चोर…….. चोर (हास्य व्यंग्य)


उस गांव एक घर में चार चोर घुसे। उन्होंने बहुत सारा सामान अपने झोलों में भर लिया था कि अचानक घर एक सदस्य की आंख खुल गयी और वह जोर से चिल्लाया ‘चोर…..चोर!’
चोर भाग निकले। वह आदमी चिल्लाता रहा और उसकी आवाज गांव में दूर तक सुनायी दी। लोग जाग उठे। इधर चोर भी जोर से भागे जा रहे थे पर अचानक एक चोर का पांव एक गड्ढे में फंस गया। वह गिर पड़ा पर उसके तीन साथी उसे उठाने की बजाय उसके पास का सामान लेकर भागते बने और उससे कहा कि ‘अगर यह तेरे पास रहा तो तेरा चोरा होना प्रमाणित हो जायेगा। अभी तो बचने की गुंजायश भी होगी।’
बाकी तीनों चोर गांव की सीमा पार कर गये। इधर गांव वालों ने उस चोर को पकड़ा और मारने लगे पर उसी गांव के चार लोग उसे चोर को बचाने आ गये और गांव वालों से बोले-‘इसे मत मारो! आजकल कानून बहुत सख्त है। इसे हमारे हवाले करो। हम इसे नहर में फैंक आते हैं। न यह बचेगा और न कोई इसकी पूछताछ करेगा। इस तरह हमारे ऊपर कोई इल्जाम भी नहीं आयेगा।’
गांव वालों ने उस चोर का हाथ उन चारों को पकड़ा दिया। वह चारों उसकी बुशर्ट का कालर पकड़ ले जाने लगे। वह चिल्ला रहा था‘मुझे नहर में मत फैंको।’
जब वह उसे पकड़ कर गांव से थोड़ा दूर लाये तब उनमें से एक आदमी ने उस चोर की बुशर्ट का कालर छोड़ते हुए कहा-‘पागल हुआ है। हम तुझे नहर में फैंकने के लिये थोड़े ही ले जा रहे हैं। हम तो वहां बैठकर तेरे साथ शिखर वार्ता करेंगे। तू हमे पहचानता नहीं है। हम तेरे गांव से परले वाले गांव में चोरी करते हुए पकड़े गये थे और तू तरले वाले गांव की छोरी छेड़ने के आरोप में हमारे साथ जेल में था।’
अब उस गांव के चारों आदमियों ने उसका हाथ छोड़ दिया। उस चोर ने चारों को पहचान लिया और बोला-‘फिर मेरे को इस तरह बचाकर ले आये।’
दूसरे आदमी ने कहा-‘अपने धंधे वास्ते! नहीं तो हमारी क्या अटकी पड़ी थी? पहले तो तू हमें उन तीन साथियों के पास ले चल और हमारा हिस्सा दिला। फिर आगे बात करेंगे!’
वह चोर उन तीनों को अपने साथियों के पास लाया। अब आठों ने मंत्रणा प्रारंभ की। दूसरे चोर ने कहा-‘अरे, काहे इसमें हिस्सा मांगते हो? हमारे गांव में तुमने कितनी बार चोरी की क्या हमें पता नहीं?’
गांव के तीसरे आदमी ने कहा-‘पर हम कभी तुम्हारे गांव में पकड़े ही नहीं गये तो हिस्सा काहेका?’
तीसरे चोर ने कहा-‘जब पकड़े जाओगे। तब बचाकर उसका कर्जा उतार देंगे। ऐसा तो है नहीं कि चोरी के आरोप में कभी हमारे गांव में पकड़े नहीं जाओगे।’
चौथे आदमी ने कहा-‘तब हम भी हिस्सा देंगे। पहले पकड़े तो जायें। वैसे हमारा गांव बहुत विकसित हो गया है और हम अब अपना गिरोह चलाते हैं खुद यह काम नहीं करते। हमारे चेले चपाटे और भाड़े के टट्टू यह काम करते हैं।’
चौथे चोर ने कहा-‘तो तुम लोग क्या अपनी सेठगिरी का रुतवा झाड़ रहे हो?’
यह विवाद उस नहर के किनारे बैठा एक पुराना चोर सुना रहा था। वह उनके पास आया और बोला-‘अरे, भले आदमियों तुम क्यों इतना झगड़ा कर रहे हो? यह हिस्सा लेने देने की बजाय अपने धंधे के लिये कंपनी बनाओ। इतने दूर दूर तक गांवों में चोर नाम की चीज नहीं बची है। जिसे देखो वही काले धंधे का सेठ बन गया है। कोई नकली घी बना रहा है तो कोई सिंथेटिक दूध बेच रहा है। अब तो चोरी करने वालों का मन गांवों में कम शहरो में अधिक लगता है। ’
सभी ने एक स्वर में पूछा-‘आखिर हम क्या करे?’
‘तुम लोग अब प्रशिक्षक बन जाओ।’उस आदमी ने समझाया-‘हर गांव में बेकार और नकारा घूम रहे लोगों को अपने यहां बुलाकर प्रशिक्षण दो। वह अपना काम कर तुम्हें हिस्सा पहुंचाते रहेंगे। अगर वह कहीं फंस जायें तो तुम उनको सजा दिलाने के नाम पर इस नहर में फैंकने के लिये लाना और छोड़ देना। याद रखना एक गांव में अगर कोई पकड़ा गया हो तो उसे दोबारा उस गांव में मत भेजना।’
एक ने पूछा-‘जब सभी गांव वालों को पता चल गया तो क्या होगा?’
पुराने चोर ने कहा-‘ऐसा नहीं होगा। तुम अपने गांव में सज्जन बने रहना। दोनों गांवों में एक दूसरे के चोर होने की बात कहकर विवाद बनाये रखना। बाहर से लड़ते दिखना पर अंदर एक रहना। कभी एक जना एक गांव के कुत्ते पर पत्थर फैंककर गुस्सा उतारना तो दूसरा भी यही करेगा। कुल मिलाकर लड़ाई का नकली मनोरंजन प्रस्तुत करना। मैं तुम्हें विस्तार से पूरा कार्यक्रम बाद में बताऊंगा, पहले अपनी कंपनी तो बना लो।’
सभी एक साथ विचार करने लगे। कपंनी का अध्यक्ष कौन बने? आखिर में उसी पुराने चोर का अध्यक्ष बनाने का विचार किया गया। सभी इस पर सहमत हो गये। पहले तो उस पुराने चोर ने ना-नुकर की पर बाद में इसके लिये राजी हो गया इस शर्त पर कि वह हर चोरी में बीस प्रतिशत हिस्सा देंगे और यह हिस्सा बाकी खर्चे काटने से पहले होगा। बाद में खर्चे काटकर आठो लोग हिस्सा करेंगे। इस पर भी सहमति हो गयी।
पुराने चोर ने कहा-‘फिर आज से ही अपनी कंपनी की शुरुआत करते हैं। आओ उस चोरी का हिस्सा बांटें। पहले मेरा बीस प्रतिशत हिस्सा निकालो फिर उसे बांट लो।’
इस तरह वह चोर कंपनी शुरु हुई।
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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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