भंवरी देवी प्रकरण;मीडिया कर्मियों पर हमला निंदनीय-हिन्दी लेख (bhanwari devi and indian media-hindi article)


           राजस्थान में भंवरी देवी के गायब होने का मामला गरमाया हुआ है। इसमें संदिग्ध आरोपियों को लेकर भारतीय प्रचार माध्यम या मीडिया अपने अनुसार समाचार दे रहा है। वैसे तो हमारे देश के प्रचार कर्मियों की आदत है कि वह कानूनों की धाराओं को जाने बगैर ही किसी भी विषय अपने मुकदमा चलाने लगते हैं-यह अलग बात है कि वह कभी सही तो कभी गलत लगते हैं। कथित आरोपी को दोषी या अपराधी कहते हुए उनको यह ज्ञान नहीं होता कि अभियुक्त और अपराधी में अंतर होता है। अनेक बार यह भी देखा गया है कि किसी हादसे पर प्रचार माध्यम इस कदर आक्रामक हो जाते हैं कि डर लगता है कि किसी निर्दोष पर मुकदमा न बन जाये-न्यायालयों में हालांकि निर्दोष बरी हो जाते हैं पर फिलहाल तो उनका धन और समय तो बर्बाद हो ही जाता है। सच बात तो यह है कि अनेक मामलों में प्रचार कर्मियों का काम न केवल दिलचस्प होता है वरन् उनके साहस की प्रशंसा करने का मन करता है, लेकिन मुश्किल यह है कि कई बार प्रचार कर्मी अपनी शक्ति को भूल जाते हैं अधिक तेजी से प्रहार करते हैं। उनको यह पता होना चाहिए कि कभी अपनी शक्ति के उपयोग में लाभ है तो कई बार निष्क्रिय हो जाने के भी लाभ हैं। भंवरी देवी प्रसंग में उन्हें अपने ही विरुद्ध बयान देकर हमले को एक तरह से आमंत्रण दिया।
             हम यह मानते हैं कि आजकल प्रचार माध्यमों के कर्मचारियों की सक्रियता ने देश को एक नया आयाम दिया है। भंवरी देवी प्रसंग में एक सीडी जारी करने का प्रयास बुरा नहीं था। इस मामले में हम प्रचार माध्यमों के इरादों से जाकर भी आगे जाकर उनका समर्थन करेंगे। पहली बात तो श्लीलता और अश्लीलता की है। भंवरी देवी के मामले में सीडी दिखाते वक्त प्रचार माध्यमों को कोई सफाई नहंी देना चाहिए था। न ही इस तरह डर डर कर धुंधली दिखाना चाहिए थी। एक भारतीय अध्यात्मिक लेखक के रूप में हमारा मानना है कि स्त्री के सम्मान की रक्षा करना चाहिए पर जहां कोई स्त्री अपनी सीडी स्वयं बनवाये तो उसे दिखाने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। हालांकि भंवरी देवी प्रसंग में यह कहना कठिन है कि सीडी उसने स्वयं बनवायी पर इतना तय है कि वह कहीं न कहीं उसका उपयोग करना चाहती थी। अगर देश के कुछ शिखर पुरुष इस तरह सीडी दिखाने का विरोध करते हैं तो लगता है कि कहीं न कहंी उनका भय ही शालीनता की बातें करवा रहा है।
            यह सीडी दिखाने के बाद कथित अभियुक्तों के परिवार की एक सदस्या ने मीडिया पर नाराजगी दिखाई। उसने यहां तक कह दिया कि ‘कोई टीवी चैनल मत देखो, अखबार मत पढ़ो और इनके कैमरे तोड़ डालो।’
अगले दिन यही हुआ। मीडिया पर हमले हो गये। अब यहां सब उनकी निंदा कर रहे हैं पर अगर हमारा विचार है कि मीडिया कर्मी और उनके संगठन स्वयं भी इसके लिये कम जिम्मेदार नहीं है। आखिर अपने ही विरुद्ध आ रहे इस संदेश को प्रसारित करने की आवश्यकता क्या थी? इस तरह प्रचार कर्मी अपनी निष्पक्षता का दंभ तो भर सकते हैं पर अपने ही विरुद्ध हिंसा को उकसाने के आरोपी वह स्वयं भी हो जाते हैं जैसे कि वह महिला नेत्री है जो कथित रूप से आरोपी की पत्नी है। मीडिया से सभी अपेक्षा करते हैं कि वह कहीं भी हिंसा भड़काने वाली बातों वाले समाचारों से दूर रहें पर क्या इससे उनको अपने ही विरुद्ध हिंसा होने देने की छूट मिल जाती है?
