हिंदी ब्लागःलेखकों को नाम व नामा मिले बगैर अंतर्जाल पर पाठक जुटाना मुश्किल


अंतर्जाल पर लिखते हुए आप कोई बात दावे से नहीं कह सकते क्योंकि एक तो इसका क्षेत्र बृहद है और इसमें तकनीकी इतनी सूक्ष्म है कि उसमें पारंगत होना सभी के लिये संभव नहीं है। ब्लाग लिखने का विचार मुझे एक अखबार में इस पर प्रकाशित एक लेख से आया था। मुझे तकनीकी रूप से इसकी जानकारी संभवतः छ माह बाद हो पायी। लिखते हुए करीब डेढ़ वर्ष से ऊपर हो गया है और कई बातें मुझे सोचने पर बाध्य कर देतीं हैं। मेरी इस पर शुरूआत मेरे एक मित्र द्वारा एक अंतर्जाल पत्रिका का पता ढूंढ कर उस पर अपनी किताब भिजवाने के लिए व्यवस्था करने के अनुरोध से हुआ। था। मेरी उस मित्र से मुलाकात हुई मैंने उससे पूछा-‘आपको उस पत्रिका का पता किसने दिया था?’

उसने बताया कि वह अब इसे भूल चुका है। वह कंप्यूटर और इंटरनेट के बारे मेंे कुछ नहीं जानता। इसका आशय यह है कि बाहर कुछ लोग हैं जो पहले से ही अंतर्जाल पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिये काम कर रहे हैं। यह लोग अंतर्जाल पत्रिकाओं और ब्लाग पर सक्रिय हैं। अपने कार्य को करते हुए वह यह आभास देते हैं कि यह उनका काम केवल शौक की वजह से है और इनको इसमें कोई अन्य लाभ नहीं है। अपने व्यवसायिक रहस्य उजागर न करना उनकी बाध्यता है पर मैं कोई व्यवसायिक ब्लाग लेखक नहीं हूं। मुझे उनसे कोई लाभ भी नहीं है कि मैं उनके इस व्यवसाय पर पर दृष्टिपात नहीं करूं। मैं उन पर प्रहार भी नहीं करना चाहता क्योंकि दूसरे की रोजीरोटी पर प्रहार करने वाला पापी होता है। यहां केवल मैं अपनी लेखकीय प्रतिबद्धता के तहत यह जानना चाहता हूं कि आखिर माजरा क्या है?

मेरा अनुमान है कि अंतर्जाल पर हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में लोगों को लिखने के लिए प्रेरित करने वाली कुछ प्रायोजित संस्थाऐं और लोगों के समूह है और जिन्हें लिखने से आर्थिक लाभ नहीं हैं उनके मित्र बनकर उन्हें प्रेरित करना शायद उनका उद्देश्य है और जिनको वह कुछ भुगतान कर रहे हैं उनको यह उत्तरदायित्व दिया गया है कि वह इन लेखकों के बीच में कुछ पाठ लिखकर और मुफ्त मे लिखने वाले ब्लाग लेखकों के पाठ पर टिप्पणी आदि देखकर प्रेरित करते रहें। छद्म और बेनाम लोगों की सक्रियता देखकर यह संशय किसी के मन में भी उठ सकता है। इतना ही नहीं कहीं कुछ ब्लाग लेखकों के सम्मेलन और शिविर लगाकर उनकी चर्चा समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कर आम नागरिकों में इस ब्लाग का प्रचार कर यह लोग अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे है। कुछ संस्थाओं के पदाधिकारी समाचार पत्रों में अपने बयान देकर यह प्रकट कर रहे हैं कि हिंदी ब्लाग जगत को वह बहुत निकट से देख रहे हैं। मेरे विचार से यह सब हो रहा है पर इसमें आपत्ति योग्य कुछ नहीं है।

