अंतर्जाल पर विधा नहीं बल्कि कथ्य महत्वपूर्ण है-विशेष संपादकीय


आज यह दूसरा ब्लाग/पत्रिका है जिसने 30 हजार पाठ/पाठक संख्या को पार किया। इससे पहले हिंदी पत्रिका ने इस संख्या को पार किया था। इस ब्लाग/पत्रिका के बारे मेंें पहले भी लिख चुका हूं पर कहने के लिये यहां बहुत सारी सामग्री सामने आ जाती है। अंतर्जाल पर नित नित नये अनुभव हो रहे हैं और उनसे कुछ नया सीखने और समझने का अवसर मिलता है।
यह संख्या बहुत अधिक नहीं है और यहां रुकना भी नहीं है पर अंतर्जाल पर लिखना मेरे लिये एक अजीबोगरीब अनुभव है और यह बाहर पत्र पत्रिकाओं पर लिखने से कहीं अलग है। पत्र पत्रिकाओं में रचना छपने पर पाठक से सीधे कोई संवाद नहीं होता। हां, कुछ पत्र पत्रिकाओं में में अपनी रचनाओं की प्रशंसा में पत्र भी छपे देखे हैं पर वहां आलोचना कोई छपती नहीं देखी क्योंकि अगर वह आती भी होंगी तो कोई संपादक वहां क्यों छापना चाहेगा? फिर वहां आलोचना भेजने की सोचेगा भी कौन? पहले तो कोई जरूरत नहीं समझेगा और भेजेगा तो अपने वास्तविक नाम से नहीं भेजेगा। वैसे भी कोई पत्र पत्रिका अपने यहां छपी रचनाओं के बारे में आलोचनात्मक सामग्री छापना पसंद नहीं करती।

यहां त्वरित टिप्पणियों की सुविधा के कारण ब्लाग लेखक तथा पाठक अपनी प्रतिक्रिया देते हैं और यह अनुभव आम जीवन में लेखन के अनुभव से अलग है। कई बार कुछ आम पाठक ऐसे भी हैं जो छहः माह पुराने पाठ पर कमेंट देते हैं। कभी अच्छी और कभी बुरी भी। ऐसे में मन में उहापोह की स्थिति बनी रहती है कि उसे बनी रहने दें कि हटा दें। तब यह सोचकर कि अन्य पाठक भी वहां आयेंगे और उनका मन खराब न हो उसे स्पैम में डाल देते हैं और इंतजार करते हैं कि टिप्पणीकर्ता पुनः वहां आये और अपनी टिप्पणी न देखकर सवाल करे पर ऐसा हुआ नहीं।

कविताओं को लेकर फब्तियां कसते हैं कि क्या यह कविता है या गद्य! वह तो अपनी बात कहकर चले जाते हैं पर फिर दूसरी बार वह किसी कविता पर ही खुश होकर लिखते हैं कि क्या मजेदार है?
ऐसे अनेक उदाहरण देखकर यह लगता है कि अंतर्जाल पर किसी विद्या को लेकर कोई पूर्वाग्रह रखना ठीक नहीं है क्योंकि यहां महत्वपूर्ण होगा कथ्य और तथ्य। बस यह देखा जायेगा कि उसमें शब्दों का चयन और प्रस्तुतीकरण कैसा है? उसमें रचयिता का भाव क्या है और उसकी विषय सामग्री कैसी है?

