अपनी बात-हिन्दी संपादकीय (apni baat-hindi editorial)


गजरौला टाईम्स में छपी इस ब्लाग लेखक को अपनी कविता एक ब्लाग पर पढ़ने को मिली। एक पाठक की तरह उसे पढ़ा तो मुंह से अपनी तारीफ स्वयं ही निकल गयी कि ‘क्या गज़ब लिखते हो यार!’
अपनी पीठ थपथपाना बुरा माना जाता है पर जब आप कंप्यूटर पर अकेले बैठे हों तो अपना मनोबल बढ़ाने का यह एक अच्छा उपाय है।
पिलानी के एक विद्यालय ने अपनी एक पत्रिका के लिये इस ब्लाग लेखक की कहानी प्रकाशित करने की स्वीकृति मांगी जो उसे सहर्ष दी गयी। अनुमति मांगने वाले संपादक ने यह बताया था कि ‘यह कहानी जस की तस छपेगी।’ जब इस लेखक ने स्वयं कहानी पढ़ी तो उसमें ढेर सारे शब्द अशुद्ध थे। तब उसमें सुधार कर उसे फिर से तैयार किया गया। वह कहानी पिलानी के उस विद्यालय के संपादक को भेजने के बाद यह लेखक सोच रहा था कि बाकी के ब्लाग पर पढ़ने लायक रह क्या गया? एक बेहतर कहानी थी वह भीे हाथ से निकल कर दूसरे के पास पहुंच गयी।
अपने लिखे पर अपनी राय करना व्यर्थ का श्रम है। उससे ज्यादा बुरी बात यह है कि अपने लिखे पर स्वयं ही फूलना-ऐसी आत्ममुग्धता वाले अधिक समय तक नहीं लिख पाते। अपनी लेखकीय जिम्मेदारी पूरी कर सारे संकट पाठकों के लिये छोड़ देना चाहिये। जब अधिक लिखेंगे तो उच्च, मध्यम तथा निम्न तीनों श्रेणियों का ही लेखन होगा। संभव है कि आप अपना लिखा जिसे बेहतर समझें उसके लिये पाठक निम्न कोटि का तय करें और जिसे आप निम्न कोटि का पाठ समझें वह पाठक दर पाठक जुटाता जाये-कम से कम इस लेखक का अनुभव तो यही कहता है।
यही स्थिति पढ़ने की है। आप किसी के पढ़े को निकृष्ट समझें पर अधिकतर लोग उसे सराहें, ऐसी संभावना रहती है। ऐसे में किसी दूसरे के लिखे पर अधिक टिप्पणियां नहीं करना चाहिये क्योंकि अगर आपको किसी ने चुनौती दी कि ऐसा लिखकर तो बताओ’, तब आपकी हवा भी खिसक सकती है। अगर आप लेखक नहीं है तो लिखने की बात सुनकर मैदान छोड़कर भागना पड़ेगा और लेखक हैं तो भी लिख नहीं पायेंगे क्योंकि ऐसी चुनोतियां में लिखना सहज काम नहीं है। लेखकीय कर्म एकांत में शांति से ही किया जा सकता है।
हिन्दी ब्लाग जगत पर लिखने वालों की सही संख्या का किसी को अनुमान नहीं है। स्वतंत्र और मौलिक लेखकों के लिये यहां श्रम साधना केवल एक विलासिता जैसा है। ऐसे में उनकी प्रतिबद्धतायें केवल स्वांत सुखाय भाव तक सिमटी हैं। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि संगठित प्रचार माध्यमों से -टीवी चैनल, समाचार पत्र पत्रिकायें तथा व्यवसायिक संस्थाऐं- अधिक क्षमतावान लेखक यहां हैं। कुछ लेखक तो ऐसे हैं कि स्थापित प्रसिद्ध लेखक कर्मियों से कहंी बेहतर लिखते हैं। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर आकर ही यह जानकारी इस लेखक को मिली है कि स्थापित और प्रसिद्ध लेखक कर्मी अपने लेखन से अधिक अपनी प्रबंधन शैली की वजह से शिखर पर हैं। शक्तिशाली वर्ग ने हिन्दी में अपने चाटुकारों या चरण सेवकों के साथ ही अपने व्यवसायों के लिये मध्यस्थ का काम करने वाले लोगों को लेखन में स्थापित किया है। परंपरागत विद्याओं से अलग हटकर ब्लाग पर लिखने वालों में अनेक ऐसे हैं जिनको अगर संगठित प्रचार माध्यमों में जगह मिले तो शायद पाठकों के लिये बेहतर पठन सामग्री उपलब्ध हो सकती है मगर रूढ और जड़ हो चुके समाज में अब यह संभावना नगण्य है। ऐसे में समाचार पत्र पत्रिकाऐं यहां हिन्दी ब्लाग जगत पर जब बुरे