आज एक अंग्रेजी अखबार में मैंने एक ऐसी ही संस्था और उसके पदाधिकारी की बात पढ़ी। उनका यह संदेश था कि ब्लाग लेखकों को आम दर्शक या पाठक के लिए लिखना चाहिए जैसे संपादकीय वगैरह। इस बारे में मैं एक दो ब्लाग में पढ़ चुका हूं। यह बात शुरू भी मैंने ही अपने ब्लाग पर शुरू की और आम पाठक को प्रभावित करने के लिए जितना मै कर सकता हूं कर रहा हूं। इसका आशय यह है कि हिंदी को अंतर्जाल पर स्थापित करने वालों ने इसी लाइन पर आगे बढ़ने का निर्णय किया है। मगर यह आलेख मैं उन लोगों की प्रशंसा में नहीं लिख रहा। बल्कि उनके प्रयासों में जो कमी है उसको सबके सामने रख रहा हूं। पहले इन संस्थाओं के स्वरूप का आधार समझें। वह कौन हो सकतीं हैं? वह दावा करतीं हैं कि उनका इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं है। उनकी सक्रियता देखकर लगता है कि-
1.कोई संस्था, व्यापारिक प्रतिष्ठान या कोई कंपनी उनको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फीस, पारिश्रमिक या कमीशन दे रही है। एक इंटरनेट उपभोक्ता के रूप में मैं प्रतिमाह साढ़े छह सौ रुपये का भुगतान कर रहा हूं और अगर कुछ लोगों की बातों पर यकीन किया जाये तो इस देश में छह से सात सौ करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है-इनसे कितना पैसा लिया जाता होगा यह आंकड़ों में मेरे पास उपलब्ध नहीं है पर जितना है उससे वह कंपनियां कुछ ऐसी संस्थाअें पर खर्च कर सकतीं हैं जो हिंदी और भारतीय भाषाओं में ब्लग लिखने के लिये प्रेरणा देने का काम करती हैं। इन्हीं में हिंदी पाठक ढूंंढे जा रहे हैं ताकि यह व्यवसाय बना रहे। संभव है कि गूगल जैसी संस्था भी इसके लिये भुगतान करती हो।
2.कुछ लोग जिन्होंने वेबसाइट बनायीं हों और वह इसके लिए बाजार ढूंढते हुए इस काम में जुटे हों ताकि और अधिक ब्लाग बनाकर वेबसाइट के स्पेस देकर उनसे पैसा कमाया जा सके।
3.इसके अलावा कोई विज्ञापन एजेंसी भी हो सकती है इसके लिए भुगतान करती हो।
4. कुछ ऐसी अंतर्जाल की पत्रिकाओं के संपादकों और ब्लाग लेखकों को भी इसके लिये भुगतान किया जाता होगा।
मैं किसी व्यक्ति द्वारा धन कमाये जाने का विरोधी नहीं हू पर इतना कहना चाहता हूं कि वह अपने दायित्वों का निर्वहन-भले ही वह निष्काम भाव से भी करते हों- नहीं कर रहे हैं। मेरे इस आलेख को पढ़कर कई ब्लाग लेखक और पाठक हैरान होंगे पर यह सच है कि जितने प्रयोग मेरे साथ हो रहे हैं उतने मैं भी करता हूं जो कभी कभी मूर्खतापूर्ण लगने वाली पोस्टों में दिखाई देता है। मैंने क्या देखा है।
1. मेरे वर्डपेस के ब्लाग पर स्पैम में अनेक कमेंट आये और उससे लगता है िक कोई मीडिया जैसे शब्द धारण करने वाली वेबसाईटें वहां अपने कमेंट डाल जातीं हैं और उनसे मेेरे व्यूज भी बनते हैं। कभी कभी तो संदेह होता है कि कोई अज्ञात शक्ति है जो मुझे सतत लिखने को प्रेरित कर रही है।
2.ब्लाग स्पाट से पता नहीं कहां से इतने सारे व्यूज आ जाते हैं जिनके आने का मार्ग ही पता नहीं चलता। यह व्यूज हिंदी के ब्लाग दिखाने वाले फोरमों से कई गुना अधिक होते है।
3.मैंने कई ऐसे लोगों को ईमेल किये जो ब्लाग लेखक नहीं हैं पर उनका कभी उत्तर नहीं आया। मैं उनको हिंदी में लिखने के लिए टूल भेजता हूं। कुछ लोगों से थोड़े दिन संपर्क रहा। उन्होंने ब्लाग भी बनाये फिर पता नहीं कहां गायब हो गये। वह छद्म नाम के लोग थे? कई बार ब्लाग के बारे में लिखे गये विषयों पर उन लोगों ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं जैसे बहुत अनुभवी हों। फिर गायब हो गये। मैं उनसे हार्दिक प्रेम करता हूं। आखिर कोई न कोई मुझे प्रेरित करने के लिए लगा ही रहता है। वह मनुष्य हैं चाहे जो भी नाम हों पर उनसे मुझे कोई शिकायत नहीं है। मुझे प्यार देने वाले लोगों के शब्द इस तरह होते हैं जैसे एक या दो लोग हैं जो नाम बदल बदलकर प्रकट होते है।
मुझे सिर्फ एक बार अखरी। यह संस्थाएं या लोग मीडिया से जुडे+ हैं पर एक भी स्थान पर मेरा नाम नहीं दिया। अभी तक यह पुराने ब्लाग लेखक वह भी जो बड़े शहरों में रहते हैं उनका नाम दिया। वह प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और अपने नाम देते हैं पर क्या कभी इस हिंदी ब्लाग जगत में वास्तविक नाम से सक्रिय छोटे शहरों के ब्लाग लेखकों को प्रसिद्ध करने में कोई योगदान दिया। अगर वह ऐसा करते तो हो सकता है कि हमें पाठक अधिक मिल जाते और उनका काम शायद और आसान हो जाता। यहां टिप्पणियां लिखकर ही अपना दायित्व समाप्त मान लिया और हमें छोड़ दिया अकेले पाठक जुटाने के लिए। 2000 हजार से अधिक पोस्ट लिखकर भी मैंने क्या पाया है? यह मेरे नहीं उनके सोचने का विषय है।

