कुछ समझें कुछ समझायें-हिन्दी व्यंग्य लेख (samjha ka fer-hindi vyangya lekh)


               इस संसार में मनुष्य समुदाय में यह भ्रम सदैव रहता है कि वह एक दूसरे को समझा सकते हैं। कोई व्यक्ति निरंतर गलतियां करता है, दुर्व्यवहार करता है या फिर व्यसनों में अपना जीवन नष्ट करता है। लोग उसे समझाते हैं कि ‘यह मत करो’ वह ‘मत करो’।
            कोई अपनी बात को लेकर जिद पर अड़ा है कि वह जो काम कर रहा है तो करता रहेगा। लोग समझाते हैं कि ‘मत करो, ‘मत करो’ पर वह मानता नहीं।
            जिसे दूध में मिलावट करना है उसे चाहे लोग उपदेश दो वह बाज नहीं आयेगा। जिससे बेईमानी और चोरी करने की आदत है वह कभी सुधरेगा यह संभव नहीं है। मगर लोग एक दूसरे को समझाते हैं पर कोई किसी की नहंी समझता। यह समझाने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है पर परिणाम शून्य बटा शून्य!
यह समझाने की प्रक्रिया एकतरफा है क्योंकि दूसरी तरफ समझने का काम नहीं होता दिखता। यहां हर जगह समझाने वाले मिल जायेंगे पर समझने वाला कहीं नहीं मिलेगा।
         पिता ने पुत्री से कहा-‘‘देखो जिस लड़के के साथ तुम दोस्ती बढ़ा रही हो वह ठीक नहीं है। तुम मेरी बात समझो वरना बाद में पछताओगी।’’
         पुत्री बोली-‘‘पापा, आपको गलतफहमी है। वह अच्छा लड़का है। कोई आपको भड़का रहा है। आप मेरी बात समझिये। वह हाथ आ गया तो बिना दहेज के मेरी शादी हो जायेगी। वैसे भी आपकी दहेज देने की हैसियत नहीं है।’’
          पिता चुप हो गये। बाद में बेटी की मां ने अपने पति से कहा-‘आप इतने प्यार से उसे मत समझाईये। थोड़ा गुस्सा दिखाईये। तभी उसे समझ में आयेगा।’
          पति ने कहा-‘भला, तुम कभी गुस्से से से मेरी बात समझी हो जो तुम्हारी लाडली समझेगी।’
          पत्नी भी तुनक कर बोली-‘तुम भी भला कहां समझते हो? तुम रोज सिगरेट पीते हो, और मौका मिल जाये तो शराब पीते हो। समझदानी की नाम तो तुम्हारे खानदान में किसी के पास नहीं है। मेरी लाड़ली है तो क्या? खून तो तुम्हारे खानदान का ही है।’
          समझदारी पर बहस सभी जगह जारी है। समझाने में सब होशियार पर समझने में सब पैदल!
         मां अपने बेटे को समझा रही है कि ‘बेटे, तुम जिस लड़की से नैन मटका कर रहे हो उसका चरित्र ठीक नहीं है। ऐसा तुम्हारे दोस्तों ने ही मुझे बताया। तुम मेरी बात समझो और उससे किनारा कर लो।’’
          बेटा बोला-‘मां तुम तो पुराने जमाने की हो नये समय की बात नहीं समझोगी।’
          ढोल साहब ने पोल साहब से कहा-‘यार, सारा दिन कार में बैठकर मत घूमा करो। इससे मोटापा और उससे होने वाले हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, और मधुमेह तथा वायु विकार जैसे रोग बढ़ जायेंगे।’
          पोल साहब ने कहा-‘तुम भी इतना पैदल मत घूमा करो। सड़क पर धूल बहुत उड़ती है। तुम्हें दमा, खांसी, आंखों में जलन तथा दूसरी बीमारियां हो जायेंगी जो पैदल चलने से होती हैं।
             समझाना आत्म मुग्धता की स्थिति है और समझने की प्रक्रिया के लिये गुजरने के लिये आत्म मंथन की कक्षा में जाना पड़ता है जिसमें छात्र की तरह कोई प्रवेश नहीं करना चाहता। इस संसार में सभी लोग मानते हैं कि वह विद्वान हैं और उनको मूर्खों को समझाने का अधिकार है। समझदार की स्वअर्जित यह पदवी सभी ने धारण कर ली है।
             यह मानवीय स्वभाव है, मगर सभी ऐसे नहीं होते। दरअसल जो दूसरों को नहीं समझाते वही समझदार हैं। ऐसे समझदार यह सोचते हैं कि ‘जब हम ही किसी की बात नहीं समझते तो भला दूसरा हमारी बात क्या समझेगा।’
          दूसरे को अपनी गलतियों के प्रति उसका ध्यान आकृष्ट करना अच्छी बात है पर इसके लिये जरूरी है कि वह पूछे भी उसे हल बताया जाये। बिना पूछे सलाह देने वाले बहुत हैं क्योंकि उसमें कोई पैसा खर्च नहीं होता। अलबत्ता आपने काम के समय अज्ञानतवाश उसे न कर पाने वाले लोग भी दूसरी से सलाह लेने से बचते हैं। डर लगता है कि कोई उनके अज्ञान को परख न ले।
          दूसरी बात यह भी है कि लोग आंख और मुंह तो खुला रखते हैं पर कान खुला कोई नहीं रखता। सभी डरते हैं कि कहीं अगर वह खुला तो मुंह बंद हो जायेगा। अपनी भड़ास मन में रह जायेगी दूसरी की कान छेदकर हमारे अंदर आयेगी। लोगों की कोशिश यही रहती है कि अपनी बात बाहर जाये पर किसी की बात हमारे कान में न आये। लोग चीखते हैं, चिल्लाते हैं, कोई उनकी बात समझे इसके लिये हर कोई यत्नशील है पर समझना कोई नहीं चाहता।
         न हमारी कोई समझेगा न हम किसी की समझेंगे तो किया क्या जाये। एक ही तरीका है कि ‘मौन’ का मार्ग अपनायें। न बोलेंगे तो इसका अफसोस नहीं होगा कि किसी ने हमारी बात नहीं मानी। मौन का मतलब केवल मुंह बंद रखना ही नहीं है बल्कि समूची इंद्रियों  को निचेष्ठ करने से है। हां कान भी बंद कर लें ताकि कोई अपनी बात न समझाये। यही कारण है कि समझदार व्यक्ति मौन रहते हैं जो मौन रहते हैं उनको समझदार माना जाता है।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
poet, writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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