वह औरत-कविता


दिन भर ईंट, पत्थर और
सीमेंट का मसाला-तस्सल सिर
पर रखकर ढोती वह औरत
रात्रि में प्लास्टिक की छत से ढंकी
झौंपडी के बाहर आंगन में
बबूल की लकड़ी से
अग्नि जलाकर
उस पर रोटी सेंकती वह औरत

सुबह चाय बनाते हुए
अपने बच्चे को
गोद में बैठाकर
उसे बडे स्नेह से
मुस्कान बिखेरती
और दूध पिलाती वह औरत

अपने अनवरत संघर्ष से
इस सृष्टी में जीवन को ही
सहजता से जीवनदान देती
चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती
अपनी शक्ति और सामर्थ्य का
प्रतीक है वह औरत
कोई उसके दर्द को नहीं सहलाता
उसकी तस्वीरें बाजार में बिकतीं हैं मंहगे भाव में
सोच भी नहीं सकती वह औरत
उसके दर्द का बयान करती हुई लिखी गयी कहानियां
बनी कई फिल्में
पाए उन्होने इनाम
न ही बदली उसकी दिनचर्या न काम
रोटी बनाना सुबह और शाम
दिन में मजदूरी और फिर खाने के बाद थोडा आराम
उसमें भी अपने ही जैसी औरतों को
अपना दर्द सुनाकर खुश होने की कोशिश करती वह औरत

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