मुझे वह लोग लिखते हैं कि तुम्हारे लेख का उपयोग करना चाहते हैं और जब सम्मति देता हूं तो लिखते हैं कि छः माह बाद करेंगे-ऐसा लगता है कि मुझे अपने बड़े ब्लाग लेखक होने का भ्रम हो जाये जो आज तक नहीं हुआ। मुझे पता नहीं अदृश्य प्रायोजक कौन है पर यह सच है कि हिंदी ब्लाग जगत पर लिखवाने का उत्तरदायित्व लेने वालों ने सही नीति नहीं अपनाई। कभी कभी तो मन करता है कि मैंने दूसरों के उद्देश्यों की पूर्ति की पर मेरी सफलता मुझसे दूर है। न नाम मिला न नामा इसलिये अपने सारे ब्लाग ही नष्ट कर डालूं पर फिर सोचता हूं देखें आगे-आगे होता है क्या? वैसे गुस्सा आने पर यह मैं कर सकता हूं। एक दिन मैंने अपनी सारी प्रकाशित रचनाएं फाड़ दी थीं।
अंतर्जाल पर हिंदी लिखने का काम मंथर गति से चल रहा है और उसके लिये वही लोग जिम्मेदार हैं जिन्होंने पैसा लेकर या अपनी इच्छा से यह काम अपने हाथ में लिया। इसका कारण वही है कि हिंदी के लेखक को सम्मान और धन से वंचित कर अपने लिऐ रोटी जुगाड़ करने की जो प्रवृत्ति पुराने प्रकाशकों में थी अब वही अंतर्जाल पर हो रहा है। यह मेरी शिकायत नहीं बल्कि उनके कामों का प्रतिवेदन है जिससे पता लगता है कि वह अपने काम में नाकाम रहे।

