सम्मान की न सोचो तो ही रचना कर्म संभव-आलेख (samman se pare hokar he rachna sanbhav-hindi lekh)


अगर किसी व्यक्ति ने अपना जीवन का श्रमिक के रूप में प्रारंभ किया हो और फिर लेखक भी बना हो तो उसके लिये इस देश में चल रही बहसों पर लिखने के लिये अनेक विषय स्वतः उपलब्ध हो जाते हैं। बस! उसे अपने लेखन से किसी प्रकार की आर्थिक उपलब्धि या कागजी सम्मान की बात बिल्कुल नहीं सोचना चाहिये। वैसे यह जरूरी नहीं है कि सभी लेखक कोई आरामगाह में पैदा होते हैं बस अंतर इतना यह है कि कुछ लोग ही अपने संघर्षों से कुछ सीख पाते हैं और उनमें भी बहुत कम उसे अपनी स्मृति में संजोकर उसे समय पड़ने पर अभिव्यक्त करते हैं।
इस समय देश में टीवी धारावाहिको और इंटरनेट की यौन सामग्री से सुसज्जित वेबसाईटों पर जमकर बहस चल रही है। इस देश में बुद्धिजीवियों की दो विचाराधारायें हैं। इनमें एक तो वह है जो मजदूरों और गरीबों को भला करने के के लिये पूंजीपतियों पर नियंत्रण चाहती है दूसरी वह है जो उदारीकरण का पक्ष लेती है। यह उदारीकरण वाली विचाराधारा के लोग संस्कृति संस्कार प्रिय भी हैं। वैसे तो दोनों विचारधाराओं के बीच हमेशा संघर्ष चलता रहता है पर दोनों एक मामले में सहमत हैं वह है राज्य से नियंत्रण की चाहत।
इंटरनेट पर सविता भाभी बैन हुई। दोनों विचाराधाराओं के लोग एकमत हो गये। इसका कारण यह था कि एक तो सविता भाभी देशी नाम था और उससे ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी भारतीय नारी के नाम का दोहन हो रहा है। पहली विचारधारा वालों को उससे कोई लेनादेना नहीं था क्योंकि उनका तो केवल पाश्चात्य विचारों और पात्रों पर नजर रखकर अपनी बात कहना ही लक्ष्य होता है। उदारीकरण और संस्कृति प्रिय बुद्धिजीवियों के लिये देशी और हिंदी नाम होने से सविता भाभी वेबसाईट पर प्रतिबंध लगना अच्छी बात रही।
आजकल सच का सामना चर्चा का विषय है। किसी काम को सोचना तब तक सच नहीं होता जब तक उसे किया न जाये। यही सोच सच के रूप में बिक रही है।
पता चला कि यह किसी ब्रिटिश और अमेरिकी धारावाहिकों की नकल है। वहां भाग लेने वाले पात्रों ने अपने राजफाश कर तहलका मचा दिया। इसी संबंध में लिखे एक पाठ पर इस लेखक को टिप्पणीकर्ता ने बताया कि ब्रिटेन में इस वजह से अनेक परिवार बर्बाद हो गये। उस सहृदय सज्जन ने बहुत अच्छी जानकारी दी। हमारा इस बारे में सोचना दूसरा है।
भारत और ब्रिटेन के समाज में बहुत बड़ा अंतर है। यह तो पता नहीं कि ब्रिटेन में कितना सोच बोला जाता है पर इतना तय है कि भारत में पैसे कमाने के लिये कोई कितना भी झूठ बोला जा सकता है-अगर वह सोचने तक ही सीमित है तो चाहे जितने झूठ बुलवा लो। इससे भी अलग एक मामला यह है कि अपने देश में ‘फिक्सिंग का खेल’ भी होता है। अभी एक अभिनेत्री के स्वयंबर मामले में एक चैनल ने स्टिंग आपरेशन किया था जिसमें एक भाग लेने वाले ने असलियत बयान की कि उसे पहले से ही तय कर बताया कि क्या कहना है?
अपने देश में एक मजेदार बात भी सामने आती है। वह यह है कि जिनका चरित्र अच्छा है तो बहुत है और जिनका नहीं है तो वह कहीं भी गिर सकते हैं। सच का सामना में भाग लेने वाले कोई मुफ्त में वहां नहीं जा रहे-याद रखिये इस देश में आदमी नाम तो चाहता है पर बदनामी से बहुत डरता है। हां, पैसे मिलने पर बदनाम होना भी नाम होने जैसा है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह एक व्यवसाय है। बस अंतर इतना है कि ठगी के मामले में कोई शिकायत करता है पर इसमें पैसा होने के कारण कोई शिकायत नहीं करता।
इन मामलों में बुद्धिजीवियों का अंर्तद्वंद्व देखने लायक है। दोनों विचाराधाराओं के बुद्धिजीवियों ने बस एक ही राह पकड़ी है कि प्रतिबंध लगाओ।
मजदूरों और गरीबों के लिये मसीहाई छबि रखने वालों का तो खैर ठीक है पर उदारवादियों का रवैया थोड़ा हैरान करने वाला है। यही उदारवादी देश मे अमेरिका और ब्रिटेन जैसे आर्थिक प्रारूप की मांग करते रहे हैं। उन्होंने सरकारी नियंत्रण का जमकर विरोध किया। धीरे धीरे सरकारी नियंत्रण कम होता चला गया और निजी क्षेत्र ने हर उस जगह अपना काम शुरु किया जहां आम आदमी की नजर जाती है। नतीजा सामने हैं! अगर समाचारों के लिये कोई सबसे बेहतर चैनल लोगों को लगता है तो वह दिल्ली दूरदर्शन!
