीड़ में भेड़ की तरह करना है। अगर वाकई मतदाता चमत्कार करने लगे तो फिर यहाँ किसी भी आंदोलन से कोई महापुरुष नहीं बनेगा। भावावेश में आम इंसान आकर उनके पीछे भी चल पड़ता है। इस आशा के साथ कि शायद कोई चमत्कार हो जाएगा।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://rajlekh.blogspot.com

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