         जहां तक भंवरी देवी प्रसंग का संबंध है, हम उससे जुड़े विषय पर प्रचार माध्यमों पर नजर ही रखे हुए हैं। हमारा मानना है कि अगर प्रचार माध्यम उस महिला के बयान को प्रचार नहीं करते तो शायद उसके समर्थकों तक इतनी तेजी से संदेश नहीं पहुंचता। हो सकता है हमार यह विचार गलत है पर इतना तय है कि इस तरह सामूहिक संदेश को प्रचार माध्यमों में स्थान मिलने से उसकी प्रहार शक्ति बढ़ गयी।
        प्रचार कर्मियों को अपने कार्य से अपने प्रबंधकों को खुश करना है तो उन्हें काफी पापड़ बेलने ही पड़ेंगे। प्रचार कर्मियों को हम कुछ सिखायें यह हमारी औकात नहीं है पर इतना जरूर कह सकते हैं कि हम लोग उनके माध्यम से ही सब देख सुन पाते हैं। उनका मनोबल बना रहे यह हम चाहते हैं पर साथ ही यह आग्रह भी करते हैं कि वह ऐसे लोगों के बयानों को स्थान कतई न दें जो उनके विरुद्ध हिंसक और घृणित वातावरण बनाते हैं। अभी आज ही यह पढ़ने को मिला कि प्रचार माध्यम स्वयं ही अपने ऊपर अनुशासन का डंडा चलोयेंगे। बाबाओं को नहीं दिखायेंगे, अंधविश्वास नहीं फैलायेंगे आदि आदि! यह प्रयास प्रशंसनीय है। मगर हम देश के लोगों से भी यह सवाल करते रहेंगे कि आखिर वह ऐसे कार्यक्रमों में अपना दिल दिमाग क्यों लगाते हैं? क्या वह बुद्धिहीन हैं जो इनसे विचलित होते है? प्रचार कर्मियों का काम है हर विषय पर प्रस्तुति करना! अनेक लोग इसमें लगे हुए हैं। उनके प्रसारणों के लिये उनकी आलोचना की जा सकती है पर निंदा स्वीकार्य नहीं है। जिस देखना है कार्यक्रम देखे जिसे नहीं देखना है न देखे। प्रचार कर्मियों को अनुशासित होने का उपेदश देने वाले स्वयं आत्म अनुशासित क्यों नहीं होते? समाज को इसके लिये प्रेरित क्यों नहीं करते?
         बहरहाल इस तरह प्रचार कर्मियों पर हमला होना ठीक नहीं है। उनका मनोबल न गिरे हम यही अपेक्षा करते हैं। सच बात तो यह है कि जिसके अनुकूल खबर हो पर खुश हो जाता है और जिसे प्रतिकूल हो वह बिफरने लगता हैं। ऐसे में प्रचार कर्मियों के लिये तालियां और गालियां दोनों ही जीवन का हिस्सा बन ही जाती हैं। इस घटना में घायल प्रचार कर्मी जल्दी स्वस्थ हों यह हमारी कामना है।
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लेखक संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
athour and writter-Deepak Bharatdeep, Gwalior

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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