लेखन की बात करते हैं तो लगता है कि उनकी मानसिकता संकीर्ण और पठन पाठन दृष्टि सीमित है। यह सही है कि इस लेखक के पाठक अधिक नहीं है। कुल बीस ब्लाग पर प्रतिदिन 2200 से 2500 के लगभग पाठक आते हैं। महीने में 70 से 75 हजार पाठक संख्या कोई मायने नहीं रखती। यही कारण है कि अपने पाठों की चोरी की बात लिखने से कोई फायदा भी नहीं होता। बहुत कम लोग इस बात पर यकीन करेंगे कि एक स्तंभकार ने एक अखबार में अपना पूरा पाठ ही इस लेखक के तीन लेखों के पैराग्राफ से सजाया था। एक अखबार तो अध्यात्म विषयों पर लिखी गयी सामग्री बड़ी चालाकी से इस्तेमाल करता है। शिकायत की कोई लाभ नहीं हुआ। संपादक का जवाब भी अद्भुत था कि ‘आपको तो खुश होना चाहिए कि आपकी बात आम लोगों तक पहुंच रही है।’
उस संपादक ने इस लेखक को अपने हिन्दी लेखक होने की जो औकात बताई उसे भूलना कठिन है। किसी लेखक को केवल लेखन की वजह से प्रसिद्ध न होने देना-यह हिन्दी व्यवसायिक जगत की नीति है और ऐसे में ब्लाग जगत की आलोचना करने वाले सारे ब्लाग पढ़कर नहीं लिखते। इसकी उनको जरूरत भी नहीं है क्योंकि उनका उद्देश्य तो अपने पाठकों को यह बताना है कि हिन्दी ब्लाग पर मत जाओ वहां सब बेकार है। इंटरनेट पर भी उसका रोग लग चुका है। इसके बावजूद यह सच है कि जो स्वयंसेवी हिन्दी लेखक ब्लाग पर दृढ़ता से लिखेंगे उनकी प्रसिद्धि रोकना कठिन है। अलबत्ता आर्थिक उपलब्धियां एक मुश्किल काम है पर पुरस्कार वगैरह मिल जाते हैं पर उसमें पुरानी परंपराओं का बोलबाला है-उसमें वही नीति है जो निकट है वही विकट है।
हिन्दी ब्लाग जगत पर कूड़ा लिखने वालों के लिये को एक ही जवाब है कि भई, समाचार पत्र पत्रिकाओं में क्या लिखा जा रहा है? ओबामा और ओसामा पर कितना लिखोगे। क्या वही यहां पर लिखें? ओबामा का जादू और ओसामा की जंग पर पढ़ते पढ़ते हम तो बोर हो गये हैं। इससे तो अच्छा है कि हिन्दी ब्लाग जगत के छद्म शाब्दिक युद्ध पढ़े जो हर रोज नये रूप में प्रस्तुत होता है। कभी कभी तो लगता है कि आज से दस बीस साल ऐसे पाठों पर कामेडी धारावाहिक बनेंगे क्योंकि संगठित प्रचार माध्यमों द्वारा तय किये गये नायक तथा खलनायकों का कोई अंत नहीं है और लोग उनसे बोर हो गए हैं। स्थिति यह है कि नायक की जगह उसका बेटा लायें तो ठीक बल्कि वह तो  खलनायक के मरने से पहले ही उसके बेटे का प्रशस्ति गान शुरु कर देते हैं ताकि उनके लिए भविष्य में सनसनी वाली सामग्री उपलब्ध होती रहे। कम से कम हिन्दी ब्लाग जगत में नाम, धर्म, तथा जाति बदलकर तो ब्लाग लेखक आते हैं ताकि उनके छद्मयुद्ध में नवीनता बनी रहे। हालांकि हिन्दी ब्लाग जगत के अधिकतर लेखक ऐसे छद्म युद्धों से दूर हैं पर समाचार पत्र पत्रिकाओं के स्तंभकार अपनी लेखनी में उनकी  वजह से ही   समूचे हिन्दी ब्लाग जगत को बुरा बताते हैं। दूसरे विषयों पर नज़र नहीं डालते। ब्लाग दिखाने वाले फोरमों के हाशिए पर (side bar) हिट दिखाये जा रहे इन ब्लाग को देखकर अपनी राय कायम करते हैं। बाकी ब्लाग देखने के लिए उनके पास न समय हा न इच्छा । देखें भी क्यों? उनका लक्ष्य तो आलोचना करना ही है!
—————-

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://anant-shabd.blogspot.com

—————————–
‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Advertisements
Post a comment or leave a trackback: Trackback URL.

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: