चमत्कार को नमस्कार, सहजता से कोई नहीं सरोकार-आलेख


इस प्रथ्वी पर जीवन अपनी सहज धारा से बहता जाता है। अनेक आपदायें इस प्रथ्वी पर आती हैं पर फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है। यहां सांस लेने वाला प्रत्येक जीव भी अपने जीवन में उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरता हुआ अपन जीवन सहजता से व्यतीत करता है। प्रथ्वी पर सभी प्राणी-जिसमे पेड़-पौद्ये, पशु-पक्षी और मनुष्य अपने जीवन में दुःख-सुख और आशा और निराशा के दौर से गुजरते है। बस फर्क इस बात का है कि इंसान उसे बयान कर सकता है दूसरे उसे सुन सकते हैं पर अगर दूसरे बयान करें तो इंसान उसे सुन नहीं सकता पर जिसमें चेतना है वह उसे महसूस कर सकता है।
कुल मिलाकर जीवन दुःख-सुख और आशा निराशा इसी सहज जीवन का हिस्सा है पर मनुष्य जो सब प्राणियो में विवेकवान है उसमें हर बुरी बात को त्रासदी और अच्छी बात को चमत्कार कहता है।

मनुष्य के मन में फैली इसी धारणा पर अनेक चालाक लोग अपनी रोटी सैंकते हैं। कभी किसी बाबा के नाम तो कभी किसी फकीर के नाम पर तो कभी किसी धार्मिक स्थान के निर्माण के नाम पर चमत्कार का भ्रमजाल फैलाते हैं। किसी घटना पर चमत्कार का रंग चढ़ाकर उसका प्रचार इस तरह करते हैं कि अपनी हालातों से परेशान लोग उस प्रतीक की तरफ आकर्षित हो जो उसके पीछे है।

14 वर्ष की एक लड़की का अपने ही घर में कत्ल हो गया। कत्ल होते ही जांचकर्ताओं ने माना कि कातिल कोई घर का आदमी है। पहले एक नौकर पर शक गया और उसकी तलाश शुरू की गयी। लड़की की देह पंचतत्वों मेंं विलीन अभी हुई थी कि उसी आरोपी नौकर का शव उसी घर की छत पर मिला जहां उस लड़की का कत्ल हुआ था। मामला उलझ गया। मृतक लड़की के बदहवास माता पिता क्या बतायें और क्या बोलें? सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे जैसे सरेआम मुकदमा चल रहा हो। टीवी चैनल सीधे प्रसारण कर रहे थे। बताओ कातिल कौन है? धीरे-धीरे कत्ल की सुई पिता की तरफ घुमाई गयी। उस तमाम तरह के आरोप लगाते हुए कहानियां गढ़ी गयी। उसके मित्रों पर संदेह किया गया। एक तरह से फैसला दिया गया कि पिता ही अपने पुत्री के कत्ल के लिये जिम्मेदार है। उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया।

जांच आगे बढ़ी। अब तीन अन्य नौकरों को घेरा गया। जांच पूरे पचास दिन चली। मृत लड़की का पिता जेल में था तो तीन अन्य नौकर भी इसी आरोप में धरे गये। जांच चलती रही। प्रचार माध्यम उस मृत लड़की की हत्या के समाचारों को बेचते रहे और तो और इतना भी भूल गये कि किसी मृतक के चरित्र पर सार्वजनिक आक्षेप करना तो दूर एकांत में भी लोग ऐसा करना अनुचित मानते हैं। सारी संस्कृति और संस्कारों का मखौल उड़ाते हुए एक 14 साल के मृत लड़की के बारे में जो बातें कहीं गयी उनको सुनकर ऐसा लगा जैसे कि किसी ने कानों में गरम सीसा डाल दिया।
आखिर जांचकर्ताओं ने अदालत में माना कि मृत लड़की के पिता के विरुद्ध लगाये गये आरोप के संबंध में उसके पास कोई साक्ष्य नहीं है। अदालत ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया। पिता जेल से बाहर आ गया। यह कहानी है पर सब घटनायें समाज और देश के नियमों को अनुसार घटित हुईं। परेशान पिता जेल से छूटा तो अपनी पत्नी के साथ सांईबाबा के मंदिर गया।