उनको छः करोड़ उपभोक्ता दिख रहे हैं और उनमें ही यह चार पांच सौ ब्लाग लेखक भी। इनमें उन्होंने 10 से पंद्रह लोगों को अपना साथी बना रखा है और सोचते हैं कि बाकी तो उपभोक्ता हैं जैसे अन्य छः करोड हैं। फिल्मी अभिनेताओं और कुछ माडलनुमा कवि-शायरों से भी ब्लाग बनवा लिया और लगे है उसका प्रचार करने। यह नहीं कि जमीन से उठे ब्लाग लेखकों को प्रचार दें जो वाकई लिखकर मेहनत कर रहे हैं। अंतर्जाल पर निकलने वाली पत्रिकाओं के सपंादकों और ब्लाग लेखकों के जो सम्मान के समाचार आते हैं और तब यह समझते मुझे देर नहीं लगती कि कोई समूह है जो इस तरह की गतिविधियों में लगे हैं। समूह के एक व्यक्ति की नाराजी से पूरे समूह के नाराज होने का प्रमाण मेरे पास है पर उसका कोई फायदा नहीं क्योंकि वह तो किसी से जुड़े हैं और उनकी नहीं बजायेंगे तो तो क्या मुझे समर्थन देंगे।
मैं अपनी बात तो कहता ही रहता हूं पर आज यह स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि सामान्य ब्लाग लेखकों को उनके लिखने के आधार पर अगर सम्मान और धन नहीं मिलेगा तो यह अभियान कभी सफल नहीं होगा। बड़े नामों के सहारे यह हिंदी ब्लाग जगत आगे नहीं बढ़ सकेगा। छहः करोड़ इंटरनेट उपभोक्ताओं में सभी नहीं लिखेंगे बल्कि पढ़ना चाहेंगे और यह छह सौ ब्लाग लेखक अगर उनसे अलग कर देखें जायें तो इनमें ही इतना सामथर््य है कि वह पाठकों को जुटा लेेंगे। समस्या यह है कि उनको नाम और नामा (अगर दिया जा सकता है तो) देना नहीं चाहते। मैं देख रहा हूं कि किस तरह के लोग नाम जुटा रहे हैं। यह लेख भी अब मुझे थका रहा है और शायद अब मैं इतनी अधिक पोस्ट नहीं लिखूं जितनी लिखता हूं। मेरे यह सच छिपा नहीं है कि लोग स्वयं आर्थिक लाभ ले रहे हैं। होटलों और रेस्टराओं में कौन आखिर पैसे खर्च कर रहा है? इतने बड़े-बड़े सम्मेलन हो रहे हैं और अंतर्जाल की पत्रिकाओं के संपादक और ब्लाग लेखक वहां पहूंचकर सम्मानित हो रहे है क्या उसमें पैसे खर्च नहीं होते? यह सब हो इसमें कोई आपत्ति नहीं है पर छोटे शहर के मध्यम वर्ग के ब्लाग लेखकों को प्रोत्साहित किये बिना अंतर्जाल पर पाठक जुटाने लायक लिखना संभव नहीं है। ब्लाग लेखकों का उपभोक्ता मानकर चलना एक मूर्खतापूर्ण विचार है।

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टिप्पणियाँ

  • alpana  On मई 25, 2008 at 11:52 पूर्वाह्न

    laisa lagta hai ekh bahut vichar ke baad likha gaya hai..

    khaaskar hindi blogging ke baare mein aap ki yah research bahut had tak sahi hai.
    shayad isee baat par’ hindyugm’ aur ‘Tarkash’ jaisee websites hamesha lekhakon ke liye inaam rakhti hai..aur pathakon ke liye bhi….jis se unhen protsahan miley…aur hindi blogging ko badahva..
    .lekin niyamit ruup se yahan kisi lekhak vishesh ko namaa de kar aap kaise likhwayenge??
    is tarah ke chalan. se… blogging ke asli astitava yani–‘swatantra abhivyakti’ par prahar hoga.
    naaam aur naaame ki fikar shayad hi koi lekhak [blog lekhak]–aur pathak swayam apni marzi se apne pasand ke lekh dhuundhte hain..
    pathak ki sankhya par lekhakon ko dhan ya samman dene bhar se asaar padega –aisa puuri tarah sach nahin hai…
    aisa main sochti hun..
    dhnywaad.
    dhnywaad.

  • दीपक भारतदीप  On मई 25, 2008 at 12:17 अपराह्न

    अल्पना जी
    आप यह बतायें मेरे ब्लाग पर पांच सौ से छहः सो व्यूज आते हैं। इनमें ब्लाग लेखकों के न होकर पाठकों के लगते है। क्या इतने पाठक होंगे या कोई एजेंसी यह करवा रही है। अगर मैं अपने ब्लाग देखता हूं तो लगता है कि मैं लोकप्रिय हो रहा हूं पर फिर एक संदेह होता है कि शायद इस तरह भरमाया जा रहा है। कुछ ब्लाग लिखें जायें तभी तो लोगों में प्रचार होगा और इंटरनेट कनेक्शनों की संख्या बढ़ेगी? आप सिद्धांतों की बात कर रही हैं मैं उसमें कुछ और ढूंढ रहा हूं। मैं जानना चाहता हूं कि कहीं ब्लाग पर प्रायोजित व्यूज दिखाकर हमसे लिखवाया तो नहीं जा रहा। आप और हम लेखक हैं और हमारी प्रतिबद्धताएं स्पष्ट हैं पर हमारा लिखा क्या वाकई आम पाठक पढ़ रहा है? या उस आधार पर प्रचार कर कोई अपना व्यवसाय बढ़ा रहा है। इस प्रश्न की तलाश में यह लिखा गया है।
    दीपक भारतदीप

