तारीख से तारीख-हास्य व्यंग्य


उसे एक ट्रक ने कुचल दिया और उसके बाद वह कौमा में चला गया। उसके परिवार वालों ने मामला दर्ज कराया। मुकदमा चला पर तारीख दर तारीख लगती रही। इधर परिवार वाले परेशान थे। उनको एक मनोचिकित्सक ने बताया था कि जब उनके मरीज को दिमागी रूप से बहुत आघात पहुंचा है जब मुकदमे के अपने पक्ष में परिणाम आने की खबर सुनेगा तब उठ खड़ा होगा।
परिवार वालों ने डाक्टरों से कहा-‘तब तो इसे झूठी खबर सुना देते हैं ताकि उठ कर खड़ा हो जाये।’
डाक्टर ने कहा-‘अगर बाद में इसे पता लगा कि यह खबर झूठी है तो यह तुरंत स्वर्ग सिधार जायेगा।’
अब घर वाले क्या करें? वह हर बार आकर उसे बताते कि ‘तारीख लगी है।’
डाक्टरों ने उनसे कहा था इसे जिंदा रखने के लिये मुकदमें के बारे में बताते रहें क्योंकि कौमा में जाने से पहले वह चिल्ला रहा था ‘‘मुआवजा’’, ‘‘मुआवजा’’।
मुकदमा चलते चलते छब्बीस साल बीत गये और जिस दिन उसके पक्ष में फैसला हुआ उसको सुनने से पहले ही पह ‘तारीख पर तारीख’ कहता हुआ स्वर्ग सिधार गया।
ऊपर सर्वशक्तिमान के पास पहुंचा तो वहां भी चिल्लाने लगा‘ ‘‘तारीख पर तारीख’’, ‘‘मुआवजा’’ ‘‘मुआवजा’’।’
सर्वशक्तिमान ने उसके मुंह पर जल छिड़का और उससे कहा‘मूर्ख, यह क्या बक रहा है। एक तो छब्बीस साल से मेरा नाम नीचे नहीं जपा और सामने आया है तो दुआ सलाम तो दूर अपना मुकदमा यहां पर भी लेकर आ गया।’
वह आदमी बोला-‘यह भला क्या बात हुई। न नीचे इंसाफ मिला और न आप दे रहे हैं। यह कैसी दुनियां मैंने बनायी है।’
सर्वशक्मिान ने कहा-‘यह दुनियां मैंने बनाई है पर चला तो तुम इंसान ही रहे हो। तुमसे किसने कहा था कि उस रोड पर जाओ जहां ट्रक चलते हैं।’
उस आदमी ने कहा-‘चलिये, आपकी बात सिर आंखों पर, मेरा एक भाई एक कारखाने में गैस रिसने से मर गया था, उसका भी यही हुआ। वह यहां आया होगा, क्या आपने उसे इंसाफ दिया।’
सर्वशक्तिमान ने कहा-‘कमबख्त, उसे तो मैंने न स्वर्ग दिया न नरक! दोनों के बीच एक गैस चैंबर है वहीं रखा है। उसे तो अब वही गैस पसंद आ रही है। वह अपनी सांसों के साथ ही प्रदूषण यहां लाया और सभी जगह फैला रहा था। स्वर्ग में तो उसे जगह देने का सवाल ही नहीं और नरक के लोग भी बुरे हैं पर उनकी रक्षा की जिम्मेदारी तो हमारी है इसलिये उसे वहां नहीं रखा। उसे भी क्या न्याय दूं वह उस गैस कारखाने के पास से गुजर ही क्यों रहा था?’
उस आदमी ने कहा-‘यह भला क्या बात हुई? यहां से क्यों जा रहे थे, वहां से क्यों आ रहे थे? न नीचे न्याय न ऊपर!’’
सर्वशक्मिान ने उससे कहा-‘अब तू कुछ भी बहाना बना! तेरे कर्मों का हिसाब तो होगा पर उसमें यह मुकदमा कोई मदद नहीं करेगा।’
इससे पहले कि कुछ सर्वशक्तिमान के दूत उसे दूर घसीट कर ले गये। एक दूत दाो बोला-‘कमबख्त, यहां हिन्दुस्तान से जो आदमी भी आता है अपने सांसरिक मुकदमें की बात करता है ताकि उसके बाकी कर्म भुला दिये जायें। ऐसी चालाकी अब नहीं चलने की। अरे, तू किस्मत वाला है कि तेरे मरने से पहले ही तेरे पक्ष में फैसला हो गया वरना हमारे यहां तो ऐसी चार पीढ़ियों के लोग ‘न्याय’ कहकर चिल्ला रहे हैं जो एक ही मुकदमा लड़े पर फैसला नहीं हुआ। कुछ तो ऐसी भी है कि जिनकी पाचवीं पीढ़ी भी आने को तैयार खड़ी है।’
वह आदमी यह सुनकर खुश हुआ कि ‘उसके मरने से पहले उसके मुकदमें का फैसला हो गया था। तब वह उस दूत से बोला-‘यार, अगर कहीं से उधार दिलवा दो तुम्हें मिठाई खिला दूं।’
दूत बोला-‘बेटा, हमें रिश्वत देने की बात मत कर! यहां पहले मेहनत कर और पैसे कमा क्योंकि तेरे मुकदमें में तेरे तीन वकील ऐसे हैं जो यहां तेरे से फीस लिये बिना आये और उनका पैसा न देना तेरे पाप कर्म में शामिल है। उनका पैसा देने से तु बेईमानी के आरोप से बच जायेगा पर देरी से देने की सजा तो तुझे मिलेगी चाहे कुछ भी कर! यह धरती नहीं है कि विलंब की सजा से बच जायेंगा। ’
उस आदमी के होश उड़ गये। वह फिर चिल्लाने लगा ‘तारीख पर तारीख’ और ‘मुआवजा’, मुआवजा।’

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कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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