देश के समाचार चैनल केवल विज्ञापन चैनल बन कर रह गये हैं जिनमें खबरें कम ही होती हैं। हिंदी फिल्म उद्योग बहुत बड़ा है और उसके लिये 365 दिन भी कम हैं। हर दिन किसी न किसी अभिनेता या अभिनेत्री का जन्म दिन होता है। फिर इतने अभिनेता और अभिनेत्रियां हैं कि उनके निजी संपर्क भी इन्हीं समाचारों में स्थान पाते हैं।
मुद्दे की बात तो यह है कि नियंत्रणवादी हो या उदारवादी व्यवस्था दोनों में अपने दोष और गुण हैं। नियंत्रणवादी व्यवस्था में कुछ बौद्धिक मध्यस्थों के द्वारा पूंजीपति समाज पर नियंत्रण स्थापित करते हैं तो उदारवादी में बौद्धिक मध्यस्थ उनका निजी कर्मचारी बन जाता है। दरअसल राज्य को सहज विचारधारा पर चलना चाहिये। यह सहज विचाराधारा अधिक लंबी नहीं है। राज्य को अपने यहां स्थित सभी समाजों पर नियंत्रण करना चाहिये पर उनकी आंतरिक गतिविधियों से परे रहना ही अच्छा है। पूंजीपतियों को व्यापार की हर तरह की छूट मिलना चाहिये पर आम आदमी को ठगने से भी बचाना राज्य का दायित्व है। व्यापार पर बाह्य निंयत्रण रखना जरूरी है पर उसमें आंतरिक दखल करना ठीक नहीं है।
दोनों ही विचारधारायें पश्चिम से आयातित हैं इसलिये आम भारतीय का सोच उनसे मेल नहीं खाता। सच बात तो यह है कि नारे और वाद की चाल से चलता यह देश दुनियां में कितना पिछड़ गया है यह हम सभी जानते और मानते हैं। इस देश की समस्या अब संस्कार, संस्कृति या धर्म बचाना नहीं बल्कि इस देश में इंसान एक आजाद इंसान की तरह जी सके इस बात की है। पूरे देश के समलैंगिक होने की बात करने वालों पर केवल हंसा ही जा सकता है। इस पर इतनी लंबी च ौड़ी बहस होती है कि लगता नहीं कि कोई अन्य समस्या है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस देश मेें लोग सच से भागते हैं और उसकी पर्दे पर ईमानदारी से अभिव्यक्ति करेंगे इसमें संदेह है।
दूसरी बात यह है कि आधी अधूरी विचाराधाराओं से व्यवस्थायें कहीं भी नहीं बनती। अगर नियंत्रणवादी हो तो पूरी तरह से सब राज्य के नियंत्रण में होना चाहिये। उदारवादी हैं तो फिर यह सब देखना पड़ेगा। सहज विचारधारा अभी किसी की समझ में नहीं आयेगी। हम इस पर लिखें भी तो बेकार लगता है। बुद्धिजीवियों के पूर्वाग्रहों को भी भला कोई मिटा सकता है। अमेरिका और ब्रिटेन की संस्कृति और संस्कारों का हम पर बहुत प्रभाव है और धीरे धीरे वह सभी बुराईयां यहां आ रही हैं जो वहां दिखती हैं। हां, हमें उनसे अधिक बुरे परिणाम भोगने पड़ेंगे। वजह यह कि पश्चिम वाले भौतिकता के अविष्कारक हैं और उसकी अच्छाईयों और बुराईयों को जानते हुए समायोजित करते हुए चलते हैं और हमारे यहां इस प्रकार के नियंत्रण की कमी है। शराब पश्चिम में भी पी जाती है पर वहां शराबी के नाम से कोई बदनाम नहीं होता क्योंकि उनके पीने का भी एक सलीका है। अपने यहां कोई नई चीज आयी नहीं कि उससे चिपट जाते हैं। उससे अलग तभी होते हैं जब कोई नई चीज न आ जाये। इसके अलावा पश्चिम में व्यायाम पर भी अधिक ध्यान दिया जाता है जिस पर हमारे लोग कम ही ध्यान देते हैं। ढेर सारी बुराईयों के बावजूद वहां हमारे देश से बड़ी आयु तक लोग जीते हैं वह भी अच्छे स्वास्थय के साथ। अपने यहां एक उम्र के बाद आदमी चिकित्सकों के द्वार पर चक्कर लगाने लगता है।
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