बड़े बड़े आलेख बिना टिप्पणियों के पड़े हुए हैं और कविताओं पर निरंतर प्रतिक्रियायें आती हैं। आलेखों के विषयों पर सवाल उठाते हैं पर कविताओं पर नहीं। अव्यवसायिक और अप्रचारित लेखक हूं इसलिये लिखने में समय और ऊर्जा व्यय करने के लिये जूझना पड़ता है। कभी किसी विषय पर आलेख लिखने का मन हो पर समय और शक्ति नहीं हो तो सोचते हैं कि कविता से काम चला लो ब्लाग जगत में इसे ठेलना भी कहते हैं। क्योंकि पाठक संख्या बढ़ रही है पर उसकी गति संतोषजनक नहीं है इसलिये अपनी प्रेरणा बनाये रखने का काम भी स्वयं ही करना पड़ता है। कई बार गंभीर विषय पर भी कविता लिख लेते हैं कि कौन इसे हजारों लोग एक साथ पढ़ने वाले हैं बाद में इस विषय पर आलेख या व्यंग्य लिख लेंगे। कुल मिलाकर अपनी बात आम पाठक तक पहुंचाने के लिये एक संघर्ष करना ही पड़ रहा है क्योंकि मैं तो इसी भरोसे हूं कि आम पाठक ही मेरा प्रचारक हो सकता है। लिखने की प्रवृत्ति बचपन से ही है इसलिये लिखने के पूरे मजे लेता हूं। पैसा तो जेब से ही जा रहा है पर जीवन में जिज्ञासा का ऐसा भाव है कि लिखता ही चला जा रहा हूं। कई बार तो ऐसे पाठ भी लिखता हूं जिनका उद्देश्य लोगों को पढ़ाने की बजाय बल्कि स्वयं उनको पढ़ना होता है। हैरान हो जाता हूं जब शब्द भी आंखों से पढ़कर बता देते हैं कि उन्होने आज क्या पढ़ा? कविताओं की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अगर कथ्य और तथ्य प्रभावपूर्ण हों तो वह यहां स्वीकार्य होंगी।
जहां तक अपने लिखे पाठों से मिले अस्पष्ट संदेशों को पढ़ा है लोगों का अध्यात्मिक सामाजिक चिंतन और हास्य व्यंग्य में समान रुचि है। हिंदी ब्लाग जगत में पता नहीं मेरा क्या मुकाम है या होगा इस पर मैं विचार नहीं करता मगर मुझे लोगों से प्यार पाकर बहुत अच्छा लगता है। मेरी मान्यता है कि अगर आप लेखक हैं तो भले ही आप उससे पैसा नहीं कमाते पर लोग आपको सम्मान और प्यार देते हैं जो कि या तो धन कमाने पर मिलता है या पद पाने पर। जब लिखना प्रारंभ किया तो पता ही नहीं था यह यात्रा कहां जायेगी। इसी लेखनी से मिले नाम की खातिर 1980 में एक अखबार में फोटो कंपोजिंग आपरेटर के रूप में अपना जीवन शुरू किया। उस समय विंडो नहीं था पर आज विंडो पर काम करने में आसानी होती है। फिर कुछ समय तक संपादक भी रहा और वहां के गुरु ने लिखने के गुर के साथ जीवन के दांव भी बताये। वह अध्यात्मिक नहीं थे पर उनकी शख्सियत मैं कभी नहीं भूलता। वह लिखने में किसी प्रकार के पूर्वाग्रह से दूर रहने के साथ ही निंरतर अभ्यास करने की प्रेरणा देते थे। यही कारण है कि जब कंप्यूटर पर लिखने के लिये बैठता हूं तो विचारों का क्रम आता चला जाता है।

जिनको मेरी कविताओं से नाराजगी है उन्हें इस बात के लिये अपना भाग्य सराहना चाहिये कि मुझे टिककर एक जगह बैठने की आदत नहीं है वरना मेरे लिये एक घंटे लिखने का मतलब होता है दस हास्य कवितायें। मैंने लोगों के हृदय में कविताओं के प्रति चिढ़ का भाव देखा है इसलिये अभी कम ही लिखता हूं। चूंकि ब्लाग पर कुछ न कुछ लिखने का पक्का विचार कर रखा है इसलिये कवितायें ही लिख लेता हूं। हां, अगर इससे कभी थोड़ी आय वगैरह की संभावना बनी तो फिर बड़े बड़े हास्य व्यंग्य भी लिखने का विचार कर सकता हूं। नहीं भी बनी तो अनेक ब्लाग की जगह एक ही ब्लाग पर सप्ताह में एक बार अवश्य लिखूंगा।
अंतर्जाल की यह यात्रा कैसे चलती रहेगी पता नहीं पर अपने अनुभव से सीखता हुआ अपने पाठकों के लिये ऐसे अवसरों पर उनको लिखता हूं। आजकल उमस बहुत है इसलिये अधिक लिखने का मन भी नहीं होता पर ऐसे अवसर लिखने का मोह संवरण भी नहीं कर सका। प्रशंसकों का आभारी हूं और आलोचकों से क्षमाप्रार्थी।
अनजाने में बहुत सारे ब्लाग/पत्रिका बना लिये पर सभी पर पाठकों की नजरें रहती हैं और शायद कुछ अदृश्य मित्र हैं जो इशारा कर जाते हैं कि देखो अपने इस ब्लाग/पत्रिका को जो आज बीस/पच्चीस/तीस हजार की पाठक संख्या के पार है। शायद वह चाहते हैं कि मैं कुछ लिखूं उन्हीं को समर्पित यह मेरा विशेष संपादकीय

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यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • sangita puri  On सितम्बर 11, 2008 at 5:58 अपराह्न

    सहमत हूं आपकी बातों से । आपके पास पाठकों को बताने लायक सामग्री हो और उसे स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत कर सकें , तो आपके ब्लाग को सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।

  • venus kesari  On सितम्बर 11, 2008 at 6:53 अपराह्न

    अच्छा लेख
    सहमत हूँ आपसे की आलेखों के विषयों पर सवाल उठाते हैं पर कविताओं पर नहीं।

    वीनस केसरी

  • S.B.Singh  On सितम्बर 11, 2008 at 7:01 अपराह्न

    दीपक भाई कविता के बारे में मन में कोई पूर्वाग्रह रखे बिना लिखें। जो चिढ़ते हैं उनके लिए क्या अफ़सोस करना। जब तक हम आप हैं कविता के कद्रदान भी रहेगें। शुभकामनाएं !

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