  • samshadahmad  On मई 25, 2008 at 12:37 अपराह्न

    दीपक जी!
    अंतर्जाल पर अधिक से अधिक पाठक तो सिर्फ समाचार पत्रों की ईमानदार कोशिश से ही आ सकते है. आपने भी एक समाचार पत्र में ब्लोगिंग के बारे में पढ़ कर अंतरजाल पर लिखना शुरू किया था और मैंने भी भास्कर के ग्वालियर संस्करण में ब्लोगिंग पर दी गई उपयोगी जानकारी के बाद ही अंतरजाल पर लेखन शुरू किया था. कमाल ये था कि मैं ६ वर्ष से कंप्यूटर ओपरेट कर रहा हूँ तो भी मुझे आसान तरीके से हिन्दी में लिखने में करीब ४ माह का समय लगा. एक समय ऐसा आया था जब में बिल्कुल निराश हो चला था परन्तु उसी समय आपकी पहली टिपण्णी ने मेरा होसला बढाया. और अभी भी इंटरनेट के ६०० रूपये मासिक खत्म करके किसी तरह टिका हुआ हूँ. कमाई भले ही ना हो लेकिन कम से कम इंटरनेट का किराया तो ब्लोगिंग से निकलना ही चाहिए ऐसा मेरा मानना है कैसे ये पता नहीं परन्तु इससे भी शायद नए पाठक और ब्लोगर अंतर्जाल से जुडेंगे.

  • samshadahmad  On मई 25, 2008 at 12:46 अपराह्न

    एक बात और,
    मैंने सर्वप्रथम आपके ब्लाग पर अपना नाम, ब्लाग यू आर एल और इमेल पता टाईप किया था तब से में वर्ड प्रेस के किसी भी ब्लाग को देखता हूँ तो मेरा नाम पता सामने आ जाता है. अटपटा लगता है इसको हटाने का कोई उपाय हो तो बताएं.

  • दीपक भारतदीप  On मई 25, 2008 at 12:57 अपराह्न

    शमशाद जी
    आपकी बात पर मुझे ध्यान आया कि मैंने आपको रोमन लिपि में हिंदी लिखने वाला इंडिक टूल भेजा था उसके बाद ही मुझे इस भले काम के रूप में कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाले टूल का पता मिला। अब मै जैसा सोचता हूं वैसा ही लिखता हूं। अगर आप कृतिदेव या देव मेंे टाईप करने वाले व्यक्ति हैं तो श्री अनुनाद सिंह जी के ब्लाग से टूल उठा ले। मेरा टूल मेरे ही विंडो में सेव हो गया है तो उसका पता नहीं है। आप मुझे लिखें तो वह मै। उसे फिर लाकर दे सकता हूं। आपने टिप्पणी की धन्यवाद। यह आलेख कुछ अजमाने के लिए मैंने लिखा है और आपके समर्थन ने मेरा विश्वास बढ़ाया है।
    दीपक भारतदीप

    आपके जो ब्लाग का पता आ रहा है इसका आशय यह है कि अगर आप वहां टिप्पणी लिखते हैं तो लिखिये और फिर सबमिट छोड़कर हट जाईये। अगर आप किसी दूसरे नाम से लिखना चाहते हैं तो फिर वहंा बदलाव कीजिये। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह तो चूंकि हमारे टाईप करने से आता है। आप अगर नहीं चाहते तो बने रहने दीजिये। वह हमारे कंप्यूटर से ही वहां आता है। मेरे साथ भी ऐसा ही है।
    दीपक भारतदीप

  • samshadahmad  On मई 25, 2008 at 1:10 अपराह्न

    धन्यवाद दीपक जी, लिखता तो मैं भी कीर्ति देव में ही हूँ लेकिन बसेरा पर जाकर यूनिकोड में कर लेता हूँ. काम चल रहा है जब कभी परेशानी दिखी तो आपको ही बताऊंगा.

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