कुछ सच कुछ झूठ-लघु कथा


शादी में वह बच्चा अपने मां बाप और दादा के साथ गया। शादी उच्च घराने की थी। वहां तमाम तरह का तामझाम था जिसमें बच्चों के मनोरंजन के लिये तीन ऐसे लोगों का भी प्रबंध जो विचित्र कपड़े और मुखौटे पहने थे। वह कभी वहां मौजूद बच्चों के साथ हाथ मिलाते और कभी आपस में एक दूसरे को मुक्का दिखाते हुए तो कभी एक दूसरे को पटकते हुए लड़ने का नाटक करते । बच्चा उनको बड़े चाव से देख रहा था। उसने तीनों से हाथ भी मिलाया। चूंकि अपने ही खास परिवार की शादी थी इसलिये वह बच्चा अपने माता पिता और दादा के साथ शादी के कार्यक्रम में आखिरी समय तक रुका।

जब शादी का कार्यक्रम समाप्त हो गया तब वह मुखौटे लगाने वाले लोग एक पर्दे के पीछे चले गये। बच्चा भी वहां चला गया। उन सभी ने अपने मुखौटे और कपड़े उतारे और फिर अपनी सामान्य वेषभूषा में बाहर आये और एक आदमी से अपना मेहनताने के पैसे लेकर चले गये।
बच्चे ने अपनी मां से कहा-‘मां, वह लोग तो आपस में एक दूसरे से लड़ने का नाटक कर रहे थे। वह तो हमारी तरह थे। देखो वह जा रहे हैं। अब उनमें कोई झगड़ा नहीं हो रहा है।’
मां ने कहा-‘हां, बेटे! वह पैसे के लिये यह इस तरह के कपड़े और मुखौटा पहनते हैं।’
बेटे ने कहा-‘पर आपस में लड़ते क्यों हैं? वह तो आपस में दोस्त हैं।’
यह बात उस लड़के के दादा भी सुन रहे थे। उन्होंने कहा-‘बेटा, पैसे के लिये वह नकली लड़ाई लड़ते हैं।’
बच्चे ने कहा-‘नकली लड़ाई कैसे लड़ते हैं? उनमें फिर दोस्ती कैसे हो जाती है? वह क्या हमारी तरह बच्चे हैं?’
दादा ने कहा-‘बेटा, तेरे पापा ने अपनी कालोनी की कमेटी के चुनाव में अपने दोस्त से लड़ाई की थी कि नहीं। वह दोस्त जिसे तुम पांच नंबर मकान वाला अंकल कहते हो। तुम्हारे पापा और वह एक दूसरे के खिला्फ कैसे भाषण करते थे। आपस में वाद विवाद भी करते थे। बस मारपीट नहीं हुई? बाकी एकदूसरे की बुराई कितनी कर रहे थे? फिर कैसे दोस्त हो गये?’

बच्चे के पिता ने अपने पिता से कहा-‘क्या पापा! आप भी बच्चे को किस तरह समझा रहे हो? वह लड़ाई तो बस दिखावा थी ताकि हम दोनों में से कोई चुनाव जीते। आपने देखा नहीं सचिव के लिये तीसरा प्रत्याशी किस तरह हार गया जबकि उसके जीतने की संभावना थी।’

बाप ने कहा-‘यही तो मैं इस बच्चे को समझा रहा हूं कि नकली लड़ाई अब केवल बच्चों का खेल नहीं रहा। इसे अब बड़े बड़े लोग खेलने लगे है। जो जितनी बड़ी नकली लड़ाई लड़ेगा उतना ही बड़ा बनेगा।’
बच्चे ने पूछा-‘जो आदमी बड़ा बनता है वह कैसा होता है?’
दादा ने हंसते हुए कहा-‘वह फिर कभी समझाऊंगा। आज नकली लड़ाई देखी तो बता दिया। कभी कोई बड़ा आदमी दिखेगा तो वह भी बता दूंगा।’
बच्चा चुप हो गया।
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लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकाएं भी हैं। वह अवश्य पढ़ें।
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका
4.अनंत शब्दयोग
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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