विभिन्न समाजों का पुराने ढर्रे पर चलना अब कठिन-आलेख


जाति, धर्म, भाषा और वर्ण के आधार पर हमारे देश में अनेक वर्षों से संगठित समाज चले आ रहे हैं और इसकी आदत वंशानुगत रूप से हमारे रक्त में ही उपस्थित है। हम कभी अपने को अपने समाज से अलग नहीं देख पाते। जबकि वास्तविकता यह है कि आधुनिक समय में इन समाजों का अस्तित्व केवल नाम को रह गया है और हमारे जीवन में समाज के होने की अनुभूति केवल शादी के लिये वर और वधू ढूंढने के समय ही हो पाती है अन्यथा जीवन में कोई अन्य मजबूत संपर्क अपने समाज से शायद ही रह पाता है। इसके बावजूद लोग अपना अस्तित्व इन खंडित समाजो में तलाश रहे हैं। हम अक्सर अपने पुराने लोगों पर अपढ़ और अनगढ़ का आरोप लगाते हैं पर शिक्षित होने के बावजूद कितना इन समाजों के दबाव से उबर पाये है यह कभी विचार नहीं कर पाते। इसके अलावा कुछ लोग अभी भी अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये समाजों का ही उपयोग करना श्रेयस्कर समझते हैं।

पुराने समय के शहर और गांव का परिदृश्य देखें तो संयुक्त परिवार की प्रथा तो थी ही साथ ही एक ही समाज के लोगों का घर और व्यवसायिक स्थल भी एक ही जगह स्थित होते थे। गलियां और मोहल्ले उनके समाजों के नाम से भी पुकारे जाते थे। वहां समाज एक सुव्यस्थित और संगठित रूप से दिखता था और लोग अपनी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के लिये एक दूसरे के साथ जुड़े रहते थे। आधुनिक समय में स्थिति बदलाव की तरफ बढ़ रही है। अब नये ढंग से कालोनी और बाजार बने हैं जहां विभिन्न समाजों के लोग केवल आर्थिक और व्यवसायिक कारणो के साथ ही अपनी रुचियों के अनुसार ही वहां रहते हैं। अपने समाज का व्यक्ति हो पास हो यह सब की इच्छा होती है पर न भी हो तो वह भय नहीं खाता।
नौकरी और व्यवसाय में संपर्क स्थापित करने वाले व्यक्तियों में कोई भी किसी जाति और धर्म का हो सकता है-अनेक स्थानों पर हमारे मित्र समूह होते हैं पर उनमें अपनी जति, धर्म या भाषा आधार न होकर व्यक्तिगत रूचियां, कार्य की प्रकृति और स्वभाव होता है। कहीं छह या आठ मित्रों का समूह होता है जहां जाति, भाषा, और धर्म के आधार पर सभी लोग अलग होते हैं पर उनका आपसी संपर्क कभी उसे उजागर नहीं कर पाता।
ऐसे बदलाव के बावजूद भी लोग खंडित समाज की तरफ ताकते हैं पर उनमें निराशा का बोध उत्पन्न होता है। आजकल के प्रतियोगिता के युग में सभी लोग एक दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते हैं और ऐसे में कोई किसी के साथ रियायत नहीं करता पर चाहते सभी हैं कि समाजों से उनको सहयोग मिले। सबसे अधिक समस्या शादी विवाह में आती है पर जैसे अंतर्जातीय विवाहों की प्रवत्ति बढ़ रही है समाजों वह खंडित ढांचा अपने अस्त्तिव को खोता नजर आ रहा है।
समाज में कुछ माता पिता अपने बेटी और बेटे के लिये अंतर्जातीय विवाह करने को तैयार हो जाते हैं तो इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है यह अलग बात है इसमें उनके प्रयास कम उनके बच्चों का आपसी प्रेम ही इसका प्रेरक होता है। धीरे-धीरे लोग अब भौतिकता के युग में समाज द्वारा अपने सदस्य होने के नाते जो व्यक्ति आर्थिक दायित्व पूरे करने का जो दबाव बन रहा है, उसे अपनी सहनशक्ति से बाहर अनुभव करने लगे हैं और ऐसी कई घटनायें सामने आ रही है जिसमें माता पिता न केवल बच्चों को अंतर्जातीय विवाह की अनुमति देते बल्कि उसमें स्वयं ही दोनों पक्ष भी शामिल हो रहे हैं। ऐसी घटनायें नगण्य हैं पर वह इस बात का संकेत हैं कि विभिन्न समाज अपने पुराने ढर्रे पर अधिक नहीं चल पायेंगें। किसी भी समाज केे शीर्षस्थ लोग कितना भी अपने समाज का गुणगान कर लें पर वह इस तथ्य का नकार नहीं सकते कि भौतिकतावाद ने उनके समाज के सदस्यों को अलग करना शुरू कर दिया है। अब तो ऐसा लगता है कि समाजों का आधार केवल शादी विवाह ही था और जैसे जैसे अंतर्जातीय विवाहों को सामाजिक स्वीकृति मिलती जायेगी उनके अस्तित्व का संकट बढ़ता ही जायेगा। यही कारण है कि आज भी सभी समाज के शीर्षस्थ बाहुबली अपने समाज में अंतर्जातीय विवाह करने वाले युगलों और उनके परिवारों को दंडित करने का प्रयास करते है। देखा जाये तो सभी समाजों का छोटे और मध्यम वर्ग के लोगों का बौद्धिक, आर्थिक और शारीरिक दोहन कई बरसों से किया जाता रहा पर अब आधुनिक समय में जब लोगों को इससे मुुक्ति पाने का अवसर मिला तो वह इससे मुक्त हो रहे हैं-यह गति धीमी है पर आगे नये समाज के निर्माण के संकेत तो अब मिलने लगे है।
फिर भी कुछ बौद्धिक, प्रबुद्ध, धनी और प्रतिष्ठित होने के साथ ही कुंठित लोगों का एक वर्ग है जो अपने स्वार्थ और अज्ञान के कारण इस बदलते समाज को रोकना चाहता है। ऐसे कुंठित और अल्पाज्ञानी लोग अभी भी अपने समाज के सदस्यों को उसके आधार पर अपने साथ करने का प्रयास करते हैं। लोग उनके सामने हामी भर भी देते हैं पर दोनों ही दिल से जानते हैं कि यह एक दिखावा है।