बस प्रचार माध्यमों को अवसर मिल गया कि यह तो उनके चमत्कार की वजह से रिहा हुआ है। इस पर कई कार्यक्रम दिखाये और उसकी प्रष्ठभूमि में सांईबाबा के भजन बजाये। वैसे सांईबाबा के चमत्कारों के बारे में आजकल सभी चैनल जमकर प्रसारण कर रहे थे। यह उनके प्रति भक्ति भाव का नहीं बल्कि अपनी व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं के कारण कर रहे है। लोग चमत्कार एक कार्यक्रम के रूप में देखें और उसे खरीदें-यही भाव उनके मन में रहता है।
उपरोक्त हत्याकांड की जांच में अनेक विशेषज्ञ जांचकर्ता लगे। उन्होंने उसके हर पहलू का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। उन्होंने समय लिया पर हत्याकांड की स्थिति को देखते हुये यह कोई बड़ी बात नहीं थी। जांचकर्ता तमाम तरह की शैक्षणिक उपाधियों के साथ अपने कार्य का अनुभव लिये हुए थे। उसी आधार पर उन्होंने अपनी बात अदालत में रखी। अदालत ने भी सब देखा और जमानत दी। यह एक सहज और सामान्य प्रक्रिया है।
मगर प्रचार माध्यमों को इसमें कुछ ऐसा चाहिये था जिसे वह बेच सकें और इसे चमत्कार का तत्व उनको मिल गया। अपनी लड़की की पहले मौत और फिर उसकी हत्या का आरोप अपने ऊपर लेने वाले पिता के लिये पूरा समय संघर्षपूर्ण था और उस दौरान उसके पास न तो हादसे पर रोने का समय था और न किसी चमत्कार की उम्मीद करने का। रिहा होने के बाद वह सांईबाबा के मंदिर गया इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं था। अपने देश में कई ऐसे लोग हैं जो ऐसे अवसरों पर मंदिर जाते हैं। अनेक लड़के और लड़कियों को परीक्षा परिणाम में उत्तीर्ण होने पर मंदिर जाते देखा जा सकता है। किसी को लड़का हुआ है पत्नी अस्पताल में है तो पति पहले अपने इष्ट के मंदिर जाता है। कई लोग अकारण भी जाते हैं। मजे की बात यह है कि सांईबाबा के मंदिर जाने के बावजूद उस पिता ने किसी से नहीं कहा कि ‘कोई चमत्कार हुआ है’, पर प्रचार माध्यम अपनी तरफ से अनेक बातें जैसे पहले जोड़ रहे थे अब भी जोड़ रहे हैं।

सांई बाबा के इस देश में करोड़ों भक्त हैं। इन पंक्तियों का लेखक हर गुरूवार को सांईबाबा के मंदिर जाकर ध्यान लगाता है। उनका मूल संदेश यही है कि ‘श्रद्धा और सब्र रखो जीवन में सारे काम होंगे।’ आशय यही है कि अपने अंदर परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखते हुए उसका ध्यान करते हुए धीरज रखो सारे सांसरिक कार्य सहजता से हो जायेंगे। इसके बावजूद कुछ लोग उनके नाम पर चमत्कारों का प्रचार कर असहजता का वातावरण फैलाते हैं। सांईबाबा कहते हैं कि जीवन में धीरज रखो पर उनकी भक्ति का व्यवसायिक दोहन करने वाले कहते हैं कि आप दौड़ो उनके पीछे तो चमत्कार हो जायेगा। सांईबाबा के मंदिर में जाकर मैं जिस तरह के दृश्य देखता हूं तो मुझे अचंभा होता है कि लोग किस तरह उनके द्वारा दिये गये सहज रहने के संदेश की अवहेलना करते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो सांईबाबा के श्रद्धा और सब्र के संदेश के मार्ग पर चलेगा वह आनंद से जीवन व्यतीत करेगा पर यह चमत्कार नहीं है बल्कि उनके संदेश के अनुसार अपने जीवन को सहजता से जीने का सहज परिणाम है। चमत्कार शब्द तो असहजता का भाव पैदा करते हैं।

यह तो केवल एक घटना का उल्लेख भर किया गया है पर अनेक घटनायें ऐसी हैं जिनमें प्रचार माध्यम चमत्कार बनाकर अपने कार्यक्रमों को बेचते हैं। इस देश में ही श्रीगीता में निष्काम भाव से कार्य करने का संदेश दिया गया और यही वह देश है जिसमें सांसरिक कार्यों में सफलता के लिये चमत्कारों का प्रचार किया जाता है। ऐसा विरोधाभास शायद ही कहीं देखने को मिले। चमत्कारों को नमस्कार करते हुए सहज भाव का तिरस्कार करते हैं।
………………….

दीपक भारतदीप

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