यह इस ब्लाग दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका पर लिखी गया पाठ है। इसके कहीं अन्य प्रकाशन की अनुमति नहीं है। अगर कहीं अन्य प्रकाशित करने की जानकारी मिलें तो इस पते पर सूचना दें।
दीपक भारतदीप, लेखक एवं संपादक

अब समय बदल गया है भले ही कुछ लोग जानते हुए भी उससे मूंह फेरना चाहते हैं। अब तो इंटरनेट का युग हैं इसमेें भी कुछ लोग ऐसे व्यवहार करना चाहते हैं जैसे कि पहले लोग किया करते थे। मगर कुछ समझदार लोग हैं जो अपनी व्यवाहारिक कठिनाईयों से जूझते हुए यह अनुभव करते हैं कि समाज अब उनका सहायक नहीं है और वह भले ही मजबूरी में ही सही उससे अलग होने को तैयार हो जाते हैं। कई जगह उनका विरोध होता है पर ऐसा करने वाले लोगों की व्यवहारिक कठिनाईयों को दूर करने का माद्दा नहीं रखते। इसलिये जिन लोगों को अपने समाज से दूरी बनाने में झिझक हो उसे अब अपने हृदय से मिटा देना चाहिए। अगर उनके बच्चों ने विजातीय विवाह का संकल्प लिया है तो उसमें उसका सहायक होने में झिझक नहीं करना चाहिए। इसके कारण यह है कि विवाह के बाद भी बच्चों को अपने अभिभावकों की आवश्यकता होती है और अगर उनके साथ वह दूरी बनायेंगे तो हो सकता है कि वह अपना वैवाहिक जीवन अच्छी तरह नहीं गुजार सकें। ऐसे में समाज तो उनके पास आने से रहा और वैसे ही सजातीय विवाह करने पर कौन कोई किसके पास कठिनाई में आता है? ऐसे में अभिभावकों को अपनी जिद्द छोड़ना चाहिए। इस लेखक ने कुछ ऐसे अंतर्जातीय विवाहों में शामिल होकर यही अनुभव किया है कि जिसमें माता पिता स्वयं शरीक होते हैं वह बच्चे आगे भी खुश रहते हैं। बदलते समय में समाज का बदलना स्वभाविक है और उसे रोकना अपने लिये कठिनाई उत्पन्न करना है।
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